Ramayana.com

युद्धकाण्ड, सर्ग 92

ततः पौलस्त्यसचिवाः श्रुत्वा चेन्द्रजितो वधम्। आचचक्षुरभिज्ञाय दशग्रीवाय सत्वराः ॥ १ ॥ युद्धे हतो महाराज लक्ष्मणेन तवात्मजः। विभीषणसहायेन मिषतां नो महाद्युतिः ॥ २ ॥

भावार्थ

रावणके मन्त्रियोंने जब इन्द्रजित्के वधका समाचार सुना, तब उन्होंने स्वयं भी प्रत्यक्ष देखकर इसका निश्चय कर लेनेके बाद तुरंत जाकर दशमुख रावणसे सारा हाल कह सुनाया ॥ वे बोले—‘महाराज ! युद्धमें विभीषणकी सहायता पाकर लक्ष्मणने आपके महातेजस्वी पुत्रको हमारे सैनिकोंके देखते-देखते मार डाला ॥ २ ॥

शूरः शूरेण संगम्य संयुगेष्वपराजितः। लक्ष्मणेन हतः शूरः पुत्रस्ते विबुधेन्द्रजित् ॥ ३ ॥ गतः स परमाँल्लोकाञ्शरैः संतर्प्य लक्ष्मणम्।

भावार्थ

‘जिसने देवताओंके राजा इन्द्रको भी परास्त किया था और पहलेके युद्धोंमें जिसकी कभी पराजय नहीं हुई थी, वही आपका शूरवीर पुत्र इन्द्रजित् शौर्यसम्पन्न लक्ष्मणके साथ भिड़कर उनके द्वारा मारा गया। वह अपने बाणोंद्वारा लक्ष्मणको पूर्णतः तृप्त करके उत्तम लोकोंमें गया’ ॥ ३½ ॥

स तं प्रतिभयं श्रुत्वा वधं पुत्रस्य दारुणम् ॥ ४ ॥ घोरमिन्द्रजितः संख्ये कश्मलं प्राविशन्महत्।

भावार्थ

युद्धमें अपने पुत्र इन्द्रजित्के भयानक वधका घोर एवं दारुण समाचार सुननेपर रावणको बड़ी भारी मूर्च्छाने घर दबाया ॥ ४½ ॥

उपलभ्य चिरात् संज्ञां राजा राक्षसपुंगवः ॥ ५ ॥ पुत्रशोकाकुलो दीनो विललापाकुलेन्द्रियः। हा राक्षसचमूमुख्य मम वत्स महाबल ॥ ६ ॥ जित्वेन्द्रं कथमद्य त्वं लक्ष्मणस्य वशं गतः।

भावार्थ

फिर दीर्घकालके बाद होशमें आकर राक्षसप्रवर राजा रावण पुत्रशोकसे व्याकुल हो गया। उसकी सारी इन्द्रियाँ अकुला उठीं और वह दीनतापूर्वक विलाप करने लगा—॥ ‘हा पुत्र ! हा राक्षस-सेनाके महाबली कर्णधार ! तुम तो पहले इन्द्रपर भी विजय पा चुके थे; फिर आज लक्ष्मणके वशमें कैसे पड़ गये ? ॥ ६½ ॥

ननु त्वमिषुभिः क्रुद्धो भिन्द्याः कालान्तकावपि ॥ ७ ॥ मन्दरस्यापि शृङ्गाणि किं पुनर्लक्ष्मणं युधि।

भावार्थ

‘बेटा ! तुम तो कुपित होनेपर अपने बाणोंसे काल और अन्तकको भी विदीर्ण कर सकते थे, मन्दराचलके शिखरोंको भी तोड़-फोड़ सकते थे; फिर युद्धमें लक्ष्मणको मार गिराना तुम्हारे लिये कौन बड़ी बात थी ? ॥ ७½ ॥

