युद्धकाण्ड, सर्ग 84
राममाश्वासमाने तु लक्ष्मणे भ्रातृवत्सले । निक्षिप्य गुल्मान् स्वस्थाने तत्रागच्छद् विभीषणः ॥ १ ॥
भावार्थ
भ्रातृभक्त लक्ष्मण जब श्रीरामको इस प्रकार आश्वासन दे रहे थे, उसी समय विभीषण वानरसैनिकोंको अपने-अपने स्थानपर स्थापित करके वहाँ आये ॥ १ ॥
नानाप्रहरणैर्वीरैश्चतुर्भिरभिसंवृतः । नीलाञ्जनचयाकारैर्मातंगैरिव यूथपैः ॥ २ ॥
भावार्थ
नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण किये चार निशाचर वीर, जो काली कजल-राशिके समान काले शरीरवाले यूथपति गजराजोंके समान जान पड़ते थे, चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा कर रहे थे ॥ २ ॥
सोऽभिगम्य महात्मानं राघवं शोकलालसम् । वानरांश्चापि दद्दशे बाष्पपर्याकुलेक्षणान् ॥ ३ ॥
भावार्थ
वहाँ आकर उन्होंने देखा महात्मा लक्ष्मण शोकमें मग्न हैं तथा वानरोंके नेत्रोंमें भी आँसू भरे हुए हैं ॥ ३ ॥
राघवं च महात्मानमिक्ष्वाकुकुलनन्दनम् । दद्दर्श मोहमापन्नं लक्ष्मणस्याङ्कमाश्रितम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
साथ ही इक्ष्वाकुकुलनन्दन महात्मा श्रीरघुनाथजीपर भी उनकी दृष्टि पड़ी, जो मूर्च्छित हो लक्ष्मणकी गोदमें लेटे हुए थे ॥ ४ ॥
व्रीडितं शोकसंतप्तं दृष्ट्वा रामं विभीषणः । अन्तर्दुःखेन दीनात्मा किमेतदिति सोऽब्रवीत् ॥ ५ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीको लज्जित तथा शोकसे संतप्त देख विभीषणका हृदय आन्तरिक दुःखसे दीन हो गया । उन्होंने पूछा— ‘यह क्या बात है ?’ ॥ ५ ॥
विभीषणमुखं दृष्ट्वा सुग्रीवं तांश्च वानरान् । लक्ष्मणोवाच मन्दार्थमिदं बाष्पपरिप्लुतः ॥ ६ ॥
भावार्थ
तब लक्ष्मणने विभीषणके मुँहकी ओर देखकर तथा सुग्रीव और दूसरे-दूसरे वानरोंपर दृष्टिपात करके आँसू बहाते हुए मन्दस्वरमें कहा—॥ ६ ॥
हता इन्द्रजिता सीता इति श्रुत्वैव राघवः। हनूमद्वचनात् सौम्य ततो मोहमुपाश्रितः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! हनुमान्जीके मुँहसे यह सुनकर कि ‘इन्द्रजित्ने सीताजीको मार डाला’ श्रीरघुनाथजी तत्काल मूर्च्छित हो गये हैं’ ॥ ७ ॥
कथयन्तं तु सौमित्रि संनिशार्य विभीषणः। पुष्कलार्थमिदं वाक्यं विसंज्ञं राममब्रवीत् ॥ ८ ॥
भावार्थ
इस प्रकार कहते हुए लक्ष्मणको विभीषणने रोका और अचेत पड़े हुए श्रीरामचन्द्रजीसे यह निश्चित बात कही—॥८॥
मनुजेन्द्रार्तरूपेण यदुक्तस्त्वं हनूमता। तदयुक्तमहं मन्ये सागरस्येव शोषणम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘महाराज ! हनुमान्जीने दुखी होकर जो आपको समाचार सुनाया है, उसे मैं समुद्रको सोख लेनेके समान असम्भव मानता हूँ ॥ ९ ॥
अभिप्रायं तु जानामि रावणस्य दुरात्मनः। सीतां प्रति महाबाहो न च घातं करिष्यति ॥ १० ॥
भावार्थ
‘महाबाहो ! दुरात्मा रावणका सीताके प्रति क्या भाव है, यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ । वह उनका वध कदापि नहीं करने देगा ॥ १० ॥
याच्यमानः सुबहुशो मया हितचिकीर्षुणा। वैदेहीमुत्सृजस्वेति न च तत् कृतवान् वचः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘मैंने उसका हित करनेकी इच्छासे अनेक बार यह अनुरोध किया कि विदेहकुमारीको छोड़ दो; किंतु उसने मेरी बात नहीं मानी ॥ ११ ॥
नैव साम्ना न दानेन न भेदेन कुतो युधा। सा द्रष्टुमपि शक्येत नैव चान्येन केनचित् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘सीताको दूसरा कोई पुरुष साम, दाम और भेदनीतिके द्वारा भी नहीं देख सकता; फिर युद्धके द्वारा कैसे देख सकता है ? ॥१२ ॥
वानरान् मोहयित्वा तु प्रतियातः स राक्षसः। मायामयीं महाबाहो तां विद्धि जनकात्मजाम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘महाबाहो ! राक्षस इन्द्रजित् वानरोंको मोहमें डालकर चला गया है । जिसका उसने वध किया था, वह मायामयी जानकी थीं, ऐसा निश्चित समझिये ॥ १३ ॥
