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युद्धकाण्ड, सर्ग 100

तस्मिन् प्रतिहतेऽस्त्रे तु रावणो राक्षसाधिपः । क्रोधं च द्विगुणं चक्रे क्रोधाच्चास्त्रमनन्तरम् ॥ १ ॥ मयेन विहितं रौद्रमन्यदस्त्रं महाद्युतिः । उत्स्रष्टुं रावणो भीमं राघवाय प्रचक्रमे ॥ २ ॥

भावार्थ

अपने उस अस्त्रके नष्ट हो जानेपर महातेजस्वी राक्षसराज रावणने दूना क्रोध प्रकट किया । उसने क्रोधवश श्रीरामके ऊपर एक दूसरे भयंकर अस्त्रको छोड़नेका आयोजन किया, जिसे मयासुरने बनाया था ॥ १-२ ॥

ततः शूलानि निश्चेरुर्गदाश्च मुसलानि च । कार्मुकाद् दीप्यमानानि वज्रसाराणि सर्वशः ॥ ३ ॥ मुद्गराः कूटपाशाश्च दीप्ताश्चाशनयस्तथा । निष्पेतुर्विविधास्तीक्ष्णा वाता इव युगक्षये ॥ ४ ॥

भावार्थ

उस समय रावणके धनुषसे वज्रके समान दृढ़ और दमकते हुए शूल, गदा, मूसल, मुद्गर, कूटपाश तथा चमचमाती अशनि आदि भाँति-भाँतिके तीखे अस्त्र छूटने लगे, मानो प्रलयकालमें वायुके विविध रूप प्रकट हो रहे हों ॥३-४॥

तदस्त्रं राघवः श्रीमानुत्तमास्त्रविदां वरः । जघान परमास्त्रेण गान्धर्वेण महाद्युतिः ॥ ५ ॥

भावार्थ

तब उत्तम अस्त्रके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी श्रीमान् रघुनाथजीने गान्धर्वनामक श्रेष्ठ अस्त्रके द्वारा रावणके उस अस्त्रको शान्त कर दिया ॥ ५ ॥

तस्मिन् प्रतिहतेऽस्त्रे तु राघवेण महात्मना । रावणः क्रोधताम्राक्षः सौरमस्त्रमुदीरयत् ॥ ६ ॥

भावार्थ

महात्मा रघुनाथजीके द्वारा उस अस्त्रके प्रतिहत हो जानेपर रावणके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और उसने सूर्यास्त्रका प्रयोग किया ॥ ६ ॥

ततश्चक्राणि निष्पेतुर्भास्वराणि महान्ति च । कार्मुकाद् भीमवेगस्य दशग्रीवस्य धीमतः ॥ ७ ॥

भावार्थ

फिर तो भयानक वेगशाली बुद्धिमान् राक्षस दशग्रीवके धनुषसे बड़े-बड़े तेजस्वी चक्र प्रकट होने लगे ॥ ७ ॥

तैरासीद् गगनं दीप्तं सम्पतद्भिः समन्ततः । पतद्भिश्च दिशो दीप्ताश्चन्द्रसूर्यग्रहैरिव ॥ ८ ॥

भावार्थ

चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रहोंके समान आकारवाले वे दीप्तिमान् अस्त्र-शस्त्र सब ओर प्रकट होते और गिरते थे । उनसे आकाशमें प्रकाश छा गया और सम्पूर्ण दिशाएँ उद्भासित हो उठीं ॥ ८ ॥

तानि चिच्छेद बाणौघैश्चक्राणि तु स राघवः । आयुधानि च चित्राणि रावणस्य चमूमुखे ॥ ९ ॥

भावार्थ

परंतु श्रीरामचन्द्रजीने अपने बाणसमूहोंद्वारा सेनाके मुहानेपर रावणके उन चक्रों और विचित्र आयुधोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ९ ॥

