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युद्धकाण्ड, सर्ग 87

एवमुक्त्वा तु सौमित्रिं जातहर्षो विभीषणः । धनुष्पाणिं तमादाय त्वरमाणो जगाम सः ॥ १ ॥

भावार्थ

पूर्वोक्त बात कहकर हर्षसे भरे हुए विभीषण धनुर्धर सुमित्राकुमारको साथ लेकर बड़े वेगसे आगे बढ़े ॥ १ ॥

अविदूरं ततो गत्वा प्रविश्य तु महद् वनम् । अदर्शयत तत्कर्म लक्ष्मणाय विभीषणः ॥ २ ॥ नीलजीमूतसङ्काशं न्यग्रोधं भीमदर्शनम् । तेजस्वी रावणभ्राता लक्ष्मणाय न्यवेदयत् ॥ ३ ॥

भावार्थ

थोड़ी ही दूर जानेपर विभीषणने एक महान् वनमें प्रवेश करके लक्ष्मणको इन्द्रजित्के कर्मानुष्ठानका स्थान दिखाया ।२। वहाँ एक बरगदका वृक्ष था, जो श्याममेघके समान सघन और देखनेमें भयंकर था । रावणके तेजस्वी भ्राता विभीषणने लक्ष्मणको वहाँकी सब वस्तुएँ दिखाकर कहा—॥३॥

इहोपहारं भूतानां बलवान् रावणात्मजः । उपहृत्य ततः पश्चात् संग्राममभिवर्तते ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘सुमित्रानन्दन ! यह बलवान् रावणकुमार प्रतिदिन यहीं आकर पहले भूतोंको बलि देता, उसके बाद युद्धमें प्रवृत्त होता है ॥ ४ ॥

अदृश्यः सर्वभूतानां ततो भवति राक्षसः । निहन्ति समरे शत्रून् बध्नाति च शरोत्तमैः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘इसीसे संग्रामभूमिमें यह राक्षस सम्पूर्ण भूतोंके लिये अदृश्य हो जाता है और उत्तम बाणोंसे शत्रुओंको मारता तथा बाँध लेता है ॥ ५ ॥

तमप्रविष्टं न्यग्रोधं बलिनं रावणात्मजम् । विध्वंसय शरैर्दीप्तैः सरथं साश्वसारथिम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘अतः जबतक यह इस बरगदके नीचे आये, उसके पहले ही आप अपने तेजस्वी बाणोंद्वारा इस बलवान् रावणकुमारको रथ, घोड़े और सारथिसहित नष्ट कर दीजिये’ ॥ ६ ॥

तथेत्युक्त्वा महातेजाः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः । बभूवावस्थितस्तत्र चित्रं विस्फारयन् धनुः ॥ ७ ॥

भावार्थ

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी सुमित्राकुमार अपने विचित्र धनुषकी टंकार करते हुए वहाँ खड़े हो गये ॥ ७ ॥

स रथेनाग्निवर्णेन बलवान् रावणात्मजः । इन्द्रजित् कवची खड्गी सध्वजः प्रत्यदृश्यत ॥ ८ ॥

भावार्थ

इतनेमें ही बलवान् रावणकुमार इन्द्रजित् अग्निके समान तेजस्वी रथपर बैठा हुआ कवच, खड्ग और ध्वजाके साथ दिखायी पड़ा ॥ ८ ॥

तमुवाच महातेजाः पौलस्त्यमपराजितम् । समाह्वये त्वां समरे सम्यग् युद्धं प्रयच्छ मे ॥ ९ ॥

भावार्थ

तब महातेजस्वी लक्ष्मणने पराजित न होनेवाले पुलस्त्यकुलनन्दन इन्द्रजित्से कहा—‘राक्षसकुमार ! मैं तुम्हें युद्धके लिये ललकारता हूँ । तुम अच्छी तरह सँभलकर मेरे साथ युद्ध करो’ ॥ ९ ॥

एवमुक्तो महातेजा मनस्वी रावणात्मजः । अब्रवीत् परुषं वाक्यं तत्र दृष्ट्वा विभीषणम् ॥ १० ॥

भावार्थ

लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी और मनस्वी रावणकुमारने वहाँ विभीषणको उपस्थित देख कठोर शब्दोंमें कहा—॥ १० ॥

इह त्वं जातसंवृद्धः साक्षाद् भ्राता पितुर्मम । कथं द्रुह्यसि पुत्रस्य पितृव्यो मम राक्षस ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘राक्षस ! यहीं तुम्हारा जन्म हुआ और यहीं बढ़कर तुम इतने बड़े हुए । तुम मेरे पिताके सगे भाई और मेरे चाचा हो । फिर तुम अपने पुत्रसे–मुझसे क्यों द्रोह करते हो ?॥११॥

