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युद्धकाण्ड, सर्ग 71

स्वबलं व्यथितं दृष्ट्वा तुमुलं लोमहर्षणम् । भ्रातॄंश्च निहतान् दृष्ट्वा शक्रतुल्यपराक्रमान् ॥ १ ॥ पितृव्यौ चापि संदृश्य समरे संनिपातितौ । युद्धोन्मत्तं च मत्तं च भ्रातरौ राक्षसोत्तमौ ॥ २ ॥ चुकोप च महातेजा ब्रह्मदत्तवरो युधि । अतिकायोऽद्रिसंकाशो देवदानवदर्पहा ॥ ३ ॥

भावार्थ

अतिकायने देखा, शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाली मेरी भयंकर सेना व्यथित हो उठी है, इन्द्रके तुल्य पराक्रमी मेरे भाइयोंका संहार हो गया है तथा मेरे चाचा—दोनों भाई युद्धोन्मत्त ( महोदर ) और मत्त ( महापार्श्व ) भी समराङ्गणमें मार गिराये गये हैं, तब उस महातेजस्वी निशाचरको बड़ा क्रोध हुआ । उसे ब्रह्माजीसे वरदान प्राप्त हो चुका था । अतिकाय पर्वतके समान विशालकाय तथा देवता और दानवोंके दर्पका दलन करनेवाला था ॥ १–३ ॥

स भास्करसहस्रस्य संघातमिव भास्वरम् । रथमारुह्य शक्रारिरभिदुद्राव वानरान् ॥ ४ ॥

भावार्थ

वह इन्द्रका शत्रु था । उसने सहस्रों सूर्योंके समूहकी भाँति देदीप्यमान तेजस्वी रथपर आरूढ़ होकर वानरोंपर धावा किया ॥ ४ ॥

स विस्फार्य तदा चापं किरीटी मृष्टकुण्डलः । नाम संश्रावयामास ननाद च महास्वनम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

उसके मस्तकपर किरीट और कानोंमें शुद्ध सुवर्णके बने हुए कुण्डल झलमला रहे थे । उसने धनुषकी टङ्कार करके अपना नाम सुनाया और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ५ ॥

तेन सिंहप्रणादेन नामविश्रावणेन च । ज्याशब्देन च भीमेन त्रासयामास वानरान् ॥ ६ ॥ ते दृष्ट्वा देहमाहात्म्यं कुम्भकर्णोऽयमुत्थितः । भयार्ता वानराः सर्वे संश्रयन्ते परस्परम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

उस सिंहनादसे, अपने नामकी घोषणासे और प्रत्यञ्चाकी भयानक टङ्कारसे उसने वानरोंको भयभीत कर दिया ॥ उसके शरीरकी विशालता देखकर वे वानर ऐसा मानने लगे कि यह कुम्भकर्ण ही फिर उठकर खड़ा हो गया । यह सोचकर सब वानर भयसे पीड़ित हो एक-दूसरेका सहारा लेने लगे ॥ ७ ॥

ते तस्य रूपमालोक्य यथा विष्णोस्त्रिविक्रमे । भयाद् वानरयोधास्ते विद्रवन्ति ततस्ततः ॥ ८ ॥

भावार्थ

त्रिविक्रम-अवतारके समय बढ़े हुए भगवान् विष्णुके विराट् रूपकी भाँति उसका शरीर देखकर वे वानर-सैनिक भयके मारे इधर-उधर भागने लगे ॥ ८ ॥

तेऽतिकायं समासाद्य वानरा मूढचेतसः । शरण्यं शरणं जग्मुर्लक्ष्मणाग्रजमाहवे ॥ ९ ॥

भावार्थ

अतिकायके निकट जाते ही वानरोंके चित्तपर मोह छा गया । वे युद्धस्थलमें लक्ष्मणके बड़े भाई शरणागतवत्सल भगवान् श्रीरामकी शरणमें गये ॥ ९ ॥

ततोऽतिकायं काकुत्स्थो रथस्थं पर्वतोपमम् । ददर्श धन्विनं दूराद् गर्जन्तं कालमेघवत् ॥ १० ॥

भावार्थ

रथपर बैठे हुए पर्वताकार अतिकायको श्रीरामचन्द्रजीने भी देखा । वह हाथमें धनुष लिये कुछ दूरपर प्रलयकालके मेघकी भाँति गर्जना कर रहा था ॥ १० ॥

स तं दृष्ट्वा महाकायं राघवस्तु सुविस्मितः । वानरान् सान्त्वयित्वा च विभीषणमुवाच ह ॥ ११ ॥

भावार्थ

उस महाकाय निशाचरको देखकर श्रीरामचन्द्रजीको भी बड़ा विस्मय हुआ । उन्होंने वानरोंको सान्त्वना देकर विभीषणसे पूछा—॥ ११ ॥

कोऽसौ पर्वतसंकाशो धनुष्मान् हरिलोचनः । युक्ते हयसहस्रेण विशाले स्यन्दने स्थितः ॥ १२ ॥ य एष निशितैः शूलैः सुतीक्ष्णैः प्रासतोमरैः । अर्चिष्मद्भिर्वृतो भाति भूतैरिव महेश्वरः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘विभीषण ! हजार घोड़ोंसे जुते हुए विशाल रथपर बैठा हुआ वह पर्वताकार निशाचर कौन है ? उसके हाथमें धनुष है और आँखें सिंहके समान तेजस्विनी दिखायी देती हैं ॥ ‘यह भूतोंसे घिरे हुए भूतनाथ महादेवजीके समान तीखे शूल तथा अत्यन्त तेजधारवाले तेजस्वी प्रासों और तोमरोंसे घिरकर अद्भुत शोभा पा रहा है ॥ १३ ॥

कालजिह्वाप्रकाशाभिर्य एषोऽभिविराजते । आवृतो रथशक्तीभिर्विद्युद्भिरिव तोयदः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘इतना ही नहीं, कालकी जिह्वाके समान प्रकाशित होनेवाली रथशक्तियोंसे घिरा हुआ यह वीर निशाचर विद्युन्मालाओंसे आवृत मेघके समान प्रकाशित हो रहा है ॥ १४॥

धनूंषि चास्य सज्जानि हेमपृष्ठानि सर्वशः । शोभयन्ति रथश्रेष्ठं शक्रचापमिवाम्बरम् ॥ १५ ॥ य एष रक्षःशार्दूलो रणभूमिं विराजयन् । अभ्येति रथिनां श्रेष्ठो रथेनादित्यवर्चसा ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘जिनके पृष्ठभागमें सोने मढ़े हुए हैं, ऐसे अनेकानेक सुसज्जित धनुष उसके श्रेष्ठ रथकी सब ओरसे उसी तरह शोभा बढ़ा रहे हैं, जैसे इन्द्रधनुष आकाशको सुशोभित करता है ॥ ‘यह राक्षसोंमें सिंहके समान पराक्रमी और रथियोंमें श्रेष्ठ वीर अपने सूर्यतुल्य तेजस्वी रथके द्वारा रणभूमिकी शोभा बढ़ाता हुआ मेरे सामने आ रहा है ॥ १६ ॥

