युद्धकाण्ड, सर्ग 90
स हताश्वो महातेजा भूमौ तिष्ठन् निशाचरः । इन्द्रजित् परमक्रुद्धः सम्प्रजज्वाल तेजसा ॥ १ ॥
भावार्थ
घोड़ोंके मारे जानेपर पृथ्वीपर खड़े हुए महातेजस्वी निशाचर इन्द्रजित्का क्रोध बहुत बढ़ गया । वह तेजसे प्रज्वलित-सा हो उठा ॥ १ ॥
तौ धन्विनौ जिघांसन्तावन्योन्यमिषुभिर्भृशम् । विजयेनाभिनिष्क्रान्तौ वने गजवृषाविव ॥ २ ॥
भावार्थ
इन्द्रजित् और लक्ष्मण दोनोंके हाथमें धनुष थे । दोनों ही अपनी-अपनी विजयके लिये एक दूसरेके सम्मुख युद्धमें प्रवृत्त हुए थे । वे अपने बाणोंद्वारा परस्पर वधकी इच्छा रखकर वनमें लड़नेके लिये निकले हुए दो गजराजोंके समान एक दूसरेपर गहरी चोट करने लगे ॥ २ ॥
निबर्हयन्तश्चान्योन्यं ते राक्षसवनौकसः । भर्तारं न जहुर्युद्धे सम्पतन्तस्ततस्ततः ॥ ३ ॥
भावार्थ
वानर और राक्षस भी परस्पर संहार करते हुए इधर-उधर दौड़ते रहे; परंतु अपने-अपने स्वामीका साथ न छोड़ सके ॥ ३ ॥
ततस्तान् राक्षसान् सर्वान् हर्षयन् रावणात्मजः । स्तुन्वानो हर्षमाणश्च इदं वचनमब्रवीत् ॥ ४ ॥
भावार्थ
तदनन्तर रावणकुमारने प्रसन्न हो प्रशंसा करके राक्षसोंका हर्ष बढ़ाते हुए कहा—॥ ४ ॥
तमसा बहुलेनेमाः संसक्ताः सर्वतो दिशः । नेह विज्ञायते स्वो वा परो वा राक्षसोत्तमाः ॥ ५ ॥ धृष्टं भवन्तो युध्यन्तु हरीणां मोहनाय वै । अहं तु रथमास्थाय आगमिष्यामि संयुगे ॥ ६ ॥ तथा भवन्तः कुर्वन्तु यथेमे हि वनौकसः । न युध्येयुर्महात्मानः प्रविष्टे नगरं मयि ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘श्रेष्ठ निशाचरो ! चारों दिशाओंमें अन्धकार छा रहा है, अतः यहाँ अपने या परायेकी पहचान नहीं हो रही है ॥ ‘इसलिये मैं जाता हूँ । दूसरे रथपर बैठकर शीघ्र ही युद्धके लिये आऊँगा । तबतक तुमलोग वानरोंको मोहमें डालनेके लिये निर्भय होकर ऐसा युद्ध करो, जिससे ये महामनस्वी वानर नगरमें प्रवेश करते समय मेरा सामना करनेके लिये न आवें’ ॥ ६-७ ॥
इत्युक्त्वा रावणसुतो वञ्चयित्वा वनौकसः । प्रविवेश पुरीं लङ्कां रथहेतोरमित्रहा ॥ ८ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर शत्रुहन्ता रावणकुमार वानरोंको चकमा दे रथके लिये लङ्कापुरीमें चला गया ॥ ८ ॥
स रथं भूषयित्वाथ रुचिरं हेमभूषितम् । प्रासासिशरसंयुक्तं युक्तं परमवाजिभिः ॥ ९ ॥ अधिष्ठितं हयज्ञेन सूतेनाप्तोपदेशिना । आरुरोह महातेजा रावणिः समितिंजयः ॥ १० ॥
भावार्थ
उसने एक सुवर्णभूषित सुन्दर रथको सजाकर उसके ऊपर प्रास, खड्ग तथा बाण आदि आवश्यक सामग्री रक्खी, फिर उसमें उत्तम घोड़े जुतवाये और अश्व हाँकनेकी विद्याके जानकार तथा हितकर उपदेश देनेवाले सारथिको उसपर बिठाकर वह महातेजस्वी समरविजयी रावणकुमार स्वयं भी उस रथपर आरूढ़ हुआ ॥ ९-१० ॥
स राक्षसगणैर्मुख्यैर्वृतो मन्दोदरीसुतः । निर्ययौ नगराद् वीरः कृतान्तबलचोदितः ॥ ११ ॥
भावार्थ
फिर प्रमुख राक्षसोंको साथ ले वीर मन्दोदरीकुमार काल-शक्तिसे प्रेरित हो नगरसे बाहर निकला ॥ ११ ॥
सोऽभिनिष्क्रम्य नगरादिन्द्रजित् परमौजसा । अभ्ययाज्जवनैरश्वैर्लक्ष्मणं सविभीषणम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
नगरसे निकलकर इन्द्रजित्ने अपने वेगशाली घोड़ोंद्वारा विभीषणसहित लक्ष्मणपर बलपूर्वक धावा किया ॥ १२ ॥
ततो रथस्थमालोक्य सौमित्री रावणात्मजम् । वानराश्च महावीर्या राक्षसश्च विभीषणः ॥ १३ ॥ विस्मयं परमं जग्मुर्लाघवात् तस्य धीमतः ।
भावार्थ
रावणकुमारको रथपर बैठा देख सुमित्रानन्दन लक्ष्मण, महापराक्रमी वानरगण तथा राक्षसराज विभीषण—सबको बड़ा विस्मय हुआ । सभी उस बुद्धिमान् निशाचरकी फुर्ती देखकर दंग रह गये ॥ १३½ ॥
