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युद्धकाण्ड, सर्ग 89

युध्यमानौ ततो दृष्ट्वा प्रसक्तौ नरराक्षसौ । प्रभिन्नाविव मातङ्गौ परस्परजयैषिणौ ॥ १ ॥ तयोर्युद्धं द्रष्टुकामो वरचापधरो बली । शूरः स रावणभ्राता तस्थौ संग्राममूर्धनि ॥ २ ॥

भावार्थ

लक्ष्मण और इन्द्रजित्को दो मदमत्त हाथियोंकी भाँति परस्पर विजय पानेकी इच्छासे युद्धासक्त होकर जूझते देख उन दोनोंके युद्धको देखनेकी इच्छासे रावणके बलवान् भाई शूरवीर विभीषण सुन्दर धनुष धारण किये उस युद्धके मुहानेपर आकर खड़े हो गये ॥ १-२ ॥

ततो विस्फारयामास महद् धनुरवस्थितः । उत्ससर्ज च तीक्ष्णाग्रान् राक्षसेषु महाशरान् ॥ ३ ॥

भावार्थ

वहाँ खड़े होकर उन्होंने अपने विशाल धनुषको खींचा और राक्षसोंपर तेज धारवाले बड़े-बड़े बाणोंको बरसाना आरम्भ किया ॥ ३ ॥

ते शराः शिखिसंस्पर्शा निपतन्तः समाहिताः । राक्षसान् द्रावयामासुर्वज्राणीव महागिरीन् ॥ ४ ॥

भावार्थ

जैसे वज्र नामक अस्त्र बड़े-बड़े पर्वतोंको विदीर्ण कर देते हैं, उसी प्रकार विभीषणके चलाये हुए वे बाण, जिनका स्पर्श आगके समान जलनेवाला था, राक्षसोंपर गिरकर उनके अङ्गोंको चीरने लगे ॥ ४ ॥

विभीषणस्यानुचरास्तेऽपि शूलासिपट्टिशैः । चिच्छिदुः समरे वीरान् राक्षसान् राक्षसोत्तमाः ॥ ५ ॥

भावार्थ

विभीषणके अनुचर भी राक्षसोंमें श्रेष्ठ वीर थे; अतः वे भी समराङ्गणमें शूल, खड्ग और पट्टिशोंद्वारा वीर राक्षसोंका संहार करने लगे ॥ ५ ॥

राक्षसैस्तैः परिवृतः स तदा तु विभीषणः । बभौ मध्ये प्रधृष्टानां कलभानामिव द्विपः ॥ ६ ॥

भावार्थ

उन चारों राक्षसोंसे घिरे हुए विभीषण धृष्ट गजशावकोंके बीचमें खड़े हुए गजराजकी भाँति शोभा पाते थे ॥ ६ ॥

ततः संचोदमानो वै हरीन् रक्षोवधप्रियान् । उवाच वचनं काले कालज्ञो रक्षसां वरः ॥ ७ ॥

भावार्थ

राक्षसोंमें श्रेष्ठ विभीषण समयोचित कर्तव्यको जानते थे, इसलिये उन्होंने वानरोंको, जिन्हें राक्षसोंका वध करना प्रिय था, युद्धके लिये प्रेरित करते हुए यह समयके अनुरूप बात कही—॥ ७ ॥

एकोऽयं राक्षसेन्द्रस्य परायणमवस्थितः । एतच्छेषं बलं तस्य किं तिष्ठत हरीश्वराः ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘वानरेश्वरो ! अब खड़े-खड़े क्या देखते हो ? राक्षसराज रावणका यह एकमात्र सहारा है, जो तुम्हारे सामने खड़ा है । रावणकी सेनाका इतना ही भाग अब शेष रह गया है ॥ ८ ॥

अस्मिंश्च निहते पापे राक्षसे रणमूर्धनि । रावणं वर्जयित्वा तु शेषमस्य बलं हतम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘इस युद्धके मुहानेपर इस पापी राक्षस इन्द्रजित्के मारे जानेपर रावणको छोड़कर उसकी सारी सेनाको मरी हुई ही समझो ॥ ९ ॥

