युद्धकाण्ड, सर्ग 99
महोदरमहापार्श्वौ हतौ दृष्ट्वा स रावणः । तस्मिंश्च निहते वीरे विरूपाक्षे महाबले ॥ १ ॥ आविवेश महान् क्रोधो रावणं तु महामृधे । सूतं संचोदयामास वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ २ ॥
भावार्थ
महाबली वीर विरूपाक्ष तो मारा ही गया था; महोदर और महापार्श्व भी कालके गालमें डाल दिये गये—यह देख उस महासमरके भीतर रावणके हृदयमें महान् क्रोधका आवेश हुआ। उसने सारथिको रथ आगे बढ़ानेकी आज्ञा दी और इस प्रकार कहा—॥ १-२ ॥
निहतानाममात्यानां रुद्धस्य नगरस्य च । दुःखमेवापनेष्यामि हत्वा तौ रामलक्ष्मणौ ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘सूत ! मेरे मन्त्री मारे गये और लङ्कापुरीपर चारों ओरसे घेरा डाला गया । इसके लिये मुझे बड़ा दुःख है । आज राम और लक्ष्मणका वध करके ही मैं अपने इस दुःखको दूर करूँगा ॥ ३ ॥
रामवृक्षं रणे हन्मि सीतापुष्पफलप्रदम् । प्रशाखा यस्य सुग्रीवो जाम्बवान् कुमुदो नलः ॥ ४ ॥ द्विविदश्चैव मैन्दश्च अङ्गदो गन्धमादनः । हनूमांश्च सुषेणश्च सर्वे च हरियूथपाः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘रणभूमिमें उस रामरूपी वृक्षको उखाड़ फेंकूँगा, जो सीतारूपी फूलके द्वारा फल देनेवाला है तथा सुग्रीव, जाम्बवान्, कुमुद, नल, द्विविद, मैन्द, अङ्गद, गन्धमादन, हनुमान् और सुषेण आदि समस्त वानरयूथपति जिसकी शाखा-प्रशाखाएँ हैं’ ॥ ४-५ ॥
स दिशो दश घोषेण रथस्यातिरथो महान् । नादयन् प्रययौ तूर्णं राघवं चाभ्यधावत ॥ ६ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर महान् अतिरथी वीर रावण अपने रथकी घर्घराहटसे दसों दिशाओंको गुँजाता हुआ बड़ी तेजीके साथ श्रीरघुनाथजीकी ओर बढ़ा ॥ ६ ॥
पूरिता तेन शब्देन सनदीगिरिकानना । संचचाल मही सर्वा त्रस्तसिंहमृगद्विजा ॥ ७ ॥
भावार्थ
रथकी आवाजसे नदी, पर्वत और जंगलोंसहित वहाँकी सारी भूमि गूँज उठी, धरती डोलने लगी और वहाँके सारे पशु-पक्षी भयसे थर्रा उठे ॥ ७ ॥
तामसं सुमहाघोरं चकारास्त्रं सुदारुणम् । निर्ददाह कपीन् सर्वांस्ते प्रपेतुः समन्ततः ॥ ८ ॥
भावार्थ
उस समय रावणने तामस नामवाले अत्यन्त भयंकर महाघोर अस्त्रको प्रकट करके समस्त वानरोंको भस्म करना आरम्भ किया । सब ओर उनकी लाशें गिरने लगीं ॥ ८ ॥
उत्पपात रजो भूमौ तैर्भग्नैः सम्प्रधावितैः । नहि तत् सहितुं शेकुर्ब्रह्मणा निर्मितं स्वयम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
उनके पाँव उखड़ गये और वे इधर-उधर भागने लगे, इससे रणभूमिमें बहुत धूल उड़ने लगी । वह तामस अस्त्र साक्षात् ब्रह्माजीका बनाया हुआ था, इसलिये वानर-योद्धा उसके वेगको सह न सके ॥ ९ ॥
तान्यनीकान्यनेकानि रावणस्य शरोत्तमैः । दृष्ट्वा भग्नानि शतशो राघवः पर्यवस्थितः ॥ १० ॥
भावार्थ
रावणके उत्तम बाणोंसे आहत हो वानरोंकी सैकड़ों सेनाएँ तितर-बितर हो गयी हैं—यह देख भगवान् श्रीराम युद्धके लिये उद्यत हो मुस्थिरभावसे खड़े हो गये ॥ १० ॥