रावणिश्चापि संक्रुद्धो रणे वानरयूथपान् ॥ १४ ॥ पातयामास बाणौघैः शतशोऽथ सहस्रशः ।
भावार्थ
तत्पश्चात् क्रोधसे भरे हुए रावणपुत्रने अपने बाण-समूहों-द्वारा रणभूमिमें सैकड़ों और हजारों वानर-यूथपतियोंको गिराना आरम्भ किया ॥ १४½ ॥
स मण्डलीकृतधनू रावणिः समितिंजयः ॥ १५ ॥ हरीनभ्यहनत् क्रुद्धः परं लाघवमास्थितः ।
भावार्थ
युद्धविजयी रावणकुमारने अपने धनुषको इतना खींचा कि वह मण्डलाकार बन गया । उसने कुपित हो बड़ी शीघ्रताके साथ वानरोंका संहार आरम्भ किया ॥ १५½ ॥
ते वध्यमाना हरयो नाराचैर्भीमविक्रमाः ॥ १६ ॥ सौमित्रिं शरणं प्राप्ताः प्रजापतिमिव प्रजाः ।
भावार्थ
उसके नाराचोंकी मार खाते हुए भयानक पराक्रमी वानर सुमित्राकुमार लक्ष्मणकी शरणमें गये, मानो प्रजाने प्रजापतिकी शरण ली हो ॥ १६½ ॥
ततः समरकोपेन ज्वलितो रघुनन्दनः । विच्छेद कार्मुकं तस्य दर्शयन् पाणिलाघवम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
तब शत्रुके युद्धसे रघुकुलनन्दन लक्ष्मणका क्रोध भड़क उठा । वे रोषसे जल उठे और उन्होंने अपने हाथकी फुर्ती दिखाते हुए उस राक्षसके धनुषको काट दिया ॥ १७ ॥
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय सज्जं चक्रे त्वरन्निव । तदप्यस्य त्रिभिर्बाणैर्लक्ष्मणो निरकृन्तत ॥ १८ ॥
भावार्थ
यह देख उस निशाचरने तुरंत ही दूसरा धनुष लेकर उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी; परंतु लक्ष्मणने तीन बाण मारकर उसके उस धनुषको भी काट दिया ॥ १८ ॥
अथैनं छिन्नधन्वानमाशीविषविषोपमैः । विव्याधोरसि सौमित्री रावणिं पञ्चभिः शरैः ॥ १९ ॥
भावार्थ
धनुष कट जानेपर विषधर सर्पके समान पाँच भयंकर बाणोंद्वारा सुमित्राकुमारने रावणपुत्रकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ १९ ॥
ते तस्य कायं निर्भिद्य महाकार्मुकनिःसृताः । निपेतुर्धरणीं बाणा रक्ता इव महोरगाः ॥ २० ॥
भावार्थ
उनके विशाल धनुषसे छूटे हुए वे बाण इन्द्रजित्का शरीर छेदकर लाल रंगके बड़े-बड़े सर्पोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २० ॥
स च्छिन्नधन्वा रुधिरं वमन् वक्त्रेण रावणिः । जग्राह कार्मुकश्रेष्ठं दृढज्यं बलवत्तरम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
धनुष कट जानेपर उन बाणोंकी चोट खाकर मुँहसे रक्त वमन करते हुए रावणपुत्रने पुनः एक मजबूत धनुष हाथमें लिया। उसकी प्रत्यञ्चा भी बहुत ही दृढ़ थी ॥ २१ ॥
स लक्ष्मणं समुद्दिश्य परं लाघवमास्थितः । ववर्ष शरवर्षाणि वर्षाणीव पुरंदरः ॥ २२ ॥
भावार्थ
फिर तो उसने लक्ष्मणको लक्ष्य करके बड़ी फुर्तीके साथ बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, मानो देवराज इन्द्र जल बरसा रहे हों ॥ २२ ॥
मुक्तमिन्द्रजिता तत्तु शरवर्षमरिंदमः । आवारयदसम्भ्रान्तो लक्ष्मणः सुदुरासदम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
यद्यपि इन्द्रजित्द्वारा की गयी उस बाणवर्षाको रोकना बहुत ही कठिन था, तो भी शत्रुदमन लक्ष्मणने बिना किसी घबराहटके उसको रोक दिया ॥ २३ ॥
संदर्शयामास तदा रावणिं रघुनन्दनः । असम्भ्रान्तो महातेजास्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २४ ॥
भावार्थ
रघुकुलनन्दन महातेजस्वी लक्ष्मणके मनमें तनिक भी घबराहट नहीं थी । उन्होंने उस रावणकुमारको जो अपना पौरुष दिखाया, वह अद्भुत-सा ही था ॥ २४ ॥
ततस्तान् राक्षसान् सर्वांस्त्रिभिरेकैकमाहवे । अविध्यत् परमक्रुद्धः शीघ्रास्त्रं सम्प्रदर्शयन् । राक्षसेन्द्रसुतं चापि बाणौघैः समताडयत् ॥ २५ ॥
भावार्थ