ध्वजशृङ्गप्रतिष्ठेन राहुणाभिविराजते । सूर्यरश्मिप्रभैर्बाणैर्दिशो दश विराजयन् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘इसके ध्वजके शिखरपर पताकामें राहुका चिह्न अङ्कित है, जिससे रथकी बड़ी शोभा हो रही है । यह सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले बाणोंसे दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रहा है ॥ १७ ॥

त्रिनतं मेघनिर्ह्रादं हेमपृष्ठमलंकृतम् । शतक्रतुधनुःप्रख्यं धनुश्चास्य विराजते ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘इसके धनुषका पृष्ठभाग सोनेसे मढ़ा हुआ तथा पुष्प आदिसे अलंकृत है । वह आदि, मध्य और अन्त तीन स्थानोंमें झुका हुआ है । उसकी प्रत्यञ्चासे मेघोंकी गर्जनाके समान टंकार-ध्वनि प्रकट होती है । इस निशाचरका धनुष इन्द्र-धनुषके समान शोभा पाता है ॥ १८ ॥

सध्वजः सपताकश्च सानुकर्षो महारथः । चतुःसादिसमायुक्तो मेघस्तनितनिःस्वनः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘इसका विशाल रथ ध्वजा, पताका और अनुकर्ष ( रथके नीचे लगे हुए आधारभूत काष्ठ) से युक्त, चार सारथियोंसे नियन्त्रित और मेघकी गर्जनाके समान घर्घराहट पैदा करनेवाला है ॥ १९ ॥

विंशतिर्दश चाष्टौ च तूणास्य रथमास्थिताः । कार्मुकाणि च भौमानि ज्याश्च काञ्चनपिङ्गलाः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘इसके रथपर बीस तरकस, दस भयंकर धनुष और आठ सुनहरे एवं पिङ्गलवर्णकी प्रत्यञ्चाएँ रखी हुई हैं ॥२०॥

द्वौ च खड्गौ च पार्श्वस्थौ प्रदीप्तौ पार्श्वशोभितौ । चतुर्हस्तत्सरुचितौ व्यक्तहस्तदशायतौ ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘दोनों बगलमें दो चमकीली तलवारें शोभा पा रही हैं, जिनकी मूँठें चार हाथकी और लंबाई दस हाथकी है ॥२१॥

रक्तकण्ठगुणो धीरो महापर्वतसंनिभः । कालः कालमहावक्त्रो मेघस्थ इव भास्करः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘गलेमें लाल रंगकी माला धारण किये महान् पर्वतके समान आकारवाला यह धीरवीर निशाचर काले रंगका दिखायी देता है । इसका विशाल मुख कालके मुखके समान भयंकर है तथा यह मेघोंकी ओटमें स्थित हुए सूर्यके समान प्रकाशित होता है ॥ २२ ॥

काञ्चनाङ्गदनद्धाभ्यां भुजाभ्यामेष शोभते । शृङ्गाभ्यामिव तुङ्गाभ्यां हिमवान् पर्वतोत्तमः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘इसकी बाँहोंमें सोनेके बाजूबंद बँधे हुए हैं । उन भुजाओंके द्वारा यह विशालकाय निशाचर दो ऊँचे शिखरोंसे युक्त गिरिराज हिमालयके समान शोभा पाता है ॥ २३ ॥

कुण्डलाभ्यामुभाभ्यां च भाति वक्त्रं सुभीषणम् । पुनर्वस्वन्तरगतं परिपूर्णो निशाकरः ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘इसका अत्यन्त भीषण मुखमण्डल दोनों कुण्डलोंसे मण्डित हो पुनर्वसु नामक दो नक्षत्रोंके बीच स्थित हुए परिपूर्ण चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहा है ॥ २४ ॥

आचक्ष्व मे महाबाहो त्वमेनं राक्षसोत्तमम् । यं दृष्ट्वा वानराः सर्वे भयार्ता विद्रुता दिशः ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘महाबाहो ! तुम मुझे इस श्रेष्ठ राक्षसका परिचय दो, जिसे देखते ही सब वानर भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भाग चले हैं’ ॥ २५ ॥

स पृष्टो राजपुत्रेण रामेणामिततेजसा । आचचक्षे महातेजा राघवाय विभीषणः ॥ २६ ॥

भावार्थ

अमित तेजस्वी राजकुमार श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर महातेजस्वी विभीषणने रघुनाथजीसे इस प्रकार कहा—॥२६॥

दशग्रीवो महातेजा राजा वैश्रवणानुजः । भीमकर्मा महात्मा हि रावणो राक्षसेश्वरः ॥ २७ ॥ तस्यासीद् वीर्यवान् पुत्रो रावणप्रतिमो बले । वृद्धसेवी श्रुतिधरः सर्वास्त्रविदुषां वरः ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘भगवन् ! जो कुबेरका छोटा भाई, महातेजस्वी, महाकाय, भयानक कर्म करनेवाला तथा राक्षसोंका स्वामी दशमुख राजा रावण है, उसके एक बड़ा पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुआ, जो बलमें रावणके ही समान है । वह वृद्ध पुरुषोंका सेवन करनेवाला, वेद-शास्त्रोंका ज्ञाता तथा सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ है ॥ २७–२८ ॥

अश्वपृष्ठे नागपृष्ठे खड्गे धनुषि कर्षणे । भेदे सान्त्वे च दाने च नये मन्त्रे च सम्मतः ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘हाथी-घोड़ोंकी सवारी करने, तलवार चलाने, धनुषपर बाणोंका संधान करने, प्रत्यञ्चा खींचने, लक्ष्य बेधने, साम और दानका प्रयोग करने तथा न्यायुक्त बर्ताव एवं मन्त्रणा देनेमें वह सबके द्वारा सम्मानित है ॥ २९ ॥

यस्य बाहुं समाश्रित्य लङ्का भवति निर्भया । तनयं धान्यमालिन्या अतिकायमिमं विदुः ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘उसीके बाहुबलका आश्रय लेकर लङ्कापुरी सदा निर्भय रहती आयी है । वही यह वीर निशाचर है । यह रावणकी दूसरी पत्नी धान्यमालिनीका पुत्र है । इसे लोग अतिकायके नामसे जानते हैं ॥ ३० ॥

एतेनाराधितो ब्रह्मा तपसा भावितात्मना । अस्त्राणि चाप्यवाप्तानि रिपवश्च पराजिताः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘तपस्यासे विशुद्ध अन्तःकरणवाले इस अतिकायने दीर्घकालतक ब्रह्माजीकी आराधना की थी । इसने ब्रह्माजीसे अनेक दिव्यास्त्र प्राप्त किये हैं और उनके द्वारा बहुत-से शत्रुओंको पराजित किया है ॥ ३१ ॥