ततो राक्षसशार्दूलो विद्राव्य हरिवाहिनीम् । स ददर्श ततो रामं तिष्ठन्तमपराजितम् ॥ ११ ॥ लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा विष्णुना वासवं यथा ।
भावार्थ
उधर वानर-सेनाको खदेड़कर राक्षससिंह रावणने देखा कि किसीसे पराजित न होनेवाले श्रीराम अपने भाई लक्ष्मणके साथ उसी तरह खड़े हैं, जैसे इन्द्र अपने छोटे भाई भगवान् विष्णु ( उपेन्द्र ) के साथ खड़े होते हैं ॥ ११½ ॥
आलिखन्तमिवाकाशमवष्टभ्य महद् धनुः ॥ १२ ॥ पद्मपत्रविशालाक्षं दीर्घबाहुमरिंदमम् ।
भावार्थ
वे अपने विशाल धनुषको उठाकर आकाशमें रेखा खींचते-से प्रतीत होते थे । उनके नेत्र विकसित कमलदलके समान विशाल थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं और वे शत्रुओंका दमन करनेमें पूर्णतः समर्थ थे ॥ १२½ ॥
ततो रामो महातेजाः सौमित्रिसहितो बली ॥ १३ ॥ वानरांश्च रणे भग्नानापतन्तं च रावणम् । समीक्ष्य राघवो हृष्टो मध्ये जग्राह कार्मुकम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
तदनन्तर लक्ष्मणसहित खड़े हुए महातेजस्वी महाबली श्रीरामने रणभूमिमें वानरोंको भागते और रावणको आते देख मनमें बड़े हर्षका अनुभव किया और धनुषके मध्यभागको दृढ़ताके साथ पकड़ा ॥ १३-१४ ॥
विस्फारयितुमारेभे ततः स धनुरुत्तमम् । महावेगं महानादं निर्भिन्दन्निव मेदिनीम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
उन्होंने अपने महान् वेगशाली और महानाद प्रकट करनेवाले उत्तम धनुषको इस तरह खींचना और उसकी टङ्कार करना आरम्भ किया, मानो वे पृथ्वीको विदीर्ण कर डालेंगे ॥ १५ ॥
रावणस्य च बाणौघैर्गमविस्फारितेन च । शब्देन राक्षसास्तेन पेतुश्च शतशस्तदा ॥ १६ ॥
भावार्थ
रावणके बाण-समूहोंसे तथा श्रीरामचन्द्रजीके धनुषकी टङ्कारसे जो भयंकर शब्द प्रकट हुआ, उससे आतङ्कित होकर सैकड़ों राक्षस तत्काल धराशायी हो गये ॥ १६ ॥
तयोः शरपथं प्राप्य रावणो राजपुत्रयोः । स बभौ च यथा राहुः समीपे शशिसूर्ययोः ॥ १७ ॥
भावार्थ
उन दोनों राजकुमारोंके बाणोंके मार्गमें आकर रावण चन्द्रमा और सूर्यके समीप स्थित हुए राहुकी भाँति शोभा पाने लगा ॥ १७ ॥
तमिच्छन् प्रथमं योद्धुं लक्ष्मणो निशितैः शरैः । मुमोच धनुरायम्य शरानग्निशिखोपमान् ॥ १८ ॥
भावार्थ
लक्ष्मण अपने पैने बाणोंके द्वारा रावणके साथ पहले स्वयं ही युद्ध करना चाहते थे; इसलिये धनुष तानकर वे अग्निशिखाके समान तेजस्वी बाण छोड़ने लगे ॥ १८ ॥
तान् मुक्तमात्रानाकाशे लक्ष्मणेन धनुष्मता । बाणान् बाणैर्महातेजा रावणः प्रत्यवारयत् ॥ १९ ॥ एकमेकेन बाणेन त्रिभिस्त्रीन् दशभिर्दश । लक्ष्मणस्य प्रचिच्छेद दर्शयन् पाणिलाघवम् ॥ २० ॥
भावार्थ
धनुर्धर लक्ष्मणके धनुषसे छूटते ही उन बाणोंको महातेजस्वी रावणने अपने सायकोंद्वारा आकाशमें ही काट गिराया ॥ वह अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाता हुआ लक्ष्मणके एक बाणको एक बाणसे, तीन बाणोंको तीन बाणसे और दस बाणोंको उतने ही बाणोंसे काट देता था ॥ २० ॥
अभ्यतिक्रम्य सौमित्रिं रावणः समितिंजयः । आससाद रणे रामं स्थितं शैलमिवापरम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