उन्होंने अत्यन्त कुपित हो अपनी शीघ्र अस्त्र-संचालनकी कलाका प्रदर्शन करते हुए उन समस्त राक्षसोंको प्रत्येकके शरीरमें तीन-तीन बाण मारकर घायल कर दिया तथा राक्षसराजके पुत्र इन्द्रजित्को भी अपने बाण-समूहोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ २५ ॥
सोऽतिविद्धो बलवता शत्रुणा शत्रुघातिना । असक्तं प्रेषयामास लक्ष्मणाय बहूञ्शरान् ॥ २६ ॥
भावार्थ
शत्रुहन्ता प्रबल शत्रुके बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर इन्द्रजित्ने लक्ष्मणपर लगातार बहुत बाण बरसाये ॥ २६ ॥
तानप्राप्ताञ्शितैर्बाणैश्चिच्छेद परवीरहा । सारथेरस्य च रणे रथिनो रथसत्तमः ॥ २७ ॥ शिरो जहार धर्मात्मा भल्लेनानतपर्वणा ।
भावार्थ
परंतु शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले रथियोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा लक्ष्मणने अपने पासतक पहुँचनेसे पहले ही उन बाणोंको अपने तीखे सायकोंद्वारा काट डाला और रणभूमिमें रथी इन्द्रजित्के सारथिका मस्तक भी झुकी हुई गाँठवाले भल्लसे उड़ा दिया ॥ २७½ ॥
असूतास्ते हयास्तत्र रथमूहुरविक्लवाः ॥ २८ ॥ मण्डलान्यभिधावन्ति तदद्भुतमिवाभवत् ।
भावार्थ
सारथिके न रहनेपर भी वहाँ उसके घोड़े व्याकुल नहीं हुए । पूर्ववत् शान्तभावसे रथको ढोते रहे और विभिन्न प्रकारके पैंतरे बदलते हुए मण्डलाकार गतिसे दौड़ लगाते रहे । वह एक अद्भुत-सी बात थी ॥ २८½ ॥
अमर्षवशमापन्नः सौमित्रिर्दृढविक्रमः ॥ २९ ॥ प्रत्यविध्यद्धयांस्तस्य शरैर्वित्रासयन् रणे ।
भावार्थ
सुदृढ़ पराक्रमी सुमित्राकुमार लक्ष्मण अमर्षके वशीभूत हो रणक्षेत्रमें उसके घोड़ोंको भयभीत करनेके लिये उन्हें बाणोंसे बेधने लगे ॥ २९½ ॥
अमर्षमाणस्तत्कर्म रावणस्य सुतो रणे ॥ ३० ॥ विव्याध दशभिर्बाणैः सौमित्रिं तममर्षणम् ।
भावार्थ
रावणकुमार इन्द्रजित् युद्धस्थलमें लक्ष्मणके इस पराक्रमको नहीं सह सका । उसने उन अमर्षशील सुमित्राकुमारको दस बाण मारे ॥ ३०½ ॥
ते तस्य वज्रप्रतिमाः शराः सर्पविषोपमाः । विलयं जग्मुरागत्य कवचं काञ्चनप्रभम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
उसके वे वज्रतुल्य बाण सर्पके विषकी भाँति प्राणघाती थे, तथापि लक्ष्मणके सुनहरी कान्तिवाले कवचसे टकराकर वहीं नष्ट हो गये ॥ ३१ ॥
अभेद्यकवचं मत्वा लक्ष्मणं रावणात्मजः । ललाटे लक्ष्मणं बाणैः सुपुङ्खैस्त्रिभिरिन्द्रजित् ॥ ३२ ॥ अविध्यत् परमक्रुद्धः शीघ्रमस्त्रं प्रदर्शयन् । तैः पृषत्कैर्ललाटस्थैः शुशुभे रघुनन्दनः ॥ ३३ ॥ रणाग्रे समरश्लाघी त्रिशृङ्ग इव पर्वतः ।
भावार्थ
लक्ष्मणका कवच अभेद्य है, ऐसा जानकर रावणकुमार इन्द्रजित्ने उनके ललाटमें सुन्दर पंखवाले तीन बाण मारे । उसने अपनी अस्त्र चलानेकी फुर्ती दिखाते हुए अत्यन्त क्रोधपूर्वक उन्हें घायल कर दिया । ललाटमें धँसे हुए उन बाणोंसे युद्धकी श्लाघा रखनेवाले रघुकुलनन्दन लक्ष्मण संग्रामके मुहानेपर तीन शिखरोंवाले पर्वतके समान शोभा पा रहे थे ॥ ३२-३३½ ॥
स तथाप्यर्दितो बाणै राक्षसेन तदा मृधे ॥ ३४ ॥ तमाशु प्रतिविव्याध लक्ष्मणः पञ्चभिः शरैः । विकृष्येन्द्रजितो युद्धे वदने शुभकुण्डले ॥ ३५ ॥
भावार्थ
उस राक्षसके द्वारा युद्धमें बाणोंसे इस प्रकार पीड़ित किये जानेपर भी लक्ष्मणने उस समय तुरंत पाँच बाणोंका संधान किया और धनुषको खींचकर चलाये हुए उन बाणोंके द्वारा सुन्दर कुण्डलोंसे सुशोभित इन्द्रजित्के मुखमण्डलको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ३४-३५ ॥
लक्ष्मणेन्द्रजितौ वीरौ महाबलशरासनौ । अन्योन्यं जघ्नतुर्वीरौ विशिखैर्भीमविक्रमौ ॥ ३६ ॥