अद्य वैवस्वतो राजा भूयो बहुमतो मम ॥ ८ ॥ येनाद्य त्वं महाबाहो संयुक्तः कालधर्मणा।

भावार्थ

‘महाबाहो ! आज सूर्यके पुत्र प्रेतराज यमका महत्त्व मुझे अधिक जान पड़ने लगा है, जिन्होंने तुम्हें भी कालधर्मसे संयुक्त कर दिया ॥ ८½ ॥

एष पन्थाः सुयोधानां सर्वामरगणेष्वपि। यः कृते हन्यते भर्तुः स पुमान् स्वर्गमृच्छति ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘समस्त देवताओंमें भी अच्छे योद्धाओंका यही मार्ग है । जो अपने स्वामीके लिये युद्धमें मारा जाता है, वह पुरुष स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ९ ॥

अद्य देवगणाः सर्वे लोकपाला महर्षयः । हतमिन्द्रजितं श्रुत्वा सुखं स्वप्स्यन्ति निर्भयाः ॥ १० ॥

भावार्थ

‘आज समस्त देवता, लोकपाल तथा महर्षि इन्द्रजित्का मारा जाना सुनकर निडर हो सुखकी नींद सो सकेंगे ॥ १० ॥

अद्य लोकास्त्रयः कृत्स्ना पृथिवी च सकानना । एकेनेन्द्रजिता हीना शून्येव प्रतिभाति मे ॥ ११ ॥ अद्य नैर्ऋतकन्यानां श्रोष्यास्यन्तःपुरे रवम् । करेणुसङ्घस्य यथा निनादं गिरिगह्वरे ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘आज तीनों लोक और काननोंसहित यह सारी पृथ्वी भी अकेले इन्द्रजित्के न होनेसे मुझे सूनी-सी दिखायी देती है ॥ ‘जैसे गजराजके मारे जानेपर पर्वतकी कन्दरामें हथिनियोंका आर्तनाद सुनायी पड़ता है, उसी प्रकार आज अन्तःपुरमें मुझे राक्षस-कन्याओंका करुण-क्रन्दन सुनना पड़ेगा ॥ १२ ॥

यौवराज्यं च लङ्कां च रक्षांसि च परंतप । मातरं मां च भार्याश्च क्व गतोऽसि विहाय नः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले पुत्र ! आज अपने युवराजपदको, लङ्कापुरीको, समस्त राक्षसोंको, अपनी माँको, मुझको और अपनी पत्नियोंको—हम सब लोगोंको छोड़कर तुम कहाँ चले गये ? ॥ १३ ॥

मम नाम त्वया वीर गतस्य यमसादनम् । प्रेतकार्याणि कार्याणि विपरीते हि वर्तसे ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘वीर ! होना तो यह चाहिये था कि मैं पहले यमलोकमें जाता और तुम यहाँ रहकर मेरे प्रेतकार्य करते; परंतु तुम विपरीत अवस्थामें स्थित हो गये ( तुम परलोकवासी हुए और मुझे तुम्हारा प्रेतकार्य करना पड़ेगा ) ॥ १४ ॥

स त्वं जीवति सुग्रीवे लक्ष्मणे च सराघवे । मम शल्यमनुद्धृत्य क्व गतोऽसि विहाय नः ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘हाय ! राम, लक्ष्मण और सुग्रीव अभी जीवित हैं; ऐसी अवस्थामें मेरे हृदयका काँटा निकाले बिना ही तुम हमें छोड़कर कहाँ चले गये ?’ ॥ १५ ॥

एवमादिविलापार्तं रावणं राक्षसाधिपम् । आविवेश महान् कोपः पुत्रव्यसनसम्भवः ॥ १६ ॥

भावार्थ

इस प्रकार आर्तभावसे विलाप करते हुए राक्षसराज रावणके हृदयमें अपने पुत्रके वधका स्मरण करके महान् क्रोधका आवेश हुआ ॥ १६ ॥

प्रकृत्या कोपनं ह्येनं पुत्रस्य पुनराधयः । दीप्तं संदीपयामासुर्घर्मेऽर्कमिव रश्मयः ॥ १७ ॥

