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युद्धकाण्ड, सर्ग 88

विभीषणवचः श्रुत्वा रावणिः क्रोधमूर्च्छितः । अब्रवीत् परुषं वाक्यं क्रोधेनाभ्युत्पपात च ॥ १ ॥

भावार्थ

विभीषणकी यह बात सुनकर रावणकुमार इन्द्रजित् क्रोधसे मूर्च्छित-सा हो उठा । वह रोषपूर्वक कठोर बातें कहने लगा और उछलकर सामने आ गया ॥ १ ॥

उद्यतायुधनिस्त्रिंशो रथे सुसमलंकृते । कालाश्वयुक्ते महति स्थितः कालान्तकोपमः ॥ २ ॥

भावार्थ

उसने खड्ग तथा दूसरे आयुध भी उठा रखे थे । काले घोड़ोंसे युक्त, सजे-सजाये विशाल रथपर बैठा हुआ इन्द्रजित् विनाशकारी कालके समान जान पड़ता था ॥ २ ॥

महाप्रमाणमुद्यम्य विपुलं वेगवद् दृढम् । धनुर्भीमबलो भीमं शरांश्चामित्रनाशनान् ॥ ३ ॥

भावार्थ

वह भयंकर बलशाली निशाचर बहुत बड़े आकारवाले, लंबे, मजबूत, वेगशाली और भयानक धनुषको तथा शत्रुओंका नाश करनेमें समर्थ बाणोंको भी लेकर युद्धके लिये उद्यत था ॥ ३ ॥

तं ददर्श महेष्वासो रथस्थः समलंकृतः । अलंकृतममित्रघ्नो रावणस्यात्मजो बली ॥ ४ ॥ हनूमत्पृष्ठमारूढमुदयस्थरविप्रभम् ।

भावार्थ

वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत होकर रथपर बैठे हुए उस महाधनुर्धर, शत्रुनाशक बलवान् रावणकुमारने देखा, लक्ष्मण अपने तेजसे ही विभूषित हो हनुमान्जीकी पीठपर आरूढ़ होकर उदयाचलपर विराजमान सूर्यदेवके समान प्रकाशित हो रहे हैं ॥ ४½ ॥

उवाचैनं सुसंरब्धः सौमित्रिं सविभीषणम् ॥ ५ ॥ तांश्च वानरशार्दूलान् पश्यध्वं मे पराक्रमम् । अद्य मत्कार्मुकोत्सृष्टं शरवर्षं दुरासदम् ॥ ६ ॥ मुक्तवर्षमिवाकाशो धारयिष्यथ संयुगे ।

भावार्थ

देखते ही वह अत्यन्त रोषसे भर गया और विभीषणसहित सुमित्राकुमार तथा अन्य वानरसिंहोंसे कहा—‘शत्रुओ! आज मेरा पराक्रम देखना । तुम सब लोग युद्धस्थलमें मेरे धनुषसे छूटे हुए बाणोंकी दुःसह वर्षाको अपने अङ्गोंपर उसी तरह धारण करोगे, जैसे आकाशमें होनेवाली उन्मुक्त वर्षाको भूतलके प्राणी अपने ऊपर धारण करते हैं ॥ ५-६½ ॥

अद्य वो मामका बाणा महाकार्मुकनिःसृताः । विधमिष्यन्ति गात्राणि तूलराशिमिवानलः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘जैसे आग रूईके ढेरको जला देती है, उसी प्रकार इस विशाल धनुषसे छूटे हुए मेरे बाण आज तुम्हारे शरीरोंकी धजियाँ उड़ा देंगे ॥ ७ ॥

तीक्ष्णसायकनिर्भिन्नाञ्शूलशक्त्यृष्टितोमरैः । अद्य वो गमयिष्यामि सर्वानेव यमक्षयम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘आज अपने शूल, शक्ति, ऋष्टि और तोमरोंद्वारा तथा तीखे सायकोंसे छिन्न-भिन्न करके तुम सब लोगोंको यमलोक पहुँचा दूँगा ॥ ८ ॥

सृजतः शरवर्षाणि क्षिप्रहस्तस्य संयुगे । जीमूतस्येव नदतः कः स्थास्यति ममाग्रतः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘युद्धस्थलमें हाथोंको बड़ी फुर्तीसे चलाकर जब मैं मेघके समान गर्जता हुआ बाणोंकी वर्षा आरम्भ करूँगा, उस समय कौन मेरे सामने ठहर सकेगा ? ॥ ९ ॥