भावार्थ
लक्ष्मण तथा इन्द्रजित् दोनों वीर महाबलवान् थे । उनके धनुष भी बहुत बड़े थे । भयंकर पराक्रम करनेवाले वे दोनों योद्धा एक दूसरेको बाणोंसे घायल करने लगे ॥ ३६ ॥
ततः शोणितदिग्धाङ्गौ लक्ष्मणेन्द्रजितावुभौ । रणे तौ रेजतुर्वीरौ पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ३७ ॥
भावार्थ
इससे लक्ष्मण और इन्द्रजित् दोनोंके शरीर लहूलुहान हो गये । रणभूमिमें वे दोनों वीर फूले हुए पलाशके वृक्षोंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ३७ ॥
तौ परस्परमभ्येत्य सर्वगात्रेषु धन्विनौ । घोरैर्विव्यधतुर्बाणैः कृतभावावुभौ जये ॥ ३८ ॥
भावार्थ
उन दोनों धनुर्धर वीरोंके मनमें विजय पानेके लिये दृढ़ संकल्प था, अतः वे आपसमें भिड़कर एक दूसरेके सभी अङ्गोंको भयंकर बाणोंका निशाना बनाने लगे ॥ ३८ ॥
ततः समरकोपेन संयुतो रावणात्मजः । विभीषणं त्रिभिर्बाणैर्विव्याध वदने शुभे ॥ ३९ ॥
भावार्थ
इसी बीचमें समरोचित क्रोधसे युक्त हुए रावणकुमारने विभीषणके सुन्दर मुखपर तीन बाणोंका प्रहार किया ॥ ३९ ॥
अयोमुखैस्त्रिभिर्विद्ध्वा राक्षसेन्द्रं विभीषणम् । एकैकेनाभिविव्याध तान् सर्वान् हरियूथपान् ॥ ४० ॥
भावार्थ
जिनके अग्रभागमें लोहेके फल लगे हुए थे, ऐसे तीन बाणोंसे राक्षसराज विभीषणको घायल करके इन्द्रजित्ने उन सभी वानर-यूथपतियोंपर एक-एक बाणका प्रहार किया ॥४०॥
तस्मै दृढतरं क्रुद्धो जघान गदया हयान् । विभीषणो महातेजा रावणेः स दुरात्मनः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
इससे महातेजस्वी विभीषणको उसपर बड़ा क्रोध आया और उन्होंने अपनी गदासे उस दुरात्मा रावणकुमारके चारों घोड़ोंको मार डाला ॥ ४१ ॥
स हताश्वादवप्लुत्य रथान्निहितसारथेः । अथ शक्तिं महातेजाः पितृव्याय मुमोच ह ॥ ४२ ॥
भावार्थ
जिसका सारथि पहले ही मारा जा चुका था और अब घोड़े भी मार डाले गये, उस रथसे नीचे कूदकर महातेजस्वी इन्द्रजित्ने अपने चाचापर शक्तिका प्रहार किया ॥ ४२ ॥
तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य सुमित्रानन्दवर्धनः । चिच्छेद निशितैर्बाणैर्दशधापातयद् भुवि ॥ ४३ ॥
भावार्थ
उस शक्तिको आती देख सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले लक्ष्मणने तीखे बाणोंसे काट डाला और दस टुकड़े करके उसे पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ४३ ॥
तस्मै दृढधनुः क्रुद्धो हताश्वाय विभीषणः । वज्रस्पर्शसमान् पञ्च ससर्जोरसि मार्गणान् ॥ ४४ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले विभीषणने जिसके घोड़े मारे गये थे, उस इन्द्रजित्पर कुपित हो उसकी छातीमें पाँच बाण मारे, जिनका स्पर्श वज्रके समान दुःसह था ॥४४॥
ते तस्य कायं भित्त्वा तु रुक्मपुङ्खा निमित्तगाः । बभूवुर्लोहितादिग्धा रक्ता इव महोरगाः ॥ ४५ ॥
भावार्थ
सुनहरे पङ्खोंसे सुशोभित और लक्ष्यतक पहुँचनेवाले वे बाण इन्द्रजित्के शरीरको विदीर्ण करके उसके रक्तमें सन गये और लाल रंगके बड़े-बड़े सर्पोंके समान दिखायी देने लगे ॥ ४५ ॥
स पितृव्यस्य संक्रुद्ध इन्द्रजिच्छरमाददे । उत्तमं रक्षसां मध्ये यमदत्तं महाबलः ॥ ४६ ॥
भावार्थ
तब महाबली इन्द्रजित्के मनमें अपने चाचाके प्रति बड़ा क्रोध हुआ। उसने राक्षसोंके बीचमें यमराजका दिया हुआ उत्तम बाण हाथमें लिया ॥ ४६ ॥
तं समीक्ष्य महातेजा महेषुं तेन संहितम् । लक्ष्मणोऽप्याददे बाणमन्यद् भीमपराक्रमः ॥ ४७ ॥
भावार्थ
उस महान् बाणको इन्द्रजित्के द्वारा धनुषपर रक्खा गया देख भयानक पराक्रम करनेवाले महातेजस्वी लक्ष्मणने भी दूसरा बाण उठाया ॥ ४७ ॥