न ज्ञातित्वं न सौहार्दं न जातिस्तव दुर्मते । प्रमाणं न च सौदर्यं न धर्मो धर्मदूषण ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘दुर्मते ! तुममें न तो कुटुम्बीजनोंके प्रति अपनापनका भाव है, न आत्मीयजनोंके प्रति स्नेह है और न अपनी जातिका अभिमान ही है । तुममें कर्तव्य-अकर्तव्यकी मर्यादा, भ्रातृ-प्रेम और धर्म कुछ भी नहीं है । तुम राक्षस-धर्मको कलंकित करनेवाले हो ॥ १२ ॥

शोच्यस्त्वमसि दुर्बुद्धे निन्दनीयश्च साधुभिः । यस्त्वं स्वजनमुत्सृज्य परभृत्यत्वमागतः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘दुर्बुद्धे ! तुमने स्वजनोंका परित्याग करके दूसरोंकी गुलामी स्वीकार की है । अतः तुम सत्पुरुषोंद्वारा निन्दनीय और शोकके योग्य हो ॥ १३ ॥

नैतच्छिथिलया बुद्ध्या त्वं वेत्सि महदन्तरम् । क्व च स्वजनसंवासः क्व च नीच पराश्रयः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘नीच निशाचर ! तुम अपनी शिथिल बुद्धिके द्वारा इस महान् अन्तरको नहीं समझ पा रहे हो कि कहाँ तो स्वजनोंके साथ रहकर स्वच्छन्दताका आनन्द लेना और कहाँ दूसरोंकी गुलामी करके जीना है ॥ १४ ॥

गुणवान् वा परजनः स्वजनो निर्गुणोऽपि वा । निर्गुणः स्वजनः श्रेयान् यः परः पर एव सः ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘दूसरे लोग कितने ही गुणवान् क्यों न हों और स्वजन गुणहीन ही क्यों न हो ? वह गुणहीन स्वजन भी दूसरोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ ही है; क्योंकि दूसरा दूसरा ही होता है ( वह कभी अपना नहीं हो सकता ) ॥ १५ ॥

यः स्वपक्षं परित्यज्य परपक्षं निषेवते । स स्वपक्षे क्षयं याते पश्चात् तैरेव हन्यते ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘जो अपने पक्षको छोड़कर दूसरे पक्षके लोगोंका सेवन करता है, वह अपने पक्षके नष्ट हो जानेपर फिर उन्हींके द्वारा मार डाला जाता है ॥ १६ ॥

निरनुक्रोशता चेयं यादृशी ते निशाचर । स्वजनेन त्वया शक्यं पौरुषं रावणानुज ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘रावणके छोटे भाई निशाचर ! तुमने लक्ष्मणको इस स्थानतक ले आकर मेरा वध करानेके लिये प्रयत्न करके यह जैसी निर्दयता दिखायी है, ऐसा पुरुषार्थ तुम्हारे-जैसा स्वजन ही कर सकता है—तुम्हारे सिवा दूसरे किसी स्वजनके लिये ऐसा करना सम्भव नहीं है’ ॥ १७ ॥

इत्युक्तो भ्रातृपुत्रेण प्रत्युवाच विभीषणः । अजानन्निव मच्छीलं किं राक्षस विकत्थसे ॥ १८ ॥

भावार्थ

अपने भतीजेके ऐसा कहनेपर विभीषणने उत्तर दिया— ‘राक्षस ! तू आज ऐसी शेखी क्यों बघारता है ? जान पड़ता है तुझे मेरे स्वभावका पता ही नहीं है ॥ १८ ॥

राक्षसेन्द्रसुतासाधो पारुष्यं त्यज गौरवात् । कुले यद्यप्यहं जातो रक्षसां क्रूरकर्मणाम् । गुणो यः प्रथमो नृणां तन्मे शीलमराक्षसम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘अधम ! राक्षसराजकुमार ! बड़ोंके बड़प्पनका ख्याल करके तू इस कठोरताका परित्याग कर दे । यद्यपि मेरा जन्म क्रूरकर्मा राक्षसोंके कुलमें ही हुआ है, तथापि मेरा शील-स्वभाव राक्षसोंका-सा नहीं है । सत्पुरुषोंका जो प्रधान गुण सत्त्व है, मैंने उसीका आश्रय ले रक्खा है ॥ १९ ॥

न रमे दारुणेनाहं न चाधर्मेण वै रमे । भ्रात्रा विषमशीलोऽपि कथं भ्राता निरस्यते ॥ २० ॥

भावार्थ

‘क्रूरतापूर्ण कर्ममें मेरा मन नहीं लगता । अधर्ममें मेरी रुचि नहीं होती । यदि अपने भाईका शील-स्वभाव अपनेसे न मिलता हो तो भी बड़ा भाई छोटे भाईको कैसे घरसे निकाल सकता है ? ( परंतु मुझे घरसे निकाल दिया गया; फिर मैं दूसरे सत्पुरुषका आश्रय क्यों न लूँ ? ) ॥ २० ॥

