युद्धकाण्ड, सर्ग 69
एवं विलपमानस्य रावणस्य दुरात्मनः । श्रुत्वा शोकाभिभूतस्य त्रिशिरा वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
दुरात्मा रावण जब शोकसे पीड़ित हो इस प्रकार विलाप करने लगा, तब त्रिशिराने कहा—॥ १ ॥
एवमेव महावीर्यो हतो नस्तातमध्यमः । न तु सत्पुरुषा राजन् विलपन्ति यथा भवान् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! इसमें संदेह नहीं कि हमारे मझले चाचा, जो इस समय युद्धमें मारे गये हैं, ऐसे ही महान् पराक्रमी थे; परंतु आप जिस प्रकार रोते-कलपते हैं, उस तरह श्रेष्ठ पुरुष किसीके लिये विलाप नहीं करते हैं ॥ २ ॥
नूनं त्रिभुवनस्यापि पर्याप्तस्त्वमसि प्रभो । स कस्मात् प्राकृत इव शोचस्यात्मानमीदृशम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! निश्चय आप अकेले ही तीनों लोकोंसे भी लोहा लेनेमें समर्थ हैं; फिर इस तरह साधारण पुरुषकी भाँति क्यों अपने-आपको शोकमें डाल रहे हैं ? ॥ ३ ॥
ब्रह्मदत्तास्ति ते शक्तिः कवचं सायको धनुः । सहस्रखरसंयुक्तो रथो मेघसमस्वनः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘आपके पास ब्रह्माजीकी दी हुई शक्ति, कवच, धनुष तथा बाण हैं; साथ ही मेघ-गर्जनाके समान शब्द करनेवाला रथ भी है, जिसमें एक हजार गदहे जोते जाते हैं ॥ ४ ॥
त्वयासकृद्धि शस्त्रेण विशस्ता देवदानवाः । स सर्वायुधसम्पन्नो राघवं शास्तुमर्हसि ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘आपने एक ही शस्त्रसे देवताओं और दानवोंको अनेक बार पछाड़ा है, अतः सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित होनेपर आप रामको भी दण्ड दे सकते हैं ॥ ५ ॥
कामं तिष्ठ महाराज निर्गमिष्याम्यहं रणे । उद्धरिष्यामि ते शत्रून् गरुडः पन्नगानिव ॥ ६ ॥ शम्बरो देवराजेन नरको विष्णुना यथा । तथाद्य शयिता रामो मया युधि निपातितः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘अथवा महाराज ! आपकी इच्छा हो तो यहीं रहें । मैं स्वयं युद्धके लिये जाऊँगा और जैसे गरुड़ सर्पोका संहार करते हैं, उसी तरह मैं आपके शत्रुओंको जड़से उखाड़ फेंकूँगा ॥ ‘जैसे इन्द्रने शम्बरासुरको और भगवान् विष्णुने नरका-सुरको मार गिराया था, उसी प्रकार युद्धस्थलमें आज मेरे द्वारा मारे जाकर राम सदाके लिये सो जायँगे’ ॥ ७ ॥
श्रुत्वा त्रिशिरसो वाक्यं रावणो राक्षसाधिपः । पुनर्जातमिवात्मानं मन्यते कालचोदितः ॥ ८ ॥
भावार्थ
त्रिशिराकी यह बात सुनकर राक्षसराज रावणको इतना संतोष हुआ कि वह अपना नया जन्म हुआ-सा मानने लगा । कालसे प्रेरित होकर ही उसकी ऐसी बुद्धि हो गयी ॥ ८ ॥
श्रुत्वा त्रिशिरसो वाक्यं देवान्तकनरान्तकौ । अतिकायश्च तेजस्वी बभूवुर्युद्धहर्षिताः ॥ ९ ॥
भावार्थ
त्रिशिराका उपर्युक्त कथन सुनकर देवान्तक, नरान्तक और तेजस्वी अतिकाय—ये तीनों युद्धके लिये उत्साहित हो गये ॥ ९ ॥
ततोऽहमहमित्येवं गर्जन्तो नैर्ऋतर्षभाः । रावणस्य सुता वीराः शक्रतुल्यपराक्रमाः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘मैं युद्धके लिये जाऊँगा, मैं जाऊँगा’ ऐसा कहते और गर्जते हुए वे तीनों श्रेष्ठ निशाचर युद्धके लिये तैयार हो गये। रावणके वे वीर पुत्र इन्द्रके समान पराक्रमी थे ॥ १० ॥
अन्तरिक्षगताः सर्वे सर्वे मायाविशारदाः । सर्वे त्रिदशदर्पघ्नाः सर्वे समरदुर्मदाः ॥ ११ ॥
भावार्थ
वे सब-के-सब आकाशमें विचरण करनेवाले,मायाविशारद, रणदुर्मद तथा देवताओंका भी दर्प दलन करनेवाले थे ॥ ११ ॥
सर्वे सुबलसम्पन्नाः सर्वे विस्तीर्णकीर्तयः । सर्वे समरमासाद्य न श्रूयन्ते स निर्जिताः ॥ १२ ॥ देवैरपि सगन्धर्वैः सकिंनरमहोरगैः । सर्वेऽस्त्रविदुषो वीराः सर्वे युद्धविशारदाः । सर्वे प्रवरविज्ञानाः सर्वे लब्धवरास्तथा ॥ १३ ॥