कुबेरेण स्वयं स्वप्ने यद् दत्तममितात्मना । दुर्जयं दुर्विषहं च सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥ ४८ ॥
भावार्थ
उस बाणकी शिक्षा महात्मा कुबेरने स्वप्नमें प्रकट होकर स्वयं उन्हें दी थी। वह बाण इन्द्र आदि देवताओं तथा असुरोंके लिये भी असह्य एवं दुर्जय था ॥ ४८ ॥
तयोस्तु धनुषी श्रेष्ठे बाहुभिः परिघोपमैः । विकृष्यमाणे बलवत् क्रौञ्चाविव चुकूजतुः ॥ ४९ ॥
भावार्थ
उन दोनोंकी परिघके समान मोटी और बलिष्ठ भुजाओंद्वारा जोर-जोरसे खींचे जाते हुए उन दोनोंके श्रेष्ठ धनुष दो क्रौञ्च पक्षियोंके समान शब्द करने लगे ॥ ४९ ॥
ताभ्यां तु धनुषी श्रेष्ठे संहितौ सायकोत्तमौ । विकृष्यमाणौ वीराभ्यां भृशं जज्वलतुः श्रिया ॥ ५० ॥
भावार्थ
उन वीरोंने अपने-अपने श्रेष्ठ धनुषपर जो उत्तम सायक रक्खे थे, वे खींचे जाते ही अत्यन्त तेजसे प्रज्वलित हो उठे ॥ ५० ॥
तौ भासयन्तावाकाशं धनुर्भ्यां विशिखौ च्युतौ । मुखेन मुखमाहत्य संनिपेततुरोजसा ॥ ५१ ॥
भावार्थ
दोनोंके बाण एक साथ ही धनुषसे छूटे और अपनी प्रभासे आकाशको प्रकाशित करने लगे। दोनोंके मुखभाग बड़े वेगसे आपसमें टकरा गये ॥ ५१ ॥
संनिपातस्तयोश्चासीच्छरयोर्घोररूपयोः । सधूमविस्फुलिङ्गश्च तज्जोऽग्निर्दारुणोऽभवत् ॥ ५२ ॥
भावार्थ
उन दोनों भयानक बाणोंकी ज्यों ही टक्कर हुई, उससे दारुण अग्नि प्रकट हो गयी; जिससे धूआँ उठने लगा और चिनगारियाँ दिखायी दीं ॥ ५२ ॥
तौ महाग्रहसंकाशावन्योन्यं संनिपत्य च । संग्रामे शतधा यातौ मेदिन्यां चैव पेततुः ॥ ५३ ॥
भावार्थ
वे दोनों बाण दो महान् ग्रहोंकी भाँति आपसमें टकराकर सैकड़ों टुकड़े हो संग्रामभूमिमें गिर पड़े ॥ ५३ ॥
शरौ प्रतिहतौ दृष्ट्वा तावुभौ रणमूर्धनि । व्रीडितौ जातरोषौ च लक्ष्मणेन्द्रजितौ तदा ॥ ५४ ॥
भावार्थ
युद्धके मुहानेपर उन दोनों बाणोंको आपसके आघात-प्रतिघातसे व्यर्थ हुआ देख लक्ष्मण और इन्द्रजित् दोनोंको ही उस समय लज्जा हुई। फिर दोनों एक दूसरेके प्रति अत्यन्त रोषसे भर गये ॥ ५४ ॥
सुसंरब्धस्तु सौमित्रिरस्त्रं वारुणमाददे । रौद्रं महेन्द्रजिद् युद्धेऽप्यसृजद् युधि निष्ठितः ॥ ५५ ॥
भावार्थ
सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने कुपित होकर वारुणास्त्र उठाया। साथ ही उस रणभूमिमें खड़े हुए इन्द्रजित्ने रौद्रास्त्र उठाया और उसे वारुणास्त्रके प्रतीकारके लिये छोड़ दिया ॥ ५५ ॥
तेन तद्विहितं शस्त्रं वारुणं परमाद्भुतम् । ततः क्रुद्धो महातेजा इन्द्रजित् समितिंजयः । आग्नेयं संदधे दीप्तं स लोकं संक्षिपन्निव ॥ ५६ ॥
भावार्थ
उस रौद्रास्त्रसे आहत होकर लक्ष्मणका अत्यन्त अद्भुत वारुणास्त्र शान्त हो गया। तदनन्तर समरविजयी महातेजस्वी इन्द्रजित्ने कुपित होकर दीप्तिमान् आग्नेयास्त्रका संधान किया, मानो वह उसके द्वारा समस्त लोकोंका प्रलय कर देना चाहता हो ॥ ५६ ॥
सौरेणास्त्रेण तद् वीरो लक्ष्मणः पर्यवारयत् । अस्त्रं निवारितं दृष्ट्वा रावणिः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ५७ ॥
भावार्थ
परंतु वीर लक्ष्मणने सूर्यास्त्रके प्रयोगसे उसे शान्त कर दिया। अपने अस्त्रको प्रतिहत हुआ देख रावणकुमार इन्द्रजित् अचेत-सा हो गया ॥ ५७ ॥
आददे निशितं बाणमासुरं शत्रुदारणम् । तस्माच्चापाद् विनिष्पेतुर्भास्वराः कूटमुद्गराः ॥ ५८ ॥ शूलानि च भुशुण्ड्यश्च गदाः खड्गाः परश्वधाः ।
भावार्थ
उसने आसुर नामक शत्रुनाशक तीखे बाणका प्रयोग किया, फिर तो उसके उस धनुषसे चमकते हुए कूट, मुद्गर, शूल, भुशुण्डि, गदा, खड्ग और फरसे निकलने लगे॥५८½॥
