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युद्धकाण्ड, सर्ग 85

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राघवः शोककर्शितः । नोपधारयते व्यक्तं यदुक्तं तेन रक्षसा ॥ १ ॥

भावार्थ

भगवान् श्रीराम शोकसे पीड़ित थे, अतः राक्षस विभीषणने जो कुछ कहा, उनकी उस बातको सुनकर भी वे उसे स्पष्टरूपसे समझ न सके—उसपर पूरा ध्यान न दे सके ॥ १ ॥

ततो धैर्यमवष्टभ्य रामः परपुरंजयः । विभीषणमुपासीनमुवाच कपिसंनिधौ ॥ २ ॥

भावार्थ

तदनन्तर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले श्रीराम धैर्य धारण करके हनुमान्जीके समीप बैठे हुए विभीषणसे बोले—॥२॥

नैर्ऋताधिपते वाक्यं यदुक्तं ते विभीषण । भूयस्तच्छ्रोतुमिच्छामि ब्रूहि यत्ते विवक्षितम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘राक्षसराज विभीषण ! तुमने अभी-अभी जो बात कही है, उसे मैं फिर सुनना चाहता हूँ । बोलो, तुम क्या कहना चाहते हो ?’ ॥ ३ ॥

राघवस्य वचः श्रुत्वा वाक्यं वाक्यविशारदः । यन् तत् पुनरिदं वाक्यं बभाषेऽथ विभीषणः ॥ ४ ॥

भावार्थ

श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर बातचीतमें कुशल विभीषणने, वह जो बात कही थी, उसे पुनः दुहराते हुए इस प्रकार कहा--॥ ४ ॥

यथाऽऽज्ञप्तं महाबाहो त्वया गुल्मनिवेशनम् । तत् तथानुष्ठितं वीर त्वद्वाक्यसमनन्तरम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘महाबाहो ! आपने जो सेनाओंको यथास्थान स्थापित करनेकी आज्ञा दी थी, वीर ! वह काम तो मैंने आपकी आज्ञा होते ही पूरा कर दिया ॥ ५ ॥

तान्यनीकानि सर्वाणि विभक्तानि समन्ततः । विन्यस्ता यूथपाश्चैव यथान्यायं विभागशः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘उन सब सेनाओंको विभक्त करके सब ओरके दरवाजोंपर स्थापित किया और यथोचित रीतिसे वहाँ अलग-अलग यूथपतियोंको भी नियुक्त कर दिया है ॥ ६ ॥

भूयस्तु मम विज्ञाप्यं तच्छृणुष्व महाप्रभो । त्वय्यकारणसंतप्ते संतप्तहृदया वयम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! अब पुनः मुझे जो बात आपकी सेवामें निवेदन करनी है, उसे भी सुन लीजिये । बिना किसी कारणके आपके संतप्त होनेसे हमलोगोंके हृदयमें भी बड़ा संताप हो रहा है ॥ ७ ॥

त्यज राजन्निमं शोकं मिथ्या संतापमागतम् । यदियं त्यज्यतां चिन्ता शत्रुहर्षविवर्धिनी ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! मिथ्या प्राप्त हुए इस शोक और संतापको त्याग दीजिये; साथ ही इस चिन्ताको भी अपने मनसे निकाल दीजिये; क्योंकि यह शत्रुओंका हर्ष बढ़ानेवाली है ॥ ८ ॥

उद्यमः क्रियतां वीर हर्षः समुपसेव्यताम् । प्राप्तव्या यदि ते सीता हन्तव्याश्च निशाचराः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘वीर ! यदि आप सीताको पाना और निशाचरोंका वध करना चाहते हैं तो उद्योग कीजिये; हर्ष और उत्साहका सहारा लीजिये ॥ ९ ॥

रघुनन्दन वक्ष्यामि श्रूयतां मे हितं वचः । साध्वयं यातु सौमित्रिर्बलेन महता वृतः ॥ १० ॥ निकुम्भिलायां सम्प्राप्तं हन्तुं रावणिमाहवे ।