चैत्यं निकुम्भिलामद्य प्राप्य होमं करिष्यति। हुतवानुपयातो हि देवैरपि सवासवैः ॥ १४ ॥ दुराधर्षो भवत्येष संग्रामे रावणात्मजः।
भावार्थ
‘वह इस समय निकुम्भिला-मन्दिरमें जाकर होम करेगा। और जब होम करके लौटेगा, उस समय उस रावणकुमारको संग्राममें परास्त करना इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी कठिन होगा ॥ १४½ ॥
तेन मोहयता नूनमेषा माया प्रयोजिता ॥ १५ ॥ विघ्नमन्विच्छता तत्र वानराणां पराक्रमे।
भावार्थ
‘निश्चय ही उसने हमलोगोंको मोहमें डालनेके लिये ही यह मायाका प्रयोग किया है । उसने सोचा होगा—यदि वानरोंका पराक्रम चलता रहा तो मेरे इस कार्यमें विघ्न पड़ेगा ( इसीलिये उसने ऐसा किया है ) ॥ १५½ ॥
ससैन्यास्तत्र गच्छामो यावत्तन्न समाप्यते ॥ १६ ॥ त्यजैनं नरशार्दूल मिथ्या संतापमागतम्।
भावार्थ
‘जबतक उसका होम-कर्म समाप्त नहीं होता, उसके पहले ही हमलोग सेनासहित निकुम्भिला-मन्दिरमें चले चलें । नरश्रेष्ठ ! झूठे ही प्राप्त हुए इस संतापको त्याग दीजिये ॥ १६½ ॥
सीदते हि बलं सर्वं दृष्ट्वा त्वां शोककर्शितम् ॥ १७ ॥ इह त्वं स्वस्थहृदयस्तिष्ठ सत्त्वसमुच्छ्रितः। लक्ष्मणं प्रेषयास्माभिः सह सैन्यानुकर्षिभिः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! आपको शोकसे संतप्त होते देख सारी सेना दुःखमें पड़ी हुई है । आप तो धैर्यमें सबसे बढ़े-चढ़े हैं; अतः स्वस्थचित्त होकर यहीं रहिये और सेनाको लेकर जाते हुए हम लोगोंके साथ लक्ष्मणजीको भेज दीजिये ॥ १७-१८॥
एष तं नरशार्दूलो रावणिं निशितैः शरैः। त्याजयिष्यति तत्कर्म ततो वध्यो भविष्यति ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘ये नरश्रेष्ठ लक्ष्मण अपने पैने बाणोंसे मारकर रावणकुमारको वह होमकर्म त्याग देनेके लिये विवश कर देंगे । इससे वह मारा जा सकेगा ॥ १९ ॥
तस्यैते निशितास्तीक्ष्णाः पत्रिपत्राङ्गवाजिनः। पतत्रिण इवासौम्याः शराः पास्यन्ति शोणितम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मणके ये पैने बाण जो पक्षियोंके अङ्गभूत परोंसे युक्त होनेके कारण बड़े वेगशाली हैं, कंक आदि क्रूर पक्षियोंके समान इन्द्रजित्के रक्तका पान करेंगे ॥ २० ॥
तत् संदिश महाबाहो लक्ष्मणं शुभलक्षणम्। राक्षसस्य विनाशाय वज्रं वज्रधरो यथा ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘अतः महाबाहो ! जैसे वज्रधारी इन्द्र दैत्योंके वधके लिये वज्रका प्रयोग करते हैं, उसी प्रकार आप उस राक्षसके विनाशके लिये शुभलक्षण-सम्पन्न लक्ष्मणको जानेकी आज्ञा दीजिये ॥ २१ ॥
मनुजवर न कालविप्रकर्षो रिपुनिधनं प्रति यत्क्षमोऽद्य कर्तुम्। त्वमतिसृज रिपोर्वधाय वज्रं दिविजरिपोर्मथने यथा महेन्द्रः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘नरेश्वर ! शत्रुका विनाश करनेमें अब यह कालक्षेप करना उचित नहीं है । इसलिये आप शत्रुवधके लिये उसी तरह लक्ष्मणको भेजिये, जैसे देवद्रोही दैत्योंके विनाशके लिये देवराज इन्द्र वज्रका प्रयोग करते हैं ॥ २२ ॥
समाप्तकर्मा हि स राक्षसर्षभो भवत्यदृश्यः समरे सुरासुरैः । युयुत्सता तेन समाप्तकर्मणा भवेत् सुराणामपि संशयो महान् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘वह राक्षसशिरोमणि इन्द्रजित् जब अपना अनुष्ठान पूरा कर लेगा, तब समराङ्गणमें देवता और असुर भी उसे देख नहीं सकेंगे । अपना कर्म पूरा करके जब वह युद्धकी इच्छासे रणभूमिमें खड़ा होगा, उस समय देवताओंको भी अपने जीवनकी रक्षाके विषयमें महान् संदेह होने लगेगा’ ॥ २३ ॥
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