तद् दृष्ट्वा लक्ष्मणः संख्ये घोरमस्त्रमथासुरम् ॥ ५९ ॥ अवार्यं सर्वभूतानां सर्वशस्त्रविदारणम् । माहेश्वरेण द्युतिमांस्तदस्त्रं प्रत्यवारयत् ॥ ६० ॥
भावार्थ
रणभूमिमें उस भयंकर आसुरास्त्रको प्रकट हुआ देख तेजस्वी लक्ष्मणने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंको विदीर्ण करनेवाले माहेश्वरास्त्रका प्रयोग किया, जिसका समस्त प्राणी मिलकर भी निवारण नहीं कर सकते थे । उस माहेश्वरास्त्रके द्वारा उन्होंने उस आसुरास्त्रको नष्ट कर दिया ॥ ५९-६०॥
तयोः समभवद् युद्धमद्भुतं रोमहर्षणम् । गगनस्थानि भूतानि लक्ष्मणं पर्यवारयन् ॥ ६१ ॥
भावार्थ
इस प्रकार उन दोनोंमें अत्यन्त अद्भुत और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा । आकाशमें रहनेवाले प्राणी लक्ष्मणको घेरकर खड़े हो गये ॥ ६१ ॥
भैरवाभिरुते भीमे युद्धे वानररक्षसाम् । भूतैर्बहुभिराकाशं विस्मितैरावृतं बभौ ॥ ६२ ॥
भावार्थ
भैरव-गर्जनासे गूँजते हुए वानरों और राक्षसोंके उस भयानक युद्धके छिड़ जानेपर आश्चर्यचकित हुए बहुसंख्यक प्राणी आकाशमें आकर खड़े हो गये। उनसे घिरे हुए उस आकाशकी अद्भुत शोभा हो रही थी ॥ ६२ ॥
ऋषयः पितरो देवा गन्धर्वगरुडोरगाः । शतक्रतुं पुरस्कृत्य ररक्षुर्लक्ष्मणं रणे ॥ ६३ ॥
भावार्थ
ऋषि, पितर, देवता, गन्धर्व, गरुड़ और नाग भी इन्द्रको आगे करके रणभूमिमें सुमित्राकुमारकी रक्षा करने लगे ॥६३॥
अथान्यं मार्गणश्रेष्ठं संदधे राघवानुजः । हुताशनसमस्पर्शं रावणात्मजदारणम् ॥ ६४ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् लक्ष्मणने दूसरा उत्तम बाण अपने धनुषपर रक्खा, जिसका स्पर्श आगके समान जलानेवाला था । उसमें रावणकुमारको विदीर्ण कर देनेकी शक्ति थी ॥ ६४ ॥
सुपत्रमनुवृत्ताङ्गं सुपर्वाणं सुसंस्थितम् । सुवर्णविकृतं वीरः शरीरान्तकरं शरम् ॥ ६५ ॥ दुरावारं दुर्विषहं राक्षसानां भयावहम् । आशीविषविषप्रख्यं देवसंघैः समर्चितम् ॥ ६६ ॥ येन शक्रो महातेजा दानवानजयत् प्रभुः । पुरा देवासुरे युद्धे वीर्यवान् हरिवाहनः ॥ ६७ ॥ अथैन्द्रमस्त्रं सौमित्रिः संयुगेष्वपराजितम् । शरश्रेष्ठं धनुःश्रेष्ठे विकर्षन्निदमब्रवीत् ॥ ६८ ॥ लक्ष्मीवाँल्लक्ष्मणो वाक्यमर्थसाधकमात्मनः । धर्मात्मा सत्यसंधश्च रामो दाशरथिर्यदि । पौरुषे चाप्रतिद्वन्द्वस्तदैनं जहि रावणिम् ॥ ६९ ॥
भावार्थ
उसमें सुन्दर पर लगे थे । उस बाणका सारा अङ्ग सुडौल एवं गोल था । उसकी गाँठ भी सुन्दर थी । वह बहुत ही मजबूत और सुवर्णसे भूषित था । उसमें शरीरको चीर डालनेकी क्षमता थी । उसे रोकना अत्यन्त कठिन था । उसके आघातको सह लेना भी बहुत मुश्किल था । वह राक्षसोंको भयभीत करनेवाला तथा विषधर सर्पके विषकी भाँति शत्रुके प्राण लेनेवाला था। देवताओंद्वारा उस बाणकी सदा ही पूजा की गयी थी। पूर्वकालके देवासुर संग्राममें हरे रंगके घोड़ोंसे युक्त रथवाले, पराक्रमी, शक्तिमान् एवं महातेजस्वी इन्द्रने उसी बाणसे दानवोंपर विजय पायी थी । उसका नाम था ऐन्द्रास्त्र । वह युद्धके अवसरोंपर कभी पराजित या असफल नहीं हुआ था । शोभासम्पन्न वीर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने अपने उत्तम धनुषपर उस श्रेष्ठ बाणको रखकर उसे खींचते हुए अपने अभिप्रायको सिद्ध करनेवाली यह बात कही—‘यदि दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम धर्मात्मा और सत्यप्रतिज्ञ हैं तथा पुरुषार्थमें उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई वीर नहीं है तो हे अस्त्र ! तुम इस रावणपुत्रका वध कर डालो’ ॥ ६५-६९ ॥
इत्युक्त्वा बाणमाकर्णं विकृष्य तमजिह्मगम् । लक्ष्मणः समरे वीरः ससर्जेन्द्रजितं प्रति । ऐन्द्रास्त्रेण समायुज्य लक्ष्मणः परवीरहा ॥ ७० ॥