भावार्थ

एक तो वह स्वभावसे ही क्रोधी था । दूसरे पुत्रकी चिन्ताओंने उसे उत्तेजित कर दिया—जलते हुएको और भी जला दिया । जैसे सूर्यकी किरणें ग्रीष्म ऋतुमें उसे अधिक प्रचण्ड बना देती हैं ॥ १७ ॥

ललाटे भ्रुकुटीभिश्च संगताभिर्व्यरोचत । युगान्ते सह नक्रैस्तु महोर्मिभिरिवोदधिः ॥ १८ ॥

भावार्थ

ललाटमें टेढ़ी भौंहोंके कारण वह उसी तरह शोभा पाता था, जैसे प्रलयकालमें मगरों और बड़ी-बड़ी लहरोंसे महासागर सुशोभित होता है ॥ १८ ॥

कोपाद् विजृम्भमाणस्य वक्त्राद् व्यक्तमिव ज्वलन् । उत्पपात सधूमाग्निर्वृत्रस्य वदनादिव ॥ १९ ॥

भावार्थ

जैसे वृत्रासुरके मुखसे धूमसहित अग्नि प्रकट हुई थी, उसी तरह रोषसे जँभाई लेते हुए रावणके मुखसे प्रकटरूपमें धूमयुक्त प्रज्वलित अग्नि निकलने लगी ॥ १९ ॥

स पुत्रवधसंतप्तः शूरः क्रोधवशं गतः । समीक्ष्य रावणो बुद्ध्या वैदेह्या रोचयद् वधम् ॥ २० ॥

भावार्थ

अपने पुत्रके वधसे संतप्त हुआ शूरवीर रावण सहसा क्रोधके वशीभूत हो गया । उसने बुद्धिसे सोच-विचारकर विदेहकुमारी सीताको मार डालना ही अच्छा समझा ॥ २० ॥

तस्य प्रकृत्या रक्ते च रक्ते क्रोधाग्निनापि च । रावणस्य महाघोरे दीप्ते नेत्रे बभूवतुः ॥ २१ ॥

भावार्थ

रावणकी आँखें एक तो स्वभावसे ही लाल थीं । दूसरे क्रोधाग्निने उन्हें और भी रक्तवर्णकी बना दिया था । अतः उसके वे दीप्तिमान् नेत्र महान् घोर प्रतीत होते थे ॥ २१ ॥

घोरं प्रकृत्या रूपं तत् तस्य क्रोधाग्निमूर्च्छितम् । बभूव रूपं क्रुद्धस्य रुद्रस्येव दुरासदम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

रावणका रूप स्वभावसे ही भयंकर था । उसपर क्रोधाग्नि-का प्रभाव पड़नेसे वह और भी भयानक हो चला और कुपित हुए रुद्रके समान दुर्जय प्रतीत होने लगा ॥ २२ ॥

तस्य क्रुद्धस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः । दीपाभ्यामिव दीप्ताभ्यां सार्चिषः स्नेहबिन्दवः ॥ २३ ॥

भावार्थ

क्रोधसे भरे हुए उस निशाचरके नेत्रोंसे आँसुओंकी बूँदें गिरने लगीं, मानो जलते हुए दीपकोंसे लौके साथ ही तेलके बिंदु झड़ रहे हों ॥ २३ ॥

दन्तान् विदशतस्तस्य श्रूयते दशानखनः । यन्त्रस्याकृष्यमाणस्य मथ्नतो दानवैरिव ॥ २४ ॥

भावार्थ

वह दाँत पीसने लगा । उस समय उसके दाँतोंके कटकटानेका जो शब्द सुनायी देता था, वह समुद्र-मन्थनके समय दानवोंद्वारा खींचे जाते हुए मन्थन-यन्त्रस्वरूप मन्दराचलकी ध्वनिके समान जान पड़ता था ॥ २४ ॥