तदस्त्रं तु हतं दृष्ट्वा रावणो राक्षसाधिपः । विव्याध दशभिर्बाणै रामं सर्वेषु मर्मसु ॥ १० ॥ स विद्धो दशभिर्बाणैर्महाकार्मुकनिःसृतैः । रावणेन महातेजा न प्राकम्पत राघवः ॥ ११ ॥ ततो विव्याध गात्रेषु सर्वेषु समितिंजयः । राघवस्तु सुसंक्रुद्धो रावणं बहुभिः शरैः ॥ १२ ॥ एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धो राघवस्यानुजो बली । लक्ष्मणः सायकान् सप्त जग्राह परवीरहा ॥ १३ ॥

भावार्थ

उस अस्त्रको नष्ट हुआ देख राक्षसराज रावणने दस बाणोंद्वारा श्रीरामके सारे मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ रावणके विशाल धनुषसे छूटे हुए उन दस बाणोंसे घायल होनेपर भी महातेजस्वी श्रीरघुनाथजी विचलित नहीं हुए॥ तत्पश्चात् समरविजयी श्रीरघुवीरने अत्यन्त कुपित हो बहुत-से बाण मारकर रावणके सारे अङ्गोंमें घाव कर दिया ॥ इसी बीचमें शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाबली रामानुज लक्ष्मणने कुपित हो सात सायक हाथमें लिये ॥ १३ ॥

तैः सायकैर्महावेगै रावणस्य महाद्युतिः । ध्वजं मनुष्यशीर्षं तु तस्य चिच्छेद नैकधा ॥ १४ ॥

भावार्थ

उन महान् वेगशाली सायकोंद्वारा उन महातेजस्वी सुमित्राकुमारने रावणकी ध्वजाके, जिसमें मनुष्यकी खोपड़ीका चिह्न था, कई टुकड़े कर डाले ॥ १४ ॥

सारथेश्चापि बाणेन शिरो ज्वलितकुण्डलम् । जहार लक्ष्मणः श्रीमान् नैर्ऋतस्य महाबलः ॥ १५ ॥

भावार्थ

इसके बाद महाबली श्रीमान् लक्ष्मणने एक बाणसे उस राक्षसके सारथिका जगमगाते हुए कुण्डलोंसे मण्डित मस्तक भी काट लिया ॥ १५ ॥

तस्य बाणैश्च चिच्छेद धनुर्गजकरोपमम् । लक्ष्मणो राक्षसेन्द्रस्य पञ्चभिर्निशितैस्तदा ॥ १६ ॥ नीलमेघनिभांश्चास्य सदश्वान् पर्वतोपमान् । जघानाप्लुत्य गदया रावणस्य विभीषणः ॥ १७ ॥

भावार्थ

इतना ही नहीं, लक्ष्मणने पाँच पैने बाण मारकर उस राक्षसराजके हाथीकी सूँड़के समान मोटे धनुषको भी काट डाला॥ तदनन्तर विभीषणने उछलकर अपनी गदासे रावणके नील मेघके समान कान्तिवाले सुन्दर पर्वताकार घोड़ोंको भी मार गिराया ॥ १७ ॥

हताश्वात् तु तदा वेगादवप्लुत्य महारथात् । कोपमाहारयत् तीव्रं भ्रातरं प्रति रावणः ॥ १८ ॥ ततः शक्तिं महाशक्तिः प्रदीप्तामशनीमिव । विभीषणाय चिक्षेप राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ॥ १९ ॥ अप्राप्तामेव तां बाणैस्त्रिभिश्चिच्छेद लक्ष्मणः । अथोदतिष्ठत् संनादो वानराणां महारणे ॥ २० ॥

भावार्थ

घोड़ोंके मारे जानेपर रावण अपने विशाल रथसे वेगपूर्वक कूद पड़ा और अपने भाईपर उसे बड़ा क्रोध आया ॥ तब उस महान् शक्तिशाली प्रतापी राक्षसराजने विभीषणको मारनेके लिये एक वज्रके समान प्रज्वलित शक्ति चलायी॥ वह शक्ति अभी विभीषण तक पहुँचने भी नहीं पायी थी कि लक्ष्मणने तीन बाण मारकर उसे बीचमें ही काट दिया । यह देख उस महासमरमें वानरोंका महान् हर्षनाद गूँज उठा ॥ २० ॥

