युद्धकाण्ड, सर्ग 68
कुम्भकर्णं हतं दृष्ट्वा राघवेण महात्मना । राक्षसा राक्षसेन्द्राय रावणाय न्यवेदयन् ॥ १ ॥
भावार्थ
महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा कुम्भकर्णको मारा गया देख राक्षसोंने अपने राजा रावणसे जाकर कहा—॥ १ ॥
राजन् स कालसंकाशः संयुक्तः कालकर्मणा । विद्राव्य वानरीं सेनां भक्षयित्वा च वानरान् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘महाराज ! कालके समान भयंकर पराक्रमी कुम्भकर्ण वानरसेनाको भगाकर तथा बहुत-से वानरोंको अपना आहार बनाकर स्वयं भी कालके गालमें चले गये ॥ २ ॥
प्रतपित्वा मुहूर्तं तु प्रशान्तो रामतेजसा । कायेनार्धप्रविष्टेन समुद्रं भीमदर्शनम् ॥ ३ ॥ निकृत्तनासाकर्णेन विक्षरद्रुधिरेण च । रुद्ध्वा द्वारं शरीरेण लङ्कायाः पर्वतोपमः ॥ ४ ॥ कुम्भकर्णस्तव भ्राता काकुत्स्थशरपीडितः । अगण्डभूतो विवृतो दावदग्ध इव द्रुमः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘वे दो घड़ीतक अपने प्रतापसे तपकर अन्तमें श्रीरामके तेजसे शान्त हो गये । उनका आधा शरीर ( धड़ ) भयानक दिखायी देनेवाले समुद्रमें घुस गया और आधा शरीर (मस्तक) नाक-कान कट जानेसे खून बहाता हुआ लङ्काके द्वारपर पड़ा है । उस शरीरके द्वारा आपके भाई पर्वताकार कुम्भकर्ण लङ्काका द्वार रोककर पड़े हैं । वे श्रीरामके बाणोंसे पीड़ित हो हाथ, पैर और मस्तकसे हीन नंग-धड़ंग धड़के रूपमें परिणत हो दावानलसे दग्ध हुए वृक्षकी भाँति नष्ट हो गये’ ॥ ३–५ ॥
श्रुत्वा विनिहतं संख्ये कुम्भकर्णं महाबलम् । रावणः शोकसंतप्तो मुमोह च पपात च ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘महाबली कुम्भकर्ण युद्धस्थलमें मारा गया’ यह सुनकर रावण शोकसे संतप्त एवं मूर्छित हो गया और तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ६ ॥
पितृव्यं निहतं श्रुत्वा देवान्तकनरान्तकौ । त्रिशिराश्चातिकायश्च रुरुदुः शोकपीडिताः ॥ ७ ॥
भावार्थ
अपने चाचाके निधनका समाचार सुनकर देवान्तक, नरान्तक, त्रिशिरा और अतिकाय दुःखसे पीड़ित हो फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ७ ॥
भ्रातरं निहतं श्रुत्वा रामेणाक्लिष्टकर्मणा । महोदरमहापार्श्वौ शोकाक्रान्तौ बभूवतुः ॥ ८ ॥
भावार्थ
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामके द्वारा भाई कुम्भकर्ण मारे गये, यह सुनकर उसके सौतेले भाई महोदर और महापार्श्व शोकसे व्याकुल हो गये ॥ ८ ॥
ततः कृच्छ्रात् समासाद्य संज्ञां राक्षसपुङ्गवः । कुम्भकर्णवधाद् दीनो विललापाकुलेन्द्रियः ॥ ९ ॥
भावार्थ
तदनन्तर बड़े कष्टसे होशमें आनेपर राक्षसराज रावण कुम्भकर्णके वधसे दुखी हो विलाप करने लगा । उसकी सारी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठी थीं ॥ ९ ॥
हा वीर रिपुदर्पघ्न कुम्भकर्ण महाबल । त्वं मां विहाय वै दैवाद् यातोऽसि यमसादनम् ॥ १० ॥ मम शल्यमनुद्धृत्य बान्धवानां महाबल । शत्रुसैन्यं प्रताप्यैकः क्व मां संत्यज्य गच्छसि ॥ ११ ॥
भावार्थ
( वह रो-रोकर कहने लगा—) ‘हा वीर ! हा महाबली कुम्भकर्ण ! तुम शत्रुओंके दर्पका दलन करनेवाले थे; किंतु दुर्भाग्यवश मुझे असहाय छोड़कर यमलोकको चल दिये ॥ ‘महाबली वीर ! तुम मेरा तथा इन भाई-बन्धुओंका कण्टक दूर किये बिना शत्रुसेनाको संतप्त करके मुझे छोड़ अकेले कहाँ चले जा रहे हो ? ॥ ११ ॥
इदानीं खल्वहं नास्मि यस्य मे पतितो भुजः । दक्षिणोऽयं समाश्रित्य न बिभेमि सुरासुरात् ॥ १२ ॥ कथमेवंविधो वीरो देवदानवदर्पहा । कालाग्निप्रतिमो ह्यद्य राघवेण रणे हतः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘इस समय मैं अवश्य ही नहींके बराबर हूँ; क्योंकि मेरी दाहिनी बाँह कुम्भकर्ण धराशायी हो गया । जिसका भरोसा करके मैं देवता और असुर किसीसे नहीं डरता था ॥ ‘देवताओं और दानवोंका दर्प चूर करनेवाला ऐसा वीर, जो कालाग्निके समान प्रतीत होता था, आज रणक्षेत्रमें रामके हाथसे कैसे मारा गया ? ॥ १३ ॥