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! मैं एक आवश्यक बात बताता हूँ, मेरी इस हितकर बातको सुनिये । रावणकुमार इन्द्रजित् निकुम्भिला-मन्दिरकी ओर गया है, अतः ये सुमित्राकुमार लक्ष्मण विशाल सेना साथ लेकर अभी उसपर आक्रमण करें--युद्धमें उस रावणपुत्रका वध करनेके लिये उसपर चढ़ाई कर दें-यही अच्छा होगा ॥ १०½ ॥

धनुर्मण्डलनिर्मुक्तैराशीविषविषोपमैः ॥ ११ ॥ शरैर्हन्तुं महेष्वासो रावणिं समितिंजयः ।

भावार्थ

‘युद्धविजयी महाधनुर्धर लक्ष्मण अपने मण्डलाकार धनुषद्वारा छोड़े गये विषधर सर्पोंके तुल्य भयानक बाणोंसे रावणपुत्रका वध करनेमें समर्थ हैं ॥ ११½ ॥

तेन वीरेण तपसा वरदानात् स्वयंभुवः । अस्त्रं ब्रह्मशिरः प्राप्तं कामगाश्च तुरङ्गमाः ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘उस वीरने तपस्या करके ब्रह्माजीके वरदानसे ब्रह्मशिर नामक अस्त्र और मनचाही गतिसे चलनेवाले घोड़े प्राप्त किये हैं ॥ १२ ॥

स एष किल सैन्येन प्राप्तः किल निकुम्भिलाम् । यद्युत्तिष्ठेत् कृतं कर्म हतान् सर्वांश्च विद्धि नः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘निश्चय ही इस समय सेनाके साथ वह निकुम्भिलामें गया है । वहाँसे अपना हवन-कर्म समाप्त करके यदि वह उठेगा तो हम सब लोगोंको उसके हाथसे मरा ही समझिये ॥ १३ ॥

निकुम्भिलामसम्प्राप्तमकृताग्निं च यो रिपुः । त्वामाततायिनं हन्यादिन्द्रशत्रो स ते वधः ॥ १४ ॥ वरो दत्तो महाबाहो सर्वलोकेश्वरेण वै । इत्येवं विहितो राजन् वधस्तस्यैष धीमतः ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘महाबाहो ! सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी ब्रह्माजीने उसे वरदान देते हुए कहा था—‘इन्द्रशत्रो ! निकुम्भिला नामक वटवृक्षके पास पहुँचने तथा हवन-सम्बन्धी कार्य पूर्ण करनेके पहले ही जो शत्रु तुझ आततायी ( शस्त्रधारी ) को मारनेके लिये आक्रमण करेगा, उसीके हाथसे तुम्हारा वध होगा ।’ राजन् ! इस प्रकार बुद्धिमान् इन्द्रजित्की मृत्युका विधान किया गया है ॥ १४-१५ ॥

वधायेन्द्रजितो राम संदिशस्व महाबलम् । हते तस्मिन् हतं विद्धि रावणं ससुहृद्गणम् ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘इसलिये श्रीराम ! आप इन्द्रजित्का वध करनेके लिये महाबली लक्ष्मणको आज्ञा दीजिये । उसके मारे जानेपर रावणको अपने सुहृदोंसहित मरा ही समझिये’ ॥ १६ ॥

विभीषणवचः श्रुत्वा रामो वाक्यमथाब्रवीत् । जानामि तस्य रौद्रस्य मायां सत्यपराक्रम ॥ १७ ॥

भावार्थ

विभीषणके वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी शोकका परित्याग करके बोले—‘सत्यपराक्रमी विभीषण ! उस भयंकर राक्षसकी मायाको मैं जानता हूँ ॥ १७ ॥

स हि ब्रह्मास्त्रवित् प्राज्ञो महामायो महाबलः । करोत्यसंज्ञान् संग्रामे देवान् सवरुणानपि ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘वह ब्रह्मास्त्रका ज्ञाता, बुद्धिमान्, बहुत बड़ा मायावी और महान् बलवान् है । वरुणसहित सम्पूर्ण देवताओंको भी वह युद्धमें अचेत कर सकता है ॥ १८ ॥