रात्रियुद्धे तदा पूर्वं वज्राशनिसमैः शरैः । शायितौ तौ मया भूयो विसंज्ञौ सपुरःसरौ ॥ १० ॥ स्मृतिर्न तेऽस्ति वा मन्ये व्यक्तं यातो यमक्षयम् । आशीविषसमं क्रुद्धं यन्मां योद्धुमुपस्थितः ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! उस दिन रात्रियुद्धमें मैंने वज्र और अशनिके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा जो पहले तुम दोनों भाइयोंको रणभूमिमें सुला दिया था और तुमलोग अपने अग्रगामी सैनिकोंसहित मूर्च्छित होकर पड़े थे, मैं समझता हूँ, उसका इस समय तुम्हें स्मरण नहीं हो रहा है । विषधर सर्पके समान रोषसे भरे हुए मुझ इन्द्रजित्के साथ जो तुम युद्ध करनेके लिये उपस्थित हो गये, उससे स्पष्ट जान पड़ता है कि यमलोकमें जानेके लिये उद्यत हो’ ॥ १०-११ ॥

तच्छ्रुत्वा राक्षसेन्द्रस्य गर्जितं राघवस्तदा । अभीतवदनः क्रुद्धो रावणिं वाक्यमब्रवीत् ॥ १२ ॥

भावार्थ

राक्षसराजके बेटेकी वह गर्जना सुनकर रघुकुलनन्दन लक्ष्मण कुपित हो उठे । उनके मुखपर भयका कोई चिह्न नहीं था । वे उस रावणकुमारसे बोले—॥ १२ ॥

उक्तश्च दुर्गमः पारः कार्याणां राक्षस त्वया । कार्याणां कर्मणा पारं यो गच्छति स बुद्धिमान् ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘निशाचर ! तुमने केवल वाणीद्वारा अपने शत्रुवध आदि कार्योंकी पूर्तिके लिये घोषणा कर दी; परंतु उन कार्योंको पूरा करना तुम्हारे लिये बहुत ही कठिन है । जो क्रियाद्वारा कर्तव्यकर्मोंके पार पहुँचता है अर्थात् जो कहता नहीं, काम पूरा करके दिखा देता है, वही पुरुष बुद्धिमान् है ॥ १३ ॥

स त्वमर्थस्य हीनार्थो दुरवापस्य केनचित् । वाचा व्याहृत्य जानीषे कृतार्थोऽस्मीति दुर्मते ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘दुर्मते ! तुम अपने अभीष्ट कार्यको सिद्ध करनेमें असमर्थ हो । जो कार्य किसीके द्वारा भी सिद्ध होना कठिन है, उसे केवल वाणीके द्वारा कहकर तुम अपनेको कृतार्थ मान रहे हो ? ॥ १४ ॥

अन्तर्धानगतेनाजौ यत्त्वया चरितस्तदा । तस्कराचरितो मार्गो नैष वीरनिषेवितः ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘उस दिन संग्राममें अपनेको छिपाकर तुमने जिसका आश्रय लिया था, वह चोरोंका मार्ग है । वीर पुरुष उसका सेवन नहीं करते ॥ १५ ॥

यथा बाणपथं प्राप्य स्थितोऽस्मि तव राक्षस । दर्शयस्वाद्य तत्तेजो वाचा त्वं किं विकत्थसे ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘राक्षस ! इस समय मैं तुम्हारे बाणोंके मार्गमें आकर खड़ा हूँ । आज तुम अपना वह तेज दिखाओ । केवल बढ़-बढ़कर बातें क्यों बना रहे हो ?’ ॥ १६ ॥

एवमुक्तो धनुर्भीमं परामृश्य महाबलः । ससर्ज निशितान् बाणानिन्द्रजित् समितिंजयः ॥१७॥

भावार्थ

लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर संग्रामविजयी महाबली इन्द्रजित्ने अपने भयंकर धनुषको दृढ़तापूर्वक पकड़कर पैने बाणोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी ॥ १७ ॥

तेन सृष्टा महावेगाः शराः सर्पविषोपमाः । सम्प्राप्य लक्ष्मणं पेतुः श्वसन्त इव पन्नगाः ॥१८॥

भावार्थ

उसके छोड़े हुए महान् वेगशाली बाण साँपके विषकी तरह जहरीले थे । वे फुफकारते हुए सर्पके समान लक्ष्मणके शरीरपर पड़ने लगे ॥ १८ ॥

शरैरतिमहावेगैर्वेगवान् रावणात्मजः । सौमित्रिमिन्द्रजिद् युद्धे विव्याध शुभलक्षणम् ॥ १९ ॥ स शरैरतिविद्धाङ्गो रुधिरेण समुक्षितः । शुशुभे लक्ष्मणः श्रीमान् विधूम इव पावकः ॥ २०॥