सम्पपात त्रिधा छिन्ना शक्तिः काञ्चनमालिनी । सविस्फुलिङ्गा ज्वलिता महोल्केव दिवश्च्युता ॥ २१ ॥

भावार्थ

सोनेकी मालासे अलंकृत वह शक्ति तीन भागोंमें विभक्त होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी, मानो आकाशसे चिनगारियोंसहित बड़ी भारी उल्का टूटकर गिरी हो ॥ २१ ॥

ततः सम्भाविततरां कालेनापि दुरासदाम् । जग्राह विपुलां शक्तिं दीप्यमानां स्वतेजसा ॥ २२ ॥

भावार्थ

तदनन्तर रावणने विभीषणको मारनेके लिये एक ऐसी विशाल शक्ति हाथमें ली, जो अपनी अमोघताके लिये विशेष विख्यात थी । काल भी उसके वेगको नहीं सह सकता था । वह शक्ति अपने तेजसे उद्दीप्त हो रही थी ॥ २२ ॥

सा वेगिता बलवता रावणेन दुरात्मना । जज्वाल सुमहातेजा दीप्ताशनिसमप्रभा ॥ २३ ॥

भावार्थ

दुरात्मा बलवान् रावणके द्वारा हाथमें ली हुई वह वेगशालिनी, महातेजस्विनी और वज्रके समान दीप्तिमती शक्ति अपने दिव्य तेजसे प्रज्वलित हो उठी ॥ २३ ॥

एतस्मिन्नन्तरे वीरो लक्ष्मणस्तं विभीषणम् । प्राणसंशयमापन्नं तूर्णमभ्यवपद्यत ॥ २४ ॥

भावार्थ

इसी बीचमें विभीषणको प्राण-संशयकी अवस्थामें पड़ा देख वीर लक्ष्मणने तुरंत उनकी रक्षा की । उन्हें पीछे करके वे स्वयं शक्तिके सामने खड़े हो गये ॥ २४ ॥

तं विमोक्षयितुं वीरश्चापमायम्य लक्ष्मणः । रावणं शक्तिहस्तं वै शरवर्षैरवाकिरत् ॥ २५ ॥

भावार्थ

विभीषणको बचानेके लिये वीर लक्ष्मण अपने धनुषको खींचकर हाथमें शक्ति लिये खड़े हुए रावणपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २५ ॥

कीर्यमाणः शरौघेण विसृष्टेन महात्मना । न प्रहर्तुं मनश्चक्रे विमुखीकृतविक्रमः ॥ २६ ॥

भावार्थ

महात्मा लक्ष्मणके छोड़े हुए बाण-समूहोंका निशाना बनकर रावण अपने भाईको मारनेके पराक्रमसे विमुख हो गया । अब उसके मनमें प्रहार करनेकी इच्छा नहीं रह गयी ॥ २६ ॥

मोक्षितं भ्रातरं दृष्ट्वा लक्ष्मणेन स रावणः । लक्ष्मणाभिमुखस्तिष्ठन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ २७ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणने मेरे भाईको बचा लिया, यह देख रावण उनकी ओर मुँह करके खड़ा हो गया और इस प्रकार बोला–॥२७॥

मोक्षितस्ते बलश्लाघिन् यस्मादेवं विभीषणः । विमुच्य राक्षसं शक्तिस्त्वयीयं विनिपात्यते ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘अपने बलपर घमंड रखनेवाले लक्ष्मण ! तुमने ऐसा प्रयास करके विभीषणको बचा लिया है, इसलिये अब उस राक्षसको छोड़कर मैं तुम्हारे ऊपर ही इस शक्तिका प्रहार करता हूँ ॥ २८ ॥