प्रहस्तो निहतो वीरो निकुम्भश्च महाबलः । कुम्भकर्णश्च कुम्भश्च धूम्राक्षश्च निशाचरः ॥ १० ॥ जम्बुमाली महामाली तीक्ष्णवेगोऽशनिप्रभः । सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च वज्रदंष्ट्रश्च राक्षसः ॥ ११ ॥ संह्रादी विकटोऽरिघ्नस्तपनो मन्द एव च । प्रघासः प्रघसश्चैव प्रजङ्घो जङ्घ एव च ॥ १२ ॥ अग्निकेतुश्च दुर्धर्षो रश्मिकेतुश्च वीर्यवान् । विद्युज्जिह्वो द्विजिह्वश्च सूर्यशत्रुश्च राक्षसः ॥ १३ ॥ अकम्पनः सुपार्श्वश्च चक्रमाली च राक्षसः । कम्पनः सत्त्ववन्तौ तौ देवान्तकनरान्तकौ ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘वीर प्रहस्त मारा गया, महाबली निकुम्भ, कुम्भकर्ण, कुम्भ तथा निशाचर धूम्राक्ष भी कालके गालमें चले गये ।१०। ‘जम्बुमाली, महामाली, तीक्ष्णवेग, अशनिप्रभ, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, राक्षस वज्रदंष्ट्र, संह्रादी, विकट, अरिघ्न, तपन, मन्द, प्रघास, प्रघस, प्रजङ्घ, जङ्घ, दुर्जय अग्निकेतु, पराक्रमी रश्मिकेतु, विद्युज्जिह्व, द्विजिह्व, राक्षस सूर्यशत्रु, अकम्पन, सुपार्श्व, निशाचर चक्रमाली, कम्पन तथा वे दोनों शक्तिशाली वीर देवान्तक और नरान्तक—ये सभी मारे जा चुके हैं ॥ ११—१४ ॥

एतान् निहत्यातिबलान् बहून् राक्षससत्तमान् । बाहुभ्यां सागरं तीर्त्वा लङ्घयतां गोष्पदं लघु ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘इन अत्यन्त बलशाली बहुसंख्यक राक्षसशिरोमणियोंका वध करके तुमलोगोंने हाथोंसे तैरकर समुद्र पार कर लिया है । अब गायकी खुरीके बराबर यह छोटा-सा राक्षस बचा हुआ है । अतः इसे भी शीघ्र ही लाँघ जाओ ॥ १५ ॥

एतावदेव शेषं वो जेतव्यमिति वानराः । हताः सर्वे समागम्य राक्षसा बलदर्पिताः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘वानरो ! इतनी ही राक्षससेना और शेष रह गयी है, जिसे तुम्हें जीतना है । अपने बलपर घमंड करनेवाले प्रायः सभी राक्षस तुमसे भिड़कर मारे जा चुके हैं ॥ १६ ॥

अयुक्तं निधनं कर्तुं पुत्रस्य जनितुर्मम । घृणामपास्य रामार्थे निहन्स्यां भ्रातुरात्मजम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘मैं इसके बापका भाई हूँ। इस नाते यह मेरा पुत्र है। अतः मेरे लिये इसका वध करना अनुचित है, तथापि श्रीरामचन्द्रजीके लिये दयाको तिलाञ्जलि दे मैं अपने इस भतीजेको मारनेके लिये उद्यत हूँ ॥ १७ ॥

हन्तुकामस्य मे बाष्पं चक्षुश्चैव निरुध्यति । तमेवैष महाबाहुर्लक्ष्मणः शमयिष्यति ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘जब मैं स्वयं मारनेके लिये इसपर हथियार चलानाचाहता हूँ, उस समय आँसू मेरी दृष्टि बंद कर देते हैं; अतः ये महाबाहु लक्ष्मण ही इसका विनाश करेंगे ॥ १८ ॥

बानरा ध्नत सम्भूय भृत्यानस्य समीपगान् । इति तेनातियशसा राक्षसेनाभिचोदिताः ॥ १९ ॥ वानरेन्द्रा जहृषिरे लाङ्गूलानि च विव्यधुः ।

