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युद्धकाण्ड, सर्ग 70

नरान्तकं हतं दृष्ट्वा चुकुशुर्नैर्ऋतर्षभाः । देवान्तकस्त्रिमूर्धा च पौलस्त्यश्च महोदरः ॥ १ ॥

भावार्थ

नरान्तकको मारा गया देख देवान्तक, पुलस्त्यकुलनन्दन त्रिशिरा और महोदर—ये श्रेष्ठ राक्षस हाहाकार करने लगे ॥ १ ॥

आरूढो मेघसंकाशं वारणेन्द्रं महोदरः । वालिपुत्रं महावीर्यमभिदुद्राव वेगवान् ॥ २ ॥

भावार्थ

महोदरने मेघके समान गजराजपर बैठकर महापराक्रमी अङ्गदके ऊपर बड़े वेगसे धावा किया ॥ २ ॥

भ्रातृव्यसनसंतप्तस्तदा देवान्तको बली । आदाय परिघं घोरमङ्गदं समभिद्रवत् ॥ ३ ॥

भावार्थ

भाईके मारे जानेसे संतप्त हुए बलवान् देवान्तकने भयानक परिघ हाथमें लेकर अङ्गदपर आक्रमण किया ॥ ३ ॥

रथमादित्यसंकाशं युक्तं परमवाजिभिः । आस्थाय त्रिशिरा वीरो वालिपुत्रमथाभ्यगात् ॥ ४ ॥

भावार्थ

इस प्रकार वीर त्रिशिरा उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी रथपर बैठकर वालिकुमारका सामना करनेके लिये आया ॥ ४ ॥

स त्रिभिर्देवदर्पघ्नै राक्षसेन्द्रैरभिद्रुतः । वृक्षमुत्पाटयामास महाविटपमङ्गदः ॥ ५ ॥ देवान्तकाय तं वीरश्चिक्षेप सहसाङ्गदः । महावृक्षं महाशाखं शक्रो दीप्तामिवाशनिम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

देवताओंका दर्प दलन करनेवाले उन तीनों निशाचर-पतियोंके आक्रमण करनेपर वीर अङ्गदने विशाल शाखाओंसे युक्त एक वृक्षको उखाड़ लिया और जैसे इन्द्र प्रज्वलित वज्रका प्रहार करते हैं, उसी प्रकार उन वालिकुमारने बड़ी-बड़ी शाखाओंसे युक्त उस महान् वृक्षको सहसा देवान्तकपर दे मारा ॥ ५-६ ॥

त्रिशिरास्तं प्रचिच्छेद शरैराशीविषोपमैः । स वृक्षं कृत्तमालोक्य उत्पपात तदाङ्गदः ॥ ७ ॥ स ववर्ष ततो वृक्षाञ्शिलाश्च कपिकुञ्जरः । तान् प्रचिच्छेद संक्रुद्धस्त्रिशिरा निशितैः शरैः ॥ ८ ॥ परिघाग्रेण तान् वृक्षान् बभञ्ज स महोदरः । त्रिशिराश्चाङ्गदं वीरमभिदुद्राव सायकैः ॥ ९ ॥

भावार्थ

परंतु त्रिशिराने विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाण मारकर उस वृक्षके टुकड़े-टुकड़े कर दिये । वृक्षको खण्डित हुआ देख कपिकुञ्जर अङ्गद तत्काल आकाशमें उछले और त्रिशिरापर वृक्षों तथा शिलाओंकी वर्षा करने लगे; किंतु क्रोधसे भरे हुए त्रिशिराने पैने बाणोंद्वारा उनको भी काट गिराया ।७-८। महोदरने अपने परिघके अग्रभागसे उन वृक्षोंको तोड़-फोड़ डाला । तत्पश्चात् सायकोंकी वर्षा करते हुए त्रिशिराने वीर अङ्गदपर धावा किया ॥ ९ ॥

गजेन समभिद्रुत्य वालिपुत्रं महोदरः । जघानोरसि संक्रुद्धस्तोमरैर्वज्रसंनिभैः ॥ १० ॥