तस्यान्तरिक्षे चरतः सरथस्य महायशः । न गतिर्ज्ञायते वीर सूर्यस्येवाभ्रसम्प्लवे ॥ १९ ॥ राघवस्तु रिपोर्ज्ञात्वा मायावीर्यं दुरात्मनः । लक्ष्मणं कीर्तिसम्पन्नमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २० ॥

भावार्थ

‘महायशस्वी वीर ! जब इन्द्रजित् रथसहित आकाशमें विचरने लगता है, उस समय बादलोंमें छिपे हुए सूर्यकी भाँति उसकी गतिका कुछ पता ही नहीं चलता ।’ विभीषणसे ऐसा कह कर भगवान् श्रीरामने अपने शत्रु दुरात्मा इन्द्रजित्की माया-शक्तिको जानकर यशस्वी वीर लक्ष्मणसे यह बात कही--१९-२०

यद् वानरेन्द्रस्य बलं तेन सर्वेण संवृतः । हनूमत्प्रमुखैश्चैव यूथपैः सह लक्ष्मण ॥ २१ ॥ जाम्बवेनर्क्षपतिना सह सैन्येन संवृतः । जहि तं राक्षससुतं मायाबलसमन्वितम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! वानरराज सुग्रीवकी जो भी सेना है, वह सब साथ ले हनुमान् आदि यूथपतियों, ऋक्षराज जाम्बवान् तथा अन्य सैनिकोंसे घिरे रहकर तुम मायाबलसे सम्पन्न राक्षसराजकुमार इन्द्रजित्का वध करो ॥ २१-२२ ॥

अयं त्वां सचिवैः सार्धं महात्मा रजनीचरः । अभिज्ञस्तस्य मायानां पृष्ठतोऽनुगमिष्यति ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘ये महामना राक्षसराज विभीषण उसकी मायाओंसे अच्छी तरह परिचित हैं, अतः अपने मन्त्रियोंके साथ ये भी तुम्हारे पीछे-पीछे जायँगे’ ॥ २३ ॥

राघवस्य वचः श्रुत्वा लक्ष्मणः सविभीषणः । जग्राह कार्मुकश्रेष्ठमन्यद् भीमपराक्रमः ॥ २४ ॥

भावार्थ

श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर विभीषणसहित भयानक पराक्रमी लक्ष्मणने अपना श्रेष्ठ धनुष हाथमें लिया ॥ २४ ॥

संनद्धः कवची खड्गी सशरी वामचापभृत् । रामपादावुपस्पृश्य हृष्टः सौमित्रिरब्रवीत् ॥ २५ ॥

भावार्थ

वे युद्धकी सब सामग्री लेकर तैयार हो गये । उन्होंने कवच धारण किया, तलवार बाँध ली और उत्तम बाण तथा बायें हाथमें धनुष ले लिये । तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीके चरण छूकर हर्षसे भरे हुए सुमित्राकुमारने कहा—ꣻ ॥ २५ ॥

अद्य मत्कार्मुकोन्मुक्ताः शरा निर्भिद्य रावणिम् । लङ्कामभिपतिष्यन्ति हंसाः पुष्करिणीमिव ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘आर्य ! आज मेरे धनुषसे छूटे हुए बाण रावणकुमारको विदीर्ण करके उसी तरह लङ्कामें गिरेंगे, जैसे हंस कमलोंसे भरे हुए सरोवरमें उतरते हैं ॥ २६ ॥

अद्यैव तस्य रौद्रस्य शरीरं मामकाः शराः । विधमिष्यन्ति भित्त्वा तं महाचापगुणच्युताः ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘इस विशाल धनुषसे छूटे हुए मेरे बाण आज ही उस भयंकर राक्षसके शरीरको विदीर्ण करके उसे कालके गालमें डाल देंगे’ ॥ २७ ॥

एवमुक्त्वा तु वचनं द्युतिमान् भ्रातुरग्रतः । स रावणिवधाकाङ्क्षी लक्ष्मणस्त्वरितं ययौ ॥ २८ ॥