भावार्थ

‘वानरो ! तुमलोग झुंड बनाकर इसके समीपवर्ती सेवकोंपर टूट पड़ो और उन्हें मार डालो।’ इस प्रकार अत्यन्त यशस्वी राक्षस विभीषणके प्रेरित करनेपर वानरयूथपति हर्षऔर उत्साहसे भर गये तथा अपनी पूँछ पटकने लगे ॥ १९½ ॥

ततस्तु कपिशार्दूलाः क्ष्वेडन्तश्च पुनः पुनः । मुमुचुर्विविधान् नादान् मेघान् दृष्ट्वेव बर्हिणः ॥ २० ॥

भावार्थ

फिर वे सिंहके समान पराक्रमी वानर बारंबार गर्जते हुए उसी तरह नाना प्रकारके शब्द करने लगे, जैसे बादलोंको देखकर मोर अपनी बोली बोलने लगते हैं ॥ २० ॥

जाम्बवानपि तैः सर्वैः स्वयूथैरभिसंवृतः । तेऽश्मभिस्ताडयामासुर्नखैर्दन्तैश्च राक्षसान् ॥ २१ ॥

भावार्थ

अपने यूथवाले समस्त भालुओंसे घिरे हुए जाम्बवान् तथा वे वानर पत्थरों, नखों और दाँतोंसे वहाँ राक्षसोंको पीटने लगे ॥ २१ ॥

निघ्नन्तमृक्षाधिपतिं राक्षसास्ते महाबलाः । परिवव्रुर्भयं त्यक्त्वा तमनेकविधायुधाः ॥ २२ ॥

भावार्थ

अपने ऊपर प्रहार करते हुए ऋक्षराज जाम्बवान्को उन महाबली राक्षसोंने भय छोड़कर चारों ओरसे घेर लिया । उनके हाथमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र थे ॥ २२ ॥

शरैः परशुभिस्तीक्ष्णैः पट्टिशैर्यष्टितोमरैः । जाम्बवन्तं मृधे जघ्नुर्निघ्नन्तं राक्षसीं चमूम् ॥ २३ ॥

भावार्थ

वे राक्षस सेनाका संहार करनेवाले जाम्बवान्पर युद्धस्थलमें बाणों, तीखे फरसों, पट्टिशों, डंडों और तोमरोंद्वारा प्रहार करने लगे ॥ २३ ॥

स सम्प्रहारस्तुमुलः संजज्ञे कपिरक्षसाम् । देवासुराणां क्रुद्धानां यथा भीमो महास्वनः ॥ २४ ॥

भावार्थ

वानरों और राक्षसोंका वह महायुद्ध क्रोधसे भरे हुए देवताओं और असुरोंके संग्रामकी भाँति बड़ा भयंकर हो चला। उसमें बड़े जोर-जोरसे भयानक कोलाहल होने लगा ॥ २४ ॥

हनूमानपि संक्रुद्धः सालमुत्पाट्य पर्वतात् । स लक्ष्मणं स्वयं पृष्ठादवरोप्य महामनाः ॥ २५ ॥ रक्षसां कदनं चक्रे दुरासादः सहस्रशः ।

भावार्थ

उस समय महामनस्वी हनुमान्जीने लक्ष्मणको अपनी पीठसे उतार दिया और स्वयं भी अत्यन्त कुपित हो पर्वतशिखरसे एक सालवृक्ष उखाड़कर सहस्रों राक्षसोंका संहार करने लगे। शत्रुओंके लिये उन्हें परास्त करना बहुत ही कठिन था ॥ २५½ ॥

स दस्त्वा तुमुलं युद्धं पितृव्यस्येन्द्रजिद् बली ॥ २६ ॥ लक्ष्मणं परवीरघ्नः पुनरेवाभ्यधावत ।

भावार्थ

शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले बलवान् इन्द्रजित्ने अपने चाचाको भी घोर युद्धका अवसर देकर पुनः लक्ष्मणपर धावा किया ॥ २६½ ॥

तौ प्रयुद्धौ तदा वीरौ मृधे लक्ष्मणराक्षसौ ॥ २७ ॥ शरौघानभिवर्षन्तौ जघ्नतुस्तौ परस्परम् ।

