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युद्धकाण्ड, सर्ग 86

अथ तस्यामवस्थायां लक्ष्मणं रावणानुजः । परेषामहितं वाक्यमर्थसाधकमब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

उस अवस्थामें रावणके छोटे भाई विभीषणने लक्ष्मणसे ऐसी बात कही, जो उनके अभीष्ट अर्थको सिद्ध करनेवाली तथा शत्रुओंके लिये अहितकर थी ॥ १ ॥

यदेतद् राक्षसानीकं मेघश्यामं विलोक्यते । पतदायोध्यतां शीघ्रं कपिभिश्च शिलायुधैः ॥ २ ॥ तस्यानीकस्य महतो भेदने यत लक्ष्मण । राक्षसेन्द्रसुतोऽप्यत्र भिन्ने दृश्यो भविष्यति ॥ ३ ॥

भावार्थ

वे बोले—‘लक्ष्मण ! यह सामने जो मेघोंकी काली घटाके समान राक्षसोंकी सेना दिखायी देती है, उसके साथ शिलारूपी आयुध धारण करनेवाले वानरवीर शीघ्र ही युद्ध छेड़ दें और आप भी इस विशाल वाहिनीके व्यूहका भेदन करनेका प्रयत्न करें । इसका मोर्चा टूटनेपर राक्षसराजका पुत्र इन्द्रजित् भी हमें यहीं दिखायी देगा ॥ २–३ ॥

स त्वमिन्द्राशनिप्रख्यैः शरैरवकिरन् परान् । अभिद्रवाशु यावद् वै नैतत् कर्म समाप्यते ॥ ४ ॥ जहि वीर दुरात्मानं मायापरमधार्मिकम् । रावणिं क्रूरकर्माणं सर्वलोकभयावहम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘अतः आप इस हवन-कर्मकी समाप्तिके पहले ही वज्रतुल्य बाणोंकी वर्षा करते हुए शत्रुओंपर शीघ्र धावा कीजिये ॥ ‘वीर ! वह दुरात्मा रावणकुमार बड़ा ही मायावी, अधर्मी, क्रूर कर्म करनेवाला और सम्पूर्ण लोकोंके लिये भयंकर है; अतः इसका वध कीजिये’ ॥ ५ ॥

विभीषणवचः श्रुत्वा लक्ष्मणः शुभलक्षणः । ववर्ष शरवर्षेण राक्षसेन्द्रसुतं प्रति ॥ ६ ॥ ऋक्षाः शाखामृगाश्चैव द्रुमप्रवरयोधिनः । अभ्यधावन्त सहितास्तदनीकमवस्थितम् ॥ ७ ॥ राक्षसाश्च शितैर्बाणैरसिभिः शक्तितोमरैः । अभ्यवर्तन्त समरे कपिसैन्यजिघांसवः ॥ ८ ॥

भावार्थ

विभीषणकी यह बात सुनकर शुभलक्षणसम्पन्न लक्ष्मणने राक्षसराजके पुत्रको लक्ष्य करके बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ साथ ही बड़े-बड़े वृक्ष लेकर युद्ध करनेवाले वानर और भालू भी वहाँ खड़ी हुई राक्षस-सेनापर एक साथ ही टूट पड़े॥ उधरसे राक्षस भी वानरसेनाको नष्ट करनेकी इच्छासे समराङ्गणमें तीखे बाणों, तलवारों, शक्तियों और तोमरोंका प्रहार करते हुए उनका सामना करने लगे ॥ ८ ॥

स सम्प्रहारस्तुमुलः संजज्ञे कपिरक्षसाम् । शब्देन महता लङ्कां नादयन् वै समन्ततः ॥ ९ ॥

भावार्थ

इस प्रकार वानरों और राक्षसोंमें घमासान युद्ध होने लगा । उसके महान् कोलाहलसे समूची लङ्कापुरी सब ओरसे गूँज उठी ॥ ९ ॥

शस्त्रैश्च विविधाकारैः शितैर्बाणैश्च पादपैः । उद्यतैर्गिरिशृङ्गैश्च घोरैराकाशमावृतम् ॥ १० ॥ राक्षसा वानरेन्द्रेषु विकृताननबाहवः । निवेशयन्तः शस्त्राणि चक्रुस्ते सुमहद्भयम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

नाना प्रकारके शस्त्रों, पैने बाणों, उठे हुए वृक्षों और भयानक पर्वत-शिखरोंसे वहाँका आकाश आच्छादित हो गया॥ विकट मुँह और बाँहोंवाले राक्षसोंने वानर-यूथपतियोंपर ( नाना प्रकारके ) शस्त्रोंका प्रहार करते हुए उनके लिये महान् भय उपस्थित कर दिया ॥ ११ ॥

तथैव सकलैर्वृक्षैर्गिरिशृङ्गैश्च वानराः । अभिजघ्नुर्निजघ्नुश्च समरे सर्वराक्षसान् ॥ १२ ॥

भावार्थ

उसी प्रकार वानर भी समराङ्गणमें सम्पूर्ण वृक्षों और पर्वत-शिखरोंद्वारा समस्त राक्षसोंको मारने एवं हताहत करने लगे ॥ १२ ॥