भावार्थ

साथ ही कुपित हुए महोदरने हाथीके द्वारा आक्रमण करके वालिकुमारकी छातीमें वज्रतुल्य तोमरोंका प्रहार किया ॥ १० ॥

देवान्तकश्च संक्रुद्धः परिघेण तदाङ्गदम् । उपगम्याभिहत्याशु व्यपचक्राम वेगवान् ॥ ११ ॥

भावार्थ

इसी प्रकार देवान्तक भी अङ्गदके निकट आ अत्यन्त क्रोधपूर्वक परिघके द्वारा उन्हें चोट पहुँचाकर तुरंत वेगपूर्वक वहाँसे दूर हट गया ॥ ११ ॥

स त्रिभिर्नैर्ऋतश्रेष्ठैर्युगपत् समभिद्रुतः । न विव्यथे महातेजा वालिपुत्रः प्रतापवान् ॥ १२ ॥

भावार्थ

उन तीनों प्रमुख निशाचरोंने एक साथ ही धावा किया था, तो भी महातेजस्वी और प्रतापी वालिकुमार अङ्गदके मनमें तनिक भी व्यथा नहीं हुई ॥१२॥

स वेगवान् महावेगं कृत्वा परमदुर्जयः । तलेन समभिद्रुत्य जघानास्य महागजम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

वे अत्यन्त दुर्जय और बड़े वेगशाली थे । उन्होंने महान् वेग प्रकट करके महोदरके महान् गजराजपर आक्रमण किया और उसके मस्तकपर जोरसे थप्पड़ मारा ॥ १३ ॥

तस्य तेन प्रहारेण नागराजस्य संयुगे । पेततुर्नयने तस्य विननाश स कुञ्जरः ॥ १४ ॥

भावार्थ

युद्धस्थलमें उनके उस प्रहारसे गजराजकी दोनों आँखें निकलकर पृथ्वीपर गिर गयीं और वह तत्काल मर गया ॥१४॥

विषाणं चास्य निष्कृष्य वालिपुत्रो महाबलः । देवान्तकमभिद्रुत्य ताडयामास संयुगे ॥ १५ ॥

भावार्थ

फिर महाबली वालिकुमारने उस हाथीका एक दाँत उखाड़ लिया और युद्धस्थलमें दौड़कर उसीके द्वारा देवान्तकपर चोट की ॥ १५ ॥

स विह्वलस्तु तेजस्वी वातोद्धूत इव द्रुमः । लाक्षारससवर्णं च सुस्राव रुधिरं महत् ॥ १६ ॥ अथाश्वस्य महातेजाः कृच्छ्राद् देवान्तको बली। आविध्य परिघं वेगादाजघान तदाङ्गदम् ॥ १७॥

भावार्थ

तेजस्वी देवान्तक उस प्रहारसे व्याकुल हो गया और वायुके हिलाये हुए वृक्षकी भाँति काँपने लगा । उसके शरीरसे महावरके समान रंगवाला रक्तका महान् प्रवाह बह चला ॥ तत्पश्चात् महातेजस्वी बलवान् देवान्तकने बड़ी कठिनाईसे अपनेको सँभालकर परिघ उठाया और उसे वेगपूर्वक घुमाकर अङ्गदपर दे मारा ॥ १७ ॥

परिघाभिहतश्चापि वानरेन्द्रात्मजस्तदा । जानुभ्यां पतितो भूमौ पुनरेवोत्पपात ह ॥ १८॥

भावार्थ

उस परिघकी चोट खाकर वानरराजकुमार अङ्गदने भूमिपर घुटने टेक दिये । फिर तुरंत ही उठकर वे ऊपरकी ओर उछले ॥ १८ ॥

तमुत्पतन्तं त्रिशिरास्त्रिभिर्बाणैरजिह्मगैः । घोरैर्हरिपतेः पुत्रं ललाटेऽभिजघान ह ॥ १९॥ ततोऽङ्गदं परिक्षिप्तं त्रिभिर्नैर्ऋतपुङ्गवैः । हनूमानथ विज्ञाय नीलश्चापि प्रतस्थतुः ॥ २०॥