एषा ते हृदयं भित्त्वा शक्तिर्लोहितलक्षणा । मद्बाहुपरिघोत्सृष्टा प्राणानादाय यास्यति ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘यह शक्ति स्वभावसे ही शत्रुओंके खूनसे नहानेवाली है, यह मेरे हाथसे छूटते ही तुम्हारे हृदयको विदीर्ण करके प्राणोंको अपने साथ ले जायगी’ ॥ २९ ॥

इत्येवमुक्त्वा तां शक्तिमष्टघण्टां महास्वनाम् । मयेन मायाविहिताममोघां शत्रुघातिनीम् ॥ ३० ॥ लक्ष्मणाय समुद्दिश्य ज्वलन्तीमिव तेजसा । रावणः परमक्रुद्धश्चिक्षेप च ननाद च ॥ ३१ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर अत्यन्त कुपित हुए रावणने मयासुरकी मायासे निर्मित, आठ घण्टोंसे विभूषित तथा महाभयंकर शब्द करनेवाली, उस अमोघ एवं शत्रुघातिनी शक्तिको, जो अपने तेजसे प्रज्वलित हो रही थी, लक्ष्मणको लक्ष्य करके चला दिया और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ३०-३१ ॥

सा क्षिप्ता भीमवेगेन वज्राशनिसमस्वना । शक्तिरभ्यपतद् वेगाल्लक्ष्मणं रणमूर्धनि ॥ ३२ ॥

भावार्थ

वज्र और अशनिके समान गड़गड़ाहट पैदा करनेवाली वह शक्ति युद्धके मुहानेपर भयानक वेगसे चलायी गयी और लक्ष्मणको वेगपूर्वक लगी ॥ ३२ ॥

तामनुव्याहरच्छक्तिमापतन्तीं स राघवः । स्वस्त्यस्तु लक्ष्मणायेति मोघा भव हतोद्यमा ॥ ३३ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणकी ओर आती हुई उस शक्तिको लक्ष्य करके भगवान् श्रीरामने कहा—‘लक्ष्मणका कल्याण हो, तेरा प्राण-नाशविषयक उद्योग नष्ट हो; अतएव तू व्यर्थ हो जा’ ॥३३॥

रावणेन रणे शक्तिः क्रुद्धेनाशीविषोपमा । मुक्ताऽऽशूरस्यभीतस्य लक्ष्मणस्य ममज्ज सा ॥ ३४ ॥

भावार्थ

वह शक्ति विषधर सर्पके समान भयंकर थी । रणभूमिमें कुपित हुए रावणने जब उसे छोड़ा, तब वह तुरंत ही निर्भय वीर लक्ष्मणकी छातीमें डूब गयी ॥ ३४ ॥

न्यपतत् सा महावेगा लक्ष्मणस्य महोरसि । जिह्वेवोरगराजस्य दीप्यमाना महाद्युतिः ॥ ३५ ॥ ततो रावणवेगेन सुदूरमवगाढया । शक्त्या विभिन्नहृदयः पपात भुवि लक्ष्मणः ॥ ३६ ॥

भावार्थ

नागराज वासुकिकी जिह्वाके समान देदीप्यमान वह महातेजस्विनी और महावेगवती शक्ति जब लक्ष्मणके विशाल वक्षःस्थलपर गिरी, तब रावणके वेगसे बहुत गहराई तक धँस गयी । उस शक्तिसे हृदय विदीर्ण हो जानेके कारण लक्ष्मण पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३५-३६ ॥

तदवस्थं समीपस्थो लक्ष्मणं प्रेक्ष्य राघवः । भ्रातृस्नेहान्महातेजा विषण्णहृदयोऽभवत् ॥ ३७ ॥

भावार्थ

महातेजस्वी रघुनाथजी पास ही खड़े थे । वे लक्ष्मणको इस अवस्थामें देखकर भ्रातृस्नेहके कारण मन-ही-मन विषादमें डूब गये ॥ ३७ ॥

स मुहूर्तमिव ध्यात्वा बाष्पपर्याकुलेक्षणः । बभूव संरब्धतरो युगान्त इव पावकः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

वे दो घड़ी तक चिन्तामें डूबे रहे । फिर नेत्रोंमें आँसू भरकर प्रलयकालमें प्रज्वलित हुई अग्निके समान अत्यन्त रोषसे उद्दीप्त हो उठे ॥ ३८ ॥