सुरासुरैरवध्यत्वं दत्तमस्मै स्वयंभुवा । एतच्च कवचं दिव्यं रथश्च रविभास्वरः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘ब्रह्माजीने इसे देवताओं और असुरोंसे न मारे जानेका वरदान दिया है । ये दिव्य कवच और सूर्यके समान तेजस्वी रथ भी उन्हींके दिये हुए हैं ॥ ३२ ॥

एतेन शतशो देवा दानवाश्च पराजिताः । रक्षितानि च रक्षांसि यक्षाश्चापि निषूदिताः ॥ ३३ ॥ वज्रं विष्टम्भितं येन बाणैरिन्द्रस्य धीमता । पाशः सलिलराजस्य युद्धे प्रतिहतस्तथा ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘इसने देवता और दानवोंको सैकड़ों बार पराजित किया है, राक्षसोंकी रक्षा की है और यक्षोंको मार भगाया है ॥ ‘इस बुद्धिमान् राक्षसने अपने बाणोंद्वारा इन्द्रके वज्रको भी कुण्ठित कर दिया है तथा युद्धमें जलके स्वामी वरुणके पाशको भी सफल नहीं होने दिया है ॥ ३४ ॥

एषोऽतिकायो बलवान् राक्षसानामथर्षभः । स रावणसुतो धीमान् देवदानवदर्पहा ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘राक्षसोंमें श्रेष्ठ यह बुद्धिमान् रावणकुमार अतिकाय बड़ा बलवान् तथा देवताओं और दानवोंके दर्पको भी दलन करनेवाला है ॥ ३५ ॥

तदस्मिन् क्रियतां यत्नः क्षिप्रं पुरुषपुङ्गव । पुरा वानरसैन्यानि क्षयं नयति सायकैः ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘पुरुषोत्तम ! अपने सायकोंसे यह सारी वानर-सेनाका संहार कर डाले, इसके पहले ही आप इस राक्षसको परास्त करनेका शीघ्र प्रयत्न कीजिये’ ॥ ३६ ॥

ततोऽतिकायो बलवान् प्रविश्य हरिवाहिनीम् । विस्फारयामास धनुर्ननाद च पुनः पुनः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

विभीषण और भगवान् श्रीराममें इस प्रकार बातें हो ही रही थीं कि बलवान् अतिकाय वानरोंकी सेनामें घुस आया और बारंबार गर्जना करता हुआ अपने धनुषपर टंकार देने लगा ॥ ३७ ॥

तं भीमवपुषं दृष्ट्वा रथस्थं रथिनां वरम् । अभिपेतुर्महात्मानः प्रधाना ये वनौकसः ॥ ३८ ॥ कुमुदो द्विविदो मैन्दो नीलः शरभ एव च । पादपैर्गिरिशृङ्गैश्च युगपत् समभिद्रवन् ॥ ३९ ॥

भावार्थ

रथियोंमें श्रेष्ठ और भयंकर शरीरवाले उस राक्षसको रथपर बैठकर आते देख कुमुद, द्विविद, मैन्द, नील और शरभ आदि जो प्रधान-प्रधान महामनस्वी वानर थे, वे वृक्ष तथा पर्वतशिखर धारण किये एक साथ ही उसपर टूट पड़े ३८-३९

तेषां वृक्षांश्च शैलांश्च शरैः कनकभूषणैः । अतिकायो महातेजाश्चिच्छेदास्त्रविदां वरः ॥ ४० ॥

भावार्थ

परंतु अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी अतिकायने अपने सुवर्णभूषित बाणोंसे वानरोंके चलाये हुए वृक्षों और पर्वत-शिखरोंको काट गिराया ॥ ४० ॥

तांश्चैव सर्वान् स हरीञ्शरैः सर्वायसैर्बली । विव्याधाभिमुखान् संख्ये भीमकायो निशाचरः ॥४१॥

भावार्थ

साथ ही उस बलवान् और भीमकाय निशाचरने युद्धस्थलमें सामने आये हुए उन समस्त वानरोंको लोहेके बाणोंसे बींध डाला ॥ ४१ ॥

तेऽर्दिता बाणवर्षेण भिन्नगात्राः पराजिताः । न शेकुरतिकायस्य प्रतिकर्तुं महाहवे ॥ ४२ ॥

भावार्थ

उसकी बाणवर्षासे आहत हो सबके शरीर क्षत-विक्षत हो गये । सबने हार मान ली और कोई भी उस महासमरमें अतिकायका सामना करनेमें समर्थ न हो सके ॥ ४२ ॥

तत् सैन्यं हरिवीराणां त्रासयामास राक्षसः । मृगयूथमिव क्रुद्धो हरिर्यौवनदर्पितः ॥ ४३ ॥

भावार्थ

जैसे जवानीके जोशसे भरा हुआ कुपित सिंह मृगोंके झुंडको भयभीत कर देता है, उसी प्रकार वह राक्षस वानरवीरोंकी उस सेनाको त्रास देने लगा ॥ ४३ ॥

स राक्षसेन्द्रो हरियूथमध्ये नायुध्यमानं निजघान कंचित् । उत्पत्य रामं स धनुःकलापी सगर्वितं वाक्यमिदं बभाषे ॥ ४४ ॥

भावार्थ

वानरोंके झुंडमें विचरते हुए राक्षसराज अतिकायने किसी भी ऐसे योद्धाको नहीं मारा, जो उसके साथ युद्ध न कर रहा हो । धनुष और तरकस धारण किये वह निशाचर उछलकर श्रीरामके पास आ गया तथा बड़े गर्वसे इस प्रकार बोला—॥ ४४ ॥

रथे स्थितोऽहं शरचापपाणि- र्न प्राकृतं कंचन योधयामि । यस्यास्ति शक्तिर्व्यवसाययुक्तो ददातु मे शीघ्रमिहाद्य युद्धम् ॥ ४५ ॥

भावार्थ

‘मैं धनुष और बाण लेकर रथपर बैठा हूँ । किसी साधारण प्राणीसे युद्ध करनेका मेरा विचार नहीं है । जिसके अंदर शक्ति हो, साहस और उत्साह हो, वह शीघ्र यहाँ आकर मुझे युद्धका अवसर दे’ ॥ ४५ ॥

तत् तस्य वाक्यं ब्रुवतो निशम्य चुकोप सौमित्रिरमित्रहन्ता । अमृष्यमाणश्च समुत्पपात जग्राह चापं च ततः स्मयित्वा ॥ ४६ ॥