भावार्थ
समराङ्गणमें ऐसा कहकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले वीर लक्ष्मणने सीधे जानेवाले उस बाणको कानतक खींचकर ऐन्द्रास्त्रसे संयुक्त करके इन्द्रजित्की ओर छोड़ दिया ॥ ७० ॥
तच्छिरः सशिरस्त्राणं श्रीमज्ज्वलितकुण्डलम् । प्रमथ्येन्द्रजितः कायात् पातयामास भूतले ॥ ७१ ॥
भावार्थ
धनुषसे छूटते ही ऐन्द्रास्त्रने जगमगाते हुए कुण्डलोंसे युक्त इन्द्रजित्के शिरस्त्राणसहित दीप्तिमान् मस्तकको धड़से काटकर धरतीपर गिरा दिया ॥ ७१ ॥
तद् राक्षसतनूजस्य भिन्नस्कन्धं शिरो महत् । तपनीयनिभं भूमौ ददृशे रुधिरोक्षितम् ॥ ७२ ॥
भावार्थ
राक्षसपुत्र इन्द्रजित्का कंधेपरसे कटा हुआ वह विशाल सिर, जो खूनसे लथपथ हो रहा था, भूमिपर सुवर्णके समान दिखायी देने लगा ॥ ७२ ॥
हतः स निपपाताथ धरण्यां रावणात्मजः । कवची सशिरस्त्राणो विप्रविद्धशरासनः ॥ ७३ ॥
भावार्थ
इस प्रकार मारा जाकर कवच, सिर और शिरस्त्राणसहित रावणकुमार धराशायी हो गया। उसका धनुष दूर जा गिरा ॥ ७३ ॥
चुक्रुशुस्ते ततः सर्वे वानराः सविभीषणाः । हृष्यन्ते निहते तस्मिन् देवा वृत्रवधे यथा ॥ ७४ ॥
भावार्थ
जैसे वृत्रासुरका वध होनेपर देवता प्रसन्न हुए थे, उसी प्रकार इन्द्रजित्के मारे जानेपर विभीषणसहित समस्त वानर हर्षसे भर गये और जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ ७४ ॥
अथान्तरिक्षे देवानामृषीणां च महात्मनाम् । जज्ञेऽथ जयसंनादो गन्धर्वाप्सरसामपि ॥ ७५ ॥
भावार्थ
आकाशमें देवताओं, महात्मा ऋषियों, गन्धवों तथा अप्सराओंका भी विजयजनित हर्षनाद गूँज उठा ॥ ७५ ॥
पतितं समभिज्ञाय राक्षसी सा महाचमूः । वध्यमाना दिशो भेजे हरिभिर्जितकाशिभिः ॥ ७६ ॥
भावार्थ
इन्द्रजित्को धराशायी हुआ जान राक्षसोंकी वह विशाल सेना विजयसे उल्लसित हुए वानरोंकी मार खाकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगी ॥ ७६ ॥
वानरैर्वध्यमानास्ते शस्त्राण्युत्सृज्य राक्षसाः । लङ्कामभिमुखाः सस्नुर्भ्रष्टसंज्ञाः प्रधाविताः ॥ ७७ ॥
भावार्थ
वानरोंद्वारा मारे जाते हुए राक्षस अपनी सुध-बुध खो बैठे और अस्त्र-शस्त्रोंको छोड़कर तेजीसे भागते हुए लङ्काकी ओर चले गये ॥ ७७ ॥
दुद्रुवुर्बहुधा भीता राक्षसाः शतशो दिशः । त्यक्त्वा प्रहरणान् सर्वे पट्टिशासिपरश्वधान् ॥ ७८ ॥
भावार्थ
राक्षस बहुत डर गये थे; इसलिये वे सब-के-सब पट्टिश, खड्ग और फरसे आदि शस्त्रोंको त्यागकर सैकड़ोंकी संख्यामें एक साथ ही सब दिशाओंमें भागने लगे ॥ ७८ ॥
केचिल्लङ्कां परित्रस्ताः प्रविष्टा वानरार्दिताः । समुद्रे पतिताः केचित् केचित् पर्वतमाश्रिताः ॥ ७९ ॥
भावार्थ
वानरोंसे पीड़ित होकर कोई डरके मारे लङ्कामें घुस गये, कोई समुद्रमें कूद पड़े और कोई-कोई पर्वतकी चोटीपर चढ़ गये ॥ ७९ ॥
हतमिन्द्रजितं दृष्ट्वा शयानं च रणक्षितौ । राक्षसानां सहस्रेषु न कश्चित् प्रत्यदृश्यत ॥ ८० ॥
भावार्थ
इन्द्रजित् मारा गया और रणभूमिमें सो रहा है, यह देख हजारों राक्षसोंमेंसे एक भी वहाँ खड़ा नहीं दिखायी दिया ॥ ८० ॥
यथास्तं गत आदित्ये नावतिष्ठन्ति रश्मयः । तथा तस्मिन् निपतिते राक्षसास्ते गता दिशः ॥ ८१ ॥
भावार्थ
जैसे सूर्यके अस्त हो जानेपर उसकी किरणें यहाँ नहीं ठहरती हैं, उसी प्रकार इन्द्रजित्के धराशायी होनेपर वे राक्षस वहाँ रुक न सके, सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ ८१ ॥
शान्तरश्मिरिवादित्यो निर्वाण इव पावकः । बभूव स महाबाहुर्व्यपास्तगतजीवितः ॥ ८२ ॥
भावार्थ