भावार्थ

उछलते समय त्रिशिराने तीन सीधे जानेवाले भयंकर बाणोंद्वारा वानरराजकुमारके ललाटमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ तदनन्तर अङ्गदको तीन प्रमुख निशाचरोंसे घिरा हुआ जान हनुमान् और नील भी उनकी सहायताके लिये अग्रसर हुए ॥ २० ॥

ततश्चिक्षेप शैलाग्रं नीलस्त्रिशिरसे तदा । तद् रावणसुतो धीमान् विभेद निशितैः शरैः ॥ २१॥

भावार्थ

उस समय नीलने त्रिशिरापर एक पर्वतशिखर चलाया; किंतु उस बुद्धिमान् रावणपुत्रने तीखे बाण मारकर उसे तोड़-फोड़ डाला ॥ २१ ॥

तद्बाणशतनिर्भिन्नं विदारितशिलातलम् । सविस्फुलिङ्गं सज्वालं निपपात गिरेः शिरः ॥ २२॥

भावार्थ

उसके सैकड़ों बाणोंसे विदीर्ण होकर उसकी एक-एक शिला बिखर गयी और वह पर्वतशिखर आगकी चिनगारियों तथा ज्वालाके साथ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २२ ॥

स विजृम्भितमालोक्य हर्षाद् देवान्तको बली । परिघेणाभिदुद्राव मारुतात्मजमाहवे ॥ २३॥

भावार्थ

अपने भाईका पराक्रम बढ़ता देख बलवान् देवान्तकको बड़ा हर्ष हुआ और उसने परिघ लेकर युद्धस्थलमें हनुमानजी-पर धावा किया ॥ २३ ॥

तमापतन्तमुत्पत्य हनूमान् कपिकुञ्जरः । आजघान तदा मूर्ध्नि वज्रकल्पेन मुष्टिना ॥ २४॥

भावार्थ

उसे आते देख कपिकुञ्जर हनुमानजीने उछलकर अपने वज्र-सरीखे मुक्केसे उसके सिरपर मारा ॥ २४ ॥

शिरसि प्राहरद् वीरस्तदा वायुसुतो बली । नादेनाकम्पयच्चैव राक्षसान् स महाकपिः ॥ २५॥

भावार्थ

बलवान् वायुकुमार महाकपि हनुमान्जीने उस समय देवान्तकके मस्तकपर प्रहार किया और अपनी भीषण गर्जनासे राक्षसोंको कम्पित कर दिया ॥ २५ ॥

स मुष्टिनिष्पिष्टविभिन्नमूर्धा निर्वान्तदन्ताक्षिविलम्बिजिह्वः । देवान्तको राक्षसराजसूनु- र्गतासुरुर्व्यां सहसा पपात ॥ २६॥

भावार्थ

उनके मुष्टि-प्रहारसे देवान्तकका मस्तक फट गया और पिस उठा । दाँत, आँखें और लंबी जीभ बाहर निकल आयीं तथा वह राक्षसराजकुमार प्राणशून्य होकर सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २६ ॥

तस्मिन् हते राक्षसयोधमुख्ये महाबले संयति देवशत्रौ । क्रुद्धस्त्रिशीर्षा निशिताख्रमुग्रं ववर्ष नीलोरसि बाणवर्षम् ॥ २७॥

भावार्थ

राक्षस-योद्धाओंमें प्रधान महाबली देवद्रोही देवान्तकके युद्धमें मारे जानेपर त्रिशिराको बड़ा क्रोध हुआ और उसने नीलकी छातीपर पैने बाणोंकी भयंकर वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २७ ॥

महोदरस्तु संक्रुद्धः कुञ्जरं पर्वतोपमम् । भूयः समधिरुह्याशु मन्दरं रश्मिवानिव ॥ २८॥