न विषादस्य कालोऽयमिति संचिन्त्य राघवः । चक्रे सुतुमुलं युद्धं रावणस्य वधे धृतः । सर्वयत्नेन महता लक्ष्मणं परिवीक्ष्य च ॥ ३९ ॥

भावार्थ

‘यह विषादका समय नहीं है’ ऐसा सोचकर श्रीरघुनाथजी रावणके वधका निश्चय करके महान् प्रयत्नके द्वारा सारी शक्ति लगाकर और लक्ष्मणकी ओर देखकर अत्यन्त भयंकर युद्ध करने लगे ॥ ३९ ॥

स ददर्श ततो रामः शक्त्या भिन्नं महाहवे । लक्ष्मणं रुधिरादिग्धं सपन्नगमिवाचलम् ॥ ४० ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् श्रीरामने उस महासमरमें शक्तिसे विदीर्ण हुए लक्ष्मणकी ओर देखा । वे खूनसे लथपथ होकर पड़े थे और सर्पयुक्त पर्वतके समान जान पड़ते थे ॥ ४० ॥

तामपि प्रहितां शक्तिं रावणेन बलीयसा । यत्नतस्ते हरिश्रेष्ठा न शेकुरवमर्दितुम् ॥ ४१ ॥

भावार्थ

अत्यन्त बलवान् रावणकी चलायी हुई उस शक्तिको लक्ष्मणकी छातीसे निकालनेके लिये बहुत प्रयत्न करनेपर भी वे श्रेष्ठ वानरगण सफल न हो सके ॥ ४१ ॥

अर्दिताश्चैव बाणौघैस्ते प्रवेकेण रक्षसाम् । सौमित्रेः सा विनिर्भिद्य प्रविष्टा धरणीतलम् ॥ ४२ ॥

भावार्थ

क्योंकि वे वानर भी राक्षसशिरोमणि रावणके बाण-समूहोंसे बहुत पीड़ित थे । वह शक्ति सुमित्राकुमारके शरीरको विदीर्ण करके धरतीतक पहुँच गयी थी ॥ ४२ ॥

तां कराभ्यां परामृश्य रामः शक्तिं भयावहाम् । बभञ्ज समरे क्रुद्धो बलवान् विचकर्ष च ॥ ४३ ॥

भावार्थ

तब महाबली रघुनाथजीने उस भयंकर शक्तिको अपने दोनों हाथोंसे पकड़कर लक्ष्मणके शरीरसे निकाला और समराङ्गणमें कुपित हो उसे तोड़ डाला ॥ ४३ ॥

तस्य निष्कर्षतः शक्तिं रावणेन बलीयसा । शराः सर्वेषु गात्रेषु पातिता मर्मभेदिनः ॥ ४४ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजी जब लक्ष्मणके शरीरसे शक्ति निकाल रहे थे, उस समय महाबली रावण उनके सम्पूर्ण अङ्गोंपर मर्मभेदी बाणोंकी वर्षा करता रहा ॥ ४४ ॥

अचिन्तयित्वा तान् बाणान् समाश्लिष्य च लक्ष्मणम् । अब्रवीच्च हनूमन्तं सुग्रीवं च महाकपिम् ॥ ४५ ॥

भावार्थ

परंतु उन बाणोंकी परवा न करके लक्ष्मणको हृदयसे लगाकर भगवान् श्रीराम हनुमान् और महाकपि सुग्रीवसे बोले—॥ ४५ ॥

लक्ष्मणं परिवार्यैवं तिष्ठध्वं वानरोत्तमाः । पराक्रमस्य कालोऽयं सम्प्राप्तो मे चिरेप्सितः ॥ ४६ ॥

भावार्थ

‘कपिवरो ! तुमलोग लक्ष्मणको इसी तरह सब ओरसे घेरकर खड़े रहो । अब मेरे लिये उस पराक्रमका अवसर आया है, जो मुझे चिरकालसे अभीष्ट था ॥ ४६ ॥