यस्य ते वज्रनिष्पेषो न कुर्याद् व्यसनं सदा । स कथं रामबाणार्तः प्रसुप्तोऽसि महीतले ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘भाई ! तुम्हें तो वज्रका प्रहार भी कभी कष्ट नहीं पहुँचा सकता था । वही तुम आज रामके बाणोंसे पीड़ित हो भूतलपर कैसे सो रहे हो ? ॥ १४ ॥
एते देवगणाः सार्धमृषिभिर्गगने स्थिताः । निहतं त्वां रणे दृष्ट्वा निनदन्ति प्रहर्षिताः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘आज समराङ्गणमें तुम्हें मारा गया देख आकाशमें खड़े हुए ये ऋषियोंसहित देवता हर्षनाद कर रहे हैं ॥ १५ ॥
ध्रुवमद्यैव संहृष्टा लब्धलक्षाः प्लवंगमाः । आरोक्ष्यन्तीह दुर्गाणि लङ्काद्वाराणि सर्वशः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘निश्चय ही अब अवसर पाकर हर्षसे भरे हुए वानर आज ही लङ्काके समस्त दुर्गम द्वारोंपर चढ़ जायँगे ॥ १६ ॥
राज्येन नास्ति मे कार्यं किंकरिष्यामि सीतया । कुम्भकर्णविहीनस्य जीविते नास्ति मे मतिः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘अब मुझे राज्यसे कोई प्रयोजन नहीं है । सीताको लेकर भी मैं क्या करूँगा ? कुम्भकर्णके बिना जीनेका मेरा मन नहीं है ॥ १७ ॥
यद्यहं भ्रातृहन्तारं न हन्मि युधि राघवम् । ननु मे मरणं श्रेयो न चेदं व्यर्थजीवितम् ॥ १८ ॥ अद्यैव तं गमिष्यामि देशं यत्रानुजो मम । नहि भ्रातॄन् समुत्सृज्य क्षणं जीवितुमुत्सहे ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘यदि मैं युद्धस्थलमें अपने भाईका वध करनेवाले रामको नहीं मार सकता तो मेरा मर जाना ही अच्छा है । इस निरर्थक जीवनको सुरक्षित रखना कदापि अच्छा नहीं है ॥ ‘मैं आज ही उस देशको जाऊँगा, जहाँ मेरा छोटा भाई कुम्भकर्ण गया है । मैं अपने भाइयोंको छोड़कर क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता ॥ १९ ॥
देवा हि मां हसिष्यन्ति दृष्ट्वा पूर्वापकारिणम् । कथमिन्द्रं जयिष्यामि कुम्भकर्ण हते त्वयि ॥ २० ॥
भावार्थ
‘मैंने पहले देवताओंका अपकार किया था । अब वे मुझे देखकर हँसेंगे । हा कुम्भकर्ण ! तुम्हारे मारे जानेपर अब मैं इन्द्रको कैसे जीत सकूँगा ? ॥ २० ॥
तदिदं मामनुप्राप्तं विभीषणवचः शुभम् । यदज्ञानान्मया तस्य न गृहीतं महात्मनः ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘मैंने महात्मा विभीषणकी कही हुई जिन उत्तम बातोंको अज्ञानवश स्वीकार नहीं किया था, वे मेरे ऊपर आज प्रत्यक्षरूपसे घटित हो रही हैं ॥ २१ ॥
विभीषणवचस्तावत् कुम्भकर्णप्रहस्तयोः । विनाशोऽयं समुत्पन्नो मां व्रीडयति दारुणः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘जबसे कुम्भकर्ण और प्रहस्तका यह दारुण विनाश उत्पन्न हुआ है, तभीसे विभीषणकी बात याद आकर मुझे लज्जित कर रही है ॥ २२ ॥
तस्यायं कर्मणः प्राप्तो विपाको मम शोकदः । यन्मया धार्मिकःश्रीमान् स निरस्तो विभीषणः ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘मैंने धर्मपरायण श्रीमान् विभीषणको जो घरसे निकाल दिया था, उसी कर्मका यह शोकदायक परिणाम अब मुझे भोगना पड़ रहा है’ ॥ २३ ॥
इति बहुविधमाकुलान्तरात्मा कृपणमतीव विलप्य कुम्भकर्णम् । न्यपतदपि दशाननो भृशार्त- स्तमनुजमिन्द्ररिपुं हतं विदित्वा ॥ २४ ॥
भावार्थ
इस प्रकार भाँति-भाँतिसे दीनतापूर्वक अत्यन्त विलाप करके व्याकुलचित्त हुआ दशमुख रावण अपने छोटे भाई इन्द्र-शत्रु कुम्भकर्णके वधका स्मरण करके बहुत ही व्यथित हो पुनः पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २४ ॥
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