भावार्थ

उसके ये अहंकारपूर्ण वचन सुनकर शत्रुहन्ता सुमित्राकुमार लक्ष्मणको बड़ा क्रोध हुआ । उसकी बातोंको सहन न कर सकनेके कारण वे आगे बढ़ आये और किंचित् मुस्कराकर उन्होंने अपना धनुष उठाया ॥ ४६ ॥

क्रुद्धः सौमित्रिरुत्पत्य तूणादाक्षिप्य सायकम् । पुरस्तादतिकायस्य विचकर्ष महद्धनुः ॥ ४७ ॥

भावार्थ

कुपित हुए लक्ष्मण उछलकर आगे आये और तरकससे बाण खींचकर अतिकायके सामने आ अपने विशाल धनुषको खींचने लगे ॥ ४७ ॥

पूरयन् स महीं सर्वामाकाशं सागरं दिशः । ज्याशब्दो लक्ष्मणस्योग्रस्त्रासयन् रजनीचरान् ॥ ४८ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणके धनुषकी प्रत्यञ्चाका वह शब्द बड़ा भयंकर था । वह सारी पृथ्वी, आकाश, समुद्र तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें गूँज उठा और निशाचरोंको त्रास देने लगा ॥ ४८ ॥

सौमित्रेश्चापनिर्घोषं श्रुत्वा प्रतिभयं तदा । विसिस्मिये महातेजा राक्षसेन्द्रात्मजो बली ॥ ४९ ॥

भावार्थ

सुमित्राकुमारके धनुषकी वह भयानक टंकार सुनकर उस समय महातेजस्वी बलवान् राक्षसराजकुमार अतिकायको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ४९ ॥

तदातिकायः कुपितो दृष्ट्वा लक्ष्मणमुत्थितम् । आदाय निशितं बाणमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५० ॥

भावार्थ

लक्ष्मणको अपना सामना करनेके लिये उठा देख अतिकाय रोषसे भर गया और तीखा बाण हाथमें लेकर इस प्रकार बोला—॥ ५० ॥

बालस्त्वमसि सौमित्रे विक्रमेष्वविचक्षणः । गच्छ किं कालसंकाशां मां योधयितुमिच्छसि ॥ ५१ ॥

भावार्थ

‘सुमित्राकुमार ! तुम अभी बालक हो । पराक्रम करनेमें कुशल नहीं हो, अतः लौट जाओ । मैं तुम्हारे लिये कालके समान हूँ । मुझसे जूझनेकी इच्छा क्यों करते हो ? ॥ ५१ ॥

नहि मद्बाहुसृष्टानां बाणानां हिमवानपि । सोढुमुत्सहते वेगमन्तरिक्षमथो मही ॥ ५२ ॥

भावार्थ

‘मेरे हाथसे छूटे हुए बाणोंका वेग गिरिराज हिमालय भी नहीं सह सकता । पृथ्वी और आकाश भी उसे नहीं सहन कर सकते ॥ ५२ ॥

सुखप्रसुप्तं कालाग्निं विबोधयितुमिच्छसि । न्यस्य चापं निवर्तस्व प्राणान्न जहि मद्गतः ॥ ५३ ॥ अथवा त्वं प्रतिस्तब्धो न निवर्तितुमिच्छसि । तिष्ठ प्राणान् परित्यज्य गमिष्यसि यमक्षयम् ॥ ५४ ॥

भावार्थ

‘तुम सुखसे सोयी ( शान्त ) हुई प्रलयाग्निको क्यों जगाना ( प्रज्वलित करना ) चाहते हो ? धनुषको यहीं छोड़कर लौट जाओ । मुझसे भिड़कर अपने प्राणोंका परित्याग न करो ॥ ‘अथवा तुम बड़े अहंकारी हो, इसीलिये लौटना नहीं चाहते । अच्छा, खड़े रहो । अभी अपने प्राणोंसे हाथ धोकर यमलोककी यात्रा करोगे ॥ ५४ ॥

पश्य मे निशितान् बाणान् रिपुदर्पनिषूदनान् । ईश्वरायुधसंकाशांस्तप्तकाञ्चनभूषणान् ॥ ५५ ॥

भावार्थ

‘शत्रुओंका दर्प चूर्ण करनेवाले मेरे इन तीखे बाणोंको, जो तपे हुए सुवर्णसे भूषित हैं, देखो; ये भगवान् शंकरके त्रिशूलकी समानता करते हैं ॥ ५५ ॥

एष ते सर्पसंकाशो बाणः पास्यति शोणितम् । मृगराज इव क्रुद्धो नागराजस्य शोणितम् । इत्येवमुक्त्वा संक्रुद्धः शरं धनुषि संदधे ॥ ५६ ॥

भावार्थ

‘जैसे कुपित हुआ सिंह गजराजका खून पीता है, उसी प्रकार यह सर्पके समान भयंकर बाण तुम्हारे रक्तका पान करेगा।’ ऐसा कहकर अतिकायने अत्यन्त कुपित हो अपने धनुषपर बाणका संधान किया ॥ ५६ ॥

श्रुत्वातिकायस्य वचः सरोषं सगर्वितं संयति राजपुत्रः । स संचुकोपातिबलो मनस्वी उवाच वाक्यं च ततो महार्थम् ॥ ५७ ॥

भावार्थ

युद्धस्थलमें अतिकायके रोष और गर्वसे भरे हुए इस वचनको सुनकर अत्यन्त बलशाली एवं मनस्वी राजकुमार लक्ष्मणको बड़ा क्रोध हुआ । वे यह महान् अर्थसे युक्त वचन बोले—॥ ५७ ॥

न वाक्यमात्रेण भवान् प्रधानो न कत्थनात् सत्पुरुषा भवन्ति । मयि स्थिते धन्विनि बाणपाणौ निदर्शयस्वात्मबलं दुरात्मन् ॥ ५८ ॥

भावार्थ

‘दुरात्मन् ! केवल बातें बनानेसे तू बड़ा नहीं हो सकता । सिर्फ डींग हाँकनेसे कोई श्रेष्ठ पुरुष नहीं होते । मैं हाथमें धनुष और बाण लेकर तेरे सामने खड़ा हूँ । तू अपना सारा बल मुझे दिखा ॥ ५८ ॥

कर्मणा सूचयात्मानं न विकत्थितुमर्हसि । पौरुषेण तु यो युक्तः स तु शूर इति स्मृतः ॥ ५९ ॥

भावार्थ

‘पराक्रमके द्वारा अपनी वीरताका परिचय दे । झूठी शेखी बघारना तेरे लिये उचित नहीं है । शूर वही माना गया है, जिसमें पुरुषार्थ हो ॥ ५९ ॥

सर्वायुधसमायुक्तो धन्वी त्वं रथमास्थितः । शरैर्वा यदि वाप्यस्त्रैर्दर्शयस्व पराक्रमम् ॥ ६० ॥