कालाग्निरिव संक्रुद्धो यां यां दिशमवैक्षत । तस्यां तस्यां भयत्रस्ता राक्षसाः संविलिल्यिरे ॥ २५ ॥ तमन्तकमिव क्रुद्धं चराचरविखादिपुम् । वीक्षमाणं दिशः सर्वा राक्षसा नोपचक्रमुः ॥ २६ ॥ ततः परमसंक्रुद्धो रावणो राक्षसाधिपः । अब्रवीद् रक्षसां मध्ये संस्तम्भयिषुराहवे ॥ २७ ॥ मया वर्षसहस्राणि चरित्वा परमं तपः । तेषु तेष्ववकाशेषु स्वयंभूः परितोषितः ॥ २८ ॥

भावार्थ

कालाग्निके समान अत्यन्त कुपित हो वह जिस-जिस दिशाकी ओर दृष्टि डालता था, उस-उस दिशामें खड़े हुए राक्षस भयभीत हो खम्भे आदिकी ओटमें छिप जाते थे ॥ चराचर प्राणियोंको ग्रस लेनेकी इच्छावाले कुपित कालके समान सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखते हुए रावणके पास राक्षस नहीं जाते थे—उसके निकट जानेका साहस नहीं करते थे ॥ तब अत्यन्त कुपित हुआ राक्षसराज रावण युद्धमें राक्षसोंको स्थापित करनेकी इच्छासे उनके बीचमें खड़ा होकर बोला—॥ ‘निशाचरो ! मैंने सहस्रों वर्षोंतक कठोर तपस्या करके विभिन्न तपस्याओंकी समाप्तिपर स्वयम्भू ब्रह्माजीको संतुष्ट किया है ॥ २८ ॥

तस्यैव तपसो व्युष्ट्या प्रसादाच्च स्वयंभुवः । नासुरेभ्यो न देवेभ्यो भयं मम कदाचन ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘उसी तपस्याके फलसे और ब्रह्माजीकी कृपासे मुझे देवताओं और असुरोंकी ओरसे कभी भय नहीं है ॥ २९ ॥

कवचं ब्रह्मदत्तं मे यदादित्यसमप्रभम् । देवासुरविमर्देषु न च्छिन्नं वज्रमुष्टिभिः ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘मेरे पास ब्रह्माजीका दिया हुआ कवच है, जो सूर्यके समान दमकता रहता है । देवताओं और असुरोंके साथ घटित हुए मेरे संग्रामके अवसरोंपर वह वज्रके प्रहारसे भी टूट नहीं सका है ॥ ३० ॥

तेन मामद्य संयुक्तं रथस्थमिह संयुगे । प्रतीयात् कोऽद्य मामाजौ साक्षादपि पुरंदरः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘इसलिये यदि आज मैं युद्धके लिये तैयार हो रथपर बैठकर रणभूमिमें खड़ा होऊँ तो कौन मेरा सामना कर सकता है ? साक्षात् इन्द्र ही क्यों न हो, वह भी मुझसे युद्ध करनेका साहस नहीं कर सकता ॥ ३१ ॥

यत् तदाभिप्रसन्नेन सशरं कार्मुकं महत् । देवासुरविमर्देषु मम दत्तं स्वयंभुवा ॥ ३२ ॥ अद्य तूर्यशतैर्भीमं धनुरुत्थाप्यतां मम । रामलक्ष्मणयोरेव वधाय परमाहवे ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘उन दिनों देवासुर-संग्रामोंमें प्रसन्न हुए ब्रह्माजीने मुझे जो बाणसहित विशाल धनुष प्रदान किया था, आज मेरे उसी भयानक धनुषको सैकड़ों मङ्गल-वाद्योंकी ध्वनिके साथ महासमरमें राम और लक्ष्मणका वध करनेके लिये ही उठाया जाय ॥ ३२-३३ ॥

स पुत्रवधसंतप्तः क्रूरः क्रोधवशं गतः । समीक्ष्य रावणो बुद्ध्या सीतां हन्तुं व्यवस्यत॥ ३४ ॥

भावार्थ

पुत्रके वधसे संतप्त हो क्रोधके वशीभूत हुए क्रूर रावणने अपनी बुद्धिसे सोच-विचारकर सीताको मार डालनेका ही निश्चय किया ॥ ३४ ॥