भावार्थ

इन्द्रजित्के वधकी अभिलाषा रखनेवाले तेजस्वी लक्ष्मण अपने भाईके सामने ऐसी बात कहकर तुरंत वहाँसे चल दिये ॥ सोऽभिवाद्य गुरोः पादौ कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । निकुम्भिलामभिययौ चैत्यं रावणिपालितम् ॥ २९ ॥ पहले उन्होंने अपने बड़े भाईके चरणोंमें प्रणाम किया, फिर उनकी परिक्रमा करके रावणकुमारद्वारा पालित निकुम्भिला-मन्दिरकी ओर प्रस्थान किया ॥ २९ ॥

विभीषणेन सहितो राजपुत्रः प्रतापवान् । कृतस्वस्त्ययनो भ्रात्रा लक्ष्मणस्त्वरितो ययौ ॥ ३० ॥

भावार्थ

भाई श्रीरामद्वारा स्वस्तिवाचन किये जानेके पश्चात् विभीषणसहित प्रतापी राजकुमार लक्ष्मण बड़ी उतावलीके साथ चले ॥ ३० ॥

वानराणां सहस्रैस्तु हनूमान् बहुभिर्वृतः । विभीषणश्च सामात्यो लक्ष्मणं त्वरितं ययौ ॥ ३१ ॥

भावार्थ

कई हजार वानरवीरोंके साथ हनुमान् और मन्त्रियोंसहित विभीषण भी लक्ष्मणके पीछे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थित हुए ॥३१॥

महता हरिसैन्येन सवेगमभिसंवृतः । ऋक्षराजबलं चैव ददर्श पथि विष्ठितम् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

विशाल वानर-सेनासहित घिरे हुए लक्ष्मणने वेगपूर्वक आगे बढ़कर मार्गमें खड़ी हुई ऋक्षराज जाम्बवान्की सेनाको देखा ॥ ३२ ॥

स गत्वा दूरमध्वानं सौमित्रिर्मित्रनन्दनः । राक्षसेन्द्रबलं दूरादपश्यद् व्यूहमाश्रितम् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

दूरतकका रास्ता तै कर लेनेपर मित्रोंको आनन्दित करनेवाले सुमित्राकुमारने कुछ दूरसे ही देखा, राक्षसराज रावणकी सेना मोर्चा बाँधे खड़ी है ॥ ३३ ॥

स सम्प्राप्य धनुष्पाणिर्मायायोगमरिंदमः । तस्थौ ब्रह्मविधानेन विजेतुं रघुनन्दनः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

शत्रुओंका दमन करनेवाले रघुकुलनन्दन लक्ष्मण हाथमें धनुष ले ब्रह्माजीके निश्चित किये हुए विधानके अनुसार उस मायावी राक्षसको जीतनेके लिये निकुम्भिला नामक स्थानमें पहुँचकर एक जगह खड़े हो गये ॥ ३४ ॥

विभीषणेन सहितो राजपुत्रः प्रतापवान् । अङ्गदेन च वीरेण तथानिलसुतेन च ॥ ३५ ॥

भावार्थ

उस समय प्रतापी राजकुमार लक्ष्मणके साथ विभीषण, वीर अङ्गद तथा पवनकुमार हनुमान् भी थे ॥ ३५ ॥

विविधममलशस्त्रभास्वरं तद् ध्वजगहनं गहनं महारथैश्च । प्रतिभयतममप्रमेयवेगं तिमिरमिव द्विषतां बलं विवेश ॥ ३६ ॥

भावार्थ

चमकीले अस्त्र-शस्त्रोंसे जो प्रकाशित हो रही थी, ध्वजों और महारथियोंके कारण गहन दिखायी देती थी, जिसके वेगका कोई माप नहीं था तथा जो अनेक प्रकारकी वेशभूषामें दृष्टिगोचर होती थी, अन्धकारके समान काली उस शत्रुसेनामें विभीषण आदिके साथ लक्ष्मणने प्रवेश किया ॥ ३६ ॥

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