भावार्थ

‘तेरे पास सब तरहके हथियार मौजूद हैं । तू धनुष लेकर रथपर बैठा हुआ है; अतः बाणों अथवा अन्य अस्त्र-शस्त्रोंके द्वारा पहले अपना पराक्रम दिखा ले ॥ ६० ॥

ततः शिरस्ते निशितैः पातयिष्याम्यहं शरैः । मारुतः कालसम्पक्वं वृन्तात् तालफलं यथा ॥ ६१ ॥

भावार्थ

‘उसके बाद मैं अपने तीखे बाणोंसे तेरा मस्तक उसी तरह काट गिराऊँगा, जैसे वायु कालक्रमसे पके हुए ताड़के फलको उसके वृन्त ( बौंडी ) से नीचे गिरा देती है ॥ ६१ ॥

अद्य ते मामका बाणास्तप्तकाञ्चनभूषणाः । पास्यन्ति रुधिरं गात्राद् बाणशल्यान्तरोत्थितम् ॥ ६२ ॥

भावार्थ

‘आज तपे हुए सुवर्णसे विभूषित मेरे बाण अपनी नोंक-द्वारा किये गये छिद्रसे निकले हुए तेरे शरीरके रक्तका पान करेंगे ॥ ६२ ॥

बालोऽयमिति विज्ञाय न चावज्ञातुमर्हसि । बालो वा यदि वा वृद्धो मृत्युं जानीहि संयुगे ॥ ६३ ॥

भावार्थ

‘तू मुझे बालक जानकर मेरी अवहेलना न कर । मैं बालक होऊँ अथवा वृद्ध, संग्राममें तो तू मुझे अपना काल ही समझ ले ॥ ६३ ॥

बालेन विष्णुना लोकास्त्रयः क्रान्तास्त्रिविक्रमैः । लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा हेतुमत् परमार्थवत् । अतिकायः प्रचुक्रोध बाणं चोत्तममाददे ॥ ६४ ॥

भावार्थ

‘वामनरूपधारी भगवान् विष्णु देखनेमें बालक ही थे; किंतु अपने तीन ही पगोंसे उन्होंने समूची त्रिलोकी नाप ली थी ।’ लक्ष्मणकी वह परम सत्य और युक्तियुक्त बात सुनकर अतिकायके क्रोधकी सीमा न रही। उसने एक उत्तम बाण अपने हाथमें ले लिया ॥ ६४ ॥

ततो विद्याधरा भूता देवा दैत्या महर्षयः । गुह्यकाश्च महात्मानस्तद् युद्धं द्रष्टुमागमन् ॥ ६५ ॥

भावार्थ

तदनन्तर विद्याधर, भूत, देवता, दैत्य, महर्षि तथा महामना गुह्यकगण उस युद्धको देखनेके लिये आये ॥ ६५ ॥

ततोऽतिकायः कुपितश्चापमारोप्य सायकम् । लक्ष्मणाय प्रचिक्षेप संक्षिपन्निव चाम्बरम् ॥ ६६ ॥

भावार्थ

उस समय अतिकायने कुपित हो धनुषपर वह उत्तम बाण चढ़ाया और आकाशको अपना ग्राम बनाते हुए-से उसे लक्ष्मणपर चला दिया ॥ ६६ ॥

तमापतन्तं निशितं शरमाशीविषोपमम् । अर्धचन्द्रेण चिच्छेद लक्ष्मणः परवीरहा ॥ ६७ ॥

भावार्थ

किंतु शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने एक अर्धचन्द्राकार बाणके द्वारा अपनी ओर आते हुए उस विषधर सर्पके तुल्य भयंकर एवं तीखे बाणको काट डाला ॥ ६७ ॥

तं निकृत्तं शरं दृष्ट्वा कृत्तभोगमिवोरगम् । अतिकायो भृशं क्रुद्धः पञ्च बाणान् समादधे ॥ ६८ ॥

भावार्थ

जैसे सर्पका फन कट जाय, उसी प्रकार उस बाणको खण्डित हुआ देख अत्यन्त कुपित हुए अतिकायने पाँच बाणोंको धनुषपर रक्खा ॥ ६८ ॥

ताञ्शरान् सम्प्रचिक्षेप लक्ष्मणाय निशाचरः । तानप्राप्ताञ्शितैर्बाणैश्चिच्छेद भरतानुजः ॥ ६९ ॥

भावार्थ

फिर उस निशाचरने लक्ष्मणपर ही वे पाँचों बाण चला दिये । वे बाण उनके समीप अभी आने भी नहीं पाये थे कि लक्ष्मणने तीखे सायकोंसे उनके टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥६९॥

स ताञ्छित्त्वा शितैर्बाणैर्लक्ष्मणः परवीरहा । आददे निशितं बाणं ज्वलन्तमिव तेजसा ॥ ७० ॥

भावार्थ

शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने अपने पैने सायकोंसे उन बाणोंका खण्डन करनेके पश्चात् एक तेज बाण हाथमें लिया, जो अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था ॥७०॥

तमादाय धनुःश्रेष्ठे योजयामास लक्ष्मणः । विचकर्ष च वेगेन विससर्ज च सायकम् ॥ ७१ ॥

भावार्थ

उसे लेकर लक्ष्मणने अपने श्रेष्ठ धनुषपर रक्खा, उसकी प्रत्यञ्चाको खींचा और बड़े वेगसे वह सायक अतिकायपर छोड़ दिया ॥ ७१ ॥

पूर्णायतविसृष्टेन शरेण नतपर्वणा । ललाटे राक्षसश्रेष्ठमाजघान स वीर्यवान् ॥ ७२ ॥

भावार्थ

धनुषको पूर्णरूपसे खींचकर छोड़े गये तथा झुकी हुई गाँठवाले उस बाणके द्वारा पराक्रमी लक्ष्मणने राक्षसश्रेष्ठ अतिकायके ललाटमें गहरा आघात किया ॥ ७२ ॥

स ललाटे शरो मग्नस्तस्य भीमस्य रक्षसः । ददृशे शोणितेनाक्तः पन्नगेन्द्र इवाचले ॥ ७३ ॥

भावार्थ

वह बाण उस भयानक राक्षसके ललाटमें धँस गया और रक्तसे भींगकर पर्वतसे सटे हुए किसी नागराजके समान दिखायी देने लगा ॥ ७३ ॥

राक्षसः प्रचकम्पेऽथ लक्ष्मणेषुप्रपीडितः । रुद्रबाणहतं घोरं यथा त्रिपुरगोपुरम् ॥ ७४ ॥ चिन्तयामास चाश्वस्य विमृश्य च महाबलः ।