प्रत्यवेक्ष्य तु ताम्राक्षः सुघोरो घोरदर्शनः । दीनो दीनस्वरान् सर्वांस्तानुवाच निशाचरान् ॥ ३५ ॥

भावार्थ

उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं और आकृति अत्यन्त भयानक दिखायी देने लगी । वह सब ओर दृष्टि डालकर पुत्रके लिये दुखी हो दीनतापूर्ण स्वरवाले सम्पूर्ण निशाचरोंसे बोला— ॥ ३५ ॥

मायया मम वत्सेन वञ्चनार्थं वनौकसाम् । किंचिदेव हतं तत्र सीतेयमिति दर्शितम् ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘मेरे बेटेने मायासे केवल वानरोंको चकमा देनेके लिये एक आकृतिको ‘यह सीता है’ ऐसा कहकर दिखाया और झूठे ही उसका वध किया था ॥ ३६ ॥

तदिदं तथ्यमेवाहं करिष्ये प्रियमात्मनः । वैदेहीं नाशयिष्यामि क्षत्रबन्धुमनुव्रताम् ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘सो आज उस झूठको मैं सत्य ही कर दिखाऊँगा और ऐसा करके अपना प्रिय करूँगा । उस क्षत्रियाधम राममें अनुराग रखनेवाली सीताका नाश कर डालूँगा’ ॥ ३७ ॥

इत्येवमुक्त्वा सचिवान् खड्गमाशु परामृशत् । उद्धृत्य गुणसम्पन्नं विमलाम्बरवर्चसम् ॥ ३८ ॥ निष्पपात स वेगेन सभार्यः सचिवैर्वृतः । रावणः पुत्रशोकेन भृशमाकुलचेतनः ॥ ३९ ॥

भावार्थ

मन्त्रियोंसे ऐसा कहकर उसने शीघ्र ही तलवार हाथमें ले ली, जो खड्गोचित गुणोंसे युक्त और आकाशके समान निर्मल कान्तिवाली थी । उसे म्यानसे निकालकर पत्नी और मन्त्रियोंसे घिरा हुआ रावण बड़े वेगसे आगे बढ़ा । पुत्रके शोकसे उसकी चेतना अत्यन्त आकुल हो रही थी ॥३८-३९॥

संक्रुद्धः खड्गमादाय सहसा यत्र मैथिली । व्रजन्तं राक्षसं प्रेक्ष्य सिंहनादं विचुक्रुशुः ॥ ४० ॥

भावार्थ

वह अत्यन्त कुपित हो तलवार लेकर सहसा उस स्थानपर जा पहुँचा, जहाँ मिथिलेशकुमारी सीता मौजूद थीं । उधर जाते हुए उस राक्षसको देखकर उसके मन्त्री सिंहनाद करने लगे ॥ ४० ॥

ऊचुश्चान्योन्यमालिङ्ग्य संक्रुद्धं प्रेक्ष्य राक्षसम् । अद्यैनं ताउभौ दृष्ट्वा भ्रातरौ प्रव्यथिष्यतः ॥ ४१ ॥

भावार्थ

वे रावणको रोषसे भरा देख एक-दूसरेका आलिङ्गन करके बोले——‘आज इसे देखकर वे दोनों भाई राम और लक्ष्मण व्यथित हो उठेंगे ॥ ४१ ॥

लोकपाला हि चत्वारः क्रुद्धेनानेन निर्जिताः । बहवः शत्रवश्चान्ये संयुगेष्वभिपातिताः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

‘क्योंकि कुपित होनेपर इस राक्षसराजने इन्द्र आदि चारों लोकपालोंको जीत लिया और दूसरे बहुत-से शत्रुओंको भी युद्धमें मार गिराया था ॥ ४२ ॥

त्रिषु लोकेषु रत्नानि भुङ्क्ते आहृत्य रावणः । विक्रमे च बले चैव नास्त्यस्य सदृशो भुवि ॥ ४३ ॥