भावार्थ

वेगवान् रावणकुमार इन्द्रजित्ने उन अत्यन्त वेगशाली बाणोंद्वारा युद्धमें शुभलक्षण लक्ष्मणको घायल कर दिया ॥ बाणोंसे उनका शरीर अत्यन्त क्षत-विक्षत हो गया। वे रक्तसे नहा उठे । उस अवस्थामें श्रीमान् लक्ष्मण धूमरहित प्रज्वलित अग्निके समान शोभा पा रहे थे ॥ २० ॥

इन्द्रजित् त्वात्मनः कर्म प्रसमीक्ष्याभिगम्य च । विनद्य सुमहानादमिदं वचनमब्रवीत् ॥२१॥

भावार्थ

इन्द्रजित् अपना यह पराक्रम देख लक्ष्मणके पास जा बड़े जोरसे गर्जना करके यों बोला—॥ २१ ॥

पत्रिणः शितधारास्ते शरा मत्कार्मुकच्युताः । आदास्यन्तेऽद्य सौमित्रे जीवितं जीवितान्तकाः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘सुमित्राकुमार ! मेरे धनुषसे छूटे हुए तेज धारवाले पंखधारी बाण शत्रुके जीवनका अन्त कर देनेवाले हैं । ये आज तुम्हारे प्राण लेकर ही रहेंगे ॥ २२ ॥

अद्य गोमायुसङ्घाश्च श्येनसङ्घाश्च लक्ष्मण । गृध्राश्च निपतन्तु त्वां गतासुं निहतं मया ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! आज मेरे द्वारा मारे जाकर जब तुम्हारे प्राण निकल जायँगे, तब तुम्हारी लाशपर झुंड-के-झुंड गीदड़, बाज और गीध टूट पड़ेंगे ॥ २३ ॥

क्षत्रबन्धुं सदानार्यं रामः परमदुर्मतिः । भक्तं भ्रातरमद्यैव त्वां द्रक्ष्यति हतं मया ॥ २४ ॥ विस्रस्तकवचं भूमौ व्यपविद्धशरासनम् । हृतोत्तमाङ्गं सौमित्रे त्वामद्य निहतं मया ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘परम दुर्बुद्धि राम तुम-जैसे अनार्य, क्षत्रियाधम एवं अपने भक्त भाईको आज ही मेरे द्वारा मारा गया देखेंगे ॥ ‘सुमित्राकुमार ! तुम्हारा कवच खिसककर पृथ्वीपर गिर जायगा, धनुष भी दूर जा पड़ेगा और तुम्हारा मस्तक भी धड़से अलग कर दिया जायगा । इस अवस्थामें राम आज मेरे हाथसे मारे गये तुमको देखेंगे’ ॥ २५ ॥

इति ब्रुवाणं संक्रुद्धः परुषं रावणात्मजम् । हेतुमद् वाक्यमर्थज्ञो लक्ष्मणः प्रत्युवाच ह ॥ २६ ॥

भावार्थ

इस तरह कठोर बातें कहते हुए रावणकुमार इन्द्रजित्से अपने प्रयोजनको जाननेवाले लक्ष्मणने कुपित होकर यह युक्तियुक्त उत्तर दिया—॥ २६ ॥

वाग्बलं त्यज दुर्बुद्धे क्रूरकर्मन् हि राक्षस । अथ कस्माद् वदस्येतत् सम्पादय सुकर्मणा ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘क्रूरकर्म करनेवाले दुर्बुद्धि राक्षस ! बकवासका बल छोड़ दे । तू ये सब बातें कहता क्यों है ? करके दिखा ॥ २७ ॥

अकृत्वा कत्थसे कर्म किमर्थमिह राक्षस । कुरु तत् कर्म येनाहं श्रद्धेयं तव कत्थनम् ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘निशाचर ! जो काम अभी किया नहीं, उसके लिये यहाँ व्यर्थ डींग क्यों हाँकता है ? तू जिसे कहता है, उस कार्यको पूरा कर, जिससे मुझे तेरी इस बढ़ा-चढ़ाकर कही हुई बातपर विश्वास हो ॥ २८ ॥

अनुक्त्वा परुषं वाक्यं किंचिदप्यनवक्षिपन् । अविकत्थन् वधिष्यामि त्वां पश्य पुरुषादन ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘नरभक्षी राक्षस ! तू देख लेना, मैं कोई कठोर बात न कहकर तेरे ऊपर किसी तरहका आक्षेप न करके आत्मप्रशंसा किये बिना ही तेरा वध करूँगा’ ॥ २९ ॥

इत्युक्त्वा पञ्च नाराचानाकर्णापूरिताञ्शरान् । विजघान महावेगाल्लक्ष्मणो राक्षसोरसि ॥ ३० ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर लक्ष्मणने उस राक्षसकी छातीमें बड़े वेगसे पाँच नाराच मारे, जो धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये थे ॥ ३० ॥