भावार्थ

लक्ष्मणके बाणसे अत्यन्त पीड़ित हो वह राक्षस काँप उठा । ठीक उसी तरह, जैसे भगवान् रुद्रके बाणोंसे आहत हो त्रिपुरका भयंकर गोपुर हिल उठा था । फिर थोड़ी ही देरमें सँभलकर महाबली अतिकाय बड़ी चिन्तामें पड़ गया और कुछ सोच-विचारकर बोला—॥ ७४½ ॥

साधु बाणनिपातेन श्लाघनीयोऽसि मे रिपुः ॥ ७५ ॥ विधायैवं विदार्यास्यं विनम्य च महाभुजौ । स रथोपस्थमास्थाय रथेन प्रचचार ह ॥ ७६ ॥

भावार्थ

‘शाबाश ! इस प्रकार अमोघ बाणका प्रयोग करनेके कारण तुम मेरे स्पृहणीय शत्रु हो ।’ मुँह फैलाकर ऐसा कहनेके पश्चात् अतिकाय अपनी दोनों विशाल भुजाओंको काबूमें करके रथके पिछले भागमें बैठकर उस रथके द्वारा ही आगे बढ़ा ॥ ७५-७६ ॥

एवं त्रीन् पञ्च सप्तेति सायकान् राक्षसर्षभः । आददे संदधे चापि विचकर्षोत्ससर्ज च ॥ ७७ ॥

भावार्थ

उस राक्षसशिरोमणि वीरने क्रमशः एक, तीन, पाँच और सात सायकोंको लेकर उन्हें धनुषपर चढ़ाया और वेगपूर्वक खींचकर चला दिया ॥ ७७ ॥

ते बाणाः कालसंकाशा राक्षसेन्द्रधनुश्च्युताः । हेमपुङ्खा रविप्रख्याश्चकुर्दीप्तमिवाम्बरम् ॥ ७८ ॥

भावार्थ

उस राक्षसराजके धनुषसे छूटे हुए उन सुवर्णभूषित, सूर्यतुल्य तेजस्वी तथा कालके समान भयंकर बाणोंने आकाशको प्रकाशसे पूर्ण-सा कर दिया ॥ ७८ ॥

ततस्तान् राक्षसोत्सृष्टान्शरौघान् राघवानुजः । असम्भ्रान्तः प्रचिच्छेद निशितैर्बहुभिः शरैः ॥ ७९ ॥

भावार्थ

परंतु रघुनाथजीके छोटे भाई लक्ष्मणने बिना किसी घबराहटके उस निशाचरद्वारा चलाये हुए उन बाणसमूहोंको तेज धारवाले बहुसंख्यक सायकोंद्वारा काट गिराया ॥ ७९ ॥

ताञ्छरान् युधि सम्प्रेक्ष्य निकृत्तान् रावणात्मजः । चुकोप त्रिदशेन्द्रारिर्जग्राह निशितं शरम् ॥ ८० ॥ स संधाय महातेजास्तं बाणं सहसोत्सृजत् । तेन सौमित्रिमायान्तमाजघान स्तनान्तरे ॥ ८१ ॥

भावार्थ

उन बाणोंको कटा हुआ देख इन्द्रद्रोही रावणकुमारको बड़ा क्रोध हुआ और उसने एक तीखा बाण हाथमें लिया ॥ उसे धनुषपर रखकर उस महातेजस्वी वीरने सहसा छोड़ दिया और उसके द्वारा सामने आते हुए सुमित्राकुमारकी छातीमें आघात किया ॥ ८१ ॥

अतिकायेन सौमित्रिस्ताडितो युधि वक्षसि । सुस्राव रुधिरं तीव्रं मदं मत्त इव द्विपः ॥ ८२ ॥

भावार्थ

अतिकायके उस बाणकी चोट खाकर सुमित्राकुमार युद्धस्थलमें अपने वक्षःस्थलसे तीव्रगतिसे रक्त बहाने लगे, मानो कोई मतवाला हाथी मस्तकसे मदकी वर्षा कर रहा हो ॥ ८२ ॥

स चकार तदात्मानं विशल्यं सहसा विभुः । जग्राह च शरं तीक्ष्णमस्त्रेणापि समादधे ॥ ८३ ॥

भावार्थ

फिर सामर्थ्यशाली लक्ष्मणने सहसा अपनी छातीसे उस बाणको निकाल दिया और एक तीखा सायक हाथमें लेकर उसे दिव्यास्त्रसे संयोजित किया ॥ ८३ ॥

आग्नेयेन तदास्त्रेण योजयामास सायकम् । स जज्वाल तदा बाणो धनुष्यस्य महात्मनः ॥ ८४ ॥ अतिकायोऽतितेजस्वी रौद्रमस्त्रं समाददे । तेन बाणं भुजङ्गाभं हेमपुङ्खमयोजयत् ॥ ८५ ॥

भावार्थ

उस समय अपने उस सायकको उन्होंने आग्नेयास्त्रसे अभिमन्त्रित किया । अभिमन्त्रित होते ही महात्मा लक्ष्मणके धनुषपर रक्खा हुआ वह बाण तत्काल प्रज्वलित हो उठा ॥ उधर अत्यन्त तेजस्वी अतिकायने भी एक सुवर्णमय पंखवाला विषधर सर्पके समान भयंकर बाण हाथमें लिया और उसे धनुषपर रक्खा ॥ ८५ ॥

तदस्त्रं ज्वलितं घोरं लक्ष्मणः शरमाहितम् । अतिकायाय चिक्षेप कालदण्डमिवान्तकः ॥ ८६ ॥

भावार्थ

इतनेहीमें लक्ष्मणने दिव्यास्त्रकी शक्तिसे सम्पन्न उस प्रज्वलित एवं भयंकर बाणको अतिकायके ऊपर चलाया, मानो यमराजने अपने कालदण्डका प्रयोग किया हो ॥ ८६ ॥

आग्नेयास्त्राभिसंयुक्तं दृष्ट्वा बाणं निशाचरः । उत्ससर्ज तदा बाणं रौद्रं सूर्यास्त्रयोजितम् ॥ ८७ ॥

भावार्थ

आग्नेयास्त्रसे अभिमन्त्रित हुए उस बाणको अपनी ओर आते देख निशाचर अतिकायने तत्काल ही अपने भयंकर बाणको सूर्यास्त्रसे अभिमन्त्रित करके चलाया ॥ ८७ ॥

तावुभावम्बरे बाणावन्योन्यमभिजघ्नतुः । तेजसा सम्प्रदीप्ताग्रौ क्रुद्धाविव भुजङ्गमौ ॥ ८८ ॥ तावन्योन्यं विनिर्दह्य पेततुः पृथिवीतले ॥ ८९ ॥

भावार्थ

उन दोनों सायकोंके अग्रभाग तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे । आकाशमें पहुँचकर वे दोनों कुपित हुए दो सर्पोंकी भाँति आपसमें टकरा गये और एक दूसरेको दग्ध करके पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ८८-८९ ॥

निरर्चिषौ भस्मकृतौ न भ्राजेते शरोत्तमौ । तावुभौ दीप्यमानौ स्म न भ्राजेते महीतले ॥ ९० ॥

भावार्थ

वे दोनों ही बाण उत्तम कोटिके थे और अपनी दीप्तिसे प्रकाशित हो रहे थे, तथापि एक-दूसरेके तेजसे भस्म होकर अपना-अपना तेज खो बैठे । इसलिये भूतलपर निष्प्रभ होनेके कारण उनकी शोभा नहीं हो रही थी ॥ ९० ॥

ततोऽतिकायः संक्रुद्धस्त्वाष्ट्रमैषीकमुत्सृजत् । ततश्चिच्छेद सौमित्रिरस्त्रमैन्द्रेण वीर्यवान् ॥ ९१ ॥

भावार्थ

तदनन्तर अतिकायने अत्यन्त कुपित हो त्वष्टा देवताके मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके एक सींकका बाण छोड़ा; परंतु पराक्रमी लक्ष्मणने उस अस्त्रको ऐन्द्रास्त्रसे काट दिया ॥ ९१ ॥

ऐषीकं निहतं दृष्ट्वा कुमारो रावणात्मजः । याम्येनास्त्रेण संक्रुद्धो योजयामास सायकम् ॥ ९२ ॥ ततस्तदस्त्रं चिक्षेप लक्ष्मणाय निशाचरः । वायव्येन तदस्त्रेण निजघान स लक्ष्मणः ॥ ९३ ॥

भावार्थ

सींकके बाणको नष्ट हुआ देख रावणपुत्र कुमार अतिकायके क्रोधकी सीमा न रही । उस राक्षसने एक सायकको याम्यास्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उसे लक्ष्मणको लक्ष्य करके चला दिया; परंतु लक्ष्मणने वायव्यास्त्रद्वारा उसको भी नष्ट कर दिया ॥ ९२-९३ ॥

अथैनं शरधाराभिर्धाराभिरिव तोयदः । अभ्यवर्षत संक्रुद्धो लक्ष्मणो रावणात्मजम् ॥ ९४ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् जैसे मेघ जलकी धारा बरसाता है, उसी प्रकार अत्यन्त कुपित हुए लक्ष्मणने रावणकुमार अतिकायपर बाण-धाराकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ९४ ॥

तेऽतिकायं समासाद्य कवचे वज्रभूषिते । भग्नाग्रशल्याः सहसा पेतुर्बाणा महीतले ॥ ९५ ॥

भावार्थ

अतिकायने एक दिव्य कवच बाँध रक्खा था, जिसमें हीरे जड़े हुए थे । लक्ष्मणके बाण अतिकायतक पहुँचकर उसके कवचसे टकराते और नोक टूट जानेके कारण सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ते थे ॥ ९५ ॥

तान्मोघानभिसम्प्रेक्ष्य लक्ष्मणः परवीरहा । अभ्यवर्षत बाणानां सहस्रेण महायशाः ॥ ९६ ॥ स वृष्यमाणो बाणौघैरतिकायो महाबलः । अवध्यकवचः संख्ये राक्षसो नैव विव्यथे ॥ ९७ ॥

भावार्थ

उन बाणोंको असफल हुआ देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महायशस्वी लक्ष्मणने पुनः सहस्रों बाणोंकी वर्षा की॥ महाबली अतिकायका कवच अभेद्य था, इसलिये युद्धस्थलमें बाण-समूहोंकी वर्षा होनेपर भी वह राक्षस व्यथित नहीं होता था ॥ ९७ ॥

शरं चाशीविषाकारं लक्ष्मणाय व्यपासृजत् । स तेन विद्धः सौमित्रिर्मर्मदेशे शरेण ह ॥ ९८ ॥

भावार्थ

उसने लक्ष्मणपर विषधर सर्पके समान भयंकर बाण चलाया । उस बाणसे सुमित्राकुमारके मर्मस्थलमें चोट पहुँची ॥ ९८ ॥

मुहूर्तमात्रं निःसंज्ञो ह्यभवच्छत्रुतापनः । ततः संज्ञामुपालभ्य चतुर्भिः सायकोत्तमैः ॥ ९९ ॥ निजघान हयान् संख्ये सारथिं च महाबलः । ध्वजस्योन्मथनं कृत्वा शरवर्षैररिंदमः ॥ १०० ॥

भावार्थ

अतः शत्रुओंको संताप देनेवाले लक्ष्मण दो घड़ीतक अचेत-अवस्थामें पड़े रहे । फिर होशमें आनेपर उन महाबली शत्रुदमन वीरने बाणोंकी वर्षासे शत्रुके रथकी ध्वजाको नष्ट कर दिया और चार उत्तम सायकोंसे रणभूमिमें उसके घोड़ों तथा सारथिको भी यमलोक पहुँचा दिया ॥ ९९-१०० ॥

असम्भ्रान्तः स सौमित्रिस्ताञ्शरानभिलक्षितान् । मुमोच लक्ष्मणो बाणान् वधार्थं तस्य रक्षसः ॥ १०१ ॥ न शशाक रुजं कर्तुं युधि तस्य नरोत्तमः । अथैनमभ्युपागम्य वायुर्वाक्यमुवाच ह ॥ १०२ ॥ ब्रह्मदत्तवरो ह्येष अवध्यकवचावृतः । ब्राह्मेणास्त्रेण भिन्द्येनमेष वध्यो हि नान्यथा । अवध्य एष ह्यन्येषामस्त्राणां कवची बली ॥ १०३ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् सम्भ्रमरहित नरश्रेष्ठ सुमित्राकुमार लक्ष्मणने उस राक्षसके वधके लिये जाँचे-बूझे हुए बहुत-से अमोघ बाण छोड़े, तथापि वे समराङ्गणमें उस निशाचरके शरीरको वेध न सके ॥ तदनन्तर वायुदेवताने उनके पास आकर कहा— ‘सुमित्रानन्दन ! इस राक्षसको ब्रह्माजीसे वरदान प्राप्त हुआ है । यह अभेद्य कवचसे ढका हुआ है । अतः इसको ब्रह्मास्त्रसे विदीर्ण कर डालो; अन्यथा यह नहीं मारा जा सकेगा । यह कवचधारी बलवान् निशाचर अन्य अस्त्रोंके लिये अवध्य है’॥ १०२-१०३ ॥

ततस्तु वायोर्वचनं निशम्य सौमित्रिरिन्द्रप्रतिमानवीर्यः । समादधे बाणमथोग्रवेगं तद्ब्राह्ममस्त्रं सहसा नियुज्य ॥ १०४ ॥

भावार्थ

लक्ष्मण इन्द्रके समान पराक्रमी थे । उन्होंने वायुदेवताका उपर्युक्त वचन सुनकर एक भयंकर वेगवाले बाणको सहसा ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित करके धनुषपर रक्खा ॥ १०४ ॥

तस्मिन् वरास्त्रे तु नियुज्यमाने सौमित्रिणा बाणवरे शिताग्रे । दिशश्च चन्द्रार्कमहाग्रहाश्च नभश्च तत्रास ररास चोर्वी ॥ १०५ ॥

भावार्थ

सुमित्राकुमार लक्ष्मणके द्वारा तेज धारवाले उस श्रेष्ठ बाणमें ब्रह्मास्त्रकी संयोजना की जानेपर उस समय सम्पूर्ण दिशाएँ, चन्द्रमा और सूर्य आदि बड़े-बड़े ग्रह तथा अन्तरिक्ष-लोकके प्राणी थर्रा उठे और भूमण्डलमें महान् कोलाहल मच गया ॥ १०५ ॥

तं ब्रह्मणोऽस्त्रेण नियुज्य चापे शरं सपुङ्खं यमदूतकल्पम् । सौमित्रिरिन्द्रारिसुतस्य तस्य ससर्ज बाणं युधि वज्रकल्पम् ॥ १०६ ॥

भावार्थ

सुमित्राकुमारने धनुषपर रक्खे हुए उस सुन्दर पंखवाले बाणको जब ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित किया, तब वह यमदूतके समान भयंकर और वज्रके समान अमोघ हो गया । उन्होंने युद्धस्थलमें उस बाणको इन्द्रद्रोही रावणके बेटे अतिकायको लक्ष्य करके चला दिया ॥ १०६ ॥

तं लक्ष्मणोत्सृष्टविवृद्धवेगं समापतन्तं श्वसनोग्रवेगम् । सुपर्णवज्रोत्तमचित्रपुङ्खं तदातिकायः समरे ददर्श ॥ १०७ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणके चलाये हुए उस बाणका वेग बहुत बढ़ा हुआ था । उसके पंख गरुड़के समान थे और उनमें हीरे जड़े हुए थे; इसलिये उनकी विचित्र शोभा होती थी । अतिकायने समराङ्गणमें उस बाणको उस समय वायुके समान भयंकर वेगसे अपनी ओर आते देखा ॥ १०७ ॥

तं प्रेक्षमाणः सहसातिकायो जघान बाणैर्निशितैरनेकैः । स सायकस्तस्य सुपर्णवेग- स्तथातिवेगेन जगाम पार्श्वम् ॥ १०८ ॥

भावार्थ

उसे देखकर अतिकायने सहसा उसके ऊपर बहुत-से पैने बाण चलाये तो भी वह गरुड़के समान वेगशाली सायक बड़े वेगसे उसके पास जा पहुँचा ॥ १०८ ॥

तमागतं प्रेक्ष्य तदातिकायो बाणं प्रदीप्तान्तककालकल्पम् । जघान शक्त्यृष्टिगदाकुठारैः शूलैः शरैश्चाप्यविपन्नचेष्टः ॥१०९॥

भावार्थ

प्रलयङ्कर कालके समान प्रज्वलित हुए उस बाणको अत्यन्त निकट आया देखकर भी अतिकायकी युद्धविषयक चेष्टा नष्ट नहीं हुई । उसने शक्ति, ऋष्टि, गदा, कुठार, शूल तथा बाणोंद्वारा उसे नष्ट करनेका प्रयत्न किया ॥ १०९ ॥

तान्यायुधान्यद्भुतविग्रहाणि मोघानि कृत्वा स शरोऽग्निदीप्तः । प्रगृह्य तस्यैव किरीटजुष्टं तदातिकायस्य शिरो जहार ॥११०॥

भावार्थ

परंतु अग्निके समान प्रज्वलित हुए उस बाणने उन अद्भुत अस्त्रोंको व्यर्थ करके अतिकायके मुकुटमण्डित मस्तकको धड़से अलग कर दिया ॥ ११० ॥

तच्छिरः सशिरस्त्राणं लक्ष्मणेषुप्रमर्दितम् । पपात सहसा भूमौ शृङ्गं हिमवतो यथा ॥१११॥

भावार्थ

लक्ष्मणके बाणसे कटा हुआ राक्षसका वह शिरस्त्राणसहित मस्तक हिमालयके शिखरकी भाँति सहसा पृथ्वीपर जा पड़ा ॥ १११ ॥

तं भूमौ पतितं दृष्ट्वा विक्षिप्ताम्बरभूषणम् । बभूवुर्व्यथिताः सर्वे हतशेषा निशाचराः ॥११२॥

भावार्थ

उसके वस्त्र और आभूषण सब ओर बिखर गये । उसे धरतीपर पड़ा देख मरनेसे बचे हुए समस्त निशाचर व्यथित हो उठे ॥ ११२ ॥

ते विषण्णमुखा दीनाः प्रहारजनितश्रमाः । विनेदुरुच्चैर्बहवः सहसा विस्वरैः स्वरैः ॥११३॥

भावार्थ

उनके मुखपर विषाद छा गया । उनपर जो मार पड़ी थी, उससे थक जानेके कारण वे और भी दुखी हो गये थे । अतः वे बहुसंख्यक राक्षस सहसा विकृत स्वरमें जोर-जोरसे रोने-चिल्लाने लगे ॥ ११३ ॥

ततस्तत्परितं याता निरपेक्षा निशाचराः । पुरीमभिमुखा भीता द्रवन्तो नायके हते ॥११४॥

भावार्थ

सेनानायकके मारे जानेपर निशाचरोंका युद्धविषयक उत्साह नष्ट हो गया, अतः वे भयभीत हो तुरंत ही लङ्कापुरीकी ओर भाग चले ॥ ११४ ॥

प्रहर्षयुक्ता बहवस्तु वानराः प्रफुल्लपद्मप्रतिमाननास्तदा । अपूजयँल्लक्ष्मणमिष्टभागिनं हते रिपौ भीमबले दुरासदे ॥११५॥

भावार्थ

इधर उस भयंकर बलशाली दुर्जय शत्रुके मारे जानेपर बहुसंख्यक वानर हर्ष और उत्साहसे भर गये । उनके मुख प्रफुल्ल कमलोंके समान खिल उठे और वे अभीष्ट विजयके भागी वीरवर लक्ष्मणकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥११५॥

अतिबलमतिकायमभ्रकल्पं युधि विनिपात्य स लक्ष्मणः प्रहृष्टः। त्वरितमथ तदा स रामपार्श्वं कपिनिवहैश्च सुपूजितो जगाम ॥११६॥

भावार्थ

युद्धस्थलमें अत्यन्त बलशाली और मेघके समान विशाल अतिकायको धराशायी करके लक्ष्मण बड़े प्रसन्न हुए । वे उस समय वानर-समूहोंसे सम्मानित हो तुरंत ही श्रीरामचन्द्रजीके पास गये ॥ ११६ ॥

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