भावार्थ
वे सभी उत्तम बलसे सम्पन्न थे। उन सबकी कीर्ति तीनों लोकोंमें फैली हुई थी और समरभूमिमें आनेपर गन्धर्वों, किन्नरों तथा बड़े-बड़े नागोंसहित देवताओंसे भी कभी उन सबकी पराजय नहीं सुनी गयी थी। वे सभी अस्त्रवेत्ता, सभी वीर और सभी युद्धकी कलामें निपुण थे। उन सबको शस्त्रों और शास्त्रोंका उत्तम ज्ञान प्राप्त था और सबने तपस्याके द्वारा वरदान प्राप्त किया था ॥ १२-१३ ॥
स तैस्तथा भास्करतुल्यवर्चसैः सुतैर्वृतः शत्रुबलश्रियार्दनैः । रराज राजा मघवान् यथामरै- र्वृतो महादानवदर्पनाशनैः ॥ १४ ॥
भावार्थ
सूर्यके समान तेजस्वी तथा शत्रुओंकी सेना और सम्पत्तिको रौंद डालनेवाले उन पुत्रोंसे घिरा हुआ राक्षसोंका राजा रावण बड़े-बड़े दानवोंका दर्प चूर्ण करनेवाले देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति शोभा पा रहा था ॥ १४ ॥
स पुत्रान् सम्परिष्वज्य भूषयित्वा च भूषणैः । आशीर्भिश्च प्रशस्ताभिः प्रेषयामास वै रणे ॥ १५ ॥
भावार्थ
उसने अपने पुत्रोंको हृदयसे लगाकर नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित किया और उत्तम आशीर्वाद देकर रणभूमिमें भेजा ॥ १५ ॥
युद्धोन्मत्तं च मत्तं च भ्रातरौ चापि रावणः । रक्षणार्थं कुमाराणां प्रेषयामास संयुगे ॥ १६ ॥
भावार्थ
रावणने अपने दोनों भाई युद्धोन्मत्त ( महापार्श्व ) और मत्त ( महोदर ) को भी युद्धमें कुमारोंकी रक्षाके लिये भेजा ॥ १६ ॥
तेऽभिवाद्य महात्मानं रावणं लोकरावणम् । कृत्वा प्रदक्षिणं चैव महाकायाः प्रतस्थिरे ॥ १७ ॥
भावार्थ
वे सभी महाकाय राक्षस समस्त लोकोंको रुलानेवाले महामना रावणको प्रणाम और उसकी परिक्रमा करके युद्धके लिये प्रस्थित हुए ॥ १७ ॥
सर्वौषधीभिर्गन्धैश्च समालभ्य महाबलाः । निर्जग्मुनैर्ॠतश्रेष्ठाः पडेते युद्धकाङ्क्षिणः ॥ १८ ॥ त्रिशिराश्चातिकायश्च देवान्तकनरान्तकौ । महोदरमहापार्श्वौ निर्जग्मुः कालचोदिताः ॥ १९ ॥
भावार्थ
सब प्रकारकी ओषधियों तथा गन्धोंका स्पर्श करके युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले त्रिशिरा, अतिकाय, देवान्तक, नरान्तक, महोदर और महापार्श्व—ये छः महाबली श्रेष्ठ निशाचर कालसे प्रेरित हो युद्धके लिये पुरीसे बाहर निकले ॥ १८-१९ ॥
ततः सुदर्शनं नागं नीलजीमूतसंनिभम् । ऐरावतकुले जातमारुरोह महोदरः ॥ २० ॥ सर्वायुधसमायुक्तस्तूणीभिश्चाप्यलंकृतः । रराज गजमास्थाय सवितेवास्तमूर्धनि ॥ २१ ॥
भावार्थ
उस समय महोदर ऐरावतके कुलमें उत्पन्न हुए काले मेघके समान रंगवाले ‘सुदर्शन’ नामक हाथीपर सवार हुआ ॥ समस्त आयुधोंसे सम्पन्न और तूणीरोंसे अलंकृत महोदर उस हाथीकी पीठपर बैठकर अस्ताचलके शिखरपर विराजमान सूर्यदेवके समान शोभा पा रहा था ॥ २१ ॥
हयोत्तमसमायुक्तं सर्वायुधसमाकुलम् । आरुरोह रथश्रेष्ठं त्रिशिरा रावणात्मजः ॥ २२ ॥
भावार्थ
रावणकुमार त्रिशिरा एक उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ, जिसमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र रक्खे गये थे और उत्तम घोड़े जुते हुए थे ॥ २२ ॥
त्रिशिरा रथमास्थाय विरराज धनुर्धरः । सविद्युदुल्कः सज्वालः सेन्द्रचाप इवाम्बुदः ॥ २३ ॥
भावार्थ
उस रथमें बैठकर धनुष धारण किये त्रिशिरा विद्युत्, उल्का, ज्वाला और इन्द्रधनुषसे युक्त मेघके समान शोभा पाने लगा ॥ २३ ॥
त्रिभिः किरीटैस्त्रिशिराः शुशुभे स रथोत्तमे । हिमवानिव शैलेन्द्रस्त्रिभिः काञ्चनपर्वतैः ॥ २४ ॥
भावार्थ
उस उत्तम रथमें सवार हो तीन किरीटोंसे युक्त त्रिशिरा तीन सुवर्णमय शिखरोंसे युक्त गिरिराज हिमालयके समान शोभा पा रहा था ॥ २४ ॥
अतिकायोऽतितेजस्वी राक्षसेन्द्रसुतस्तदा । आरुरोह रथश्रेष्ठं श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