सुपत्रवाजिता बाणा ज्वलिता इव पन्नगाः । नैर्ऋतोरस्यभासन्त सवितू रश्मयो यथा ॥ ३१ ॥

भावार्थ

सुन्दर पंखोंके कारण अत्यन्त वेगसे जानेवाले और प्रज्वलित सर्पके समान दिखायी देनेवाले वे बाण उस राक्षसकी छातीपर सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ३१ ॥

स शरैराहतस्तेन सरोषो रावणात्मजः । सुप्रयुक्तैस्त्रिभिर्बाणैः प्रतिविव्याध लक्ष्मणम् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणके बाणोंसे आहत होकर रावणकुमार रोषसे आग-बबूला हो उठा । उसने अच्छी तरह चलाये हुए तीन बाणोंसे लक्ष्मणको भी घायल करके बदला चुकाया ॥ ३२ ॥

स बभूव महाभीमो नरराक्षससिंहयोः । विमर्दस्तुमुलो युद्धे परस्परजयैषिणोः ॥ ३३ ॥ विक्रान्तौ बलसम्पन्नावुभौ विक्रमशालिनौ । उभौ परमदुर्जयावतुल्यबलतेजसौ ॥ ३४ ॥

भावार्थ

एक ओर पुरुषसिंह लक्ष्मण थे तो दूसरी ओर राक्षससिंह इन्द्रजित् । दोनों युद्धस्थलमें एक-दूसरेपर विजय पाना चाहते थे । उन दोनोंका वह तुमुल संग्राम महाभयंकर था ॥ वे दोनों वीर पराक्रमी, बलसम्पन्न, विक्रमशाली, परम दुर्जय तथा अनुपम बल और तेजसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त दुर्जय थे ॥ ३४ ॥

युयुधाते तदा वीरौ ग्रहाविव नभोगतौ । बलवृत्राविव हि तौ युधि वै दुष्प्रधर्षणौ ॥ ३५ ॥

भावार्थ

जैसे आकाशमें दो ग्रह टकरा गये हों, उसी तरह वे दोनों वीर परस्पर जूझ रहे थे । उस युद्धस्थलमें वे इन्द्र और वृत्रासुरके समान दुर्धर्ष जान पड़ते थे ॥ ३५ ॥

युयुधाते महात्मानौ तदा केसरिणाविव । बहूनवसृजन्तौ हि मार्गणौघानवस्थितौ । नरराक्षसमुख्यौ तौ प्रहृष्टावभ्ययुध्यताम् ॥ ३६ ॥

भावार्थ

वे महामनस्वी नरश्रेष्ठ तथा राक्षसप्रवर वीर जैसे दो सिंह आपसमें लड़ रहे हों उसी प्रकार युद्ध करते थे और बहुत-से बाणोंकी वर्षा करते हुए युद्धभूमिमें डटे हुए थे । दोनों ही बड़े हर्ष और उत्साहके साथ एक-दूसरेका सामना करते थे ॥ ३६ ॥

ततः शरान् दाशरथिः संधायामित्रकर्षणः । ससर्ज राक्षसेन्द्राय क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् ॥ ३७ ॥ तस्य ज्यातलनिर्घोषं स श्रुत्वा राक्षसाधिपः । विवर्णवदनो भूत्वा लक्ष्मणं समुदैक्षत ॥ ३८ ॥

भावार्थ

तदनन्तर दशरथनन्दन शत्रुसूदन लक्ष्मणने कुपित हुए सर्पकी भाँति लंबी साँस खींचते हुए अपने धनुषपर अनेक बाण रक्खे और उन सबको राक्षसराज इन्द्रजित्पर चलाया ॥ उनके धनुषकी डोरीसे प्रकट होनेवाली टंकार-ध्वनि सुनकर राक्षसराज इन्द्रजित्का मुँह उदास हो गया और वह चुपचाप लक्ष्मणकी ओर देखने लगा ॥ ३८ ॥

विवर्णवदनं दृष्ट्वा राक्षसं रावणात्मजम् । सौमित्रिं युद्धसंयुक्तं प्रत्युवाच विभीषणः ॥ ३९ ॥

भावार्थ

रावणकुमार इन्द्रजित्का मुँह उदास देखकर विभीषणने युद्धमें लगे हुए सुमित्राकुमारसे कहा—॥ ३९ ॥

निमित्तान्युप पश्यामि यान्यस्मिन् रावणात्मजे । त्वर तेन महाबाहो भग्न एष न संशयः ॥ ४० ॥