भावार्थ

तदनन्तर अत्यन्त क्रोधसे भरा हुआ महोदर पुनः शीघ्र ही एक पर्वताकार हाथीपर सवार हुआ, मानो सूर्यदेव मन्दराचलपर आरूढ़ हुए हों ॥ २८ ॥

ततो बाणमयं वर्षं नीलस्योपर्यपातयत् । गिरौ वर्षं तडिच्चक्रचापवानिव तोयदः ॥ २९॥

भावार्थ

हाथीपर चढ़कर उसने नीलके ऊपर बाणोंकी विकट वर्षा की, मानो इन्द्रधनुष एवं विद्युन्मण्डलसे युक्त मेघ किसी पर्वतपर जलकी वर्षा कर रहा हो ॥ २९ ॥

ततः शरौघैरभिवृष्यमाणो विभिन्नगात्रः कपिसैन्यपालः । नीलो बभूवाथ विसृष्टगात्रो विघ्रम्भितस्तेन महाबलेन ॥ ३०॥

भावार्थ

बाण-समूहोंकी निरन्तर वर्षा होनेसे वानरसेनापति नीलके सारे अङ्ग क्षत-विक्षत हो गये । उनका शरीर शिथिल हो गया । इस प्रकार महाबली महोदरने उन्हें मूर्छित करके उनके बल-विक्रमको कुण्ठित कर दिया ॥ ३० ॥

ततस्तु नीलः प्रतिलब्धसंज्ञः शैलं समुत्पाट्य सवृक्षखण्डम् । ततः समुत्पत्य महोग्रवेगो महोदरं तेन जघान मूर्ध्नि ॥ ३१ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् होशमें आनेपर नीलने वृक्ष-समूहोंसे युक्त एक शैल-शिखरको उखाड़ लिया । उनका वेग बड़ा भयंकर था । उन्होंने उछलकर उस वृक्षको महोदरके मस्तकपर दे मारा॥३१॥

ततः स शैलाभिनिपातभग्नो महोदरस्तेन महाद्विपेन । व्यामोहितो भूमितले गतासुः पपात वज्राभिहतो यथाद्रिः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

उस पर्वतशिखरके आघातसे महोदर उस महान् गजराजके साथ ही चूर-चूर हो गया और मूर्च्छित एवं प्राणशून्य हो वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३२ ॥

पितृव्यं निहतं दृष्ट्वा त्रिशिराश्चापमाददे । हनूमन्तं च संक्रुद्धो विव्याध निशितैः शरैः ॥ ३३ ॥

भावार्थ

पिताके भाईको मारा गया देख त्रिशिराके क्रोधकी सीमा न रही । उसने धनुष हाथमें ले लिया और हनुमान्जीको पैने बाणोंसे बींधना आरम्भ किया ॥ ३३ ॥

स वायुसूनुः कुपितश्चिक्षेप शिखरं गिरेः । त्रिशिरास्तच्छरैस्तीक्ष्णैर्बिभेद बहुधा बली ॥ ३४ ॥

भावार्थ

तब पवनकुमारने कुपित होकर उस राक्षसके ऊपर पर्वतका शिखर चलाया, परंतु बलवान् त्रिशिराने अपने तीखे सायकोंसे उसके कई टुकड़े कर डाले ॥ ३४ ॥

तद् व्यर्थं शिखरं दृष्ट्वा द्रुमवर्षं तदा कपिः । विससर्ज रणे तस्मिन् रावणस्य सुतं प्रति ॥ ३५ ॥

भावार्थ

उस पर्वतशिखरके प्रहारको व्यर्थ हुआ देख कपिवर हनुमान्ने उस रणभूमिमें रावणपुत्र त्रिशिराके ऊपर वृक्षोंकी वर्षा आरम्भ की ॥ ३५ ॥

तमापतन्तमाकाशे द्रुमवर्षं प्रतापवान् । त्रिशिरा निशितैर्बाणैश्चिच्छेद च ननाद च ॥ ३६ ॥

भावार्थ

किंतु प्रतापी त्रिशिराने आकाशमें होनेवाली वृक्षोंकी उस वृष्टिको अपने पैने बाणोंसे छिन्न-भिन्न कर दिया और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ३६ ॥