समरविजयी रावण सुमित्राकुमारको लाँघकर रणभूमिमें दूसरे पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े हुए श्रीरामके पास जा पहुँचा ॥ २१ ॥
स राघवं समासाद्य क्रोधसंरक्तलोचनः । व्यसृजच्छरवर्षाणि रावणो राक्षसेश्वरः ॥ २२ ॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीके निकट जाकर क्रोधसे लाल आँखें किये राक्षसराज रावण उनके ऊपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥ २२ ॥
शरधारास्ततो रामो रावणस्य धनुश्च्युताः । दृष्ट्वावपतिताः शीघ्रं भल्लाञ्जग्राह सत्वरम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
रावणके धनुषसे गिरती हुई उन बाण धाराओंपर दृष्टिपात करके श्रीरामने बड़ी उतावलीके साथ शीघ्र ही कई भल्ल हाथमें लिये ॥ २३ ॥
ताञ्छरौघांस्ततो भल्लैस्तीक्ष्णैश्चिच्छेद राघवः । दीप्यमानान् महाघोराञ्छरान्राशीविषोपमान् ॥ २४ ॥
भावार्थ
रघुकुलभूषण श्रीरामने रावणके विषधर सर्पोंके समान महाभयंकर एवं दीप्तिमान् बाणसमूहोंको उन तीखे भल्लोंसे काट डाला ॥ २४ ॥
राघवो रावणं तूर्णं रावणो राघवं तथा । अन्योन्यं विविधैस्तीक्ष्णैः शरवर्षैर्ववर्षतुः ॥ २५ ॥
भावार्थ
फिर श्रीरामने रावणको और रावणने श्रीरामको अपना लक्ष्य बनाया और दोनों ही शीघ्रतापूर्वक एक दूसरेपर भाँति-भाँतिके पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २५ ॥
चेरतुश्च चिरं चित्रं मण्डलं सव्यदक्षिणम् । बाणवेगात् समुत्क्षिप्तावन्योन्यमपराजितौ ॥ २६ ॥
भावार्थ
वे दोनों चिरकालतक वहाँ विचित्र दायें-बायें पैतरेसे विचरते रहे । बाणके वेगसे एक-दूसरेको घायल करते हुए वे दोनों वीर पराजित नहीं होते थे ॥ २६ ॥
तयोर्भूतानि वित्रेसुर्युगपत् सम्प्रयुध्यतोः । रौद्रयोः सायकमुचोर्यमान्तकनिकाशयोः ॥ २७ ॥
भावार्थ
एक साथ जूझते और सायकोंकी वर्षा करते हुए श्रीराम और रावण यमराज और अन्तकके समान भयंकर जान पड़ते थे । उनके युद्धसे सम्पूर्ण प्राणी थर्रा उठे ॥ २७ ॥
सततं विविधैर्बाणैर्बभूव गगनं तदा । घनैरिवातपापाये विद्युन्मालासमाकुलैः ॥ २८ ॥
भावार्थ
जैसे वर्षा ऋतुमें विद्युत्-समूहोंसे व्याप्त मेघोंकी घटासे आकाश आच्छादित हो जाता है, उसी प्रकार उस समय नाना प्रकारके बाणोंसे वह ढक गया था ॥ २८ ॥
गवाक्षितमिवाकाशं बभूव शरवृष्टिभिः । महावेगैः सुतीक्ष्णाग्रैर्गृध्रपत्रैः सुवाजितैः ॥ २९ ॥
भावार्थ
गीधकी पाँखके सुन्दर परोंसे सुशोभित और तेज धारवाले महान् वेगशाली बाणोंकी अनवरत वर्षासे आकाश ऐसा जान पड़ता था, मानो उसमें बहुत-से झरोखे लग गये हों ॥ २९ ॥
शरान्धकारमाकाशं चक्रतुः परमं तदा । गतेऽस्तं तपने चापि महामेघाविवोत्थितौ ॥ ३० ॥
भावार्थ
दो बड़े-बड़े मेघोंकी भाँति उठे हुए श्रीराम और रावणने सूर्यके अस्त और उदित होनेपर भी बाणोंके गहन अन्धकारसे आकाशको ढक रक्खा था ॥ ३० ॥
तयोरभून्महायुद्धमन्योन्यवधकाङ्क्षिणोः । अनासाद्यमचिन्त्यं च वृत्रवासवयोरिव ॥ ३१ ॥
भावार्थ