भावार्थ

‘महाबाहो ! इस समय रावणपुत्र इन्द्रजित्में मुझे जो लक्षण दिखायी दे रहे हैं, उनसे जान पड़ता है कि निःसंदेह इसका उत्साह भंग हो गया है; अतः आप इसके वधके लिये शीघ्रता करें’ ॥ ४० ॥

ततः संधाय सौमित्रिः शरानाशीविषोपमान् । मुमोच विशिखांस्तस्मिन् सर्पानिव विषोल्बणान् ॥ ४१ ॥

भावार्थ

तब सुमित्राकुमारने विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाणोंको धनुषपर चढ़ाया और उन्हें इन्द्रजित्को लक्ष्य करके चला दिया । वे बाण क्या थे महाविषैले सर्प थे ॥ ४१ ॥

शक्राशनिसमस्पर्शैर्लक्ष्मणेनाहतः शरैः । मुहूर्तमभवन्मूढः सर्वसंक्षुभितेन्द्रियः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

उन बाणोंका स्पर्श इन्द्रके वज्रकी भाँति दुःसह था । लक्ष्मणके चलाये हुए उन बाणोंकी चोट खाकर इन्द्रजित् दो घड़ीके लिये मूर्छित हो गया । उसकी सारी इन्द्रियाँ विक्षुब्ध हो उठीं ॥ ४२ ॥

उपलभ्य मुहूर्तेन संज्ञां प्रत्यागतेन्द्रियः । ददर्शावस्थितं वीरमाजौ दशरथात्मजम् । सोऽभिचक्राम सौमित्रिं रोषात् संरक्तलोचनः ॥ ४३ ॥

भावार्थ

थोड़ी देरमें जब होश हुआ और इन्द्रियाँ सुस्थिर हुईं, तब उसने रणभूमिमें दशरथकुमार वीर लक्ष्मणको खड़ा देखा । देखते ही उसके नेत्र रोषसे लाल हो गये और वह सुमित्राकुमारके सामने गया ॥ ४३ ॥

अब्रवीच्चैनमासाद्य पुनः स परुषं वचः । किं न स्मरसि तद् युद्धे प्रथमे मत्पराक्रमम् । निबद्धस्त्वं सह भ्रात्रा यदा युधि विचेष्टसे ॥ ४४ ॥

भावार्थ

वहाँ पहुँचकर वह उनसे कठोर वाणीमें बोला— ‘सुमित्राकुमार ! पहले युद्धमें मैंने जो पराक्रम दिखाया था, उसे क्या तुम भूल गये ? उस दिन तुमको और तुम्हारे भाईको भी मैंने बाँध लिया था । उस समय तुम युद्धभूमिमें पड़े-पड़े छटपटा रहे थे ॥ ४४ ॥

युवां खलु महायुद्धे वज्राशनिसमैः शरैः । शायितौ प्रथमं भूमौ विसंज्ञौ सपुरःसरौ ॥ ४५ ॥

भावार्थ

‘उस महायुद्धमें वज्र एवं अशनिके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा मैंने तुम दोनों भाइयोंको पहले धरतीपर सुला दिया था । तुम दोनों अपने अग्रगामी सैनिकोंके साथ मूर्छित होकर पड़े थे ॥ ४५ ॥

स्मृतिर्वा नास्ति ते मन्ये व्यक्तं वा यमसादनम् । गन्तुमिच्छसि यन्मां त्वमाधर्षयितुमिच्छसि ॥ ४६ ॥

भावार्थ

‘अथवा मालूम होता है कि तुम्हें उन सब बातोंकी याद नहीं आ रही है । यह स्पष्ट जान पड़ता है कि तुम यमलोकमें जाना चाहते हो । इसीलिये तुम मुझे पराजित करनेकी इच्छा रखते हो ॥ ४६ ॥

यदि ते प्रथमे युद्धे न दृष्टो मत्पराक्रमः । अद्य त्वां दर्शयिष्यामि तिष्ठेदानीं व्यवस्थितः ॥ ४७ ॥ इत्युक्त्वा सप्तभिर्बाणैरभिविव्याध लक्ष्मणम् । दशभिस्तु हनूमन्तं तीक्ष्णधारैः शरोत्तमैः ॥ ४८ ॥

भावार्थ

‘यदि पहले युद्धमें तुमने मेरा पराक्रम नहीं देखा है तो आज तुम्हें दिखा दूँगा । इस समय सुस्थिरभावसे खड़े रहो’॥ ऐसा कहकर तीखी धारवाले सात बाणोंसे उसने लक्ष्मणको घायल कर दिया और दस उत्तम सायकोंद्वारा हनुमान्जीपर प्रहार किया ॥ ४८ ॥