हनूमांस्तु समुत्पत्य हयं त्रिशिरसस्तदा । विददार नखैः क्रुद्धो नागेन्द्रं मृगराडिव ॥ ३७ ॥

भावार्थ

तब हनुमान्जी कूदकर त्रिशिराके पास जा पहुँचे और जैसे कुपित सिंह गजराजको अपने पंजोंसे चीर डालता है, उसी प्रकार रोषसे भरे हुए उन पवनकुमारने त्रिशिराके घोड़ेको अपने नखोंसे विदीर्ण कर डाला ॥ ३७ ॥

अथ शक्तिं समासाद्य कालरात्रिमिवान्तकः । चिक्षेपानिलपुत्राय त्रिशिरा रावणात्मजः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

यह देख रावणकुमार त्रिशिराने शक्ति हाथमें ली, मानो यमराजने कालरात्रिको साथ ले लिया हो, वह शक्ति लेकर उसने पवनकुमार हनुमान्पर चलायी ॥ ३८ ॥

दिवः क्षिप्तामिवोल्कां तां शक्तिं क्षिप्तामसङ्गताम् । गृहीत्वा हरिशार्दूलो बभञ्ज च ननाद च ॥ ३९ ॥

भावार्थ

जैसे आकाशसे उल्कापात हुआ हो, उसी प्रकार वह शक्ति, जिसकी गति कहीं कुण्ठित नहीं होती थी, चली; परंतु वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीने उसे अपने शरीरमें लगनेसे पहले ही हाथसे पकड़ लिया और तोड़ डाला, तोड़नेके बाद उन्होंने भयंकर गर्जना की ॥ ३९ ॥

तां दृष्ट्वा घोरसंकाशां शक्तिं भग्नां हनूमता । प्रहृष्टा वानरगणा विनेदुर्जलदा यथा ॥ ४० ॥

भावार्थ

हनुमान्जीने वह भयानक शक्ति तोड़ दी, यह देख वानर-वृन्द अत्यन्त हर्षसे उल्लसित हो मेघोंके समान गम्भीर गर्जना करने लगे ॥ ४० ॥

ततः खड्गं समुद्यम्य त्रिशिरा राक्षसोत्तमः । निचखान तदा खड्गं वानरेन्द्रस्य वक्षसि ॥ ४१ ॥

भावार्थ

तब राक्षसशिरोमणि त्रिशिराने तलवार उठायी और कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीकी छातीपर उसकी भरपूर चोट की ॥ ४१ ॥

खड्गप्रहाराभिहतो हनूमान् मारुतात्मजः । आजघान त्रिमूर्धानं तलेनोरसि वीर्यवान् ॥ ४२ ॥

भावार्थ

तलवारकी चोटसे घायल हो पराक्रमी पवनकुमार हनुमान्ने त्रिशिराकी छातीमें एक तमाचा जड़ दिया ॥ ४२ ॥

स तलाभिहतस्तेन स्रस्तहस्तायुधो भुवि । निपपात महातेजास्त्रिशिरास्त्यक्तचेतनः ॥ ४३ ॥

भावार्थ

उनका थप्पड़ लगते ही महातेजस्वी त्रिशिरा अपनी चेतना खो बैठा । उसके हाथसे हथियार खिसक गया और वह स्वयं भी पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ४३ ॥

स तस्य पततः खड्गं तमाच्छिद्य महाकपिः । ननाद गिरिसंकाशस्त्रासयन् सर्वराक्षसान् ॥ ४४ ॥

भावार्थ

गिरते समय उस राक्षसके खड्गको छीनकर पर्वताकार महाकपि हनुमान्जी सब राक्षसोंको भयभीत करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ४४ ॥

अमृष्यमाणस्तं घोषमुत्पपात निशाचरः । उत्पत्य च हनूमन्तं ताडयामास मुष्टिना ॥ ४५ ॥

भावार्थ

उनकी वह गर्जना उस निशाचरसे सही नहीं गयी, अतः वह सहसा उछलकर खड़ा हो गया । उठते ही उसने हनुमान्जीको एक मुक्का मारा ॥ ४५ ॥