भावार्थ

लक्ष्मण और इन्द्रजित् दोनों वीर उस समय रणभूमिमें बड़े वेगसे जूझने लगे। वे दोनों बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए एक दूसरेको चोट पहुँचाने लगे ॥ २७½ ॥

अभीक्ष्णमन्तर्दधतुः शरजालैर्महाबलौ ॥ २८ ॥ चन्द्रादित्याविवोष्णान्ते यथा मेघैस्तरस्विनौ ।

भावार्थ

वे महाबली वीर बाणोंका जाल-सा बिछाकर बारंबार एक दूसरेको ढक देते थे। ठीक उसी तरह, जैसे वर्षाकालमें वेगशाली चन्द्रमा और सूर्य बादलोंसे आच्छादित हो जाया करते हैं ॥ २८½ ॥

नह्यादानं न संधानं धनुषो वा परिग्रहः ॥ २९ ॥ न विप्रमोक्षो बाणानां न विकर्षो न विग्रहः । न मुष्टिप्रतिसंधानं न लक्ष्यप्रतिपादनम् ॥ ३० ॥ अदृश्यत तयोस्तत्र युध्यतोः पाणिलाघवात् ।

भावार्थ

युद्धमें लगे हुए उन दोनों वीरोंके हाथोंमें इतनी फुर्ती थी कि तरकससे बाणोंका निकालना, उनको धनुषपर रखना, धनुषको इस हाथसे उस हाथमें लेना, उसे मुट्ठीमें दृढ़तापूर्वक पकड़ना, कानतक खींचना, बाणोंका विभाग करना, उन्हें छोड़ना और लक्ष्य वेधना आदि कुछ भी दिखायी नहीं पड़ता था ॥ २९-३०½ ॥

चापवेगप्रयुक्तैश्च बाणजालैः समन्ततः ॥ ३१ ॥ अन्तरिक्षेऽभिसम्पन्ने न रूपाणि चकाशिरे ।

भावार्थ

धनुषके वेगसे छोड़े गये बाणसमूहोंद्वारा आकाश सब ओरसे ढक गया। अतः उसमें साकार वस्तुओंका दीखना बंद हो गया ॥ ३१½ ॥

लक्ष्मणो रावणिं प्राप्य रावणिश्चापि लक्ष्मणम्॥ ३२ ॥ अव्यवस्था भवत्युग्रा ताभ्यामन्योन्यविग्रहे ।

भावार्थ

लक्ष्मण रावणकुमारके पास पहुँचकर और रावणकुमार लक्ष्मणके निकट जाकर दोनों परस्पर जूझने लगे । इस प्रकार युद्ध करते हुए जब वे एक दूसरेपर प्रहार करने लगते, तब भयंकर अव्यवस्था पैदा हो जाती थी । क्षण-क्षणमें यह निश्चय करना कठिन हो जाता था कि अमुककी विजय या पराजय होगी ॥ ३२½ ॥

ताभ्यामुभाभ्यां तरसा प्रसृष्टैर्विशिखैः शितैः ॥ ३३ ॥ निरन्तरमिवाकाशं बभूव तमसा वृतम् ।

भावार्थ

उन दोनोंके द्वारा वेगपूर्वक छोड़े गये तीखे बाणोंसे आकाश ठसाठस भर गया और वहाँ अँधेरा छा गया ॥३३½॥

तैः पतद्भिश्च बहुभिस्तयोः शरशतैः शितैः ॥ ३४ ॥ दिशश्च प्रदिशश्चैव बभूवुः शरसंकुलाः ।

भावार्थ

वहाँ गिरते हुए बहुसंख्यक अस्त्रों और सैकड़ों तीखे सायकोंसे सम्पूर्ण दिशाएँ और विदिशाएँ भी व्याप्त हो गयीं ॥३४½॥

तमसा पिहितं सर्वमासीत् प्रतिभयं महत् ॥ ३५ ॥ अस्तं गते सहस्रांशौ संवृते तमसा च वै । रुधिरौघा महानद्यः प्रावर्तन्त सहस्रशः ॥ ३६ ॥

