दोहा 119
फिरत नारि नर अति पछिताहीं। दैअहि दोषु देहिं मन माहीं॥ सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं॥१॥
भावार्थ
लौटते हुए वे स्त्री-पुरुष बहुत ही पछताते हैं और मन-ही-मन दैवको दोष देते हैं। परस्पर [ बड़े ही ] विषादके साथ कहते हैं कि विधाताके सभी काम उलटे हैं॥१॥
निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू॥ रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा॥२॥
भावार्थ
वह विधाता बिलकुल निरंकुश ( स्वतन्त्र ), निर्दय और निडर है, जिसने चन्द्रमाको रोगी ( घटने-बढ़नेवाला ) और कलंकी बनाया, कल्पवृक्षको पेड़ और समुद्रको खारा बनाया। उसीने इन राजकुमारोंको वनमें भेजा है॥२॥
जौं पै इन्हहि दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू॥ ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना॥३॥
भावार्थ
जब विधाताने इनको वनवास दिया है, तब उसने भोग-विलास व्यर्थ ही बनाये। जब ये बिना जूतेके ( नंगे ही पैरों ) रास्तेमें चल रहे हैं, तब विधाता अनेकों वाहन ( सवारियाँ ) व्यर्थ ही रचे॥३॥
ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता॥ तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा॥४॥
भावार्थ
जब ये कुश और पत्ते बिछाकर जमीनपर ही पड़े रहते हैं, तब विधाता सुन्दर सेज ( पलंग और बिछौने ) किसलिये बनाता है? विधाताने जब इनको बड़े-बड़े पेड़ों [ के नीचे ] का निवास दिया, तब उज्ज्वल महलोंको बना-बनाकर उसने व्यर्थ ही परिश्रम किया॥४॥
जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार। बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार॥११९॥
भावार्थ
जो ये सुन्दर और अत्यन्त सुकुमार होकर मुनियोंके ( वल्कल ) वस्त्र पहनते और जटा धारण करते हैं, तो फिर करतार ( विधाता ) ने भाँति-भाँतिके गहने और कपड़े वृथा ही बनाये॥११९॥
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