तेन मुष्टिप्रहारेण संचुकोप महाकपिः । कुपितश्च निजग्राह किरीटे राक्षसर्षभम् ॥ ४६ ॥

भावार्थ

उसके मुक्केकी चोट खाकर महाकपि हनुमान्जीको बड़ा क्रोध हुआ । कुपित होनेपर उन्होंने उस राक्षसका मुकुटमण्डित मस्तक पकड़ लिया ॥ ४६ ॥

स तस्य शीर्षाण्यसिना शितेन किरीटजुष्टानि सकुण्डलानि । क्रुद्धः प्रचिच्छेद सुतोऽनिलस्य त्वष्टुः सुतस्येव शिरांसि शक्रः ॥ ४७ ॥ तान्यायताक्षाण्यगसंनिभानि प्रदीप्तवैश्वानरलोचनानि । पेतुः शिरांसीन्द्ररिपोः पृथिव्यां ज्योतींषि मुक्तानि यथार्कमार्गात् ॥ ४८ ॥

भावार्थ

फिर तो जैसे पूर्वकालमें इन्द्रने त्वष्टाके पुत्र विश्वरूपके तीनों मस्तकोंको वज्रसे काट गिराया था, उसी प्रकार कुपित हुए पवनपुत्र हनुमान्ने रावणपुत्र त्रिशिराके किरीट और कुण्डलोंसहित तीनों मस्तकोंको तीखी तलवारसे काट डाला ॥ उन मस्तकोंकी सभी इन्द्रियाँ विशाल थीं । उनकी आँखें प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रही थीं । उस इन्द्रद्रोही त्रिशिराके वे तीनों सिर उसी प्रकार पृथ्वीपर गिरे, जैसे आकाशसे तारे टूटकर गिरते हैं ॥ ४८ ॥

तस्मिन् हते देवरिपौ त्रिशीर्षे हनूमता शक्रपराक्रमेण । नेदुः प्लवंगाः प्रचचाल भूमी रक्षांस्यथो दुद्रुविरे समन्तात् ॥ ४९ ॥

भावार्थ

देवद्रोही त्रिशिरा जब इन्द्रतुल्य पराक्रमी हनुमान्जीके हाथसे मारा गया, तब समस्त वानर हर्षनाद करने लगे, धरती काँपने लगी तथा राक्षस चारों दिशाओंकी ओर भाग चले ॥ ४९ ॥

हतं त्रिशिरसं दृष्ट्वा तथैव च महोदरम् । हतौ प्रेक्ष्य दुराधर्षौ देवान्तकनरान्तकौ ॥ ५० ॥ चुकोप परमामर्षी मत्तो राक्षसपुङ्गवः । जग्राहार्चिष्मतीं चापि गदां सर्वायसीं तदा ॥ ५१ ॥

भावार्थ

त्रिशिरा तथा महोदरको मारा गया देख और दुर्जय वीर देवान्तक एवं नरान्तकको भी कालके गालमें गया हुआ जान अत्यन्त अमर्षशील राक्षसशिरोमणि मत्त ( महापार्श्व ) कुपित हो उठा । उसने एक तेजस्विनी गदा हाथमें ली, जो सम्पूर्णतः लोहेकी बनी हुई थी ॥ ५०-५१ ॥

हेमपट्टपरिक्षिप्तां मांसशोणितफेनिलाम् । विराजमानां विपुलां शत्रुशोणिततर्पिताम् ॥ ५२ ॥

भावार्थ

उसपर सोनेका पत्र जड़ा हुआ था । युद्धस्थलमें पहुँचनेपर वह शत्रुओंके रक्त और मांसमें सन जाती थी । उसका आकार विशाल था । वह सुन्दर शोभासे सम्पन्न तथा शत्रुओंके रक्तसे तृप्त होनेवाली थी ॥ ५२ ॥