भावार्थ

अतः सब कुछ अन्धकारसे आच्छन्न हो गया और बड़ा भयानक दृश्य दिखायी देने लगा । सूर्य अस्त हो गये, सब ओर अँधेरा फैल गया और रक्तके प्रवाहसे पूर्ण सहस्रों बड़ी-बड़ी नदियाँ बह चलीं ॥ ३५-३६ ॥

क्रव्यादा दारुणा वाग्भिश्चिक्षिपुर्भीमनिःस्वनान् । न तदानीं ववौ वायुर्न च जज्वाल पावकः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

मांसभक्षी भयंकर जन्तु अपनी वाणीद्वारा भयानक शब्द प्रकट करने लगे । उस समय न तो वायु चलती थी और न आग ही प्रज्वलित होती थी ॥ ३७ ॥

स्वस्त्यस्तु लोकेभ्य इति जजल्पुस्ते महर्षयः । सम्पेतुश्चात्र संतता गन्धर्वाः सह चारणैः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

महर्षिगण बोल उठे--‘संसारका कल्याण हो ।’ उस समय गन्धर्वोंको बड़ा संताप हुआ । वे चारणोंके साथ वहाँसे भाग चले ॥ ३८ ॥

अथ राक्षससिंहस्य कृष्णान् कनकभूषणान् । शरैश्चतुर्भिः सौमित्रिर्विव्याध चतुरो हयान् ॥ ३९ ॥

भावार्थ

तदनन्तर लक्ष्मणने चार बाण मारकर उस राक्षससिंहके सोनेके आभूषणोंसे सजे हुए काले रंगके चारों घोड़ोंको बींध दिया ॥ ३९ ॥

ततोऽपरेण भल्लेन पीतेन निशितेन च । सम्पूर्णायतमुक्तेन सुपत्रेण सुवर्चसा ॥ ४० ॥ महेन्द्राशनिकल्पेन सूतस्य विचरिष्यतः । स तेन बाणाशनिना तलशब्दानुनादिना ॥ ४१ ॥ लाघवाद् राघवः श्रीमाञ्छिरः कायादपाहरत् ।

भावार्थ

तत्पश्चात् रघुकुलनन्दन श्रीमान् लक्ष्मणने दूसरे तीखे, पानीदार सुन्दर पंखवाले और चमकीले भल्लसे जो इन्द्रके वज्रकी समानता करता था तथा जिसे कानतक खींचकर छोड़ा गया था, रणभूमिमें विचरते हुए इन्द्रजित्के सारथिका मस्तक शीघ्रतापूर्वक धड़से अलग कर दिया । वह वज्रोपम बाण छूटनेके साथ ही हथेलीके शब्दसे अनुनादित हो सनसनाता हुआ आगे बढ़ा था ॥ ४०-४१½ ॥

स यन्तरि महातेजा हते मन्दोदरीसुतः ॥ ४२ ॥ स्वयं सारथ्यमकरोत् पुनश्च धनुरस्पृशत् । तदद्भुतमभूत् तत्र सारथ्यं पश्यतां युधि ॥ ४३ ॥

भावार्थ

सारथिके मारे जानेपर महातेजस्वी मन्दोदरीकुमार इन्द्रजित् स्वयं ही सारथिका भी काम सँभालता--घोड़ोंको भी काबूमें रखता और फिर धनुषको भी चलाता था । युद्धस्थलमें उसके द्वारा वहाँ सारथिके कार्यका भी सम्पादन होना दर्शकोंकी दृष्टिमें बड़ी अद्भुत बात थी ॥ ४२-४३ ॥

हयेषु व्यग्रहस्तं तं विव्याध निशितैः शरैः । धनुष्यथ पुनर्व्यग्रं हयेषु मुमुचे शरान् ॥ ४४ ॥

भावार्थ

इन्द्रजित् जब घोड़ोंको रोकनेके लिये हाथ बढ़ाता, तब लक्ष्मण उसे तीखे बाणोंसे बेधने लगते और जब वह युद्धके लिये धनुष उठाता, तब उसके घोड़ोंपर बाणोंका प्रहार करते थे ॥ ४४ ॥