दोनों एक-दूसरेका वध करना चाहते थे; अतः वृत्रासुर और इन्द्रकी भाँति उन दोनोंमें ऐसा महान् युद्ध होने लगा, जो दुर्लभ तथा अचिन्त्य है ॥ ३१ ॥
उभौ हि परमेष्वासावुभौ युद्धविशारदौ । उभावस्त्रविदां मुख्यावुभौ युद्धे विचेरतुः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
दोनों ही महान् धनुर्धर और दोनों ही युद्धकी कलामें निपुण थे । दोनों ही अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे; अतः दोनों बड़े ही उत्साहसे रणभूमिमें विचरने लगे ॥ ३२ ॥
उभौ हि येन व्रजतस्तेन तेन शरोर्मयः । ऊर्मयो वायुना विद्धा जग्मुः सागरयोरिव ॥ ३३ ॥
भावार्थ
वे जिस-जिस मार्गसे जाते, उसी-उसीसे बाणोंकी लहर-सी उठने लगती थी । ठीक उसी तरह, जैसे वायुके थपेड़े खाकर दो समुद्रोंके जलमें उत्ताल तरङ्गें उठ रही हों ॥ ३३ ॥
ततः संसक्तहस्तस्तु रावणो लोकरावणः । नाराचमालां रामस्य ललाटे प्रत्यमुञ्चत ॥ ३४ ॥
भावार्थ
तदनन्तर जिसके हाथ बाण छोड़नेमें ही लगे हुए थे, समस्त लोकोंको रुलानेवाले उस रावणने श्रीरामचन्द्रजीके ललाटमें नाराचोंकी माला-सी पहना दी ॥ ३४ ॥
रौद्रचापप्रयुक्तां तां नीलोत्पलदलप्रभाम् । शिरसाधारयद् रामो न व्यथामभ्यपद्यत ॥ ३५ ॥
भावार्थ
भयंकर धनुषसे छूटी और नील कमलदलके समान श्याम कान्तिसे प्रकाशित होती हुई उस नाराच-मालाको श्रीरामचन्द्रजीने अपने सिरपर धारण किया; किंतु वे व्यथित नहीं हुए ॥ ३५ ॥
अथ मन्त्रानपि जपन् रौद्रमस्त्रमुदीरयन् । शरान् भूयः समादाय रामः क्रोधसमन्वितः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् क्रोधसे भरे हुए श्रीरामने पुनः बहुत-से बाण लेकर मन्त्रजपपूर्वक रौद्रास्त्रका प्रयोग किया ॥ ३६ ॥
मुमोच च महातेजाश्चापमायम्य वीर्यवान् । ताञ्शरान् राक्षसेन्द्राय चिक्षेपाच्छिन्नसायकः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
फिर उन महातेजस्वी, महापराक्रमी और अविच्छिन्नरूपसे बाणवर्षा करनेवाले श्रीरघुवीरने धनुषको कानतक खींचकर वे सभी बाण राक्षसराज रावणपर छोड़ दिये ॥ ३७ ॥
ते महामेघसंकाशे कवचे पतिताः शराः । अवध्ये राक्षसेन्द्रस्य न व्यथां जनयंस्तदा ॥ ३८ ॥
भावार्थ
वे बाण राक्षसराज रावणके महामेघके समान काले रंगके अमेध कवचपर गिरे थे; इसलिये उस समय उसे व्यथित न कर सके ॥ ३८ ॥
पुनरेवाथ तं रामो रथस्थं राक्षसाधिपम् । ललाटे परमास्त्रेण सर्वास्त्रकुशलोऽभिनत् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
सम्पूर्ण अस्त्रोंके संचालनमें कुशल भगवान् श्रीरामने पुनः रथपर बैठे हुए राक्षसराज रावणके ललाटमें उत्तम अस्त्रोंका प्रहार करके उसे घायल कर दिया ॥ ३९ ॥
ते भित्त्वा बाणरूपाणि पञ्चशीर्षा इवोरगाः । श्वसन्तो विविशुर्भूमिं रावणप्रतिकूलिताः ॥ ४० ॥
भावार्थ
श्रीरामके वे उत्तम बाण रावणको घायल करके उसके निवारण करनेपर फुफकारते हुए पाँच सिरवाले सर्पोंके समान धरतीमें समा गये ॥ ४० ॥