ततः शरशतेनैव सुप्रयुक्तेन वीर्यवान् । क्रोधाद् द्विगुणसंरब्धो निर्बिभेद विभीषणम् ॥ ४९ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् दूने रोषसे भरे हुए उस पराक्रमी निशाचरने अच्छी तरहसे छोड़े गये सौ बाणोंद्वारा विभीषणको क्रोधपूर्वक क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ४९ ॥

तद् दृष्ट्वेन्द्रजिता कर्म कृतं रामानुजस्तदा । अचिन्तयित्वा प्रहसन्नेतत् किंचिदिति ब्रुवन् ॥ ५० ॥

भावार्थ

इन्द्रजित्द्वारा किये गये इस पराक्रमको देखकर श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मणने उसकी कोई परवा नहीं की और हँसते-हँसते कहा—‘यह तो कुछ नहीं है’ ॥ ५० ॥

मुमोच च शरान् घोरान् संगृह्य नरपुंगवः । अभीतवदनः क्रुद्धो रावणिं लक्ष्मणो युधि ॥ ५१ ॥ नैवं रणगताः शूराः प्रहरन्ति निशाचर । लघवश्चाल्पवीर्याश्च शरा हीमे सुखास्तव ॥ ५२ ॥ नैवं शूरास्तु युध्यन्ते समरे युद्धकाङ्क्षिणः । इत्येवं तं ब्रुवन् धन्वी शरैरभिववर्ष ह ॥ ५३ ॥

भावार्थ

साथ ही उन नरश्रेष्ठ लक्ष्मणने मुखपर भयकी छायातक नहीं आने दी । उन्होंने युद्धस्थलमें कुपित हो भयंकर बाण हाथमें लिये और उन्हें रावणकुमारको लक्ष्य करके चला दिया॥ फिर वे बोले—‘निशाचर ! रणभूमिमें आये हुए शूरवीर इस तरह प्रहार नहीं करते । तुम्हारे ये बाण बहुत हल्के और कमजोर हैं । इनसे कष्ट नहीं होता—सुख ही मिलता है॥ ‘युद्धकी इच्छा रखनेवाले शूरवीर समराङ्गणमें इस तरह युद्ध नहीं करते हैं ।’ ऐसा कहते हुए धनुर्धर वीर लक्ष्मणने उस राक्षसपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ५३ ॥

तस्य बाणैः सुविध्वस्तं कवचं काञ्चनं महत् । व्यशीर्यत रथोपस्थे ताराजालमिवाम्बरात् ॥ ५४ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणके बाणोंसे इन्द्रजित्का महान् कवच, जो सोनेका बना हुआ था, टूटकर रथकी बैठकमें बिखर गया, मानो आकाशसे ताराओंका समूह टूटकर गिर पड़ा हो ॥ ५४ ॥

विधूतवर्मा नाराचैर्बभूव स कृतव्रणः । इन्द्रजित् समरे वीरः प्रत्यूषे भानुमानिव ॥ ५५ ॥

भावार्थ

कवच कट जानेपर नाराचोंके प्रहारसे वीर इन्द्रजित्के सारे अङ्गोंमें घाव हो गये । वह समराङ्गणमें रक्तसे रञ्जित हो प्रातःकालके सूर्यकी भाँति दिखायी देने लगा ॥ ५५ ॥

ततः शरसहस्रेण संक्रुद्धो रावणात्मजः । विभेद समरे वीरो लक्ष्मणं भीमविक्रमः ॥ ५६ ॥ व्यशीर्यत महद्दिव्यं कवचं लक्ष्मणस्य तु । कृतप्रतिकृतान्योन्यं बभूवतुररिंदमौ ॥ ५७ ॥

भावार्थ

तब भयानक पराक्रमी वीर रावणकुमारने अत्यन्त कुपित हो समरभूमिमें लक्ष्मणको सहस्रों बाणोंसे घायल कर दिया ॥ इससे लक्ष्मणका भी दिव्य एवं विशाल कवच छिन्न-भिन्न हो गया । वे दोनों शत्रुदमन वीर एक दूसरेके प्रहारका जवाब देने लगे ॥ ५७ ॥

अभीक्ष्णं निःश्वसन्तौ तौ युध्येतां तुमुलं युधि । शरसंकृत्तसर्वाङ्गौ सर्वतो रुधिरोक्षितौ ॥ ५८ ॥

भावार्थ

वे बारंबार हाँफते हुए भयानक युद्ध करने लगे । युद्धस्थलमें बाणोंके आघातसे दोनोंके सारे अङ्ग क्षत-विक्षत हो गये थे । अतः वे दोनों सब ओरसे लहूलुहान हो गये ॥ ५८ ॥