भावार्थ

‘तीनों लोकोंमें जो रत्नभूत पदार्थ हैं, उन सबको लाकर रावण भोग रहा है । भूमण्डलमें इसके समान पराक्रमी और बलवान् दूसरा कोई नहीं है’ ॥ ४३ ॥

तेषां संजल्पमानानामशोकवनिकां गताम् । अभिदुद्राव वैदेहीं रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ४४ ॥

भावार्थ

वे इस प्रकार बातचीत कर ही रहे थे कि क्रोधसे अचेत-सा हुआ रावण अशोक-वाटिकामें बैठी हुई विदेहकुमारी सीताका वध करनेके लिये दौड़ा ॥ ४४ ॥

वार्यमाणः सुसंक्रुद्धः सुहृद्भिर्हितबुद्धिभिः । अभ्यधावत संक्रुद्धः खे ग्रहो रोहिणीमिव ॥ ४५ ॥

भावार्थ

उसके हितका विचार करनेवाले सुहृद् उस रोषभरे रावणको रोकनेकी चेष्टा कर रहे थे; तो भी वह अत्यन्त कुपित हो जैसे आकाशमें कोई क्रूर ग्रह रोहिणी नामक नक्षत्रपर आक्रमण करता हो, उसी प्रकार सीताकी ओर दौड़ा ॥ ४५ ॥

मैथिली रक्ष्यमाणा तु राक्षसीभिरनिन्दिता । ददर्श राक्षसं क्रुद्धं निस्त्रिंशवरधारिणम् ॥ ४६ ॥ तं निशाम्य सनिस्त्रिंशं व्यथिता जनकात्मजा । निवार्यमाणं बहुशः सुहृद्भिरनिवर्तिनम् ॥ ४७ ॥

भावार्थ

उस समय सतीसाध्वी सीता राक्षसियोंके संरक्षणमें थीं । उन्होंने देखा, क्रोधसे भरा हुआ राक्षस एक बहुत बड़ी तलवार लिये मुझे मारनेके लिये आ रहा है । यद्यपि उसके सुहृद् उसे बारंबार रोक रहे हैं तो भी वह लौट नहीं रहा है । इस तरह तलवार ले रावणको आते देख जनकनन्दिनीके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ ४६-४७ ॥

सीता दुःखसमाविष्टा विलपन्तीदमब्रवीत् । यथायं मामभिक्रुद्धः समभिद्रवति स्वयम् ॥ ४८ ॥ वधिष्यति सनाथां मामनाथामिव दुर्मतिः ।

भावार्थ

सीता दुःखमें डूब गयीं और विलाप करती हुई इस प्रकार बोलीं—‘यह दुर्बुद्धि राक्षस जिस तरह कुपित हो स्वयं मेरी ओर दौड़ा आ रहा है, इससे जान पड़ता है, यह सनाथा होनेपर भी मुझे अनाथाकी भाँति मार डालेगा ॥ ४८½ ॥

बहुशश्चोदयामास भर्तारं मामनुव्रताम् ॥ ४९ ॥ भार्या मम भवस्वेति प्रत्याख्यातो ध्रुवं मया ।

भावार्थ

‘मैं अपने पतिमें अनुराग रखती हूँ तो भी इसने अनेक बार प्रेरित किया कि ‘तुम मेरी भार्या बन जाओ’ । उस समय निश्चय ही मैंने इसे ठुकरा दिया था ॥ ४९½ ॥

सोऽयं मामनुपस्थाने व्यक्तं नैराश्यमागतः ॥ ५० ॥ क्रोधमोहसमाविष्टो व्यक्तं मां हन्तुमुद्यतः ।

भावार्थ

‘मेरे इस तरह ठुकरानेपर निश्चय ही यह निराश हो क्रोध और मोहके वशीभूत हो गया है और अवश्य ही मुझे मार डालनेके लिये उद्यत है ॥ ५०½ ॥

अथवा तौ नरव्याघ्रौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ५१ ॥ मन्निमित्तमनार्येण समरेऽद्य निपातितौ । भैरवो हि महान् नादो राक्षसानां श्रुतो मया ॥ ५२ ॥ बहूनामिह हृष्टानां तथा विक्रोशतां प्रियम् ।