ऋक्षवानरमुख्यैश्च महाकायैर्महाबलैः । रक्षसां युध्यमानानां महद्भयमजायत ॥ १३ ॥

भावार्थ

मुख्य-मुख्य महाकाय महाबली रीछों और वानरोंसे जूझते हुए राक्षसोंको महान् भय लगने लगा ॥ १३ ॥

स्वमनीकं विषण्णं तु श्रुत्वा शत्रुभिरर्दितम् । उदतिष्ठत दुर्धर्षः स कर्मण्यनन्नुष्ठिते ॥ १४ ॥

भावार्थ

रावणकुमार इन्द्रजित् बड़ा दुर्धर्ष वीर था । उसने जब सुना कि मेरी सेना शत्रुओंद्वारा पीड़ित होकर बड़े दुःखमें पड़ गयी है, तब अनुष्ठान समाप्त होनेके पहले ही वह युद्धके लिये उठ खड़ा हुआ ॥ १४ ॥

वृक्षान्धकारान्निर्गत्य जातक्रोधः स रावणिः । आरुरोह रथं सज्जं पूर्वयुक्तं सुसंयतम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

उस समय उसके मनमें बड़ा क्रोध उत्पन्न हुआ था । वह वृक्षोंके अन्धकारसे निकलकर एक सुसज्जित रथपर आरूढ़ हुआ, जो पहलेसे ही जोतकर तैयार रक्खा गया था । वह रथ बहुत ही सुदृढ़ था ॥ १५ ॥

स भीमकार्मुकशरः कृष्णाञ्जनचयोपमः । रक्तास्यनयनो भीमो बभौ मृत्युरिवान्तकः ॥ १६ ॥

भावार्थ

इन्द्रजित्के हाथमें भयंकर धनुष और बाण थे । वह काले कोयलेके ढेर-सा जान पड़ता था । उसके मुँह और नेत्र लाल थे । वह भयंकर राक्षस विनाशकारी मृत्युके समान प्रतीत होता था ॥ १६ ॥

दृष्ट्वैव तु रथस्थं तं पर्यवर्तत तद् बलम् । रक्षसां भीमवेगानां लक्ष्मणेन युयुत्सताम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

इन्द्रजित् रथपर बैठ गया, यह देखते ही लक्ष्मणके साथ युद्धकी इच्छा रखनेवाले भयंकर वेगशाली राक्षसोंकी वह सेना उसके आसपास सब ओर खड़ी हो गयी ॥ १७ ॥

तस्मिंस्तु काले हनुमानरुजत् स दुरासदम् । धरणीधरसंकाशो महावृक्षमरिंदमः ॥ १८ ॥

भावार्थ

उस समय शत्रुओंका दमन करनेवाले पर्वतके समान विशालकाय हनुमान्जीने एक बहुत बड़े वृक्षको, जिसे तोड़ना या उखाड़ना कठिन था, उखाड़ लिया ॥ १८ ॥

स राक्षसानां तत् सैन्यं कालाग्निरिव निर्दहन् । चकार बहुभिर्वृक्षैर्निःसंज्ञं युधि वानरः ॥ १९ ॥

भावार्थ

फिर तो वे वानरवीर प्रलयाग्निके समान प्रज्वलित हो उठे और युद्धस्थलमें राक्षसोंकी उस सेनाको दग्ध करते हुए बहुसंख्यक वृक्षोंकी मारसे अचेत करने लगे ॥ १९ ॥

विध्वंसयन्तं तरसा दृष्ट्वैव पवनात्मजम् । राक्षसानां सहस्राणि हनूमन्तमवाकिरन् ॥ २० ॥

भावार्थ

पवनकुमार हनुमान्जी बड़े वेगसे राक्षस-सेनाका विध्वंस कर रहे हैं, यह देखते ही सहस्रों राक्षस उनपर अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे ॥ २० ॥

शितशूलधराः शूलैरसिभिश्चासिपाणयः । शक्तिहस्ताश्च शक्तीभिः पट्टिशैः पट्टिशायुधाः ॥ २१ ॥

भावार्थ

चमकीले शूल धारण करनेवाले राक्षस शूलोंसे, जिनके हाथोंमें तलवारें थीं वे तलवारोंसे, शक्तिधारी शक्तियोंसे और पट्टिशधारी राक्षस पट्टिशोंसे उनपर प्रहार करने लगे ॥ २१ ॥

परिघैश्च गदाभिश्च कुन्तैश्च शुभदर्शनैः । शतश्च शतघ्नीभिरायसैरपि मुद्गरैः ॥ २२ ॥ घोरैः परशुभिश्चैव भिन्दिपालैश्च राक्षसाः । मुष्टिभिर्वज्रकल्पैश्च तलैरशनिसंनिभैः ॥ २३ ॥ अभिजघ्नुः समासाद्य समन्तात् पर्वतोपमम् । तेषामपि च संक्रुद्धश्चकार कदनं महत् ॥ २४ ॥ स ददर्श कपिश्रेष्ठमचलोपममिन्द्रजित् । सूदमानमसंत्रस्तममित्रान् पवनात्मजम् ॥ २५ ॥