धर्मात् प्रच्युतशीलं हि पुरुषं पापनिश्चयम् । त्यक्त्वा सुखमवाप्नोति हस्तादाशीविषं यथा ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘जिसका शील-स्वभाव धर्मसे भ्रष्ट हो गया हो, जिसने पाप करनेका दृढ़ निश्चय कर लिया हो, ऐसे पुरुषका त्याग करके प्रत्येक प्राणी उसी प्रकार सुखी होता है, जैसे हाथपर बैठे हुए जहरीले सर्पको त्याग देनेसे मनुष्य निर्भय हो जाता है ॥ २१ ॥

परस्वहरणे युक्तं परदाराभिमर्शकम् । त्याज्यमाहुर्दुरात्मानं वेश्म प्रज्वलितं यथा ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘जो दूसरोंका धन लूटता हो और परायी स्त्रीपर हाथ लगाता हो, उस दुरात्माको जलते हुए घरकी भाँति त्याग देने योग्य बताया गया है ॥ २२ ॥

परस्वानां च हरणं परदाराभिमर्शनम् । सुहृदामतिशङ्का च त्रयो दोषाः क्षयावहाः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘पराये धनका अपहरण, परस्त्रीके साथ संसर्ग और अपने हितैषी सुहृदोंपर अधिक शङ्का—अविश्वास—ये तीन दोष विनाशकारी बताये गये हैं ॥ २३ ॥

महर्षीणां वधो घोरः सर्वदेवैश्च विग्रहः । अभिमानश्च रोषश्च वैरत्वं प्रतिकूलता ॥ २४ ॥ एते दोषा मम भ्रातुर्जीवितैश्वर्यनाशनाः । गुणान् प्रच्छादयामासुः पर्वतानिव तोयदाः ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘महर्षियोंका भयंकर वध, सम्पूर्ण देवताओंके साथ विरोध, अभिमान, रोष, वैर और धर्मके प्रतिकूल चलना—ये दोष मेरे भाईमें मौजूद हैं, जो उसके प्राण और ऐश्वर्य दोनोंका नाश करनेवाले हैं । जैसे बादल पर्वतोंको आच्छादित कर देते हैं, उसी प्रकार इन दोषोंने मेरे भाईके सारे गुणोंको ढक दिया है ॥ २४-२५ ॥

दोषैरेतैः परित्यक्तो मया भ्राता पिता तव । नेयमस्ति पुरी लङ्का न चत्वं न च ते पिता ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘इन्हीं दोषोंके कारण मैंने अपने भाई एवं तेरे पिताका त्याग किया है । अब न तो यह लङ्कापुरी रहेगी, न तू रहेगा और न तेरे पिता ही रह जायँगे ॥ २६ ॥

अतिमानश्च बालश्च दुर्विनीतश्च राक्षस । बद्धस्त्वं कालपाशेन ब्रूहि मां यद् यदिच्छसि ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘राक्षस ! तू अत्यन्त अभिमानी, उद्दण्ड और बालक ( मूर्ख ) है, कालके पाशमें बँधा हुआ है; इसलिये तेरी जो-जो इच्छा हो, मुझे कह ले ॥ २७ ॥

अद्येह व्यसनं प्राप्तं यन्मां परुषमुक्तवान् । प्रवेष्टुं न त्वया शक्यं न्यग्रोधं राक्षसाधम ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘नीच राक्षस ! तूने मुझसे जो कठोर बात कही है, उसीका यह फल है कि आज तुझपर यहाँ घोर संकट आया है । अब तू बरगदके नीचेतक नहीं जा सकता ॥ २८ ॥

धर्षयित्वा च काकुत्स्थं न शक्यं जीवितुं त्वया । युध्यस्व नरदेवेन लक्ष्मणेन रणे सह । हतस्त्वं देवताकार्यं करिष्यसि यमक्षयम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘ककुत्स्थकुलभूषण लक्ष्मणका तिरस्कार करके तू जीवित नहीं रह सकता; अतः इन नरदेव लक्ष्मणके साथ रणभूमिमें युद्ध कर । यहाँ मारा जाकर तू यमलोकमें पहुँचेगा और देवताओंका कार्य करेगा ( उन्हें संतुष्ट करेगा )॥ २९ ॥

निदर्शयस्वात्मबलं समुद्यतं कुरुष्व सर्वायुधसायकव्ययम् । न लक्ष्मणस्यैत्य हि बाणगोचरं त्वमद्य जीवन् सबलोगमिष्यसि ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘अब तू अपना बढ़ा हुआ सारा बल दिखा’ समस्त आयुधों और सायकोंका व्यय कर ले; परंतु लक्ष्मणके बाणोंका निशाना बनकर आज तू सेनासहित जीवित नहीं लौट सकेगा’ ॥ ३० ॥

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