भावार्थ

‘अथवा इस नीचने आज समराङ्गणमें मेरे ही कारण दोनों भाई पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मणको मार गिराया है ॥ ‘क्योंकि इस समय मैंने राक्षसोंका बड़ा भयंकर सिंहनाद सुना है । हर्षसे भरे हुए बहुत-से निशाचर अपने प्रियजनोंको पुकार रहे थे ॥ ५२½ ॥

अहो धिङ्मन्निमित्तोऽयं विनाशो राजपुत्रयोः ॥ ५३ ॥ अथवा पुत्रशोकेन अहत्वा रामलक्ष्मणौ । विधमिष्यति मां रौद्रो राक्षसः पापनिश्चयः ॥ ५४ ॥

भावार्थ

‘अहो ! यदि मेरे कारण उन राजकुमारोंका विनाश हुआ तो मेरे जीवनको धिक्कार है अथवा यह भी सम्भव है कि पापपूर्ण विचार रखनेवाला यह भयंकर राक्षस पुत्रशोकसे संतप्त हो श्रीराम और लक्ष्मणको न मार सकनेके कारण मेरा ही बध कर डाले ॥ ५३-५४ ॥

हनूमतस्तु तद् वाक्यं न कृतं क्षुद्रया मया । यद्यहं तस्य पृष्ठेन तदायासमनिन्दिता ॥ ५५ ॥ नाद्यैवमनुशोचेयं भर्तुरङ्कगता सती । मन्ये तु हृदयं तस्याः कौसल्यायाः फलिष्यति ॥ ५६ ॥ एकपुत्रा यदा पुत्रं विनष्टं श्रोष्यते युधि ।

भावार्थ

‘मुझ क्षुद्र ( मूर्ख ) नारीने हनुमान्की कही हुई वह बात नहीं मानी । यदि श्रीरामद्वारा जीती न जानेपर भी उस समय हनुमान्की पीठपर बैठकर चली गयी होती तो पतिके अङ्कमें स्थान पाकर आज इस तरह बारंबार शोक नहीं करती ॥ ‘मेरी सास कौसल्या एक ही बेटेकी माँ हैं । यदि वे युद्धमें अपने पुत्रके विनाशका समाचार सुनेंगी तो मैं समझती हूँ कि उनका हृदय अवश्य फट जायगा ॥ ५६½ ॥

सा हि जन्म च बाल्यं च यौवनं च महात्मनः ॥ ५७ ॥ धर्मकार्याणि रूपं च रुदती संसरिष्यति ।

भावार्थ

‘वे रोती हुई अपने महात्मा पुत्रके जन्म, बाल्यावस्था, युवावस्था, धर्म-कर्म तथा रूपका स्मरण करेंगी ॥ ५७½ ॥

निराशा निहते पुत्रे दत्त्वा श्राद्धमचेतना ॥ ५८ ॥ अग्निमावेक्ष्यते नूनमपो वापि प्रवेक्ष्यति ।

भावार्थ

‘अपने पुत्रके मारे जानेपर पुत्र-दर्शनसे निराश एवं अचेत-सी हो वे उनका श्राद्ध करके निश्चय ही जलती आगमें समा जाएँगी अथवा सरयूकी जलधारामें आत्मविसर्जन कर देंगी ॥ ५८½ ॥

धिगस्तु कुब्जामसतीं मन्थरां पापनिश्चयाम् ॥ ५९ ॥ यन्निमित्तमिमं शोकं कौसल्या प्रतिपत्स्यते ।

भावार्थ

‘पापपूर्ण विचारवाली उस दुष्टा कुबड़ी मन्थराको धिक्कार है, जिसके कारण मेरी सास कौसल्याको यह पुत्रका शोक देखना पड़ेगा’ ॥ ५९½ ॥