पापात्मायं दशग्रीवो वध्यतां पापनिश्चयः । काङ्क्षितं चातकस्येव धर्मान्ते मेघदर्शनम् ॥ ४७ ॥

भावार्थ

‘इस पापात्मा एवं पापपूर्ण विचार रखनेवाले दशमुख रावणको अब मार डाला जाय, यही उचित है । जैसे पपीहेको ग्रीष्म ऋतुके अन्तमें मेघके दर्शनकी इच्छा रहती है, उसी प्रकार मैं भी इसका वध करनेके लिये चिरकालसे इसे देखना चाहता हूँ ॥ ४७ ॥

अस्मिन् मुहूर्ते नचिरात् सत्यं प्रतिशृणोमि वः । अरावणमरामं वा जगद् द्रक्ष्यथ वानराः ॥ ४८ ॥

भावार्थ

‘वानरो ! मैं इस मुहूर्तमें तुम्हारे सामने यह सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि कुछ ही देरमें यह संसार रावणसे रहित दिखायी देगा या रामसे ॥ ४८ ॥

राज्यनाशं वने वासं दण्डके परिधावनम् । वैदेह्याश्च परामर्शं रक्षोभिश्च समागमम् ॥ ४९ ॥ प्राप्तं दुःखं महाघोरं क्लेशाश्च निरयोपमः । अद्य सर्वमहं त्यक्ष्ये निहत्वा रावणं रणे ॥ ५० ॥

भावार्थ

‘मेरे राज्यका नाश, वनका निवास, दण्डकारण्यकी दौड़-धूप, विदेहकुमारी सीताका राक्षसद्वारा अपहरण तथा राक्षसोंके साथ संग्राम——इन सबके कारण मुझे महाघोर दुःख सहना पड़ा है और नरकके समान कष्ट उठाना पड़ा है; किंतु रणभूमिमें रावणका वध करके आज मैं सारे दुःखोंसे छुटकारा पा जाऊँगा ॥ ४९-५० ॥

यदर्थं वानरं सैन्यं समानीतमिदं मया । सुग्रीवश्च कृतो राज्ये निहत्वा वालिनं रणे । यदर्थं सागरः क्रान्तः सेतुर्बद्धश्च सागरे ॥ ५१ ॥ सोऽयमद्य रणे पापश्चक्षुर्विषयमागतः । चक्षुर्विषयमागत्य नायं जीवितुमर्हति ॥ ५२ ॥

भावार्थ

‘जिसके लिये मैं वानरोंकी यह विशाल सेना साथ लाया हूँ, जिसके कारण मैंने युद्धमें वालीका वध करके सुग्रीवको राज्यपर बिठाया है तथा जिसके उद्देश्यसे समुद्रपर पुल बाँधा और उसे पार किया, वह पापी रावण आज युद्धमें मेरी आँखोंके सामने उपस्थित है । मेरे दृष्टिपथमें आकर अब यह जीवित रहने योग्य नहीं है ॥ ५१-५२ ॥

दृष्टिं दृष्टिविषस्येव सर्पस्य मम रावणः । यथा वा वैनतेयस्य दृष्टिं प्राप्तो भुजंगमः ॥ ५३ ॥

भावार्थ

‘दृष्टिमात्रसे संहारकारी विषका प्रसार करनेवाले सर्पकी आँखोंके सामने आकर जैसे कोई मनुष्य जीवित नहीं बच सकता अथवा जैसे विनतानन्दन गरुड़की दृष्टिमें पड़कर कोई महान् सर्प जीवित नहीं बच सकता, उसी प्रकार आज रावण मेरे सामने आकर जीवित या सकुशल नहीं लौट सकता॥५३॥

सुखं पश्यत दुर्धर्षो युद्धं वानरपुङ्गवाः । आसीनाः पर्वताग्रेषु ममेदं रावणस्य च ॥ ५४ ॥