भावार्थ

बहुत-से परिघों, गदाओं, सुन्दर भालों, सैकड़ों शतघ्नियों, लोहेके बने हुए मुद्गरों, भयानक फरसों, भिन्दिपालों, वज्रके समान मुक्कों और अशनितुल्य थप्पड़ोंसे वे समस्त राक्षस पास आकर सब ओरसे पर्वताकार हनुमान्जीपर प्रहार करने लगे।हनुमान्जीने कुपित होकर उनका भी महान् संहार किया॥ इन्द्रजित्ने देखा, कपिवर पवनकुमार हनुमान् पर्वतके समान अचल हो निःशङ्कभावसे अपने शत्रुओंका संहार कर रहे हैं ॥ २५ ॥

स सारथिमुवाचेदं याहि यत्रैष वानरः । क्षयमेव हि नः कुर्याद् राक्षसानामुपेक्षितः ॥ २६ ॥

भावार्थ

यह देखकर उसने अपने सारथिसे कहा—‘जहाँ यह वानर युद्ध करता है, वहीं चलो । यदि उसकी उपेक्षा की गयी तो यह हम सब राक्षसोंका विनाश ही कर डालेगा’ ॥२६॥

इत्युक्तः सारथिस्तेन ययौ यत्र स मारुतिः । वहन् परमदुर्धर्षं स्थितमिन्द्रजितं रथे ॥ २७ ॥

भावार्थ

उसके ऐसा कहनेपर सारथि रथपर बैठे हुए अत्यन्त दुर्जय वीर इन्द्रजित्को ढोता हुआ उस स्थानपर गया, जहाँ पवनपुत्र हनुमान्जी विराजमान थे ॥ २७ ॥

सोऽभ्युपेत्य शरान् खड्गान् पट्टिशांश्च परश्वधान् । अभ्यवर्षत दुर्धर्षः कपिमूर्धनि राक्षसः ॥ २८ ॥ तानि शस्त्राणि घोराणि प्रतिगृह्य स मारुतिः । रोषेण महताविष्टो वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ २९ ॥ युध्यस्व यदि शूरोऽसि रावणात्मज दुर्मते । वायुपुत्रं समासाद्य न जीवन् प्रतियास्यसि ॥ ३० ॥

भावार्थ

वहाँ पहुँचकर उस दुर्जय राक्षसने हनुमान्जीके मस्तकपर बाणों, तलवारों, पट्टिशों और फरसोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ उन भयानक शस्त्रोंको अपने शरीरपर झेलकर पवनपुत्र हनुमान्जी महान् रोषसे भर गये और इस प्रकार बोले—॥ ‘दुर्बुद्धि रावणकुमार ! यदि बड़े शूरवीर हो तो आओ, मेरे साथ मल्लयुद्ध करो । इस वायुपुत्रसे भिड़कर जीवित नहीं लौट सकोगे ॥ ३० ॥

बाहुभ्यां सम्प्रयुध्यस्व यदि मे द्वन्द्वमाहवे । वेगं सहस्व दुर्बुद्धे ततस्त्वं राक्षसां वरः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘दुर्मते ! अपनी भुजाओंद्वारा मेरे साथ द्वन्द्व-युद्ध करो । इस बाहुयुद्धमें यदि मेरा वेग सह लो तो तुम राक्षसोंमें श्रेष्ठ वीर समझे जाओगे’ ॥ ३१ ॥

हनूमन्तं जिघांसन्तं समुद्यतशरासनम् । रावणात्मजमाचष्टे लक्ष्मणाय विभीषणः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

रावणकुमार इन्द्रजित् धनुष उठाकर हनुमान्जीका वध करना चाहता था । इसी अवस्थामें विभीषणने लक्ष्मणको उसका परिचय दिया—॥ ३२ ॥

यः स वासवनिर्जेता रावणस्यात्मसम्भवः । स एष रथमास्थाय हनूमन्तं जिघांसति ॥ ३३ ॥ तमप्रतिमसंस्थानैः शरैः शत्रुनिवारणैः । जीवितान्तकरैर्घोरैः सौमित्रे रावणिं जहि ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘सुमित्रानन्दन ! रावणका जो पुत्र इन्द्रको भी जीत चुका है, वही यह रथपर बैठकर हनुमान्जीका वध करना चाहता है । अतः आप शत्रुओंका विदारण करनेवाले, अनुपम आकार-प्रकारसे युक्त एवं प्राणान्तकारी भयंकर बाणोंद्वारा उस रावणकुमारको मार डालिये’ ॥ ३३-३४ ॥

इत्येवमुक्तस्तु तदा महात्मा विभीषणेनारिविभीषणेन । ददर्श त पर्वतसन्निकाशं रथस्थितं भीमबलं दुरासदम् ॥ ३५ ॥

भावार्थ

शत्रुओंको भयभीत करनेवाले विभीषणके ऐसा कहनेपर उस समय महात्मा लक्ष्मणने रथपर बैठे हुए उस भयंकर बलशाली पर्वताकार दुर्जय राक्षसको देखा ॥ ३५ ॥

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