सुदीर्घकालं तौ वीरावन्योन्यं निशितैः शरैः । ततक्षतुर्महात्मानौ रणकर्मविशारदौ । बभूवतुश्चात्मजये यत्तौ भीमपराक्रमौ ॥ ५९ ॥

भावार्थ

दोनों वीर दीर्घकालतक एक-दूसरेपर पैने बाणोंका प्रहार करते रहे । दोनों ही महामनस्वी तथा युद्धकी कलामें निपुण थे । दोनों भयंकर पराक्रम प्रकट करते थे और अपनी-अपनी विजयके लिये प्रयत्नशील थे ॥ ५९ ॥

तौ शरौघैस्तथाकीर्णौ निकृत्तकवचध्वजौ । सृजन्तौ रुधिरं चोष्णं जलं प्रस्रवणाविव ॥ ६० ॥ शरवर्षं ततो घोरं मुञ्चतोर्भीमनिःस्वनम् । सासारयोरिवाकाशे नीलयोः कालमेघयोः ॥ ६१ ॥

भावार्थ

दोनोंके शरीर बाण-समूहोंसे व्याप्त थे । दोनोंके ही कवच और ध्वज कट गये थे । जैसे दो झरने जल बहा रहे हों, उसी तरह वे दोनों अपने शरीरसे गरम-गरम रक्त बहा रहे थे ॥ दोनों ही भयंकर गर्जनाके साथ बाणोंकी घोर वर्षा कर रहे थे, मानो प्रलयकालके दो नील मेघ आकाशमें जलकी धारा बरसा रहे हों ॥ ६१ ॥

तयोरथ महान् कालो व्यतीयाद् युध्यमानयोः । न च तौ युद्धवैमुख्यं क्रमं चाप्युपजग्मतुः ॥ ६२ ॥

भावार्थ

वहाँ जूझते हुए उन दोनों वीरोंका बहुत अधिक समय व्यतीत हो गया; परंतु वे दोनों न तो युद्धसे विमुख हुए और न उन्हें थकावट ही हुई ॥ ६२ ॥

अस्त्राण्यस्त्रविदां श्रेष्ठौ दर्शयन्तौ पुनः पुनः । शरानुच्चावचाकारानन्तरिक्षे बबन्धतुः ॥ ६३ ॥

भावार्थ

दोनों ही अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे और बारंबार अपने अस्त्रोंका प्रदर्शन करते थे । उन्होंने आकाशमें छोटे-बड़े बाणोंका जाल-सा बाँध दिया ॥ ६३ ॥

व्यपेतदोषमस्यन्तौ लघु चित्रं च सुष्ठु च । उभौ तु तुमुलं घोरं चक्रतुर्नरराक्षसौ । ६४ ॥

भावार्थ

वे मनुष्य और राक्षस—दोनों वीर बड़ी फुर्तीके साथ अद्भुत और सुन्दर ढंगसे बाणोंका प्रहार करते थे । उनके बाण चलानेकी कलामें कोई दोष नहीं दिखायी देता था । वे दोनों घोर घमासान युद्ध कर रहे थे ॥ ६४ ॥

तयोः पृथक् पृथग् भीमः शुश्रुवे तलनिस्वनः । स कम्पं जनयामास निर्घात इव दारुणः ॥ ६५ ॥

भावार्थ

बाण चलाते समय उन दोनोंकी हथेली और प्रत्यञ्चाका भयंकर एवं तुमुल नाद पृथक्-पृथक् सुनायी देता था, जो भयंकर वज्रपातकी आवाजके समान श्रोताओंके हृदयमें कम्प उत्पन्न कर देता था ॥ ६५ ॥

तयोः स भ्राजते शब्दस्तथा समरमत्तयोः । सुघोरयोर्निष्टनतोर्गगने मेघयोरिव ॥ ६६ ॥

भावार्थ

उन दोनों रणोन्मत्त वीरोंका वह शब्द आकाशमें परस्पर टकराते हुए दो महाभयंकर मेघोंकी गड़गड़ाहटके समान सुशोभित होता था ॥ ६६ ॥

सुवर्णपुङ्खैर्नाराचैर्बलवन्तौ कृतव्रणौ । प्रसुस्रुवाते रुधिरं कीर्तिमन्तौ जये धृतौ ॥ ६७ ॥

भावार्थ

वे दोनों बलवान् योद्धा सोनेके पंखवाले नाराचोंसे घायल हो शरीरसे खून बहा रहे थे । दोनों ही यशस्वी थे और अपनी-अपनी विजयके लिये प्रयत्न कर रहे थे ॥ ६७ ॥