तेजसा सम्प्रदीप्ताग्रां रक्तमाल्यविभूषिताम् । ऐरावतमहापद्मसार्वभौमभयावहाम् ॥ ५३ ॥

भावार्थ

उसका अग्रभाग तेजसे प्रज्वलित होता था । वह लाल रंगके फूलोंसे सजायी गयी थी तथा ऐरावत, पुण्डरीक और सार्वभौम नामक दिग्गजोंको भी भयभीत करनेवाली थी ॥५३॥

गदामादाय संक्रुद्धो मत्तो राक्षसपुङ्गवः । हरीन् समभिदुद्राव युगान्ताग्निरिव ज्वलन् ॥ ५४ ॥

भावार्थ

उस गदाको हाथमें लेकर क्रोधसे भरा हुआ राक्षसशिरोमणि मत्त ( महापार्श्व ) प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा और वानरोंकी ओर दौड़ा ॥ ५४ ॥

अथर्षभः समुत्पत्य वानरो रावणानुजम् । मत्तानीकमुपागम्य तस्थौ तस्याग्रतो बली ॥ ५५ ॥

भावार्थ

तब ऋषभ नामक बलवान् वानर उछलकर रावणके छोटे भाई मत्तानीक ( महापार्श्व ) के पास आ पहुँचे और उसके सामने खड़े हो गये ॥ ५५ ॥

तं पुरस्तात् स्थितं दृष्ट्वा वानरं पर्वतोपमम् । आजघानोरसि क्रुद्धो गदया वज्रकल्पया ॥ ५६ ॥

भावार्थ

पर्वताकार वानरवीर ऋषभको सामने खड़ा देख कुपित हुए महापार्श्वने अपनी वज्रतुल्य गदासे उनकी छातीपर प्रहार किया ॥ ५६ ॥

स तयाभिहतस्तेन गदया वानरर्षभः । भिन्नवक्षाः समाधूतः सुस्राव रुधिरं बहु ॥ ५७ ॥

भावार्थ

उसकी उस गदाके आघातसे वानरशिरोमणि ऋषभका वक्षःस्थल क्षत-विक्षत हो गया । वे काँप उठे और अधिक मात्रामें खूनकी धारा बहाने लगे ॥ ५७ ॥

स सम्प्राप्य चिरात् संज्ञामृषभो वानरेश्वरः । क्रुद्धो विस्फुरमाणोष्ठो महापार्श्वमुदैक्षत ॥ ५८ ॥

भावार्थ

बहुत देरके बाद होशमें आनेपर वानरराज ऋषभ कुपित हो उठे और महापार्श्वकी ओर देखने लगे । उस समय उनके ओठ फड़क रहे थे ॥ ५८ ॥

स वेगवान् वेगवदभ्युपेत्य तं राक्षसं वानरवीरमुख्यः । संवर्त्य मुष्टिं सहसा जघान बाह्वन्तरे शैलनिकाशरूपः ॥ ५९ ॥

भावार्थ

वानरवीरोंमें प्रधान ऋषभका रूप पर्वतके समान जान पड़ता था । वे बड़े वेगशाली थे । उन्होंने वेगपूर्वक उस राक्षसके पास पहुँचकर मुक्का ताना और सहसा उसकी छातीपर प्रहार किया ॥ ५९ ॥

स कृत्तमूलः सहसेव वृक्षः क्षितौ पपात क्षतजोक्षिताङ्गः । तां चास्य घोरां यमदण्डकल्पां गदां प्रगृह्याशु तदा ननाद ॥ ६० ॥

भावार्थ

फिर तो महापार्श्व जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा । उसके सारे अङ्ग रक्तसे नहा उठे । इधर ऋषभ उस निशाचरकी यमदण्डके समान भयंकर गदाको शीघ्र ही हाथमें लेकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ६० ॥

मुहूर्तमासीत् स गतासुकल्पः प्रत्यागतात्मा सहसा सुरारिः । उत्पत्य संध्याभ्रसमानवर्ण- स्तं वारिराजात्मजमाजघान ॥ ६१ ॥