छिद्रेषु तेषु बाणौघैर्विचरन्तमभीतवत् । अर्दयामास समरे सौमित्रिः शीघ्रकृत्तमः ॥ ४५ ॥

भावार्थ

उन छिद्रों ( बाण-प्रहारके अवसरों ) में शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणने समराङ्गणमें निर्भय-से विचरते हुए इन्द्रजित्को अपने बाण-समूहोंद्वारा अत्यन्त पीड़ित कर दिया ॥ ४५ ॥

निहतं सारथिं दृष्ट्वा समरे रावणात्मजः । प्रजहौ समरोद्धर्षं विषण्णः स बभूव ह ॥ ४६ ॥ विषण्णवदनं दृष्ट्वा राक्षसं हरियूथपाः । ततः परमसंहृष्टा लक्ष्मणं चाभ्यपूजयन् ॥ ४७ ॥

भावार्थ

समरभूमिमें सारथिको मारा गया देख रावणकुमारने युद्धविषयक उत्साह त्याग दिया । वह विषादमें डूब गया ॥ उस राक्षसके मुखपर विषाद छाया हुआ देख वे वानरयूथपति बड़े प्रसन्न हुए और लक्ष्मणकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ४७ ॥

ततः प्रमाथी रभसः शरभो गन्धमादनः । अमृष्यमाणाश्चत्वारश्चक्रुर्वेगं हरीश्वराः ॥ ४८ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् प्रमाथी, शरभ, रभस और गन्धमादन--इन चार वानरेश्वरोंने अमर्षसे भरकर अपना महान् वेग प्रकट किया ॥ ४८ ॥

ते चास्य हयमुख्येषु तूर्णमुत्पत्य वानराः । चतुर्षु सुमहावीर्या निपेतुर्भीमविक्रमाः ॥ ४९ ॥ तेषामधिष्ठितानां तैर्वानरैः पर्वतोपमैः । मुखेभ्यो रुधिरं व्यक्तं हयानां समवर्तत ॥ ५० ॥

भावार्थ

वे चारों वानर महान् बलशाली और भयंकर पराक्रमी थे । वे सहसा उछलकर इन्द्रजित्के चारों घोड़ोंपर कूद पड़े ॥ उन पर्वताकार वानरोंके भारसे दब जानेके कारण उन घोड़ोंके मुखोंसे खून निकलने लगा ॥ ५० ॥

ते हया मथिता भग्ना व्यसवो धरणीं गताः । ते निहत्य हयांस्तस्य प्रमथ्य च महारथम् । पुनरुत्पत्य वेगेन तस्थुर्लक्ष्मणपार्श्वतः ॥ ५१ ॥

भावार्थ

उनसे रौंदे जानेके कारण घोड़ोंके अङ्ग-भङ्ग हो गये और वे प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़े । इस प्रकार घोड़ोंकी जान ले इन्द्रजित्के विशाल रथको भी तोड़-फोड़कर वे चारों वानर पुनः वेगसे उछले और लक्ष्मणके पास आकर खड़े हो गये ॥ ५१ ॥

स हताश्वाद्वप्लुत्य रथान्मथितसारथिः । शरवर्षेण सौमित्रिमभ्यधावत रावणिः ॥ ५२ ॥

भावार्थ

सारथि तो पहले ही मारा गया था । जब घोड़े भी मार डाले गये, तब रावणकुमार रथसे कूद पड़ा और बाणोंकी वर्षा करता हुआ सुमित्राकुमारकी ओर बढ़ा ॥ ५२ ॥

ततो महेन्द्रप्रतिमः स लक्ष्मणः पदातिनं तं निहतैर्हयोत्तमैः । सृजन्तमाजौ निशिताञ्छरोत्तमान् भृशं तदा बाणगणैर्व्यदारयत् ॥ ५३ ॥

भावार्थ

उस समय इन्द्रके समान पराक्रमी लक्ष्मणने श्रेष्ठ घोड़ोंके मारे जानेसे पैदल चलकर युद्धमें तीखे उत्तम बाणोंकी वर्षा करते हुए इन्द्रजित्को अपने बाणसमूहोंकी मारसे अत्यन्त घायल कर दिया ॥ ५३ ॥

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