भावार्थ

‘दुर्धर्ष वानरशिरोमणियो ! अब तुमलोग पर्वतके शिखरोंपर बैठकर मेरे और रावणके इस युद्धको सुखपूर्वक देखो ॥ ५४ ॥

अद्य पश्यन्तु रामस्य रामत्वं मम संयुगे । त्रयो लोकाः सगन्धर्वाः सदेवाः सर्षिचारणाः॥ ५५ ॥

भावार्थ

‘आज संग्राममें देवता, गन्धर्व, सिद्ध, ऋषि और चारणोंसहित तीनों लोकोंके प्राणी रामका रामत्व देखें ॥ ५५ ॥

अद्य कर्म करिष्यामि यल्लोकाः सचराचराः । सदेवाः कथयिष्यन्ति यावद् भूमिर्धरिष्यति । समागम्य सदा लोके यथा युद्धं प्रवर्तितम् ॥ ५६ ॥

भावार्थ

‘आज मैं वह पराक्रम प्रकट करूँगा, जिसकी जबतक यह पृथ्वी कायम रहेगी, तबतक चराचर जगत्के जीव और देवता भी सदा लोकमें एकत्र होकर चर्चा करेंगे और जिस प्रकार युद्ध हुआ है, उसे एक दूसरेसे कहेंगे’ ॥ ५६ ॥

एवमुक्त्वा शितैर्बाणैस्तप्तकाञ्चनभूषणैः । आजघान रणे रामो दशग्रीवं समाहितः ॥ ५७ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर भगवान् श्रीराम सावधान हो अपने सुवर्णभूषित तीखे बाणोंसे रणभूमिमें दशानन रावणको घायल करने लगे ॥ ५७ ॥

तथा प्रदीप्तैर्नाराचैर्मुसलैश्चापि रावणः । अभ्यवर्षत् तदा रामं धाराभिरिव तोयदः ॥ ५८ ॥

भावार्थ

इसी प्रकार जैसे मेघ जलकी धारा गिराता है; उसी तरह रावण भी श्रीरामपर चमकीले नाराचों और मूसलोंकी वर्षा करने लगा ॥ ५८ ॥

रामरावणमुक्तानामन्योन्यमभिनिघ्नताम् । वराणां च शराणां च बभूव तुमुलः स्वनः ॥ ५९ ॥

भावार्थ

एक दूसरेपर चोट करते हुए राम और रावणके छोड़े हुए श्रेष्ठ बाणोंके परस्पर टकरानेसे बड़ा भयंकर शब्द प्रकट होता था ॥ ५९ ॥

विच्छिन्नाश्च विकीर्णाश्च रामरावणयोः शराः । अन्तरिक्षात् प्रदीप्ताग्रा निपेतुर्धरणीतले ॥ ६० ॥

भावार्थ

श्रीराम और रावणके बाण परस्पर छिन्न-भिन्न होकर आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़ते थे । उस समय उनके अग्रभाग बड़े उद्दीप्त दिखायी देते थे ॥ ६० ॥

तयोर्ज्यातलनिर्घोषो रामरावणयोर्महान् । त्रासनः सर्वभूतानां बभूवाद्भुतोपमः ॥ ६१ ॥

भावार्थ

राम और रावणके धनुषकी प्रत्यञ्चासे प्रकट हुई महान् टंकारध्वनि समस्त प्राणियोंके मनमें त्रास उत्पन्न कर देती थी और बड़ी अद्भुत प्रतीत होती थी ॥ ६१ ॥

स कीर्यमाणः शरजालवृष्टिभि- र्महात्मना दीप्तधनुष्मतार्दितः । भयात् प्रदुद्राव समेत्य रावणो यथानिलेनाभिहतो बलाहकः ॥ ६२ ॥

भावार्थ

जैसे वायुके थपेड़े खाकर मेघ छिन्न-भिन्न हो जाता है, उसी प्रकार दीप्तिमान् धनुष धारण करनेवाले महात्मा श्रीरामके बाण-समूहोंकी वर्षासे आहत एवं पीड़ित हुआ रावण भयके मारे वहाँसे भाग गया ॥ ६२ ॥

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