राक्षसराज रावणका अत्यन्त तेजस्वी पुत्र अतिकाय समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ था। वह भी उस समय एक उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ ॥ २५ ॥
सुचक्राक्षं सुसंयुक्तं स्वनुकर्षं सुकूबरम् । तूणीबाणासनैर्दीप्तं प्रासासिपरिघाकुलम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
उस रथके पहिये और धुरे बहुत सुन्दर थे । उसमें उत्तम घोड़े जुते हुए थे तथा उसके अनुकर्ष और कूबर भी सुदृढ़ थे । तूणीर, बाण और धनुषके कारण वह रथ उद्दीप्त हो रहा था । प्रास, खड्ग और परिघोंसे वह भरा हुआ था ॥२६॥
स काञ्चनविचित्रेण किरीटेन विराजता । भूषणैश्च बभौ मेरुः प्रभाभिरिव भासयन् ॥ २७ ॥
भावार्थ
वह सुवर्णनिर्मित विचित्र एवं दीप्तिशाली किरीट तथा अन्य आभूषणोंसे विभूषित हो अपनी प्रभासे प्रकाशका विस्तार करते हुए मेरुपर्वतके समान सुशोभित होता था ॥ २७ ॥
स रराज रथे तस्मिन् राजसूनुर्महाबलः । वृतो नैर्ऋतशार्दूलैर्वज्रपाणिरिवामरैः ॥ २८ ॥
भावार्थ
उस रथपर श्रेष्ठ निशाचरोंसे घिरकर बैठा हुआ वह महाबली राक्षसराजकुमार देवताओंसे घिरे हुए वज्रपाणि इन्द्रके समान शोभा पाता था ॥ २८ ॥
हयमुच्चैःश्रवःप्रख्यं श्वेतं कनकभूषणम् । मनोजवं महाकायमारुरोह नरान्तकः ॥ २९ ॥
भावार्थ
नरान्तक उच्चैःश्रवाके समान श्वेत वर्णवाले एक सुवर्णभूषित विशालकाय और मनके समान वेगशाली अश्वपर आरूढ़ हुआ ॥ २९ ॥
गृहीत्वा प्रासमुल्काभं विरराज नरान्तकः । शक्तिमादाय तेजस्वी गुहः शिखिगतो यथा ॥ ३० ॥
भावार्थ
उल्काके समान दीप्तिमान् प्रास हाथमें लेकर तेजस्वी नरान्तक शक्ति लिये मोरपर बैठे हुए तेजःपुञ्जसे सम्पन्न कुमार कार्तिकेयके समान सुशोभित हो रहा था ॥ ३० ॥
देवान्तकः समादाय परिघं हेमभूषणम् । परिगृह्य गिरिं दोर्भ्यां वपुर्विष्णोर्विडम्बयन् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
देवान्तक स्वर्णभूषित परिघ लेकर समुद्रमन्थनके समय दोनों हाथोंसे मन्दराचल उठाये हुए भगवान् विष्णुके स्वरूपका अनुकरण-सा कर रहा था ॥ ३१ ॥
महापार्श्वो महातेजा गदामादाय वीर्यवान् । विरराज गदापाणिः कुबेर इव संयुगे ॥ ३२ ॥
भावार्थ
महातेजस्वी और पराक्रमी महापार्श्वं हाथमें गदा लेकर युद्धस्थलमें गदाधारी कुबेरके समान शोभा पाने लगा ॥ ३२॥
ते प्रतस्थुर्महात्मानोऽमरावत्याः सुरा इव । तान् गजैश्च तुरङ्गैश्च रथैश्चाम्बुदनिःस्वनैः ॥ ३३ ॥ अनूत्पेतुर्महात्मानो राक्षसाः प्रवरायुधाः ।
भावार्थ
अमरावतीपुरीसे निकलनेवाले देवताओंके समान वे सभी महाकाय निशाचर लङ्कापुरीसे चले । उनके पीछे श्रेष्ठ आयुध धारण किये विशालकाय राक्षस हाथी, घोड़ों तथा मेघकी गर्जनाके समान घर्घराहट पैदा करनेवाले रथोंपर सवार हो युद्धके लिये निकले ॥ ३३½ ॥
ते विरेजुर्महात्मानः कुमाराः सूर्यवर्चसः ॥ ३४ ॥ किरीटिनः श्रिया जुष्टा ग्रहा दीप्ता इवाम्बरे ।
भावार्थ
वे सूर्यतुल्य तेजस्वी, महामनस्वी राक्षसराजकुमार मस्तकपर किरीट धारण करके उत्तम शोभा-सम्पत्तिसे सेवित हो आकाशमें प्रकाशित होनेवाले ग्रहोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ३४½ ॥
प्रगृहीता बभौ तेषां शस्त्राणामावलिः सिता ॥ ३५ ॥ शरदभ्रप्रतीकाशा हंसावलिरिवाम्बरे ।
भावार्थ
उनके द्वारा धारण की हुई अस्त्र-शस्त्रोंकी श्वेत पङ्क्ति आकाशमें शरद्ऋतुके बादलोंकी भाँति उज्ज्वल कान्तिसे युक्त हंसोंकी श्रेणीके समान शोभा पा रही थी ॥ ३५½ ॥
मरणं वापि निश्चित्य शत्रूणां वा पराजयम् ॥ ३६ ॥ इति कृत्वा मतिं वीराः संजग्मुः संयुगार्थिनः ।
भावार्थ
आज या तो हम शत्रुओंको परास्त कर देंगे, या स्वयं ही मृत्युकी गोदमें सदाके लिये सो जायँगे—ऐसा निश्चय करके वे वीर राक्षस युद्धके लिये आगे बढ़े ॥ ३६½ ॥
जगर्जुश्च प्रणेदुश्च चिक्षिपुश्चापि सायकान् ॥ ३७ ॥ जगृहुश्च महात्मानो निर्यान्तो युद्धदुर्मदाः ।
भावार्थ
वे युद्धदुर्मद महामनस्वी निशाचर गर्जते, सिंहनाद करते, बाण हाथमें लेते और उन्हें शत्रुओंपर छोड़ देते थे ॥३७½॥
क्ष्वेडितास्फोटितानां वै संचचालेव मेदिनी ॥ ३८ ॥ रक्षसां सिंहनादैश्च संस्फुटितमिवाम्बरम् ।
भावार्थ
उन राक्षसोंके गर्जने, ताल ठोंकने और सिंहनाद करनेसे पृथ्वी कम्पित-सी होने लगी और आकाश फटने-सा लगा ॥३८½॥
तेऽभिनिष्क्रम्य मुदिता राक्षसेन्द्रा महाबलाः ॥ ३९ ॥ ददृशुर्वानरानीकं समुद्यतशिलानगम् ।
भावार्थ
उन महाबली राक्षसशिरोमणि वीरोंने प्रसन्नतापूर्वक नगरकी सीमासे बाहर निकलकर देखा, वानरोंकी सेना पर्वतशिखर और बड़े-बड़े वृक्ष उठाये युद्धके लिये तैयार खड़ी है ॥३९½॥
हरयोऽपि महात्मानो ददृशू राक्षसं बलम् ॥ ४० ॥ हस्त्यश्वरथसम्बाधं किङ्किणीशतनादितम् । नीलजीमूतसंकाशं समुद्यतमहायुधम् ॥ ४१ ॥
भावार्थ
महामना वानरोंने भी राक्षससेनापर दृष्टिपात किया । वह हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी थी, सैकड़ों-हजारों घुँघुरुओंकी रुनझुनसे निनादित थी, काले मेघोंकी घटा-जैसी दिखायी देती थी और हाथोंमें बड़े-बड़े आयुध लिये हुए थी ॥ ४०-४१ ॥
दीप्तानलरविप्रख्यैर्नैर्ऋतैः सर्वतो वृतम् । तद् दृष्ट्वा बलमायातं लब्धलक्षाः प्लवङ्गमाः ॥ ४२ ॥ समुद्यतमहाशैलाः सम्प्रणेदुर्मुहुर्मुहुः । अमृष्यमाणा रक्षांसि प्रतिनर्दन्त वानराः ॥ ४३ ॥ ततः समुत्कृष्टरवं निशम्य रक्षोगणा वानरयूथपानाम् । अमृष्यमाणाः परहर्षमुग्रं महाबला भीमतरं प्रणेदुः ॥ ४४ ॥
भावार्थ
प्रज्वलित अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी राक्षसोंने उसे सब ओरसे घेर रखा था । निशाचरोंकी उस सेनाको आती देख वानर प्रहार करनेका अवसर पाकर महान् पर्वतशिखर उठाये बारंबार गर्जना करने लगे । वे राक्षसोंका सिंहनाद सहन न करनेके कारण बदलेमें जोर-जोरसे दहाड़ने लगे थे ।४२-४३। वानरयूथपतियोंका वह उच्च स्वरसे किया हुआ गर्जन-तर्जन सुनकर भयंकर एवं महान् बलसे सम्पन्न राक्षसगण शत्रुओंका हर्ष सहन न कर सके; अतः स्वयं भी अत्यन्त भीषण सिंहनाद करने लगे ॥ ४४ ॥
ते राक्षसबलं घोरं प्रविश्य हरियूथपाः । विचेरुरुद्यतैः शैलैर्नगाः शिखरिणो यथा ॥ ४५ ॥
भावार्थ
तब वानर-यूथपति राक्षसोंकी उस भयंकर सेनामें घुस गये और शैलशृङ्ग उठाये शिखरोंवाले पर्वतोंकी भाँति वहाँ विचरण करने लगे ॥ ४५ ॥
केचिदाकाशमाविश्य केचिदुर्व्यां प्लवङ्गमाः । रक्षःसैन्येषु संक्रुद्धाः केचिद् द्रुमशिलायुधाः ॥ ४६ ॥ द्रुमांश्च विपुलस्कन्धान् गृह्य वानरपुङ्गवाः ।
भावार्थ
वृक्षों और शिलाओंको आयुधके रूपमें धारण किये वानर योद्धा राक्षससैनिकोंपर अत्यन्त कुपित हो आकाशमें उड़-उड़कर विचरने लगे । कितने ही वानरशिरोमणि वीर मोटी-मोटी शाखाओंवाले वृक्षोंको हाथमें लेकर पृथ्वीपर विचरण करने लगे ॥ ४६½ ॥
तद् युद्धमभवद् घोरं रक्षोवानरसंकुलम् ॥ ४७ ॥ ते पादपशिलाशैलैश्चक्रुर्वृष्टिमनूपमाम् । बाणौघैर्वार्यमाणाश्च हरयो भीमविक्रमाः ॥ ४८ ॥
भावार्थ
उस समय राक्षसों और वानरोंके उस युद्धने बड़ा भयंकर रूप धारण किया । राक्षसोंने बाणसमूहोंकी वर्षाद्वारा जब वानरोंको आगे बढ़नेसे रोका, उस समय वे भयंकर पराक्रमी वानर उनपर वृक्षों, शिलाओं तथा शैलशिखरोंकी अनुपम वृष्टि करने लगे ॥ ४७-४८ ॥
सिंहनादान् विनेदुश्च रणे राक्षसवानराः । शिलाभिश्चूर्णयामासुर्यातुधानान् प्लवङ्गमाः ॥ ४९ ॥ निर्जघ्नुः संयुगे क्रुद्धाः कवचाभरणावृतान् ।
भावार्थ
राक्षस और वानर दोनों ही वहाँ रणक्षेत्रमें सिंहोंके समान दहाड़ रहे थे । कुपित हुए वानरोंने कवचों और आभूषणोंसे विभूषित बहुतेरे राक्षसोंको युद्धस्थलमें शिलाओंकी मारसे कुचल दिया—मार डाला ॥ ४९½ ॥
केचिद् रथगतान् वीरान् गजवाजिगतानपि ॥ ५० ॥ निर्जघ्नुः सहसाऽऽप्लुत्य यातुधानान् प्लवङ्गमाः ।
भावार्थ
कितने ही वानर रथ, हाथी और घोड़ेपर बैठे हुए वीर राक्षसोंको भी सहसा उछलकर मार डालते थे ॥ ५०½ ॥
शैलशृङ्गान्विताङ्गास्ते मुष्टिभिर्वान्तलोचनाः ॥ ५१ ॥ चेलुः पेतुश्च नेदुश्च तत्र राक्षसपुङ्गवाः ।
भावार्थ
वहाँ प्रधान-प्रधान राक्षसोंके शरीर पर्वत-शिखरोंसे आच्छादित हो गये थे । वानरोंके मुक्कोंकी मार खाकर कितनोंकी आँखें बाहर निकल आयी थीं । वे निशाचर भागते, गिरते-पड़ते और चीत्कार करते थे ॥ ५१½ ॥
राक्षसाश्च शरैस्तीक्ष्णैर्विभिदुः कपिकुञ्जरान् ॥ ५२ ॥ शूलमुद्गरखड्गैश्च जघ्नुः प्रासैश्च शक्तिभिः ।
भावार्थ
राक्षसोंने भी पैने बाणोंसे कितने ही वानर-शिरोमणियोंको विदीर्ण कर दिया था तथा शूलों, मुद्गरों, खड्गों, प्रासों और शक्तियोंसे बहुतोंको मार गिराया था ॥ ५२½ ॥
अन्योन्यं पातयामासुः परस्परजयैषिणः ॥ ५३ ॥ रिपुशोणितदिग्धाङ्गास्तत्र वानरराक्षसाः ।
भावार्थ
शत्रुओंके रक्त जिनके शरीरोंमें लिपटे हुए थे, वे वानर और राक्षस वहाँ परस्पर विजय पानेकी इच्छासे एक दूसरेको धराशायी कर रहे थे ॥ ५३½ ॥
ततः शैलैश्च खड्गैश्च विसृष्टैर्हरिराक्षसैः ॥ ५४ ॥ मुहूर्तेनावृता भूमिरभवच्छोणितोक्षिता ।
भावार्थ
थोड़ी ही देरमें वह युद्धभूमि वानरों और राक्षसोंद्वारा चलाये गये पर्वत-शिखरों तथा तलवारोंसे आच्छादित हो रक्तके प्रवाहसे सिंच उठी ॥ ५४½ ॥
विकीर्णैः पर्वताकारै रक्षोभिरभिमर्दितैः । आसीद् वसुमती पूर्णा तदा युद्धमदान्वितैः ॥ ५५ ॥
भावार्थ
युद्धके मदसे उन्मत्त हुए पर्वताकार राक्षस जो शिलाओंकी मारसे कुचल दिये गये थे, सब ओर बिखरे पड़े थे । उनसे वहाँकी सारी भूमि पट गयी थी ॥ ५५ ॥
आक्षिप्ताः क्षिप्यमाणाश्च भग्नशैलाश्च वानराः । पुनरङ्गैस्तदा चक्रुरासन्ना युद्धमद्भुतम् ॥ ५६ ॥
भावार्थ
राक्षसोंने जिनके युद्धके साधनभूत शैल-शिखरोंको तोड़-फोड़ डाला था, वे वानर उनके प्रहारोंसे विचलित किये जानेपर उन राक्षसोंके अत्यन्त निकट जा अपने हाथ-पैर आदि अङ्गोंद्वारा ही अद्भुत युद्ध करने लगे ॥ ५६ ॥
वानरान् वानरैरेव जघ्नुस्ते नैर्ऋतर्षभाः । राक्षसान् राक्षसैरेव जघ्नुस्ते वानरा अपि ॥ ५७ ॥
भावार्थ
राक्षसोंके प्रधान-प्रधान वीर वानरोंको पकड़कर उन्हें दूसरे वानरोंपर पटक देते थे । इसी प्रकार वानर भी राक्षसोंसे ही राक्षसोंको मार रहे थे ॥ ५७ ॥
आक्षिप्य च शिलाः शैलाञ्जघ्नुस्ते राक्षसास्तदा । तेषां चाच्छिद्य शस्त्राणि जघ्नू रक्षांसि वानराः ॥ ५८ ॥
भावार्थ
उस समय राक्षस अपने शत्रुओंके हाथसे शिलाओं और शैल-शिखरोंको छीनकर उन्हींसे उनपर प्रहार करने लगे तथा वानर भी राक्षसोंके हथियार छीनकर उन्हींके द्वारा उनका वध करने लगे ॥ ५८ ॥
निर्जघ्नुः शैलशृङ्गैश्च बिभिदुश्च परस्परम् । सिंहनादान् विनेदुश्च रणे राक्षसवानराः ॥ ५९ ॥
भावार्थ
इस तरह राक्षस और वानर दोनों ही दलोंके योद्धा एक-दूसरेको पर्वत-शिखरसे मारने, अस्त्र-शस्त्रोंसे विदीर्ण करने तथा रणभूमिमें सिंहोंके समान दहाड़ने लगे ॥ ५९ ॥
छिन्नवर्मतनुत्राणा राक्षसा वानरैर्हताः । रुधिरं प्रस्रुतास्तत्र रससारमिव द्रुमाः ॥ ६० ॥
भावार्थ
राक्षसोंकी शरीर-रक्षाके साधनभूत कवच आदि छिन्न-भिन्न हो गये । वानरोंकी मार खाकर वे अपने शरीरसे उसी प्रकार रक्त बहाने लगे, जैसे वृक्ष अपने तनोंसे गोंद बहाया करते हैं ॥ ६० ॥
रथेन च रथं चापि वारणेनापि वारणम् । हयेन च हयं केचिन्निर्जघ्नुर्वानरा रणे ॥ ६१ ॥
भावार्थ
कितने ही वानर रणभूमिमें रथसे रथको, हाथीसे हाथीको और घोड़ेसे घोड़ेको मार गिराते थे ॥ ६१ ॥
क्षुरप्रैरर्धचन्द्रैश्च भल्लैश्च निशितैः शरैः । राक्षसा वानरेन्द्राणां बिभिदुः पादपाञ्शिलाः ॥ ६२ ॥
भावार्थ
वानर-यूथपतियोंके चलाये हुए वृक्षों और शिलाओंको निशाचर योद्धा तीखे क्षुरप्र, अर्धचन्द्र और भल्ल नामक बाणोंसे तोड़-फोड़ डालते थे ॥ ६२ ॥
विकीर्णाः पर्वतास्तैश्च द्रुमच्छिन्नैश्च संयुगे । हतैश्च कपिरक्षोभिर्दुर्गमा वसुधाभवत् ॥ ६३ ॥
भावार्थ
टूट-फूटकर गिरे हुए पर्वतों, कटे हुए वृक्षों तथा राक्षसों और वानरोंकी लाशोंसे पट जानेके कारण उस भूमिमें चलना-फिरना कठिन हो गया ॥ ६३ ॥
ते वानरा गर्वितहृष्टचेष्टाः संग्राममासाद्य भयं विमुच्य । युद्धं स्म सर्वे सह राक्षसैस्ते नानायुधाश्चकुरदीनसत्त्वाः ॥ ६४ ॥
भावार्थ
वानरोंकी सारी चेष्टाएँ गर्वसे भरी हुई तथा हर्ष और उत्साहसे युक्त थीं । उनके हृदयमें दीनता नहीं थी तथा उन्होंने राक्षसोंके ही नाना प्रकारके आयुध छीनकर हस्तगत कर लिये थे, अतः वे सब संग्राममें पहुँचकर राक्षसोंके साथ भय छोड़कर युद्ध कर रहे थे ॥ ६४ ॥
तस्मिन् प्रवृत्ते तुमुले विमर्दे प्रहृष्यमाणेषु वलीमुखेषु । निपात्यमानेषु च राक्षसेषु महर्षयो देवगणाश्च नेदुः ॥ ६५ ॥
भावार्थ
इस प्रकार जब भयंकर मारकाट मची हुई थी, वानर प्रसन्न थे और राक्षसोंकी लाशें गिर रही थीं, उस समय महर्षि तथा देवगण हर्षनाद करने लगे ॥ ६५ ॥
ततो हयं मारुततुल्यवेग- मारुह्य शक्तिं निशितां प्रगृह्य । नरान्तको वानरसैन्यमुग्रं महार्णवं मीन इवाविवेश ॥ ६६ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वायुके समान तीव्र वेगवाले घोड़ेपर सवार हो हाथमें तीखी शक्ति लिये नरान्तक वानरोंकी भयंकर सेनामें उसी तरह घुसा, जैसे कोई मत्स्य महासागरमें प्रवेश कर रहा हो ॥ ६६ ॥
स वानरान् सप्त शतानि वीरः प्रासेन दीप्तेन विनिर्बिभेद । एकः क्षणेनेन्द्ररिपुर्महात्मा जघान सैन्यं हरिपुङ्गवानाम् ॥ ६७ ॥ दद़शुश्च महात्मानं हयपृष्ठप्रतिष्ठितम् । चरन्तं हरिसैन्येषु विद्याधरमहर्षयः ॥ ६८ ॥
भावार्थ
उस महाकाय इन्द्रद्रोही वीर निशाचरने चमचमाते हुए भालेसे अकेले ही सात सौ वानरोंको चीर डाला और क्षणभरमें वानर-यूथपतियोंकी एक बहुत बड़ी सेनाका संहार कर डाला॥ घोड़ेकी पीठपर बैठे हुए उस महामनस्वी वीरको विद्याधरों और महर्षियोंने वानरोंकी सेनामें विचरते देखा ॥ ६८ ॥
स तस्य दद़शे मार्गो मांसशोणितकर्दमः । पतितैः पर्वताकारैर्वानरैरभिसंवृतः ॥ ६९ ॥
भावार्थ
वह जिस मार्गसे निकल जाता, वही धराशायी हुए पर्वताकार वानरोंसे ढका दिखायी देता था और वहाँ रक्त एवं मांसकी कीच मच जाती थी ॥ ६९ ॥
यावद् विक्रमितुं बुद्धिं चक्रुः प्लवगपुङ्गवाः । तावदेतानतिक्रम्य निर्बिभेद नरान्तकः ॥ ७० ॥
भावार्थ
वानरोंके प्रधान-प्रधान वीर जबतक पराक्रम करनेका विचार करते, तबतक ही नरान्तक इन सबको लाँघकर भालेकी मारसे घायल कर देता था ॥ ७० ॥
ज्वलन्तं प्रासमुद्यम्य संग्रामाग्रे नरान्तकः । ददाह हरिसैन्यानि वनानीव विभावसुः ॥ ७१ ॥
भावार्थ
जैसे दावानल सूखे जंगलोंको जलाता है, उसी प्रकार प्रज्वलित प्रास लिये नरान्तक युद्धके मुहानेपर वानर-सेनाओंको दग्ध करने लगा ॥ ७१ ॥
यावदुत्पाटयामासुर्वृक्षाञ्शैलान् वनौकसः । तावत् प्रासहताः पेतुर्वज्रकृत्ता इवाचलाः ॥ ७२ ॥
भावार्थ
वानरलोग जबतक वृक्ष और पर्वत-शिखरोंको उखाड़ते, तबतक ही उसके भालेकी चोट खाकर वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति ढह जाते थे ॥ ७२ ॥
दिक्षु सर्वासु बलवान् विचचार नरान्तकः । प्रमृद्नन् सर्वतो युद्धे प्रावृट्काले यथानिलः ॥ ७३ ॥
भावार्थ
जैसे वर्षाकालमें प्रचण्ड वायु सब ओर वृक्षोंको तोड़ती-उखाड़ती हुई विचरती है, उसी प्रकार बलवान् नरान्तक रणभूमिमें वानरोंको रौंदता हुआ सम्पूर्ण दिशाओंमें विचरने लगा ॥ ७३ ॥
न शेकुर्धावितुं वीरा न स्थातुं स्पन्दितुं भयात् । उत्पतन्तं स्थितं यान्तं सर्वान् विव्याध वीर्यवान् ॥ ७४ ॥
भावार्थ
वानर वीर भयके मारे न तो भाग पाते थे, न खड़े रह पाते थे और न उनसे दूसरी ही कोई चेष्टा करते बनती थी । पराक्रमी नरान्तक उछलते हुए, पड़े हुए और जाते हुए सभी वानरोंपर भालेकी चोट कर देता था ॥ ७४ ॥
एकेनान्तककल्पेन प्रासेनादित्यतेजसा । भग्नानि हरिसैन्यानि निपेतुर्धरणीतले ॥ ७५ ॥
भावार्थ
उसका प्रास ( भाला ) अपनी प्रभासे सूर्यके समान उद्दीप्त हो रहा था और यमराजके समान भयंकर जान पड़ता था । उस एक ही भालेकी मारसे घायल होकर झुंड-के-झुंड वानर धरतीपर सो गये ॥ ७५ ॥
वज्रनिष्पेषसदृशं प्रासस्याभिनिपातनम् । न शेकुर्वानराः सोढुं ते विनेदुर्महास्वनम् ॥ ७६ ॥
भावार्थ
वज्रके आघातको भी मात करनेवाले उस प्रासके दारुण प्रहारको वानर नहीं सह सके । वे जोर-जोरसे चीत्कार करने लगे ॥ ७६ ॥
पततां हरिवीराणां रूपाणि प्रचकाशिरे । वज्रभिन्नाग्रकूटानां शैलानां पततामिव ॥ ७७ ॥
भावार्थ
वहाँ गिरते हुए वानर-वीरोंके रूप उन पर्वतोंके समान दिखायी देते थे, जो वज्रके आघातसे शिखरोंके विदीर्ण हो जानेसे धराशायी हो रहे हों ॥ ७७ ॥
ये तु पूर्वं महात्मानः कुम्भकर्णेन पातिताः । ते स्वस्था वानरश्रेष्ठाः सुग्रीवमुपतस्थिरे ॥ ७८ ॥
भावार्थ
पहले कुम्भकर्णने जिन्हें रणभूमिमें गिरा दिया था, वे महामनस्वी श्रेष्ठ वानर उस समय स्वस्थ हो सुग्रीवकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ ७८ ॥
प्रेक्षमाणः स सुग्रीवो ददृशे हरिवाहिनीम् । नरान्तकभयत्रस्तां विद्रवन्तीं यतस्ततः ॥ ७९ ॥
भावार्थ
सुग्रीवने जब सब ओर दृष्टिपात किया, तब देखा कि वानरोंकी सेना नरान्तकसे भयभीत होकर इधर-उधर भाग रही है ॥ ७९ ॥
विद्रुतां वाहिनीं दृष्ट्वा स ददर्श नरान्तकम् । गृहीतप्रासमायान्तं हयपृष्ठप्रतिष्ठितम् ॥ ८० ॥ दृष्ट्वोवाच महातेजाः सुग्रीवो वानराधिपः । कुमारमङ्गदं वीरं शक्रतुल्यपराक्रमम् ॥ ८१ ॥
भावार्थ
सेनाको भागती देख उन्होंने नरान्तकपर भी दृष्टि डाली, जो घोड़ेकी पीठपर बैठकर हाथमें भाला लिये आ रहा था ॥ उसे देखकर महातेजस्वी वानरराज सुग्रीवने इन्द्रतुल्य पराक्रमी वीर कुमार अङ्गदसे कहा—॥ ८१ ॥
गच्छैनं राक्षसं वीरं योऽसौ तुरगमास्थितः । क्षोभयन्तं हरिबलं क्षिप्रं प्राणैर्वियोजय ॥ ८२ ॥
भावार्थ
‘बेटा ! वह जो घोड़ेपर बैठा हुआ वानर-सेनामें हलचल मचा रहा है, उस वीर राक्षसका सामना करनेके लिये जाओ और उसके प्राणोंका शीघ्र ही अन्त कर दो’ ॥ ८२ ॥
स भर्तुर्वचनं श्रुत्वा निष्पपाताङ्गदस्तदा । अनीकान्मेघसंकाशादंशुमानिव वीर्यवान् ॥ ८३ ॥
भावार्थ
स्वामीकी यह आज्ञा सुनकर पराक्रमी अङ्गद उस समय मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होनेवाली वानर-सेनासे उसी तरह निकले, जैसे सूर्यदेव बादलोंके ओटसे प्रकट हो रहे हों ॥८३॥
शैलसंघातसंकाशो हरीणामुत्तमोऽङ्गदः । रराजाङ्गदसंनद्धः सधातुरिव पर्वतः ॥ ८४ ॥ निरायुधो महातेजाः केवलं नखदंष्ट्रवान् । नरान्तकमभिक्रम्य वालिपुत्रोऽब्रवीद् वचः ॥ ८५ ॥
भावार्थ
वानरोंमें श्रेष्ठ अङ्गद शैल-समूहके समान विशालकाय थे । वे अपनी बाँहोंमें बाजूबंद धारण किये हुए थे, इसलिये सुवर्ण आदि धातुओंसे युक्त पर्वतके समान शोभा पाते थे ॥ वालिपुत्र अङ्गद महातेजस्वी थे । उनके पास कोई हथियार नहीं था । केवल नख और दाढ़ ही उनके अस्त्र-शस्त्र थे । वे नरान्तकके पास पहुँचकर इस प्रकार बोले—॥ ८५ ॥
तिष्ठ किं प्राकृतैरेभिर्हरिभिस्त्वं करिष्यसि । अस्मिन् वज्रसमस्पर्शं प्रासं क्षिप ममोरसि ॥ ८६ ॥
भावार्थ
‘ओ निशाचर ! ठहर जा । इन साधारण बंदरोंको मारकर तू क्या करेगा ? तेरे भालेकी चोट वज्रके समान असह्य है; किंतु जरा इसे मेरी इस छातीपर तो मार’ ॥ ८६ ॥
अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा प्रचुक्रोध नरान्तकः। संदश्य दशनैरोष्ठं निःश्वस्य च भुजंगवत् । अभिगम्याङ्गदं क्रुद्धो वालिपुत्रं नरान्तकः ॥ ८७ ॥
भावार्थ
अङ्गदकी यह बात सुनकर नरान्तकको बड़ा क्रोध हुआ । वह कुपित हो, दाँतोंसे ओठ दबा सर्पकी भाँति लंबी साँस ले, वालिपुत्र अङ्गदके पास आकर खड़ा हो गया ॥ ८७ ॥
स प्रासमाविध्य तदाङ्गदाय समुज्ज्वलन्तं सहसोत्ससर्ज । स वालिपुत्रोरसि वज्रकल्पे बभूव भग्नो न्यपतच्च भूमौ ॥ ८८ ॥
भावार्थ
उसने उस चमकते हुए भालेको घुमाकर सहसा उसे अङ्गदपर दे मारा । वालिपुत्र अङ्गदका वक्षःस्थल वज्रके समान कठोर था । नरान्तकका भाला उसपर टकराकर टूट गया और जमीनपर जा पड़ा ॥ ८८ ॥
तं प्रासमालोक्य तदा विभग्नं सुपर्णकृत्तोरगभोगकल्पम् । तलं समुद्यम्य स वालिपुत्र- स्तुरंगमस्याभिजघान मूर्ध्नि ॥ ८९ ॥
भावार्थ
उस भालेको गरुड़के द्वारा खण्डित किये गये सर्पके शरीरकी भाँति टूक-टूक होकर पड़ा देख वालिपुत्र अङ्गदने हथेली ऊँची करके नरान्तकके घोड़ेके मस्तकपर बड़े जोरसे थप्पड़ मारा ॥ ८९ ॥
निमग्नपादः स्फुटिताक्षितारो निष्कान्तजिह्वोऽचलसंनिकाशः । स तस्य वाजी निपपात भूमौ तलप्रहारेण विकीर्णमूर्धा ॥ ९० ॥
भावार्थ
उस प्रहारसे घोड़ेका सिर फट गया, पैर नीचेको धँस गये, आँखें फूट गयीं और जीभ बाहर निकल आयी । वह पर्वताकार अश्व प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ९० ॥
नरान्तकः क्रोधवशं जगाम हतं तुरंगं पतितं समीक्ष्य । स मुष्टिमुद्यम्य महाप्रभावो जघान शीर्षे युधि वालिपुत्रम् ॥ ९१ ॥
भावार्थ
घोड़ेको मरकर पृथ्वीपर पड़ा देख नरान्तकके क्रोधकी सीमा न रही । उस महाप्रभावशाली निशाचरने युद्धस्थलमें मुक्का तानकर वालिकुमारके मस्तकपर मारा ॥ ९१ ॥
अथाङ्गदो मुष्टिविशीर्णमूर्धा सुस्राव तीव्रं रुधिरं भृशोष्णम् । मुहुर्विजज्वाल मुमोह चापि संज्ञां समासाद्य विसिस्मिये च ॥ ९२ ॥
भावार्थ
मुक्केकी मारसे अङ्गदका सिर फूट गया । उससे वेगपूर्वक गर्म-गर्म रक्तकी धारा बहने लगी । उनके माथेमें बड़ी जलन हुई । वे मूर्च्छित हो गये और थोड़ी देरमें जब होश हुआ, तब उस राक्षसकी शक्ति देखकर आश्चर्यचकित हो उठे ॥ ९२ ॥
अथाङ्गदो मृत्युसमानवेगं संवर्त्य मुष्टिं गिरिशृङ्गकल्पम् । निपातयामास तदा महात्मा नरान्तकस्योरसि वालिपुत्रः ॥ ९३ ॥
भावार्थ
फिर अङ्गदने पर्वत-शिखरके समान अपना मुक्का ताना, जिसका वेग मृत्युके समान था । फिर उन महात्मा वालिकुमारने उससे नरान्तककी छातीमें प्रहार किया ॥ ९३ ॥
स मुष्टिनिर्भिन्ननिमग्नवक्षा ज्वाला वमन्शोणितदिग्धगात्रः । नरान्तको भूमितले पपात यथाचलो वज्रनिपातभग्नः ॥ ९४ ॥
भावार्थ
मुक्केके आघातसे नरान्तकका हृदय विदीर्ण हो गया । वह मुँहसे आगकी ज्वाला-सी उगलने लगा । उसके सारे अङ्ग लहूलुहान हो गये और वह वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ९४ ॥
तदान्तरिक्षे त्रिदशोत्तमानां वनौकसां चैव महाप्रणादः । बभूव तस्मिन् निहतेऽग्र्यवीर्ये नरान्तके वालिसुतेन संख्ये ॥ ९५ ॥
भावार्थ
वालिकुमारके द्वारा युद्धस्थलमें उत्तम पराक्रमी नरान्तकके मारे जानेपर उस समय आकाशमें देवताओंने और भूतलपर वानरोंने बड़े जोरसे हर्षनाद किया ॥ ९५ ॥
अथाङ्गदो राममनःप्रहर्षणं सुदुष्करं तं कृतवान् हि विक्रमम् । विसिस्मिये सोऽप्यथ भीमकर्मा पुनश्च युद्धे स बभूव हर्षितः ॥ ९६ ॥
भावार्थ
अङ्गदने श्रीरामचन्द्रजीके मनको अत्यन्त हर्ष प्रदान करनेवाला वह परम दुष्कर पराक्रम किया था । उससे श्रीरामचन्द्रजीको भी बड़ा विस्मय हुआ । तत्पश्चात् भीषण कर्म करनेवाले अङ्गद पुनः युद्धके लिये हर्ष और उत्साहसे भर गये॥
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