महाबाहु इन्द्रजित् निष्प्राण हो जानेपर शान्त किरणोंवाले सूर्य अथवा बुझी हुई आगके समान निस्तेज हो गया ॥८२॥
प्रशान्तपीडाबहुलो विनष्टारिः प्रहर्षवान् । बभूव लोकः पतिते राक्षसेन्द्रसुते तदा ॥ ८३ ॥
भावार्थ
उस समय राक्षसराजकुमार इन्द्रजित्के समरभूमिमें गिर जानेपर सारे संसारकी अधिकांश पीडा नष्ट हो गयी । सबका शत्रु मारा गया और सभी हर्षसे भर गये ॥ ८३ ॥
हर्षं च शक्रो भगवान् सह सर्वैर्महर्षिभिः । जगाम निहते तस्मिन् राक्षसे पापकर्मणि ॥ ८४ ॥
भावार्थ
उस पापकर्मा राक्षसके मारे जानेपर सम्पूर्ण महर्षियोंके साथ भगवान् इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ८४ ॥
आकाशे चापि देवानां शुश्रुवे दुन्दुभिस्वनः । नृत्यद्भिरप्सरोभिश्च गन्धर्वैश्च महात्मभिः ॥ ८५ ॥
भावार्थ
आकाशमें नाचती हुई अप्सराओं और गाते हुए महामना गन्धर्वोंके नृत्य और गानकी ध्वनिके साथ देवताओंकी दुन्दुभिका शब्द भी सुनायी देने लगा ॥ ८५ ॥
ववर्षुः पुष्पवर्षाणि तदद्भुतमिवाभवत् । प्रशशाम हते तस्मिन् राक्षसे क्रूरकर्मणि ॥ ८६ ॥
भावार्थ
देवता आदि वहाँ फूलोंकी वर्षा करने लगे । वह दृश्य अद्भुत-सा प्रतीत हुआ । उस क्रूरकर्मा राक्षसके मारे जानेपर वहाँकी उड़ती हुई धूल शान्त हो गयी ॥ ८६ ॥
शुद्धा आपो नभश्चैव जहृषुर्देवदानवाः । आजग्मुः पतिते तस्मिन् सर्वलोकभयावहे ॥ ८७ ॥ ऊचुश्च सहितास्तुष्टा देवगन्धर्वदानवाः । विज्वराः शान्तकलुषा ब्राह्मणा विचरन्त्विति ॥ ८८ ॥ ततोऽभ्यनन्दन् संहृष्टाः समरे हरियूथपाः । तमप्रतिबलं दृष्ट्वा हतं नैर्ऋतपुङ्गवम् ॥ ८९ ॥
भावार्थ
सम्पूर्ण लोकोंको भय देनेवाले इन्द्रजित्के धराशायी होनेपर जल स्वच्छ हो गया, आकाश भी निर्मल दिखायी देने लगा और देवता तथा दानव हर्षसे खिल उठे । देवता, गन्धर्व और दानव वहाँ आये और सब एक साथ संतुष्ट होकर बोले-अब ब्राह्मणलोग निश्चिन्त एवं क्लेशशून्य होकर सर्वत्र विचरें ॥ समराङ्गणमें अप्रतिम बलशाली निशाचरशिरोमणि इन्द्रजित्को मारा गया देख हर्षसे भरे हुए वानर-यूथपति लक्ष्मणका अभिनन्दन करने लगे ॥ ८९ ॥
विभीषणो हनूमांश्च जाम्बवांश्चर्क्षयूथपः । विजयेनाभिनन्दन्तस्तुष्टुवुश्चापि लक्ष्मणम् ॥ ९० ॥
भावार्थ
विभीषण, हनुमान् और रीछ-यूथपति जाम्बवान्—ये इस विजयके लिये लक्ष्मणजीका अभिनन्दन करते हुए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ९० ॥
क्ष्वेडन्तश्च प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः । लब्धलक्षा रघुसुतं परिवार्योपतस्थिरे ॥ ९१ ॥
भावार्थ
हर्ष एवं रक्षाका अवसर पाकर वानर किलकिलाते, कूदते और गर्जते हुए वहाँ रघुकुलनन्दन लक्ष्मणको घेरकर खड़े हो गये ॥ ९१ ॥
लाङ्गूलानि प्रविध्यन्तः स्फोटयन्तश्च वानराः । लक्ष्मणो जयतीत्येव वाक्यं विश्रावयंस्तदा ॥ ९२ ॥
भावार्थ
उस समय अपनी पूँछोंको हिलाते और फटकारते हुए वानर वीर ‘लक्ष्मणकी जय हो’ यह नारा लगाने लगे ॥९२॥
अन्योन्यं च समाश्लिष्य हरयो हृष्टमानसाः । चक्रुरुच्चावचगुणा राघवाश्रयसत्कथाः ॥ ९३ ॥
भावार्थ
वानरोंका चित्त हर्षसे भरा हुआ था । वे विविध गुणों-वाले वानर एक-दूसरेको हृदयसे लगाकर श्रीरामचन्द्रजीसे सम्बन्ध रखनेवाली कथाएँ कहने लगे ॥ ९३ ॥
तदसुकरमथाभिवीक्ष्य हृष्टाः प्रियसुहृदो युधि लक्ष्मणस्य कर्म । परममुपलभन्मनःप्रहर्षं विनिहितमिन्द्ररिपुं निशम्य देवाः ॥९४॥
भावार्थ
युद्धस्थलमें लक्ष्मणके प्रिय सुहृद् वानर उनका वह दुष्कर एवं महान् पराक्रम देख बड़े प्रसन्न हुए । देवता भी उस इन्द्रद्रोही राक्षसका वध हुआ देख मनमें बड़े भारी हर्षका अनुभव करने लगे ॥ ९४ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें