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युद्धकाण्ड, सर्ग 91

रुधिरक्लिन्नगात्रस्तु लक्ष्मणः शुभलक्षणः । बभूव हृष्टस्तं हत्वा शत्रुजेतारमाहवे ॥ १ ॥ ततः स जाम्बवन्तं च हनूमन्तं च वीर्यवान् । संनिपत्य महातेजास्तांश्च सर्वान् वनौकसः ॥ २ ॥ आजगाम ततः शीघ्रं यत्र सुग्रीवराघवौ । विभीषणमवष्टभ्य हनूमन्तं च लक्ष्मणः ॥ ३ ॥

भावार्थ

संग्रामभूमिमें शत्रुविजयी इन्द्रजित्का वध करके रक्तसे भीगे हुए शरीरवाले शुभलक्षण लक्ष्मण बहुत प्रसन्न हुए ॥ बल-विक्रमसे सम्पन्न वे महातेजस्वी सुमित्राकुमार जाम्बवान् और हनुमान्जीसे दौड़कर मिले और उन समस्त वानरोंको साथ ले शीघ्रतापूर्वक उस स्थानपर आये, जहाँ वानरराज सुग्रीव और भगवान् श्रीराम विद्यमान थे । उस समय लक्ष्मण विभीषण और हनुमान्जीका सहारा लेकर चल रहे थे ॥ २-३ ॥

ततो राममभिक्रम्य सौमित्रिरभिवाद्य च । तस्थौ भ्रातृसमीपस्थः शक्रस्येन्द्रानुजो यथा ॥ ४ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके सामने आकर उनके चरणोंमें प्रणाम करके सुमित्राकुमार अपने उन ज्येष्ठ भ्राताके पास उसी तरह खड़े हो गये, जैसे इन्द्रके पास उपेन्द्र ( वामनरूपधारी श्रीहरि) खड़े होते हैं ॥ ४ ॥

निष्टनन्निव चागत्य राघवाय महात्मने । आचचक्षे तदा वीरो घोरमिन्द्रजितो वधम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

उस समय वीर विभीषण प्रसन्नतापूर्वक लौटनेके द्वारा ही शत्रुके मारे जानेकी बात सूचित-सी करते हुए आये और महात्मा श्रीरघुनाथजीसे बोले—‘प्रभो ! इन्द्रजित्के वधका भयंकर कार्य सम्पन्न हो गया’ ॥ ५ ॥

रावणेस्तु शिरश्छिन्नं लक्ष्मणेन महात्मना । न्यवेदयत रामाय तदा हृष्टो विभीषणः ॥ ६ ॥

भावार्थ

विभीषणने बड़े हर्षके साथ श्रीरामसे यह निवेदन किया कि महात्मा लक्ष्मणने ही रावणकुमार इन्द्रजित्का मस्तक काटा है ॥ ६ ॥

श्रुत्वैव तु महावीर्यो लक्ष्मणेनेन्द्रजिद्वधम् । प्रहर्षमतुलं लेभे वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मणके द्वारा इन्द्रजित्का वध हुआ है’ यह समाचार सुनते ही महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ और वे इस प्रकार बोले—॥ ७ ॥

साधु लक्ष्मण तुष्टोऽस्मि कर्म चासुकरं कृतम् । रावणेर्हि विनाशेन जितमित्युपधारय ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘शाबाश ! लक्ष्मण ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ । आज तुमने बड़ा दुष्कर पराक्रम किया । रावणपुत्र इन्द्रजित्के मारे जानेसे तुम यह निश्चित समझ लो कि अब हमलोग युद्धमें जीत गये’ ॥ ८ ॥

स तं शिरस्युपाघ्राय लक्ष्मणं कीर्तिवर्धनम् । लज्जमानं बलात् स्नेहादङ्कमारोप्य वीर्यवान् ॥ ९ ॥ उपवेश्य तमुत्सङ्गे परिष्वज्यावपीडितम् । भ्रातरं लक्ष्मणं स्निग्धं पुनः पुनरुदैक्षत ॥ १० ॥

भावार्थ

यशकी वृद्धि करनेवाले लक्ष्मण ( उस समय अपनी प्रशंसा सुनकर ) लजा रहे थे; किंतु पराक्रमी श्रीरामने उन्हें बलपूर्वक खींचकर गोदमें ले लिया और बड़े स्नेहसे उनका मस्तक सूँघा । शस्त्रोंके आघातसे पीड़ित हुए स्नेही बन्धु लक्ष्मणको गोदमें बिठाकर और हृदयसे लगाकर वे बड़े प्यारसे उनकी ओर बारंबार देखने लगे ॥ ९-१० ॥

शल्यसम्पीडितं शस्तं निःश्वसन्तं तु लक्ष्मणम् । रामस्तु दुःखसंतप्तं तं तु निःश्वासपीडितम् ॥ ११ ॥ मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय भूयः संस्पृश्य च त्वरन् । उवाच लक्ष्मणं वाक्यमाश्वास्य पुरुषर्षभः ॥ १२ ॥ कृतं परमकल्याणं कर्म दुष्करकर्मणा । अद्य मन्ये हते पुत्रे रावणं निहतं युधि ॥ १३ ॥ अद्याहं विजयी शत्रौ हते तस्मिन् दुरात्मनि । रावणस्य नृशंसस्य दिष्ट्या वीर त्वया रणे ॥ १४ ॥ छिन्नो हि दक्षिणो बाहुः स हि तस्य व्यपाश्रयः ।

भावार्थ

लक्ष्मण अपने शरीरमें धँसे हुए बाणोंके द्वारा अत्यन्त पीड़ित थे । उनके अङ्गोंमें जगह-जगह घाव हो गया था । वे बारंबार लंबी साँस खींचते थे, आघातजनित क्लेशसे संतप्त हो रहे थे तथा उन्हें साँस लेनेमें भी पीड़ा होती थी । उस अवस्थामें पुरुषोत्तम श्रीरामने स्नेहसे उनका मस्तक सूँघकर पीड़ा दूर करनेके लिये पुनः जल्दी-जल्दी उनके शरीरपर हाथ फेरा और आश्वासन देकर लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा—॥ ‘वीर ! तुमने अपने दुष्कर पराक्रमसे परम कल्याणकारी कार्य सम्पन्न किया है । आज बेटेके मारे जानेपर युद्धस्थलमें रावणको भी मैं मारा गया ही मानता हूँ । उस दुरात्मा शत्रुका वध हो जानेसे आज मैं वास्तवमें विजयी हो गया । सौभाग्यकी बात है कि तुमने रणभूमिमें इन्द्रजित्का वध करके निर्दयी निशाचर रावणकी दाहिनी बाँह ही काट डाली; क्योंकि वही उसका सबसे बड़ा सहारा था ॥ १३-१४½ ॥

विभीषणहनूमद्भ्यां कृतं कर्म महद् रणे ॥ १५ ॥ अहोरात्रैस्त्रिभिर्वीरः कथंचिद् विनिपातितः । निरमित्रः कृतोऽस्म्यद्य निर्यास्यति हि रावणः ॥ १६ ॥ बलव्यूहेन महता निर्यास्यति हि रावणः । बलव्यूहेन महता श्रुत्वा पुत्रं निपातितम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘विभीषण और हनुमान्ने भी समरभूमिमें महान् पराक्रम कर दिखाया है । तुम सब लोगोंने मिलकर तीन दिन और तीन रातमें किसी तरह उस वीर राक्षसको मार गिराया तथा मुझे शत्रुहीन बना दिया । अब रावण ही युद्धके लिये निकलेगा ॥ ‘महान् सैन्य-समुदायसहित पुत्रको मारा गया सुनकर रावण विशाल सेना साथ लेकर युद्धके लिये आयेगा ॥ १७ ॥

तं पुत्रवधसंतप्तं निर्यान्तं राक्षसाधिपम् । बलेनावृत्य महता निहनिष्यामि दुर्जयम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘पुत्रके वधसे संतप्त होकर निकले हुए उस दुर्जय राक्षसराज रावणको मैं अपनी बड़ी भारी सेनाके द्वारा घेरकर मार डालूँगा ॥ १८ ॥

त्वया लक्ष्मण नाथेन सीता च पृथिवी च मे । न दुष्प्रापा हते तस्मिञ्शक्रजेतरि चाहवे ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! इन्द्रजित् इन्द्रको भी जीत चुका था । जब उसे भी तुमने युद्धभूमिमें मार गिराया, तब तुम-जैसे रक्षक और सहायकके होते हुए मुझे सीता और भूमण्डलके राज्यको प्राप्त करनेमें कोई कठिनाई नहीं होगी’ ॥ १९ ॥

स तं भ्रातरमाश्वास्य परिष्वज्य च राघवः । रामः सुषेणं मुदितः समाभाष्येदमब्रवीत् ॥ २० ॥

भावार्थ

इस प्रकार भाईको आश्वासन देकर रघुकुलनन्दन श्रीरामने उन्हें हृदयसे लगा लिया और प्रसन्नतापूर्वक सुषेणको बुलाकर कहा—॥ २० ॥

विशल्योऽयं महाप्राज्ञ सौमित्रिर्मित्रवत्सलः । यथा भवति सुस्वस्थस्तथा त्वं समुपाचर ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘परम बुद्धिमान् सुषेण ! तुम शीघ्र ही ऐसा उपचार करो जिससे ये मित्रवत्सल सुमित्राकुमार पूर्णतः स्वस्थ हो जायँ और इनके शरीरसे बाण निकलकर घाव भरनेके साथ ही सारी पीड़ा दूर हो जाय ॥ २१ ॥

विशल्यः क्रियतां क्षिप्रं सौमित्रिः सविभीषणः । ऋक्षवानरसैन्यानां शूराणां द्रुमयोधिनाम् ॥ २२ ॥ ये चाप्यन्येऽत्र युध्यन्ति सशल्या व्रणिनस्तथा । तेऽपि सर्वे प्रयत्नेन क्रियन्ते सुखिनस्त्वया ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘सुमित्राकुमार लक्ष्मण और विभीषण दोनोंके शरीरसे तुम शीघ्र ही बाण निकाल दो और घाव अच्छा कर दो । वृक्षोंद्वारा युद्ध करनेवाले जो शूरवीर रीछ तथा वानर सैनिक हैं, उनमें भी जो दूसरे-दूसरे लोग बाणोंसे बिंधे हुए और घायल होकर युद्ध कर रहे हैं, उन सभीको तुम प्रयत्न करके सुखी एवं स्वस्थ कर दो’ ॥ २२-२३ ॥

एवमुक्तः स रामेण महात्मा हरियूथपः । लक्ष्मणाय ददौ नस्तः सुषेणः परमौषधम् ॥ २४ ॥

भावार्थ

महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर वानर-यूथपति सुषेणने लक्ष्मणकी नाकमें एक बहुत ही उत्तम ओषधि लगा दी ॥ २४ ॥

स तस्य गन्धमाघ्राय विशल्यः समपद्यत । तदा निर्वेदनश्चैव संरूढव्रण एव च ॥ २५ ॥

भावार्थ

उसकी गन्ध सूँघते ही लक्ष्मणके शरीरसे बाण निकल गये और उनकी सारी पीड़ा दूर हो गयी । उनके शरीरमें जितने भी घाव थे, सब भर गये ॥ २५ ॥

विभीषणमुखानां च सुहृदां राघवाज्ञया। सर्ववानरमुख्यानां चिकित्सामकरोत् तदा ॥ २६ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे सुषेणने विभीषण आदि सुहृदों तथा समस्त वानरशिरोमणियोंकी तत्काल चिकित्सा की ॥ २६ ॥

ततः प्रकृतिमापन्नो हृतशल्यो गतक्लमः। सौमित्रिर्मुमुदे तत्र क्षणेन विगतज्वरः ॥ २७ ॥

भावार्थ

फिर तो क्षणभरमें बाण निकल जाने और पीड़ा दूर हो जानेसे सुमित्राकुमार स्वस्थ एवं नीरोग हो हर्षका अनुभव करने लगे ॥ २७ ॥

तदैव रामः प्लवगाधिपस्तथा विभीषणश्चर्क्षपतिश्च वीर्यवान्। अवेक्ष्य सौमित्रिमरोगमुत्थितं मुदा ससैन्याः सुचिरं जहर्षिरे ॥ २८ ॥

भावार्थ

उस समय भगवान् श्रीराम, वानरराज सुग्रीव, विभीषण तथा पराक्रमी ऋक्षराज जाम्बवान् लक्ष्मणको निरोग होकर खड़ा हुआ देख सेनासहित बड़े प्रसन्न हुए ॥ २८ ॥

अपूजयत् कर्म स लक्ष्मणस्य सुदुष्करं दाशरथिर्महात्मा। बभूव हृष्टो युधि वानरेन्द्रो निशाम्य तं शक्रजितं निपातितम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

दशरथनन्दन महात्मा श्रीरामने लक्ष्मणके उस अत्यन्त दुष्कर पराक्रमकी पुनः भूरि-भूरि प्रशंसा की। इन्द्रजित् युद्धमें मार गिराया गया, यह सुनकर वानरराज सुग्रीवको भी बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २९ ॥

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