निहत्य राघवस्यास्त्रं रावणः क्रोधमूर्च्छितः । आसुरं सुमहाघोरमस्त्रं प्रादुश्चकार सः ॥ ४१ ॥ सिंहव्याघ्रमुखांश्चापि कङ्ककोकमुखानपि । गृध्रश्येनमुखांश्चापि शृगालवदनांस्तथा ॥ ४२ ॥ ईहामृगमुखांश्चापि व्यादितास्यान् भयावहान् । पञ्चास्याँल्लेलिहानांश्च ससर्ज निशिताञ्शरान् ॥ ४३ ॥ शरान् खरमुखांश्चान्यान् वराहमुखसंस्थितान् । श्वानकुक्कुटवक्त्रांश्च मकराशीविषाननान् ॥ ४४ ॥ एतांश्चान्यांश्च मायाभिः ससर्ज निशिताञ्छरान् । रामं प्रति महातेजाः क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् ॥ ४५ ॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीके अस्त्रका निवारण करके क्रोधसे मूर्छित हुए रावणने आसुरनामक दूसरा महाभयंकर अस्त्र प्रकट किया॥ उससे सिंह, बाघ, कङ्क, चक्रवाक, गीध, बाज, सियार, भेड़िये, गदहे, सूअर, कुत्ते, मुर्गे, मगर और जहरीले साँपोंके समान मुखवाले बाणोंकी वृष्टि होने लगी । वे बाण मुँह फैलाये, जबड़े चाटते हुए पाँच मुखवाले भयंकर सर्पोंके समान जान पड़ते थे । फुफकारते हुए सर्पकी भाँति कुपित हुए महातेजस्वी रावणने इनका तथा अन्य प्रकारके तीखे बाणोंका भी श्रीरामके ऊपर प्रयोग किया ॥ ४२–४५ ॥
आसुरेण समाविष्टः सोऽस्त्रेण रघुपुङ्गवः । ससर्जास्त्रं महोत्साहं पावकं पावकोपमः ॥ ४६ ॥ अग्निदीप्तमुखान् बाणांस्तत्र सूर्यमुखानपि । चन्द्रार्धचन्द्रवक्त्रांश्च धूमकेतुमुखानपि । ग्रहनक्षत्रवर्णांश्च महोल्कामुखसंस्थितान् ॥ ४७ ॥ विद्युज्जिह्वोपमांश्चापि ससर्ज विविधाञ्छरान् ।
भावार्थ
उस आसुरास्त्रसे आवृत हुए अग्नि-तुल्य तेजस्वी महान् उत्साही रघुकुलतिलक श्रीरामने आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया ॥ उसके द्वारा उन्होंने अग्नि, सूर्य, चन्द्र, अर्धचन्द्र, धूमकेतु, ग्रह, नक्षत्र, उल्का तथा बिजलीकी प्रभाके समान प्रज्वलित मुखवाले नाना प्रकारके बाण प्रकट किये ॥ ४७½ ॥
ते रावणशरा घोरा राघवास्त्रसमाहताः ॥ ४८ ॥ विलयं जग्मुराकाशे जघ्नुश्चैव सहस्रशः ।
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीके आग्नेयास्त्रसे आहत हो रावणके वे भयंकर बाण आकाशमें ही विलीन हो गये, तथापि उनके द्वारा सहस्रों वानर मारे गये थे ॥ ४८½ ॥
तदस्त्रं निहतं दृष्ट्वा रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ ४९ ॥ हृष्टा नेदुस्ततः सर्वे कपयः कामरूपिणः । सुग्रीवाभिमुखा वीराः सम्परिक्षिप्य राघवम् ॥ ५० ॥
भावार्थ
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामने उस आसुरास्त्रको नष्ट कर दिया, यह देख इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सुग्रीव आदि सभी वीर वानर श्रीरामको चारों ओरसे घेरकर हर्षनाद करने लगे ॥ ४९-५० ॥
ततस्तदस्त्रं विनिहत्य राघवः प्रसह्य तद् रावणबाहुनिःसृतम् । मुदान्वितो दाशरथिर्महात्मा विनेदुरुच्चैर्मुदिताः कपीश्वराः ॥ ५१ ॥
भावार्थ
दशरथनन्दन महात्मा श्रीराम रावणके हाथोंसे छूटे हुए उस आसुरास्त्रका बलपूर्वक विनाश करके बड़े प्रसन्न हुए और वानर-यूथपति आनन्दमग्न हो उच्च स्वरसे सिंहनाद करने लगे॥
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