ते गात्रयोर्निपतिता रुक्मपुङ्खाः शरा युधि । असृग्दिग्धा विनिष्पेतुर्विविशुर्धरणीतलम् ॥ ६८ ॥

भावार्थ

युद्धमें उन दोनोंके चलाये हुए सुवर्णमय पंखवाले बाण एक दूसरेके शरीरपर पड़ते, रक्तसे भीगकर निकलते और धरतीमें समा जाते थे ॥ ६८ ॥

अन्ये सुनिशितैः शस्त्रैराकाशे संजघट्टिरे । बभञ्जुश्चिच्छिदुश्चैव तयोर्बाणाः सहस्रशः ॥ ६९ ॥

भावार्थ

उनके हजारों बाण आकाशमें तीखे शस्त्रोंसे टकराते और उन्हें तोड़कर टुकड़े-टुकड़े कर डालते थे ॥ ६९ ॥

स बभूव रणो घोरस्तयोर्बाणमयश्चयः । अग्निभ्यामिव दीप्ताभ्यां सत्रे कुशमयश्च यः ॥ ७० ॥

भावार्थ

वह बड़ा भयंकर युद्ध हो रहा था । उसमें उन दोनोंके बाणोंका समूह यज्ञमें गार्हपत्य और आहवनीय नामक दो प्रज्वलित अग्नियोंके साथ बिछे हुए कुशोंके ढेरकी भाँति जान पड़ता था ॥ ७० ॥

तयोः कृतव्रणौ देहौ शुशुभाते महात्मनोः । सुपुष्पाविव निष्पत्रौ वने किंशुकशाल्मली ॥ ७१ ॥

भावार्थ

उन दोनों महामनस्वी वीरोंके क्षत-विक्षत शरीर वनमें पत्रहीन एवं लाल पुष्पोंसे भरे हुए पलाश और सेमलके वृक्षोंके समान सुशोभित होते थे ॥ ७१ ॥

चक्रतुस्तुमुलं घोरं संनिपातं मुहुर्मुहुः । इन्द्रजिल्लक्ष्मणश्चैव परस्परजयैषिणौ ॥ ७२ ॥

भावार्थ

एक दूसरेको जीतनेकी इच्छावाले इन्द्रजित् और लक्ष्मण रह-रहकर बारंबार भयंकर मार-काट मचाते थे ॥ ७२ ॥

लक्ष्मणो रावणिं युद्धे रावणिश्चापि लक्ष्मणम् । अन्योन्यं तावभिघ्नन्तौ न श्रमं प्रतिपद्यताम् ॥ ७३ ॥

भावार्थ

लक्ष्मण रणभूमिमें रावणकुमारपर चोट करते थे और रावणकुमार लक्ष्मणपर । इस तरह एक दूसरेपर प्रहार करते हुए वे वीर थकते नहीं थे ॥ ७३ ॥

बाणजालैः शरीरस्थैरवगाढैस्तरस्विनौ । शुशुभाते महावीर्यौ प्ररूढाविव पर्वतौ ॥ ७४ ॥

भावार्थ

उन दोनों वेगशाली वीरोंके शरीरमें बाणोंके समूह धँस गये थे, इसलिये वे दोनों महापराक्रमी योद्धा जिनपर बहुत-से वृक्ष उग आये हों, उन दो पर्वतोंके समान शोभा पाते थे ॥ ७४ ॥

तयो रुधिरसिक्तानि संवृतानि शरैर्भृशम् । बभ्राजुः सर्वगात्राणि ज्वलन्त इव पावकाः ॥ ७५ ॥

भावार्थ

बाणोंसे ढके और खूनसे भीगे हुए उन दोनोंके सारे अङ्ग जलती हुई आगके समान उद्दीप्त हो रहे थे ॥ ७५ ॥

तयोरथ महान् कालो व्यतीयाद् युध्यमानयोः । न च तौ युद्धवैमुख्यं श्रमं चाप्यभिजग्मतुः ॥ ७६ ॥

भावार्थ

इस तरह युद्ध करते-करते उन दोनोंका बहुत समय व्यतीत हो गया; परंतु वे दोनों न तो युद्धसे विमुख हुए और न उन्हें थकावट ही हुई ॥ ७६ ॥

अथ समरपरिश्रमं निहन्तुं समरमुखेष्वजितस्य लक्ष्मणस्य । प्रियहितमुपपादयन् महात्मा समरमुपेत्य विभीषणोऽवतस्थे ॥ ७७ ॥

भावार्थ

युद्धके मुहानेपर पराजित न होनेवाले लक्ष्मणके युद्धजनित श्रमका निवारण तथा उनके प्रिय एवं हितका सम्पादन करनेके लिये महात्मा विभीषण युद्धभूमिमें आकर खड़े हो गये ॥७७॥

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