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दोहा 121

चौ०

नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकईं साँझ समय जनु सोहीं॥ मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी॥१॥

भावार्थ

स्त्रियाँ स्नेहवश विकल हो जाती हैं। मानो सन्ध्याके समय चकवी [ भावी वियोगकी पीड़ासे ] सोह रही हों ( दुःखी हो रही हों )। इनके चरणकमलोंको कोमल तथा मार्गको कठोर जानकर वे व्यथित हृदयसे उत्तम वाणी कहती हैं—॥१॥

चौ०

परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे॥ जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा॥२॥

भावार्थ

इनके कोमल और लाल-लाल चरणों ( तलवों ) को छूते ही पृथ्वी वैसे ही सकुचा जाती है जैसे हमारे हृदय सकुचा रहे हैं। जगदीश्वरने यदि इन्हें वनवास ही दिया, तो सारे रास्तेको पुष्पमय क्यों नहीं बना दिया?॥२॥

चौ०

जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं॥ जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखन पाए॥३॥

भावार्थ

यदि ब्रह्मासे माँगे मिले तो हे सखि! [ हम तो उनसे माँगकर ] इन्हें अपनी आँखोंमें ही रखें! जो स्त्री-पुरुष इस अवसरपर नहीं आये, वे श्रीसीतारामजीको नहीं देख सके॥३॥

चौ०

सुनि सुरूपु बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई॥ समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई॥४॥

भावार्थ

उनके सौन्दर्यको सुनकर वे व्याकुल होकर पूछते हैं कि भाई! अबतक वे कहाँतक गये होंगे? और जो समर्थ हैं वे दौड़ते हुए जाकर उनके दर्शन कर लेते हैं और जन्मका परम फल पाकर, विशेष आनन्दित होकर लौटते हैं॥४॥

दो०

अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं। होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं॥१२१॥

भावार्थ

[ गर्भवती, प्रसूता आदि ] अबला स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े [ दर्शन न पानेसे ] हाथ मलते और पछताते हैं। इस प्रकार जहाँ-जहाँ श्रीरामचन्द्रजी जाते हैं, वहाँ-वहाँ लोग प्रेमके वशमें हो जाते हैं॥१२१॥

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