भावार्थ

देवद्रोही महापार्श्व दो घड़ीतक मुर्देकी भाँति पड़ा रहा । फिर होशमें आनेपर वह सहसा उछलकर खड़ा हो गया । उसका रक्तरञ्जित शरीर संध्याकालके बादलोंके समान लाल दिखायी देता था । उसने वरुणपुत्र ऋषभको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ६१ ॥

स मूर्च्छितो भूमितले पपात मुहूर्तमुत्पत्य पुनः ससंज्ञः । तामेव तस्याद्रिवराद्रिकल्पां गदां समाविध्य जघान संख्ये ॥ ६२ ॥

भावार्थ

उस चोटसे ऋषभ मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े । दो घड़ीके बाद होशमें आनेपर वे पुनः उछलकर सामने आ गये और उन्होंने युद्धस्थलमें महापार्श्वकी उसी गदाको, जो किसी पर्वतराजकी चट्टानके समान जान पड़ती थी, घुमाकर उस निशाचरपर दे मारा ॥ ६२ ॥

सा तस्य रौद्रा समुपेत्य देहं रौद्रस्य देवाध्वरविप्रशत्रोः । बिभेद वक्षः क्षतजं च भूरि सुस्राव धात्वम्भ इवाद्रिराजः ॥ ६३ ॥

भावार्थ

उसकी उस भयंकर गदाने देवता, यज्ञ और ब्राह्मणसे शत्रुता रखनेवाले उस रौद्र-राक्षसके शरीरपर चोट करके उसके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर दिया । फिर तो जैसे पर्वतराज हिमालय गेरु आदि धातुओंसे मिला हुआ जल बहाता है, उसी प्रकार वह भी अधिक मात्रामें रक्त बहाने लगा ॥६३॥

अभिदुद्राव वेगेन गदां तस्य महात्मनः । तां गृहीत्वा गदां भीमामाविध्य च पुनः पुनः ॥ ६४ ॥ मत्तानीकं महात्मा स जघान रणमूर्धनि ।

भावार्थ

उस समय उस राक्षसने महामना ऋषभके हाथसे अपनी गदा लेनेके लिये उनपर धावा किया; किंतु ऋषभने उस भयानक गदाको हाथमें लेकर बारंबार घुमाया और बड़े वेगसे महापार्श्वपर आक्रमण किया । इस तरह उन महामनस्वी वानरवीरने युद्धके मुहानेपर उस निशाचरकी जीवन-लीला समाप्त कर दी थी ॥ ६४½ ॥

स स्वया गदया भग्नो विशीर्णदशनेक्षणः ॥ ६५ ॥ निपपात तदा मत्तो वज्राहत इवाचलः ।

भावार्थ

अपनी ही गदाकी चोट खाकर महापार्श्वके दाँत टूट गये और आँखें फूट गयीं । वह वज्रके मारे हुए पर्वत-शिखरकी भाँति तत्काल धराशायी हो गया ॥ ६५½ ॥

विशीर्णनयने भूमौ गतसत्त्वे गतायुषि । पतिते राक्षसे तस्मिन् विद्रुतं राक्षसं बलम् ॥ ६६ ॥

भावार्थ

जिसकी आँखें नष्ट और चेतना विलुप्त हो गयी थी, वह राक्षस महापार्श्व जब गतायु होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब राक्षसोंकी सेना सब ओर भाग चली ॥ ६६ ॥

तस्मिन् हते भ्रातरि रावणस्य तन्नैर्ऋतानां बलमर्णवाभम् । त्यक्तायुधं केवलजीवितार्थं दुद्राव भिन्नार्णवसंनिकाशम् ॥ ६७ ॥

भावार्थ

रावणके भाई महापार्श्वका वध हो जानेपर राक्षसोंकी वह समुद्रके समान विशाल सेना हथियार फेंककर केवल जान बचानेके लिये सब ओर भागने लगी, मानो महासागर फूटकर सब ओर बहने लगा हो ॥ ६७ ॥

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