इत्येवं मैथिलीं दृष्ट्वा विलपन्तीं तपस्विनीम् ॥ ६० ॥ रोहिणीमिव चन्द्रेण विना ग्रहवशं गताम् । एतस्मिन्नन्तरे तस्य अमात्यः शीलवाञ्छुचिः ॥ ६१ ॥ सुपार्श्वो नाम मेधावी रावणं रक्षसां वरम् । निवार्यमाणः सचिवैरिदं वचनमब्रवीत् ॥ ६२ ॥

भावार्थ

चन्द्रमासे बिछुड़कर किसी क्रूर ग्रहके वशमें पड़ी हुई रोहिणीकी भाँति तपस्विनी सीताको इस प्रकार विलाप करती देख रावणके सुशील एवं शुद्ध आचार-विचारवाले सुपार्श्व-नामक बुद्धिमान् मन्त्रीने दूसरे सचिवोंके मना करनेपर भी उस समय राक्षसराज रावणसे यह बात कही—॥ ६०-६२ ॥

कथं नाम दशग्रीव साक्षाद्वैश्रवणानुज । हन्तुमिच्छसि वैदेहीं क्रोधाद् धर्ममपास्य च ॥ ६३ ॥

भावार्थ

‘महाराज दशग्रीव ! तुम तो साक्षात् कुबेरके भाई हो; फिर क्रोधके कारण धर्मको तिलाञ्जलि दे विदेहकुमारीके वधकी इच्छा कैसे कर रहे हो ? ॥ ६३ ॥

वेदविद्याव्रतस्नातः स्वकर्मनिरतस्तथा । स्त्रियः कस्माद् वधं वीर मन्यसे राक्षसेश्वर ॥ ६४ ॥

भावार्थ

‘वीर राक्षसराज ! तुम विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए वेदविद्याका अध्ययन पूरा करके गुरुकुलसे स्नातक होकर निकले थे और तबसे सदा अपने कर्तव्यके पालनमें लगे रहे तो भी आज अपने हाथसे एक स्त्रीका वध करना तुम कैसे ठीक समझते हो ? ॥ ६४ ॥

मैथिलीं रूपसम्पन्नां प्रत्यवेक्षस्व पार्थिव । तस्मिन्नेव सहास्माभिराहवे क्रोधमुत्सृज ॥ ६५ ॥

भावार्थ

‘पृथ्वीनाथ ! इस मिथिलेशकुमारीके दिव्य रूपकी ओर देखो ( देखकर इसके ऊपर दया करो ) और युद्धमें हमलोगोंके साथ चलकर रामपर ही अपना क्रोध उतारो ॥ ६५ ॥

अभ्युत्थानं त्वमद्यैव कृष्णपक्षचतुर्दशी । कृत्वा निर्याह्यमावास्यां विजयाय बलैर्वृतः ॥ ६६ ॥

भावार्थ

‘आज कृष्णपक्षकी चतुर्दशी है । अतः आज ही युद्धकी तैयारी करके कल अमावास्याके दिन सेनाके साथ विजयके लिये प्रस्थान करो ॥ ६६ ॥

शूरो धीमान् रथी खड्गी रथप्रवरमास्थितः । हत्वा दाशरथिं रामं भवान् प्राप्स्यति मैथिलीम् ॥ ६७ ॥

भावार्थ

‘तुम शूरवीर, बुद्धिमान् और रथी वीर हो । एक श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो खड्ग हाथमें लेकर युद्ध करो । दशरथनन्दन रामका वध करके तुम मिथिलेशकुमारी सीताको प्राप्त कर लोगे’ ॥ ६७ ॥

स तद् दुरात्मा सुहृदा निवेदितं वचः सुधर्म्यं प्रतिगृह्य रावणः । गृहं जगामाथ ततश्च वीर्यवान् पुनः सभां च प्रययौ सुहृद्वृतः ॥ ६८ ॥

भावार्थ

मित्रके कहे हुए उस उत्तम धर्मानुकूल वचनको स्वीकार करके बलवान् दुरात्मा रावण महलमें लौट गया और वहाँसे फिर अपने सुहृदोंके साथ उसने राजसभामें प्रवेश किया ।६८।

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें