युद्धकाण्ड, सर्ग 67
ते निवृत्ता महाकायाः श्रुत्वाङ्गदवचस्तदा । नैष्ठिकीं बुद्धिमास्थाय सर्वे संग्रामकाङ्क्षिणः ॥ १ ॥
भावार्थ
अङ्गदके पूर्वोक्त वचन सुनकर वे सब विशालकाय वानर मरने-मारनेका निश्चय करके युद्धकी इच्छासे लौटे थे ॥ १ ॥
समुदीरितवीर्यास्ते समारोपितविक्रमाः । पर्यवस्थापिता वाक्यैरङ्गदेन बलीयसा ॥ २ ॥
भावार्थ
महाबली अङ्गदने उनके पूर्व-पराक्रमोंका वर्णन करके अपने वचनोंद्वारा उन्हें सुदृढ़ एवं बल-विक्रमसम्पन्न बनाकर खड़ा कर दिया था ॥ २ ॥
प्रयाताश्च गता हर्षं मरणे कृतनिश्चयाः । चक्रुः सुतुमुलं युद्धं वानरास्त्यक्तजीविताः ॥ ३ ॥
भावार्थ
अब वे वानर मरनेका निश्चय करके बड़े हर्षके साथ आगे बढ़े और जीवनका मोह छोड़कर अत्यन्त भयंकर युद्ध करने लगे ॥ ३ ॥
अथ वृक्षान् महाकायाः सानूनि सुमहान्ति च । वानरास्तूर्णमुद्यम्य कुम्भकर्णमभिद्रवन् ॥ ४ ॥
भावार्थ
उन विशालकाय वानर-वीरोंने वृक्ष तथा बड़े-बड़े पर्वतशिखर लेकर तुरंत ही कुम्भकर्णपर धावा किया ॥ ४ ॥
कुम्भकर्णः सुसंक्रुद्धो गदामुद्यम्य वीर्यवान् । धर्षयन् स महाकायः समन्ताद् व्यक्षिपद् रिपून् ॥ ५ ॥
भावार्थ
परंतु अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए विक्रमशाली महाकाय कुम्भकर्णने गदा उठाकर शत्रुओंको घायल करके उन्हें चारों ओर बिखेर दिया ॥ ५ ॥
शतानि सप्त चाष्टौ च सहस्राणि च वानराः । प्रकीर्णाः शेरते भूमौ कुम्भकर्णेन ताडिताः ॥ ६ ॥
भावार्थ
कुम्भकर्णकी मार खाकर आठ हजार सात सौ वानर तत्काल धराशायी हो गये ॥ ६ ॥
षोडशाष्टौ च दश च विंशात्त्रिंशत्तथैव च । परिक्षिप्य च बाहुभ्यां खादन् स परिधावति । भक्षयन् भृशसंक्रुद्धो गरुडः पन्नगानिव ॥ ७ ॥
भावार्थ
वह सोलह, आठ, दस, बीस और तीस-तीस वानरोंको अपनी दोनों भुजाओंसे समेट लेता और जैसे गरुड़ सर्पोंको खाता है, उसी प्रकार अत्यन्त क्रोधपूर्वक उनका भक्षण करता हुआ सब ओर दौड़ता-फिरता था ॥ ७ ॥
कृच्छ्रेण च समाश्वस्ताः संगम्य च ततस्ततः । वृक्षाद्रिहस्ता हरयस्तस्थुः संग्राममूर्धनि ॥ ८ ॥
भावार्थ
उस समय वानर बड़ी कठिनाईसे धैर्य धारण करके इधर-उधरसे एकत्र हुए और वृक्ष तथा पर्वतशिखर हाथमें लेकर संग्रामभूमिमें डटे रहे ॥ ८ ॥
ततः पर्वतमुत्पाट्य द्विविदः प्लवगर्षभः । दुद्राव गिरिशृङ्गाभं विलम्ब इव तोयदः ॥ ९ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् मेघके समान विशाल शरीरवाले वानरशिरोमणि द्विविदने एक पर्वत उखाड़कर पर्वतशिखरके समान ऊँचे कुम्भकर्णपर आक्रमण किया ॥ ९ ॥
तं समुत्पाट्य चिक्षेप कुम्भकर्णाय वानरः । तमप्राप्य महाकायं तस्य सैन्येऽपतत् ततः ॥ १० ॥
भावार्थ
उस पर्वतको उखाड़कर द्विविदने कुम्भकर्णके ऊपर फेंका; किंतु वह उस विशालकाय राक्षसतक न पहुँचकर उसकी सेनामें जा गिरा ॥ १० ॥
ममर्दाश्वान् गजांश्चापि रथांश्चापि गजोत्तमान् । तानि चान्यानि रक्षांसि एवं चान्यद्रिरेः शिरः ॥ ११ ॥ तच्छैलवेगाभिहतं हताश्वं हतसारथिम् । रक्षसां रुधिरक्लिन्नं बभूवायोधनं महत् ॥ १२ ॥
भावार्थ
उस पर्वत-शिखरने राक्षससेनाके कितने ही घोड़ों, हाथियों, रथों, गजराजों तथा दूसरे-दूसरे राक्षसोंको भी कुचल डाला ॥ उस समय वह महान् युद्धस्थल, जिसमें शैल-शिखरके वेगसे कितने ही घोड़े और सारथि कुचल गये थे, राक्षसोंके रुधिरसे गीला हो गया ॥ १२ ॥
रथिनो वानरेन्द्राणां शरैः कालान्तकोपमैः । शिरांसि नर्दतां जह्रुः सहसा भीमनिःस्वनाः ॥ १३ ॥ वानराश्च महात्मानः समुत्पाट्य महाद्रुमान् । रथानश्वान् गजानुघ्रन् राक्षसानभ्यसूदयन् ॥ १४ ॥
भावार्थ
तब भयानक सिंहनाद करनेवाले राक्षस-सेनाके रथियोंने प्रलयकालीन यमराजके समान भयंकर बाणोंसे गर्जते हुए वानर-यूथपतियोंके मस्तकोंको सहसा काटना आरम्भ किया ॥ महामनस्वी वानर भी बड़े-बड़े पेड़ उखाड़कर शत्रुसेनाके रथ, घोड़े, हाथी, ऊँट और राक्षसोंका संहार करने लगे १४
हनूमाꣳश्शैलशृङ्गाणि शिलाश्च विविधान् द्रुमान् । ववर्ष कुम्भकर्णस्य शिरस्यम्बरमास्थितः ॥ १५ ॥
भावार्थ
हनुमान्जी आकाशमें पहुँचकर कुम्भकर्णके मस्तकपर पर्वत-शिखरों, शिलाओं और नाना प्रकारके वृक्षोंकी वर्षा करने लगे ॥ १५ ॥
तानि पर्वतशृङ्गाणि शूलेन स विभेद ह । बभञ्ज वृक्षवर्षं च कुम्भकर्णो महाबलः ॥ १६ ॥
भावार्थ
परंतु महाबली कुम्भकर्णने अपने शूलसे उन पर्वतशिखरोंको फोड़ डाला और बरसाये जानेवाले वृक्षोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ १६ ॥
ततो हरीणां तदनीकमुग्रं दुद्राव शूलं निशितं प्रगृह्य । तस्थौ स तस्यापततः परस्ता- न्महीधराग्रं हनुमान् प्रगृह्य ॥ १७ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् उसने अपने तीक्ष्ण शूलको हाथमें लेकर वानरोंकी उस भयंकर सेनापर आक्रमण किया । यह देख हनुमान्जी एक पर्वत-शिखर हाथमें लेकर उस आक्रमणकारी राक्षसका सामना करनेके लिये खड़े हो गये ॥ १७ ॥
स कुम्भकर्णं कुपितो जघान वेगेन शैलोत्तमभीमकायम् । संचुक्षुभे तेन तदाभिभूतो मेदार्द्रगात्रो रुधिरावसिक्तः ॥ १८ ॥
भावार्थ
उन्होंने कुपित हो श्रेष्ठ पर्वतके समान भयानक शरीरवाले कुम्भकर्णपर बड़े वेगसे प्रहार किया । उनकी उस मारसे कुम्भकर्ण व्याकुल हो उठा । उसका सारा शरीर चर्बीसे गीला हो गया और वह रक्तसे नहा गया ॥ १८ ॥
स शूलमाविध्य तडित्प्रकाशां गिरिं यथा प्रज्वलिताग्निशृङ्गम् । बाह्वन्तरे मारुतिमाजघान गुहोऽचलं क्रौञ्चमिवोग्रशक्त्या ॥ १९ ॥
भावार्थ
फिर तो उसने भी बिजलीके समान चमकते हुए शूलको घुमाकर जिसके शिखरपर आग जल रही हो, उस पर्वतके समान हनुमान्जीकी छातीमें उसी तरह मारा, जैसे स्वामी कार्तिकेयने अपनी भयानक शक्तिसे क्रौञ्चपर्वतपर आघात किया था ॥ १९ ॥
स शूलनिर्भिन्नमहाभुजान्तरः प्रविह्वलः शोणितमुद्वमन् मुखात् । ननाद भीमं हनुमान् महाहवे युगान्तमेघस्तनितस्वनोपमम् ॥ २० ॥
भावार्थ
उस महासमरमें शूलकी चोटसे हनुमान्जीकी दोनों भुजाओंके बीचका भाग ( वक्षःस्थल ) विदीर्ण हो गया । वे व्याकुल हो गये और मुँहसे रक्त वमन करने लगे । उस समय पीड़ाके मारे उन्होंने बड़ा भयंकर आर्तनाद किया, जो प्रलयकालके मेघोंकी गर्जनाके समान जान पड़ता था ॥ २० ॥
ततो विनेदुः सहसा प्रहृष्टा रक्षोगणास्तं व्यथितं समीक्ष्य । प्लवंगमास्तु व्यथिता भयार्ताः प्रदुद्रुवुः संयति कुम्भकर्णात् ॥ २१ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीको आघातसे पीड़ित देख राक्षसोंके हर्षकी सीमा न रही । वे सहसा जोर-जोरसे कोलाहल करने लगे । इधर कुम्भकर्णके भयसे पीड़ित एवं व्यथित हुए वानर युद्धभूमि छोड़कर भागने लगे ॥ २१ ॥
ततस्तु नीलो बलवान् पर्यवस्थापयन् बलम् । प्रविचिक्षेप शैलाग्रं कुम्भकर्णाय धीमते ॥ २२ ॥
भावार्थ
यह देख बलवान् नीलने वानरसेनाको धैर्य बँधाने एवं सुस्थिर रखनेके लिये बुद्धिमान् कुम्भकर्णपर एक पर्वतका शिखर चलाया ॥ २२ ॥
तदापतन्तं सम्प्रेक्ष्य मुष्टिनाभिजघान ह । मुष्टिप्रहाराभिहतं तच्छैलाग्रं व्यशीर्यत । सविस्फुलिङ्गं सज्वालं निपपात महीतले ॥ २३ ॥
भावार्थ
उस पर्वतशिखरको अपने ऊपर आता देख कुम्भकर्णने उसपर मुक्केसे आघात किया । उसका मुक्का लगते ही वह शिखर चूर-चूर होकर बिखर गया और आगकी चिनगारियाँ तथा लपटें निकालता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २३ ॥
ऋषभः शरभो नीलो गवाक्षो गन्धमादनः । पञ्च वानरशार्दूलाः कुम्भकर्णमुपाद्रवन् ॥ २४ ॥
भावार्थ
इसके बाद ऋषभ, शरभ, नील, गवाक्ष और गन्धमादन— इन पाँच प्रमुख वानरवीरोंने कुम्भकर्णपर धावा किया ॥ २४ ॥
शैलैर्वृक्षैस्तलैः पादैर्मुष्टिभिश्च महाबलाः । कुम्भकर्णं महाकायं निजघ्नुः सर्वतो युधि ॥ २५ ॥
भावार्थ
वे महाबली वीर चारों ओरसे घेरकर युद्धस्थलमें महाकाय कुम्भकर्णको पर्वतों, वृक्षों, थप्पड़ों, लातों और मुक्कोंसे मारने लगे ॥ २५ ॥
स्पर्शानिव प्रहारांस्तान् वेदयानो न विव्यथे । ऋषभं तु महावेगं बाहुभ्यां परिषस्वजे ॥ २६ ॥
भावार्थ
यद्यपि ये लोग बड़े जोर-जोरसे प्रहार करते थे, तथापि उसे ऐसा जान पड़ता था मानो कोई धीरेसे छू रहा हो । अतः इनकी मारसे उसे तनिक भी पीड़ा नहीं हुई । उसने महान् वेगशाली ऋषभको अपनी दोनों भुजाओंमें भर लिया ॥२६॥
कुम्भकर्णभुजाभ्यां तु पीडितो वानरर्षभः । निपपातर्षभो भीमः प्रमुखागतशोणितः ॥ २७ ॥
भावार्थ
कुम्भकर्णकी दोनों भुजाओंसे दबकर पीड़ित हुए भयंकर वानरशिरोमणि ऋषभके मुँहसे खून निकलने लगा और वे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २७ ॥
मुष्टिना शरभं हत्वा जानुना नीलमाहवे । आजघान गवाक्षं तु तलेनेन्द्ररिपुस्तदा । पादेनाभ्यहनत् क्रुद्धस्तरसा गन्धमादनम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर उस समरभूमिमें इन्द्रद्रोही कुम्भकर्णने शरभको मुक्केसे मारकर नीलको घुटनेसे रगड़ दिया और गवाक्षको थप्पड़से मारा । फिर क्रोधसे भरकर उसने गन्धमादनको बड़े वेगसे लात मारी ॥ २८ ॥
दत्तप्रहारव्यथिता मुमुहुः शोणितोक्षिताः । निपेतुस्ते तु मेदिन्यां निकृत्ता इव किंशुकाः ॥ २९ ॥
भावार्थ
उसके प्रहारसे व्यथित हुए वानर मूर्च्छित हो गये और रक्तसे नहा उठे । फिर कटे हुए पलाश-वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २९ ॥
तेषु वानरमुख्येषु पातितेषु महात्मसु । वानराणां सहस्राणि कुम्भकर्णं प्रदुद्रुवुः ॥ ३० ॥
भावार्थ
उन महामनस्वी प्रमुख वानरोंके धराशायी हो जानेपर हजारों वानर एक साथ कुम्भकर्णपर टूट पड़े ॥ ३० ॥
तं शैलमिव शैलाभाः सर्वे तु प्लवगर्षभाः । समारुह्य समुत्पत्य दद॑शुश्च महाबलाः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
पर्वतके समान प्रतीत होनेवाले वे समस्त महाबली वानरयूथपति उस पर्वताकार राक्षसके ऊपर चढ़ गये और उछल-उछलकर उसे दाँतोंसे काटने लगे ॥ ३१ ॥
तं नखैर्दशनैश्चापि मुष्टिभिर्बाहुभिस्तथा । कुम्भकर्णं महाबाहुं निजघ्नुः प्लवगर्षभाः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
वे वानरशिरोमणि नखों, दाँतों, मुक्कों और हाथोंसे महाबाहु कुम्भकर्णको मारने लगे ॥ ३२ ॥
स वानरसहस्रैस्तु विचितः पर्वतोपमः । रराज राक्षसव्याघ्रो गिरिरात्मरुहैरिव ॥ ३३ ॥
भावार्थ
जैसे पर्वत अपने ऊपर उगे हुए वृक्षोंसे सुशोभित होता है, उसी प्रकार सहस्रों वानरोंसे व्याप्त हुआ वह पर्वताकार राक्षस वीर अद्भुत शोभा पाने लगा ॥ ३३ ॥
बाहुभ्यां वानरान् सर्वान् प्रगृह्य स महाबलः । भक्षयामास संक्रुद्धो गरुडः पन्नगानिव ॥ ३४ ॥
भावार्थ
जैसे गरुड़ सर्पोंको अपना आहार बनाते हैं, उसी तरह अत्यन्त कुपित हुआ वह महाबली राक्षस समस्त वानरोंको दोनों हाथोंसे पकड़-पकड़कर भक्षण करने लगा ॥ ३४ ॥
प्रक्षिप्ताः कुम्भकर्णेन वक्त्रे पातालसंनिभे । नासापुटाभ्यां संजग्मुः कर्णाभ्यां चैव वानराः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
कुम्भकर्ण अपने पातालके समान मुखमें वानरोंको झोंकता जाता था और वे उसके कानों तथा नाकोंकी राहसे बाहर निकलते जाते थे ॥ ३५ ॥
भक्षयन् भृशसंक्रुद्धो हरीन् पर्वतसंनिभः । बभञ्ज वानरान् सर्वान् संक्रुद्धो राक्षसोत्तमः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
अत्यन्त क्रोधसे भरकर वानरोंका भक्षण करते हुए पर्वतके समान विशालकाय उस राक्षसराजने समस्त वानरोंके अङ्ग-भङ्ग कर डाले ॥ ३६ ॥
मांसशोणितसंक्लेदां कुर्वन् भूमिं स राक्षसः । चचार हरिसैन्येषु कालाग्निरिव मूर्च्छितः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
रणभूमिमें रक्त और मांसकी कीच मचाता हुआ वह राक्षस बढ़ी हुई प्रलयाग्निके समान वानरसेनामें विचरने लगा ॥ ३७ ॥
वज्रहस्तो यथा शक्रः पाशहस्त इवान्तकः । शूलहस्तो बभौ युद्धे कुम्भकर्णो महाबलः ॥ ३८ ॥
भावार्थ
शूल हाथमें लेकर संग्रामभूमिमें विचरता हुआ महाबली कुम्भकर्ण वज्रधारी इन्द्र और पाशधारी यमराजके समान जान पड़ता था ॥ ३८ ॥
यथा शुष्काण्यरण्यानि ग्रीष्मे दहति पावकः । तथा वानरसैन्यानि कुम्भकर्णो ददाह सः ॥ ३९ ॥ ततस्ते वध्यमानास्तु हतयूथाः प्लवंगमाः । वानरा भयसंविग्ना विनेदुर्विकृतैः स्वरैः ॥ ४० ॥
भावार्थ
जैसे ग्रीष्म ऋतुमें दावानल सूखे जंगलोंको जला देता है, उसी प्रकार कुम्भकर्ण वानरसेनाओंको दग्ध करने लगा ॥ जिनके यूथ-के-यूथ नष्ट हो गये थे, वे वानर कुम्भकर्णकी मार खाकर भयसे उद्विग्न हो उठे और विकृत स्वरमें चीत्कार करने लगे ॥ ४० ॥
अनेकशो वध्यमानाः कुम्भकर्णेन वानराः । राघवं शरणं जग्मुर्व्यथिता भिन्नचेतसः ॥ ४१ ॥ प्रभग्नान् वानरान् दृष्ट्वा वज्रहस्तात्मजात्मजः । अभ्यधावत वेगेन कुम्भकर्णं महाहवे ॥ ४२ ॥
भावार्थ
कुम्भकर्णके हाथसे मारे जाते हुए बहुत-से वानर, जिनका दिल टूट गया था, व्यथित हो श्रीरघुनाथजीकी शरणमें गये ॥ वानरोंको भागते देख वालिकुमार अङ्गद उस महासमरमें कुम्भकर्णकी ओर बड़े वेगसे दौड़े ॥ ४२ ॥
शैलशृङ्गं महद् गृह्य विनदन् स मुहुर्मुहुः । त्रासयन् राक्षसान् सर्वान् कुम्भकर्णपदानुगान् ॥ ४३ ॥ चिक्षेप शैलशिखरं कुम्भकर्णस्य मूर्धनि ।
भावार्थ
उन्होंने बारंबार गर्जना करके एक विशाल शैल-शिखर हाथमें ले लिया और कुम्भकर्णके पीछे चलनेवाले समस्त राक्षसोंको भयभीत करते हुए उस पर्वतशिखरको उसके मस्तकपर दे मारा ॥ ४३३ ॥
स तेनाभिहतो मूर्ध्नि शैलेनेन्द्ररिपुस्तदा ॥ ४४ ॥ कुम्भकर्णः प्रजज्वाल क्रोधेन महता तदा । सोऽभ्यधावत वेगेन वालिपुत्रममर्षणः ॥ ४५ ॥
भावार्थ
मस्तकपर उस पर्वत-शिखरकी चोट खाकर इन्द्रद्रोही कुम्भकर्ण उस समय महान् क्रोधसे जल उठा और उस प्रहारको सहन न कर सकनेके कारण बड़े वेगसे वालिपुत्रकी ओर दौड़ा ॥ ४४-४५ ॥
कुम्भकर्णो महानादस्त्रासयन् सर्ववानरान् । शूलं ससर्ज वै रोषादङ्गदे तु महाबलः ॥ ४६ ॥
भावार्थ
बड़े जोरसे गर्जना करनेवाले महाबली कुम्भकर्णने समस्त वानरोंको संत्रस्त करते हुए अङ्गदपर बड़े रोषसे शूलका प्रहार किया ॥ ४६ ॥
तदापतन्तं बलवान् युद्धमार्गविशारदः । लाघवान्मोक्षयामास बलवान् वानरर्षभः ॥ ४७ ॥
भावार्थ
किंतु युद्धमार्गके ज्ञाता बलवान् वानरशिरोमणि अङ्गदने फुर्तीसे हटकर अपनी ओर आते हुए उस शूलसे अपने-आपको बचा लिया ॥ ४७ ॥
उत्पत्य चैनं तरसा तलेनोरस्यताडयत् । स तेनाभिहतः कोपात् प्रसुमोहाचलोपमः ॥ ४८ ॥
भावार्थ
साथ ही बड़े वेगसे उछलकर उन्होंने उसकी छातीमें एक थप्पड़ मारा । क्रोधपूर्वक चलाये हुए उस थप्पड़की मार खाकर वह पर्वताकार राक्षस मूर्च्छित हो गया ॥ ४८ ॥
स लब्धसंज्ञोऽतिबलो मुष्टिं संगृह्य राक्षसः । अपहस्तेन चिक्षेप विसंज्ञः स पपात ह ॥ ४९ ॥
भावार्थ
थोड़ी देरमें जब उसे होश हुआ, तब उस अत्यन्त बलशाली राक्षसने भी बायें हाथसे मुक्का बाँधकर अङ्गदपर प्रहार किया, जिससे वे अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४९ ॥
तस्मिन् प्लवगशार्दूले विसंज्ञे पतिते भुवि । तच्छूलं समुपादाय सुग्रीवमभिदुद्रुवे ॥ ५० ॥
भावार्थ
वानरप्रवर अङ्गदके अचेत एवं धराशायी हो जानेपर कुम्भकर्ण वही शूल लेकर सुग्रीवकी ओर दौड़ा ॥ ५० ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य कुम्भकर्णं महाबलम् । उत्पपात तदा वीरः सुग्रीवो वानराधिपः ॥ ५१ ॥
भावार्थ
महाबली कुम्भकर्णको अपनी ओर आते देख वीर वानरराज सुग्रीव तत्काल ऊपरकी ओर उछले ॥ ५१ ॥
स पर्वताग्रमुत्क्षिप्य समाविध्य महाकपिः । अभिदुद्राव वेगेन कुम्भकर्णं महाबलम् ॥ ५२ ॥ तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य कुम्भकर्णः प्लवंगमम् । तस्थौ विवृत्तसर्वाङ्गो वानरेन्द्रस्य सम्मुखः ॥ ५३ ॥ कपिशोणितदिग्धाङ्गं भक्षयन्तं महाकपीन् । कुम्भकर्णं स्थितं दृष्ट्वा सुग्रीवो वाक्यमब्रवीत् ॥ ५४ ॥
भावार्थ
महाकपि सुग्रीवने एक पर्वत-शिखरको उठा लिया और उसे घुमाकर महाबली कुम्भकर्णपर वेगपूर्वक धावा किया ॥ वानर सुग्रीवको आक्रमण करते देख कुम्भकर्ण अपने सारे अङ्गोंको फैलाकर उन वानरराजके सामने खड़ा हो गया ॥ कुम्भकर्णका सारा शरीर वानरोंके रक्तसे नहा उठा था । वह बड़े-बड़े वानरोंको खाता हुआ उनके सामने खड़ा था । उसे देखकर सुग्रीवने कहा—॥ ५४ ॥
पातिताश्च त्वया वीराः कृतं कर्म सुदुष्करम् । भक्षितानि च सैन्यानि प्राप्तं ते परमं यशः ॥ ५५ ॥ त्यज तद् वानरानीकं प्राकृतैः किं करिष्यसि । सहस्वैकं निपातं मे पर्वतस्यास्य राक्षस ॥ ५६ ॥
भावार्थ
‘राक्षस ! तुमने बहुत-से वीरोंको मार गिराया, अत्यन्त दुष्कर कर्म कर दिखाया और कितने ही सैनिकोंको अपना आहार बना लिया । इससे तुम्हें शौर्यका महान् यश प्राप्त हुआ है । अब इन वानरोंकी सेनाको छोड़ दो । इन साधारण बंदरोंसे लड़कर क्या करोगे ? यदि शक्ति हो तो मेरे चलाये हुए इस पर्वतकी एक ही चोट सह लो’ ॥ ५५-५६ ॥
तद् वाक्यं हरिराजस्य सत्त्वधैर्यसमन्वितम् । श्रुत्वा राक्षसशार्दूलः कुम्भकर्णोऽब्रवीद् वचः ॥ ५७ ॥
भावार्थ
वानरराजकी यह सत्त्व और धैर्यसे युक्त बात सुनकर राक्षसप्रवर कुम्भकर्ण बोला—॥ ५७ ॥
प्रजापतेस्तु पौत्रस्त्वं तथैवर्क्षरजःसुतः । धृतिपौरुषसम्पन्नस्तस्माद् गर्जसि वानर ॥ ५८ ॥
भावार्थ
‘वानर ! तुम प्रजापतिके पौत्र, ऋक्षरजाके पुत्र तथा धैर्य एवं पौरुषसे सम्पन्न हो । इसीलिये इस तरह गरज रहे हो’ ॥ ५८ ॥
स कुम्भकर्णस्य वचो निशम्य व्याविध्य शैलं सहसा मुमोच । तेनाजघानोरसि कुम्भकर्णं शैलेन वज्राशनिसंनिभेन ॥ ५९ ॥
भावार्थ
कुम्भकर्णकी यह बात सुनकर सुग्रीवने उस शैल-शिखरको घुमाकर सहसा उसके ऊपर छोड़ दिया । वह वज्र और अशनिके समान था । उसके द्वारा उन्होंने कुम्भकर्णकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ५९ ॥
तच्छैलशृङ्गं सहसा विभिन्नं भुजान्तरे तस्य तदा विशाले । ततो विषेदुः सहसा प्लवंगा रक्षोगणाश्चापि मुदा विनेदुः ॥ ६० ॥ स शैलशृङ्गाभिहतश्चुकोप ननाद रोषाच्च विवृत्य वक्त्रम् । व्याविध्य शूलं स तडित्प्रकाशं चिक्षेप हर्यृक्षपतेर्वधाय ॥ ६१ ॥
भावार्थ
किंतु उसके विशाल वक्षःस्थलसे टकराकर वह शैल-शिखर सहसा चूर-चूर हो गया । यह देख वानर तत्काल विषादमें डूब गये और राक्षस बड़े हर्षके साथ गर्जना करने लगे॥ उस पर्वत-शिखरकी चोट खाकर कुम्भकर्णको बड़ा क्रोध हुआ । वह रोषसे मुँह फैलाकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगा । फिर उसने बिजलीके समान चमकनेवाले उस शूलको घुमाकर सुग्रीवके वधके लिये चलाया ॥ ६१ ॥
तत् कुम्भकर्णस्य भुजप्रणुन्नं शूलं शितं काञ्चनधामयष्टिम् । क्षिप्रं समुत्पत्य निगृह्य दोर्भ्यां बभञ्ज वेगेन सुतोऽनिलस्य ॥ ६२ ॥
भावार्थ
कुम्भकर्णके हाथसे छूटे हुए उस तीखे शूलको, जिसके डंडेमें सोनेकी लड़ियाँ लगी हुई थीं, वायुपुत्र हनुमान्ने शीघ्र उछलकर दोनों हाथोंसे पकड़ लिया और उसे वेगपूर्वक तोड़ डाला ॥ ६२ ॥
कृतं भारसहस्रस्य शूलं कालायसं महत् । बभञ्ज जानुमारोप्य तदा हृष्टः प्लवंगमः ॥ ६३ ॥
भावार्थ
वह महान् शूल हजार भार काले लोहेका बना हुआ था, जिसे हनुमान्जीने बड़े हर्षके साथ अपने घुटनोंमें लगाकर तत्काल तोड़ दिया ॥ ६३ ॥
शूलं भग्नं हनुमता दृष्ट्वा वानरवाहिनी । हृष्टा ननाद बहुशः सर्वतश्चापि दुद्रुवे ॥ ६४ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीके द्वारा शूलको तोड़ा गया देख वानर-सेना बड़े हर्षसे भरकर बारंबार सिंहनाद करने लगी और चारों ओर दौड़ लगाने लगी ॥ ६४ ॥
बभूवाथ परित्रस्तो राक्षसो विमुखोऽभवत् । सिंहनादं च ते चक्रुः प्रहृष्टा वनगोचराः । मारुतिं पूजयांचकुर्दृष्ट्वा शूलं तथागतम् ॥ ६५ ॥
भावार्थ
परंतु वह राक्षस भयसे थर्रा उठा । उसके मुखपर उदासी छा गयी और वनचारी वानर अत्यन्त प्रसन्न हो सिंहनाद करने लगे । उन सबने शूलको खण्डित हुआ देख पवनकुमार हनुमान्जीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ६५ ॥
स तत् तथा भग्नमवेक्ष्य शूलं चुकोप रक्षोधिपतिर्महात्मा । उत्पाट्य लङ्कामलयात् स शृङ्गं जघान सुग्रीवमुपेत्य तेन ॥ ६६ ॥
भावार्थ
इस प्रकार उस शूलको भग्न हुआ देख महाकाय राक्षसराज कुम्भकर्णको बड़ा क्रोध हुआ और उसने लङ्काके निकटवर्ती मलय पर्वतका शिखर उठाकर सुग्रीवके निकट जा उनपर दे मारा ॥ ६६ ॥
स शैलशृङ्गाभिहतो विसंज्ञः पपात भूमौ युधि वानरेन्द्रः । तं वीक्ष्य भूमौ पतितं विसंज्ञं नेदुः प्रहृष्टा युधि यातुधानाः ॥ ६७ ॥
भावार्थ
उस शैलशिखरसे आहत हो वानरराज सुग्रीव अपनी सुध-बुध खो बैठे और युद्धभूमिमें गिर पड़े । उन्हें अचेत होकर पृथ्वीपर पड़ा देख निशाचरोंको बड़ी प्रसन्नता हुई और वे रणक्षेत्रमें सिंहनाद करने लगे ॥ ६७ ॥
समभ्युपेत्याद्भुतघोरवीर्यं स कुम्भकर्णो युधि वानरेन्द्रम् । जहार सुग्रीवमभिप्रगृह्य यथानिलो मेघमिव प्रचण्डः ॥ ६८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर कुम्भकर्णने युद्धस्थलमें अद्भुत एवं भयानक पराक्रम प्रकट करनेवाले वानरराज सुग्रीवके पास जाकर उन्हें उठा लिया और जैसे प्रचण्ड वायु बादलोंको उड़ा ले जाती है, उसी तरह वह उन्हें हर ले गया ॥ ६८ ॥
स तं महामेघनिकाशरूप- मुत्पाट्य गच्छन् युधि कुम्भकर्णः । रराज मेरुप्रतिमानरूपो मेरुर्यथा व्युच्छ्रितघोरशृङ्गः ॥ ६९ ॥
भावार्थ
कुम्भकर्णका स्वरूप मेरु पर्वतके समान जान पड़ता था । वह महान् मेघके समान रूपवाले सुग्रीवको उठाकर जब युद्धस्थलसे चला, उस समय भयानक ऊँचे शिखरोंवाले मेरुगिरिके समान ही शोभा पाने लगा ॥ ६९ ॥
ततस्तमादाय जगाम वीरः संस्तूयमानो युधि राक्षसेन्द्रः । शृण्वन् निनादं त्रिदिवालयानां प्लवङ्गराजग्रहविस्मितानाम् ॥ ७० ॥
भावार्थ
उन्हें लेकर वह वीर राक्षसराज लङ्काकी ओर चल दिया । उस समय युद्धस्थलमें सभी राक्षस उसकी स्तुति कर रहे थे । वानरराजके पकड़े जानेसे आश्चर्यचकित हुए देवताओंका दुःखजनित शब्द उसे स्पष्ट सुनायी दे रहा था ॥ ७० ॥
ततस्तमादाय तदा स मेने हरीन्द्रमिन्द्रोपममिन्द्रवीर्यः । अस्मिन् हते सर्वमिदं हतं स्यात् सराघवं सैन्यमितीन्द्रशत्रुः ॥ ७१ ॥
भावार्थ
इन्द्रके समान पराक्रमी इन्द्रद्रोही कुम्भकर्णने उस समय देवेन्द्रतुल्य तेजस्वी वानरराज सुग्रीवको पकड़कर मन-ही-मन यह मान लिया कि इनके मारे जानेसे श्रीरामसहित यह सारी वानर-सेना स्वतः नष्ट हो जायगी ॥ ७१ ॥
विद्रुतां वाहिनीं दृष्ट्वा वानराणामितस्ततः । कुम्भकर्णेन सुग्रीवं गृहीतं चापि वानरम् ॥ ७२ ॥ हनूमांश्चिन्तयामास मतिमान् मारुतात्मजः । एवं गृहीते सुग्रीवे किं कर्तव्यं मया भवेत् ॥ ७३ ॥
भावार्थ
‘वानरोंकी सेना इधर-उधर भाग रही है और वानरराज सुग्रीवको कुम्भकर्णने पकड़ लिया है’, यह देखकर बुद्धिमान् पवनकुमार हनुमान्ने सोचा—‘सुग्रीवके इस प्रकार पकड़ लिये जानेपर मुझे क्या करना चाहिये ? ॥ ७२-७३ ॥
यद्धि न्याय्यं मया कर्तुं तत् करिष्याम्यसंशयम् । भूत्वा पर्वतसंकाशो नाशयिष्यामि राक्षसम् ॥ ७४ ॥
भावार्थ
‘मेरे लिये जो भी करना उचित होगा, उसे मैं निःसंदेह करूँगा । पर्वताकार रूप धारण करके उस राक्षसका नाश कर डालूँगा ॥७४॥
मया हते संयति कुम्भकर्णे महाबले मुष्टिविशीर्णदेहे । विमोचिते वानरपार्थिवे च भवन्तु हृष्टाः प्लवगाः समग्राः ॥ अथवा स्वयमप्येष मोक्षं प्राप्स्यति वानरः । गृहीतोऽयं यदि भवेत् त्रिदशैः सासुरोरगैः ॥ ७६ ॥ मन्ये न तावदात्मानं बुध्यते वानराधिपः । शैलप्रहाराभिहतः कुम्भकर्णेन संयुगे ॥ ७७ ॥
भावार्थ
‘युद्धस्थलमें अपने मुक्कोंसे मार-मारकर महाबली कुम्भकर्णके शरीरको चूर-चूर कर दूँगा; इस प्रकार जब वह मेरे हाथसे मारा जायगा तथा वानरराज सुग्रीवको उसकी कैदसे छुड़ा लिया जायगा, तब सारे वानर हर्षसे खिल उठेंगे; अच्छा ऐसाही हो ॥ ‘अथवा ये सुग्रीव स्वयं ही उसकी पकड़से छूट जायँगे । यदि इन्हें देवता, असुर अथवा नाग भी पकड़ लें तो ये अपने ही प्रयत्नसे उनकी कैदसे भी छुटकारा पा जायँगे ॥ ‘मैं समझता हूँ कि युद्धमें कुम्भकर्णने शिलाके प्रहारसे सुग्रीवको जो गहरी चोट पहुँचायी है, उससे अचेत हुए वानरराजको अभीतक होश नहीं हुआ है ॥ ७७ ॥
अयं मुहूर्तात् सुग्रीवो लब्धसंज्ञो महाहवे । आत्मनो वानराणां च यत् पथ्यं तत् करिष्यति ॥ ७८ ॥ मया तु मोक्षितस्यास्य सुग्रीवस्य महात्मनः । अप्रीतिश्च भवेत् कष्टा कीर्तिनाशश्च शाश्वतः ॥ ७९ ॥
भावार्थ
‘एक ही मुहूर्तमें जब सुग्रीव सचेत होंगे, तब महासमरमें अपने और वानरोंके लिये जो हितकर कर्म होगा, उसे करेंगे ॥ ‘यदि मैं इन्हें छुड़ाऊँ तो महात्मा सुग्रीवको प्रसन्नता नहीं होगी, उल्टे इनके मनमें खेद होगा और सदाके लिये इनके यशका नाश हो जायगा ॥ ७९ ॥
तस्मान्मुहूर्तं काङ्क्षिष्ये विक्रमं मोक्षितस्य तु । भिन्नं च वानरानीकं तावदाश्वासयाम्यहम् ॥ ८० ॥
भावार्थ
‘अतः मैं एक मुहूर्ततक उनके छूटनेकी प्रतीक्षा करूँगा । फिर वे छूट जायँगे तो उनका पराक्रम देखूँगा । तबतक भागी हुई वानर-सेनाको धैर्य बँधाता हूँ’ ॥ ८० ॥
इत्येवं चिन्तयित्वाथ हनूमान् मारुतात्मजः । भूयः संस्तम्भयामास वानराणां महाचमूम् ॥ ८१ ॥ स कुम्भकर्णोऽथ विवेश लङ्कां स्फुरन्तमादाय महाहरिं तम् । विमानचर्यागृहगोपुरस्थैः पुष्पाग्र्यवर्षैरभिपूज्यमानः ॥ ८२ ॥
भावार्थ
ऐसा विचारकर पवनकुमार हनुमान्ने वानरोंकी उस विशाल वाहिनीको पुनः आश्वासन दे स्थिरतापूर्वक स्थापित किया॥ उधर कुम्भकर्ण हाथ-पैर हिलाते हुए महावानर सुग्रीवको लिये-दिये लङ्कामें घुस गया । उस समय विमानों ( सतमहले मकानों ), सड़कके दोनों ओर बनी हुई गृहपंक्तियों तथा गोपुरोंमें रहनेवाले स्त्री-पुरुष उत्तम फूलोंकी वर्षा करके कुम्भकर्णका स्वागत-सत्कार कर रहे थे ॥ ८२ ॥
लाजगन्धोदवर्षैस्तु सेच्यमानः शनैः शनैः । राजवीथ्यास्तु शीतत्वात् संज्ञां प्राप महाबलः ॥ ८३ ॥
भावार्थ
लावा और गन्धयुक्त जलकी वर्षाद्वारा अभिषिक्त हो राजमार्गकी शीतलताके कारण महाबली सुग्रीवको धीरे-धीरे होश आ गया ॥ ८३ ॥
ततः स संज्ञामुपलभ्य कृच्छ्राद् बलीयसस्तस्य भुजान्तरस्थः । अवेक्षमाणः पुरराजमार्गं विचिन्तयामास मुहुर्महात्मा ॥ ८४ ॥
भावार्थ
तब बड़ी कठिनाईसे सचेत हो बलवान् कुम्भकर्णकी भुजाओंमें दबे हुए महात्मा सुग्रीव नगर और राजमार्गकी ओर देखकर बारंबार इस प्रकार विचार करने लगे—॥ ८४ ॥
एवं गृहीतेन कथं नु नाम शक्यं मया सम्प्रतिकर्तुमद्य । तथा करिष्यामि यथा हरीणां भविष्यतीष्टं च हितं च कार्यम् ॥ ८५ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार इस राक्षसकी पकड़में आकर अब मैं किस तरह इससे भरपूर बदला ले सकता हूँ ? मैं वही करूँगा, जिससे वानरोंका अभीष्ट और हितकर कार्य हो’ ॥ ८५ ॥
ततः कराग्रैः सहसा समेत्य राजा हरीणाममरेन्द्रशत्रोः । खरैश्च कर्णौ दशनैश्च नासां ददंश पादैर्विददार पार्श्वौ ॥ ८६ ॥
भावार्थ
ऐसा निश्चय करके वानरोंके राजा सुग्रीवने सहसा हाथोंके तीखे नखोंद्वारा इन्द्रशत्रु कुम्भकर्णके दोनों कान नोच लिये, दाँतोंसे उसकी नाक काट ली और अपने पैरोंके नखोंसे उस राक्षसकी दोनों पसलियाँ फाड़ डालीं ॥ ८६ ॥
स कुम्भकर्णो हृतकर्णनासो विदारितस्तेन रदैर्नखैश्च । रोषाभिभूतः क्षतजार्द्रगात्रः सुग्रीवमाविध्य पिपेष भूमौ ॥ ८७ ॥
भावार्थ
सुग्रीवके दाँतों और नखोंसे दोनों कानोंका निम्न भाग और नाक कट जाने तथा पार्श्वभागके विदीर्ण हो जानेसे कुम्भकर्णका सारा शरीर लहूलुहान हो गया । तब उसे बड़ा रोष हुआ और उसने सुग्रीवको घुमाकर भूमिपर पटक दिया । पटककर वह उन्हें भूमिपर रगड़ने लगा ॥ ८७ ॥
स भूतले भीमबलाभिपिष्टः सुरारिभिस्तैरभिहन्यमानः । जगाम खं कन्दुकवज्जवेन पुनश्च रामेण समाजगाम ॥ ८८ ॥
भावार्थ
भयानक बलशाली कुम्भकर्ण जब उन्हें पृथ्वीपर रगड़ रहा था और वे देवद्रोही राक्षस उनपर सब ओरसे चोट कर रहे थे, उसी समय सुग्रीव सहसा गेंदकी भाँति वेगपूर्वक आकाशमें उछले और पुनः श्रीरामचन्द्रजीसे आ मिले ॥८८॥
कर्णनासाविहीनस्तु कुम्भकर्णो महाबलः । रराज शोणितोत्सिक्तो गिरिः प्रस्रवणैरिव ॥ ८९ ॥
भावार्थ
महाबली कुम्भकर्ण अपनी नाक और कान खो बैठा । उसके अङ्गोंसे इस तरह खून बहने लगा, जैसे पर्वतसे पानीके झरने गिरते हैं । वह रक्तसे नहा उठा और झरनोंसे युक्त शैलशिखरकी भाँति शोभा पाने लगा ॥ ८९ ॥
शोणितार्द्रो महाकायो राक्षसो भीमदर्शनः । युद्धायाभिमुखो भूयो मनश्चक्रे निशाचरः ॥ ९० ॥
भावार्थ
महाकाय राक्षस रक्तसे नहाकर और भी भयानक दिखायी देने लगा । उस निशाचरने पुनः शत्रुके सामने जाकर युद्ध करनेका विचार किया ॥ ९० ॥
अमर्षाच्छोणितोद्गारी शुशुभे रावणानुजः । नीलाञ्जनचयप्रख्यः ससंध्य इव तोयदः ॥ ९१ ॥
भावार्थ
अमर्षपूर्वक रक्त वमन करता हुआ रावणका छोटा भाई कुम्भकर्ण, जिसके शरीरका रंग काले मेघके समान था, संध्याकालके बादलकी भाँति सुशोभित हो रहा था ॥ ९१ ॥
गते च तस्मिन् सुरराजशत्रुः क्रोधात् प्रदुद्राव रणाय भूयः । अनायुधोऽस्मीति विचिन्त्य रौद्रो घोरं तदा मुद्गरमाससाद ॥ ९२ ॥ ततः स पुर्याः सहसा महौजा निष्कम्य तद् वानरसैन्यमुग्रम् । बभक्ष रक्षो युधि कुम्भकर्णः प्रजा युगान्ताग्निरिव प्रवृद्धः ॥ ९३ ॥
भावार्थ
सुग्रीवके निकल भागनेपर वह इन्द्रद्रोही राक्षस फिर युद्धके लिये दौड़ा । उस समय यह सोचकर कि ‘मेरे पास कोई हथियार नहीं है’ उसने एक बड़ा भयंकर मुद्गर ले लिया ॥ तदनन्तर महाबलशाली राक्षस कुम्भकर्ण सहसा लङ्कापुरीसे निकलकर प्रजाका भक्षण करनेवाली प्रलयकालकी प्रज्वलित अग्निके समान उस भयंकर वानर-सेनाको युद्धस्थलमें अपना आहार बनाने लगा ॥ ९३ ॥
बुभुक्षितः शोणितमांसगृध्नुः प्रविश्य तद् वानरसैन्यमुग्रम् । चखाद रक्षांसि हरीन् पिशाचा- न्नृक्षांश्च मोहाद् युधि कुम्भकर्णः । यथैव मृत्युर्हरते युगान्ते स भक्षयामास हरींश्च मुख्यान् ॥ ९४ ॥
भावार्थ
उस समय कुम्भकर्णको भूख सता रही थी, अतएव वह रक्त और मांसके लिये लालायित हो रहा था । उसने उस भयंकर वानर-सेनामें प्रवेश करके मोहवश वानरों और भालुओंके साथ-साथ राक्षसों तथा पिशाचोंको भी खाना आरम्भ कर दिया । वह प्रधान-प्रधान वानरोंको उसी प्रकार अपना ग्रास बना रहा था, जैसे प्रलयकालमें मृत्यु प्राणियोंके प्राणोंका अपहरण करती है ॥९४॥
एकं द्वौ त्रीन् बहून् क्रुद्धो वानरान् सह राक्षसैः । समादायैकहस्तेन प्रचिक्षेप त्वरन् मुखे ॥ ९५ ॥
भावार्थ
वह बड़ी उतावलीके साथ एक हाथसे क्रोधपूर्वक एक, दो, तीन तथा बहुत-बहुत राक्षसों और वानरोंको समेटकर अपने मुँहमें झोंक लेता था ॥ ९५ ॥
सम्प्रस्रवंस्तदा मेदः शोणितं च महाबलः । वध्यमानो नगेन्द्राग्रैर्भक्षयामास वानरान् ॥ ९६ ॥
भावार्थ
उस समय वह महाबली निशाचर पर्वत-शिखरोंकी मार खाता हुआ भी मुँहसे वानरोंकी चर्बी और रक्त गिराता हुआ उन सबका भक्षण कर रहा था ॥ ९६ ॥
ते भक्ष्यमाणा हरयो रामं जग्मुस्तदा गतिम् । कुम्भकर्णो भृशं क्रुद्धः कपीन् खादन् प्रधावति ॥ ९७ ॥
भावार्थ
उसके द्वारा खाये जाते हुए वानर भयभीत हो उस समय भगवान् श्रीरामकी शरणमें गये । उधर कुम्भकर्ण अत्यन्त कुपित हो वानरोंको अपना आहार बनाता हुआ सब ओर उनपर धावा करने लगा ॥ ९७ ॥
शतानि सप्त चाष्टौ च विंशात्रिंशत् तथैव च । सम्परिष्वज्य बाहुभ्यां खादन् विपरिधावति ॥ ९८ ॥
भावार्थ
वह सात, आठ, बीस, तीस तथा सौ-सौ वानरोंको अपनी दोनों भुजाओंमें भर लेता और उन्हें खाता हुआ रणभूमिमें दौड़ता-फिरता था ॥ ९८ ॥
मेदोवसाशोणितदिग्धगात्रः कर्णावसक्तग्रथितान्त्रमालः । ववर्ष शूलानि सुतीक्ष्णदंष्ट्रः कालो युगान्तस्य इव प्रवृद्धः ॥ ९९ ॥
भावार्थ
उसके शरीरमें मेद, चर्बी और रक्त लिपटे हुए थे। उसके कानोंमें आँतोंकी मालाएँ उलझी हुई थीं तथा उसकी दाढ़ें बहुत तीखी थीं । वह महाप्रलयके समय प्राणियोंका संहार करनेवाले विशाल रूपधारी कालके समान वानरोंपर शूलोंकी वर्षा कर रहा था ॥ ९९ ॥
तस्मिन् काले सुमित्रायाः पुत्रः परबलार्दनः । चकार लक्ष्मणः क्रुद्धो युद्धं परपुरंजयः ॥ १०० ॥
भावार्थ
उस समय शत्रुनगरीपर विजय पाने तथा शत्रुओंका संहार करनेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण कुपित होकर उस राक्षसके साथ युद्ध करने लगे ॥ १०० ॥
स कुम्भकर्णस्य शराञ्शरीरे सप्त वीर्यवान् । निचखानाददे चान्यान् विससर्ज च लक्ष्मणः ॥ १०१ ॥
भावार्थ
उन पराक्रमी लक्ष्मणने कुम्भकर्णके शरीरमें सात बाण धँसा दिये । फिर दूसरे बाण लिये और उन्हें भी उसपर छोड़ दिया ॥ १०१ ॥
पीड्यमानस्तदस्त्रं तु विशेषं तत् स राक्षसः । ततश्चुकोप बलवान् सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ १०२ ॥
भावार्थ
उनसे पीड़ित हुए उस राक्षसने लक्ष्मणके उस अस्त्रको निःशेष कर दिया । तब सुमित्राके आनन्दको बढ़ानेवाले बलवान् लक्ष्मणको बड़ा क्रोध हुआ ॥ १०२ ॥
अथास्य कवचं शुभ्रं जाम्बूनदमयं शुभम् । प्रच्छादयामास शरैः संध्याभ्रमिव मारुतः ॥ १०३ ॥
भावार्थ
उन्होंने कुम्भकर्णके सुवर्णनिर्मित सुन्दर एवं दीप्तिमान् कवचको अपने बाणोंसे ढककर उसी तरह अदृश्य कर दिया, जैसे हवाने संध्याकालके बादलको उखाड़कर अदृश्य कर दिया हो ॥ १०३ ॥
नीलाञ्जनचयप्रख्यः शरैः काञ्चनभूषणैः । आपीड्यमानः शुशुभे मेघैः सूर्य इवांशुमान् ॥ १०४ ॥
भावार्थ
काले कोयलेके ढेरकी-सी कान्तिवाला कुम्भकर्ण लक्ष्मणके सुवर्णभूषित बाणोंसे आच्छादित हो मेघोंसे ढके हुए अंशुमाली सूर्यके समान शोभा पा रहा था ॥ १०४ ॥
ततः स राक्षसो भीमः सुमित्रानन्दवर्धनम् । सावज्ञमेव प्रोवाच वाक्यं मेघौघनिःस्वनः ॥ १०५ ॥ अन्तकस्याप्यकष्टेन युधि जेतारमाहवे । युध्यता मामभीतेन ख्यापिता वीरता त्वया ॥ १०६ ॥
भावार्थ
तब उस भयंकर राक्षसने मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर स्वरसे सुमित्रानन्दन लक्ष्मणका तिरस्कार करते हुए कहा—॥ ‘लक्ष्मण ! मैं युद्धमें यमराजको भी बिना कष्ट उठाये ही जीत लेनेकी शक्ति रखता हूँ । तुमने मेरे साथ निर्भय होकर युद्ध करते हुए अपनी अद्भुत वीरताका परिचय दिया है ॥ १०६ ॥
प्रगृहीतायुधस्येह मृत्योरिव महामृधे । तिष्ठन्नप्यग्रतः पूज्यः किमु युद्धप्रदायकः ॥ १०७ ॥
भावार्थ
‘जब मैं महासमरमें मृत्युके समान हथियार लेकर युद्धके लिये उद्यत होऊँ, उस समय जो मेरे सामने खड़ा रह जाय, वह भी प्रशंसाका पात्र है । फिर जो मुझे युद्ध प्रदान कर रहा हो, उसके लिये तो कहना ही क्या है ? ॥ १०७ ॥
ऐरावतं समारूढो वृतः सर्वामरैः प्रभुः । नैव शक्रोऽपि समरे स्थितपूर्वः कदाचन ॥ १०८ ॥
भावार्थ
‘ऐरावतपर आरूढ़ हो सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए शक्तिशाली इन्द्र भी पहले मेरे सामने युद्धमें नहीं ठहर सके हैं ॥ १०८ ॥
अद्य त्वयाहं सौमित्रे बालेनापि पराक्रमैः । तोषितो गन्तुमिच्छामि त्वामनुज्ञाप्य राघवम् ॥ १०९ ॥
भावार्थ
‘सुमित्रानन्दन ! तुमने बालक होकर भी आज अपने पराक्रमसे मुझे संतुष्ट कर दिया; अतः मैं तुम्हारी अनुमति लेकर युद्धके लिये श्रीरामके पास जाना चाहता हूँ ॥ १०९ ॥
यत् तु वीर्यबलोत्साहैस्तोषितोऽहं रणे त्वया । राममेवैकमिच्छामि हन्तुं यस्मिन् हते हतम् ॥ ११० ॥
भावार्थ
‘तुमने अपने वीर्य, बल और उत्साहसे रणभूमिमें मुझे संतोष प्रदान किया है; इसलिये अब मैं केवल रामको ही मारना चाहता हूँ, जिनके मारे जानेपर सारी शत्रुसेना स्वतः मर जायगी ॥ ११० ॥
रामे मयात्र निहते येऽन्ये स्थास्यन्ति संयुगे । तानहं योधयिष्यामि स्वबलेन प्रमाथिना ॥ १११ ॥
भावार्थ
‘मेरे द्वारा रामके मारे जानेपर जो दूसरे लोग युद्धभूमिमें खड़े रहेंगे, उन सबके साथ मैं अपने संहारकारी बलके द्वारा युद्ध करूँगा’ ॥ १११ ॥
इत्युक्तवाक्यं तद् रक्षः प्रोवाच स्तुतिसंहितम् । मृधे घोरतरं वाक्यं सौमित्रिः प्रहसन्निव ॥ ११२ ॥
भावार्थ
वह राक्षस जब पूर्वोक्त बात कह चुका, तब सुमित्राकुमार लक्ष्मण रणभूमिमें ठठाकर हँस पड़े और उससे प्रशंसामिश्रित कठोर वाणीमें बोले—॥ ११२ ॥
यस्त्वं शक्रादिभिर्देवैरसह्यः प्राप्य पौरुषम् । तत् सत्यं नान्यथा वीर दग्धस्तेऽद्य पराक्रमः ॥ ११३ ॥ एष दाशरथी रामस्तिष्ठत्यद्रिरिवाचलः ।
भावार्थ
‘वीर कुम्भकर्ण ! तुम महान् पौरुष पाकर जो इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी असह्य हो उठे हो,वह तुम्हारा कथन बिल्कुल ठीक है, झूठ नहीं है । मैंने स्वयं अपनी आँखोंसे आज तुम्हारा पराक्रम देख लिया । ये रहे दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम, जो पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हैं’ ॥ ११३½ ॥
इति श्रुत्वा ह्यनादृत्य लक्ष्मणं स निशाचरः ॥ ११४॥ अतिक्रम्य च सौमित्रिं कुम्भकर्णो महाबलः । राममेवाभिदुद्राव कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ ११५॥
भावार्थ
लक्ष्मणकी यह बात सुनकर उसका आदर न करते हुए महाबली निशाचर कुम्भकर्णने सुमित्राकुमारको लाँघकर श्रीरामपर ही धावा किया । उस समय वह अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको कम्पित-सी किये देता था ॥ ११४-११५ ॥
अथ दाशरथी रामो रौद्रमस्त्रं प्रयोजयन् । कुम्भकर्णस्य हृदये ससर्ज निशिताञ्शरान् ॥ ११६॥
भावार्थ
उसे आते देख दशरथनन्दन श्रीरामने रौद्रास्त्रका प्रयोग करके कुम्भकर्णके हृदयमें अनेक तीखे बाण मारे ॥ ११६ ॥
तस्य रामेण विद्धस्य सहसाभिप्रधावतः । अङ्गारमिश्राः क्रुद्धस्य मुखान्निश्चेरुरर्चिषः ॥ ११७॥
भावार्थ
श्रीरामके बाणोंसे घायल हो वह सहसा उनपर टूट पड़ा । उस समय क्रोधसे भरे हुए कुम्भकर्णके मुखसे अङ्गारमिश्रित आगकी लपटें निकल रही थीं ॥ ११७ ॥
रामास्त्रविद्धो घोरं वै नर्दन् राक्षसपुङ्गवः । अभ्यधावत संक्रुद्धो हरीन् विद्रावयन् रणे ॥ ११८॥
भावार्थ
भगवान् श्रीरामके अस्त्रसे पीड़ित हो राक्षसप्रवर कुम्भकर्ण घोर गर्जना करता और रणभूमिमें वानरोंको खदेड़ता हुआ क्रोधपूर्वक उनकी ओर दौड़ा ॥ ११८ ॥
तस्योरसि निमग्नास्ते शरा बर्हिणवाससः । हस्ताच्चास्य परिभ्रष्टा गदा चोर्व्यां पपात ह ॥ ११९॥
भावार्थ
श्रीरामके बाणोंमें मोरके पंख लगे हुए थे । वे कुम्भकर्णकी छातीमें धँस गये । अतः व्याकुलताके कारण उसके हाथसे गदा छूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ११९ ॥
आयुधानि च सर्वाणि विप्रकीर्यन्त भूतले । स निरायुधमात्मानं यदा मेने महाबलः ॥ १२०॥ मुष्टिभ्यां च कराभ्यां च चकार कदनं महत् ।
भावार्थ
इतना ही नहीं, उसके अन्य सब आयुध भी भूमिपर बिखर गये । जब उसने समझ लिया कि अब मेरे पास कोई हथियार नहीं है, तब उस महाबली निशाचरने दोनों मुक्कों और हाथोंसे ही वानरोंका महान् संहार आरम्भ किया ॥ १२०½ ॥
स बाणैरतिविद्धाङ्गः क्षतजेन समुक्षितः । रुधिरं परिसुस्राव गिरिः प्रस्रवणं यथा ॥ १२१॥
भावार्थ
बाणोंसे उसके सारे अङ्ग अत्यन्त घायल हो गये थे, इसलिये वह खूनसे नहा उठा और जैसे पर्वत झरने बहाता है, उसी तरह वह अपनी देहसे रक्तकी धारा बहाने लगा ॥ १२१ ॥
स तीव्रेण च कोपेन रुधिरेण च मूर्च्छितः । वानरान् राक्षसानृक्षान् खादन् स परिधावति ॥ १२२॥
भावार्थ
वह खूनसे लथपथ और दुःसह क्रोधसे व्याकुल होकर वानरों, भालुओं तथा राक्षसोंको भी खाता हुआ चारों ओर दौड़ने लगा ॥ १२२ ॥
अथ शृङ्गं समाविध्य भीमं भीमपराक्रमः । चिक्षेप राममुद्दिश्य बलवानन्तकोपमः ॥ १२३॥
भावार्थ
इसी बीचमें यमराजके समान प्रतीत होनेवाले उस बलवान् एवं भयानक पराक्रमी निशाचरने एक भयंकर पर्वतका शिखर उठाया और उसे घुमाकर श्रीरामचन्द्रजीको लक्ष्य करके चला दिया ॥ १२३ ॥
अप्राप्तमन्तरा रामः सप्तभिस्तमजिह्मगैः । चिच्छेद गिरिशृङ्गं तं पुनः संधाय कार्मुकम् ॥ १२४॥
भावार्थ
परंतु श्रीरामने पुनः धनुषका संधान करके सीधे जानेवाले सात बाण मारकर उस पर्वत-शिखरको बीचमें ही टूक-टूक कर डाला, अपने पासतक नहीं आने दिया ॥ १२४ ॥
ततस्तु रामो धर्मात्मा तस्य शृङ्गं महत् तदा । शरैः काञ्चनचित्राङ्गैश्चिच्छेद भरताग्रजः ॥ १२५॥ तन्मेरुशिखराकारं द्योतमानमिव श्रिया । द्वे शते वानराणां च पतमानमपातयत् ॥ १२६॥
भावार्थ
भरतके बड़े भाई धर्मात्मा श्रीरामने सुवर्णभूषित विचित्र बाणोंद्वारा जब उस महान् पर्वतशिखरको काट दिया, उस समय अपनी प्रभासे प्रकाशित-सा होते हुए उस मेरुपर्वतके शृङ्गसदृश शिखरने भूमिपर गिरते-गिरते दो सौ वानरोंको धराशायी कर दिया ॥ १२५-१२६ ॥
तस्मिन् काले स धर्मात्मा लक्ष्मणो राममब्रवीत् । कुम्भकर्णवधे युक्तो योगान् परिमृशन् बहून् ॥ १२७॥
भावार्थ
उस समय धर्मात्मा लक्ष्मणने, जो कुम्भकर्णके वधके लिये नियुक्त थे, उसके वधकी अनेक युक्तियोंका विचार करते हुए श्रीरामसे कहा—॥ १२७ ॥
नैवायं वानरान् राजन् न विजानाति राक्षसान् । मत्तः शोणितगन्धेन स्वान् परांश्चैव खादति ॥ १२८॥
भावार्थ
‘राजन् ! यह राक्षस शोणितकी गन्धसे मतवाला हो गया है; अतः न वानरोंको पहचानता है न राक्षसोंको । अपने और पराये दोनों ही पक्षोंके योद्धाओंको खा रहा है ॥ १२८ ॥
साध्वेनमधिरोहन्तु सर्वतो वानरर्षभाः । यूथपाश्च यथा मुख्यास्तिष्ठन्त्वस्मिन् समन्ततः ॥ १२९॥
भावार्थ
‘अतः श्रेष्ठ वानर-यूथपतियोंमें जो प्रधान लोग हैं, वे सब ओरसे इसके ऊपर चढ़ जायँ और इसके शरीरपर ही बैठे रहें ॥ १२९ ॥
अद्यायं दुर्मतिः काले गुरुभारप्रपीडितः । प्रचरन् राक्षसो भूमौ नान्यान् हन्यात् प्लवंगमान् ॥ १३०॥
भावार्थ
‘ऐसा होनेसे यह दुर्बुद्धि निशाचर इस समय भारी भारसे पीड़ित हो रणभूमिमें विचरण करते समय दूसरे वानरोंको नहीं मार सकेगा’ ॥ १३० ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजपुत्रस्य धीमतः । ते समारुरुहुर्हृष्टाः कुम्भकर्णं महाबलाः ॥१३१॥ कुम्भकर्णस्तु संक्रुद्धः समारूढः प्लवंगमैः । व्यधूनयत् तान् वेगेन दुष्टहस्तीव हस्तिपान् ॥१३२॥ तान् दृष्ट्वा निर्धुतान् रामो रुष्टोऽयमिति राक्षसम् । समुत्पपात वेगेन धनुरुत्तममाददे ॥१३३॥
भावार्थ
बुद्धिमान् राजकुमार लक्ष्मणकी यह बात सुनकर वे महाबली वानर-यूथपति बड़े हर्षके साथ कुम्भकर्णपर चढ़ गये ॥ वानरोंके चढ़ जानेपर कुम्भकर्ण अत्यन्त कुपित हो उठा और जैसे बिगड़ैल हाथी महावतोंको गिरा देता है, उसी प्रकार उसने वेगपूर्वक वानरोंको अपनी देह हिलाकर गिरा दिया ॥ उन सबको गिराया गया देख श्रीरामने यह समझ लिया कि कुम्भकर्ण रुष्ट हो गया है । फिर वे बड़े वेगसे उछलकर उस राक्षसकी ओर दौड़े और एक उत्तम धनुष हाथमें ले लिया ॥ १३३ ॥
क्रोधरक्तेक्षणो धीरो निर्दहन्निव चक्षुषा । राघवो राक्षसं वेगादभिदुद्राव वेगितः । यूथपान् हर्षयन् सर्वान् कुम्भकर्णबलार्दितान् ॥१३४॥
भावार्थ
उस समय उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे । वे धीर-वीर श्रीरघुनाथजी उसकी ओर इस प्रकार देखने लगे, मानो उसे अपनी दृष्टिसे दग्ध कर डालेंगे । उन्होंने कुम्भकर्णके बलसे पीड़ित समस्त वानरयूथपतियोंका हर्ष बढ़ाते हुए बड़े वेगसे उस राक्षसपर धावा किया ॥ १३४ ॥
स चापमादाय भुजंगकल्पं दृढज्यमुग्रं तपनीयचित्रम् । हरीन् समाश्वास्य समुत्पपात रामो निबद्धोत्तमतूणबाणः ॥१३५॥
भावार्थ
सुदृढ़ प्रत्यञ्चासे संयुक्त, सर्पके समान भयंकर और सुवर्णसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभासे सम्पन्न उग्र धनुषको हाथमें लेकर श्रीरामने उत्तम तरकस और बाण बाँध लिये और वानरोंको आश्वासन देकर उन्होंने कुम्भकर्णपर बड़े वेगसे आक्रमण किया ॥ १३५ ॥
स वानरगणैस्तैस्तु वृतः परमदुर्जयैः । लक्ष्मणानुचरो वीरः सम्प्रतस्थे महाबलः ॥१३६॥
भावार्थ
उस समय अत्यन्त दुर्जय वानरसमूहोंने उन्हें चारों ओरसे घेर रक्खा था । लक्ष्मण उनके पीछे-पीछे चल रहे थे । इस प्रकार वे महाबली वीर श्रीराम आगे बढ़े ॥ १३६ ॥
स ददर्श महात्मानं किरीटिनमरिंदमम् । शोणिताप्लुतरक्ताक्षं कुम्भकर्णं महाबलः ॥१३७॥ सर्वान् समभिधावन्तं यथा रुष्टं दिशागजम् । मार्गमाणं हरीन् क्रुद्धं राक्षसैः परिवारितम् ॥१३८॥
भावार्थ
उन महान् बलशाली श्रीरामने देखा, महाकाय शत्रुदमन कुम्भकर्ण मस्तकपर किरीट धारण किये सब ओर धावा कर रहा है । उसके सारे अङ्ग खूनसे लथपथ हो रहे हैं । वह रोषसे भरे हुए दिग्गजकी भाँति क्रोधपूर्वक वानरोंको खोज रहा है और उन सबपर आक्रमण करता है । बहुत-से राक्षस उसे घेरे हुए हैं ॥ १३७-१३८ ॥
विन्ध्यमन्दरसंकाशं काञ्चनाङ्गदभूषणम् । स्रवन्तं रुधिरं वक्त्राद् वर्षमेघमिवोत्थितम् ॥१३९॥
भावार्थ
वह विन्ध्य और मन्दराचलके समान जान पड़ता है । सोनेके बाजूबंद उसकी भुजाओंको विभूषित किये हुए हैं तथा वह ( वर्षाकालमें ) उमड़े हुए जलवर्षी मेघकी भाँति मुँहसे रक्तकी वर्षा कर रहा है ॥ १३९ ॥
जिह्वया परिलिहन्तं सृक्किणी शोणितोक्षिते । मृद्नन्तं वानरानीकं कालान्तकयमोपमम् ॥१४०॥
भावार्थ
जिह्वाके द्वारा रक्तसे भीगे हुए जबड़े चाट रहा है और प्रलयकालके संहारकारी यमराजकी भाँति वानरोंकी सेनाको रौंद रहा है ॥ १४० ॥
तं दृष्ट्वा राक्षसश्रेष्ठं प्रदीप्तानलवर्चसम् । विस्फारयामास तदा कार्मुकं पुरुषर्षभः ॥१४१॥
भावार्थ
इस प्रकार प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी राक्षसशिरोमणि कुम्भकर्णको देखकर पुरुषप्रवर श्रीरामने तत्काल अपना धनुष खींचा ॥ १४१ ॥
स तस्य चापनिर्घोषात् कुपितो राक्षसर्षभः । अमृष्यमाणस्तं घोषमभिदुद्राव राघवम् ॥१४२॥
भावार्थ
उनके धनुषकी टंकार सुनकर राक्षसश्रेष्ठ कुम्भकर्ण कुपित हो उठा और उस टंकारध्वनिको सहन न करके श्रीरघुनाथजीकी ओर दौड़ा* ॥ १४२ ॥
ततस्तु वातोद्धतमेघकल्पं भुजंगराजोत्तमभोगबाहुः । तमापतन्तं धरणीधराभ- मुवाच रामो युधि कुम्भकर्णम् ॥ १४३॥ न वेद्मि संयुगे सक्तः स्वान् परान् वा निशाचर । रक्षणीयोऽसि मे वत्स सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ एवमुक्तो वचस्तेन कुम्भकर्णेन धीमता । विभीषणो महाबाहुः कुम्भकर्णमुवाच ह ॥ गदितं मे कुलस्यास्य रक्षणार्थमरिंदम । न श्रुतं सर्वरक्षोभिस्ततोऽहं राममागतः ॥ कृतं तु तन्महाभाग सुकृतं दुष्कृतं तु वा । एवमुक्त्वाश्रुपूर्णाक्षो गदापाणिर्विभीषणः । एकान्तमाश्रितो भूत्वा चिन्तयामास संस्थितः ॥
भावार्थ
तदनन्तर जिनकी भुजाएँ नागराज वासुकिके समान विशाल और मोटी थीं, उन भगवान् श्रीरामने पवनकी प्रेरणा-तब श्रीरामचन्द्रजीके लिये युद्ध करनेके निमित्त गदा हाथमें लिये विभीषण उनके आगे आकर खड़े हो गये और उस युद्धस्थलमें भाई होकर भाईका सामना करनेके लिये बड़े वेगसे आगे बढ़े । विभीषणको सामने देखकर कुम्भकर्णने इस प्रकार कहा— ‘वत्स ! तुम भाईका स्नेह छोड़कर श्रीरघुनाथजीका प्रिय करो और रणभूमिमें शीघ्र मेरे ऊपर गदा चलाओ। इस समय तुम क्षात्रधर्ममें दृढ़तापूर्वक स्थिर रहो । तुम जो श्रीरामकी शरणमें आ गये, इससे तुमने हमलोगोंका काम बना दिया । राक्षसोंमें एक तुम्हीं ऐसे हो, जिसने इस जगत्में सत्य और धर्मकी रक्षा की है । जो धर्ममें अनुरक्त होते हैं, उन्हें कभी कोई दुःख नहीं भोगना पड़ता है। अब एकमात्र तुम्हीं इस कुलकी संतानपरम्पराको सुरक्षित रखनेके लिये जीवित रहोगे । श्रीरघुनाथजीकी कृपासे तुम्हें राक्षसोंका राज्य प्राप्त होगा । दुर्जय वीर ! मेरी प्रकृतिसे तो तुम परिचित ही हो; अतः शीघ्र मेरा रास्ता छोड़कर दूर हट जाओ। इस समय सम्भ्रमके कारण मेरी विचारशक्ति नष्ट हो गयी है; अतः तुम्हें मेरे सामने नहीं खड़ा होना चाहिये । निशाचर ! इस समय युद्धमें आसक्त होनेके कारण मुझे अपने अथवा परायेकी पहचान नहीं हो रही है, तथापि वत्स ! तुम मेरे लिये रक्षणीय हो—मैं तुम्हारा वध करना नहीं चाहता । यह तुमसे सची बात कहता हूँ ।’ बुद्धिमान् कुम्भकर्णके ऐसा कहनेपर महाबाहु विभीषणने उससे कहा— ‘शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर ! मैंने इस कुलकी रक्षाके लिये बहुत कुछ कहा था; किंतु समस्त राक्षसोंने मेरी बात नहीं सुनी; अतः मैं निराश होकर श्रीरामकी शरणमें आ गया । महाभाग ! यह मेरे लिये पुण्य हो या पाप । अब मैंने श्रीरामका आश्रय तो ग्रहण कर ही लिया।’ ऐसा कहकर गदाधारी विभीषणके नेत्रोंमें आँसू भर आये और वे एकान्तका आश्रय ले खड़े होकर चिन्ता करने लगे । से उमड़े हुए मेघके समान काले और पर्वतके समान ऊँचे शरीरवाले कुम्भकर्णको आक्रमण करते देख रणभूमिमें उससे कहा—॥ १४३ ॥
आगच्छ रक्षोऽधिप मा विषाद- मवस्थितोऽहं प्रगृहीतचापः । अवेहि मां राक्षसवंशनाशनं यस्त्वं मुहूर्ताद् भविता विचेताः ॥ १४४॥
भावार्थ
‘राक्षसराज ! आओ, विषाद न करो । मैं धनुष लेकर खड़ा हूँ । मुझे राक्षसवंशका विनाश करनेवाला समझो । अब तुम भी दो ही घड़ीमें अपनी चेतना खो बैठोगे ( मर जाओगे )’ ॥ १४४ ॥
रामोऽयमिति विज्ञाय जहास विकृतस्वनम् । अभ्यधावत संक्रुद्धो हरीन् विद्रावयन् रणे ॥ १४५॥
भावार्थ
‘यही राम हैं’—यह जानकर वह राक्षस विकृत स्वरमें अट्टहास करने लगा और अत्यन्त कुपित हो रणक्षेत्रमें वानरोंको भगाता हुआ उनकी ओर दौड़ा ॥ १४५ ॥
दारयन्निव सर्वेषां हृदयानि वनौकसाम् । प्रहस्य विकृतं भीमं स मेघस्तनितोपमम् ॥ १४६॥ कुम्भकर्णो महातेजा राघवं वाक्यमब्रवीत् । नाहं विराधो विज्ञेयो न कबन्धः खरो न च । न वाली न च मारीचः कुम्भकर्णः समागतः ॥ १४७॥
भावार्थ
महातेजस्वी कुम्भकर्ण समस्त वानरोंके हृदयको विदीर्ण-सा करता हुआ विकृत स्वरमें जोर-जोरसे हँसकर मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर एवं भयंकर वाणीमें श्रीरघुनाथजीसे बोला— ‘राम ! मुझे विराध, कबन्ध और खर नहीं समझना चाहिये । मैं मारीच और वाली भी नहीं हूँ । यह कुम्भकर्ण तुमसे लड़ने आया है ॥ १४६-१४७॥
पश्य मे मुद्गरं भीमं सर्वं कालायसं महत् । अनेन निर्जिता देवा दानवाश्च पुरा मया ॥ १४८॥
भावार्थ
‘मेरे इस भयंकर एवं विशाल मुद्गरकी ओर देखो । यह सब-का-सब काले लोहेका बना हुआ है । मैंने पूर्वकालमें इसीके द्वारा समस्त देवताओं और दानवोंको परास्त किया है ॥ १४८ ॥
विकर्णनास इति मां नावज्ञातुं त्वमर्हसि । स्वल्पापि हि न मे पीडा कर्णनासाविनाशनात् ॥ १४९॥
भावार्थ
‘मेरे नाक-कान नीचेसे कट गये हैं, ऐसा समझकर तुम्हें मेरी अवहेलना नहीं करनी चाहिये । इन दोनों अङ्गोंके नष्ट होनेसे मुझे थोड़ी-सी भी पीड़ा नहीं होती है ॥ १४९ ॥
दर्शयेक्ष्वाकुशार्दूल वीर्यं गात्रेषु मेऽनघ । ततस्त्वां भक्षयिष्यामि दृष्टपौरुषविक्रमम् ॥ १५०॥
भावार्थ
‘निष्पाप रघुनन्दन ! तुम इक्ष्वाकुवंशके वीर पुरुष हो, अतः मेरे अङ्गोंपर अपना पराक्रम दिखाओ । तुम्हारे पौरुष एवं बल-विक्रमको देख लेनेके बाद ही मैं तुम्हें खाऊँगा’ ॥ १५० ॥
स कुम्भकर्णस्य वचो निशम्य रामः सपुङ्खान् विससर्ज बाणान् । तैराहतो वज्रसमप्रवेगै- र्न चुक्षुभे न व्यथते सुरारिः ॥१५१॥
भावार्थ
कुम्भकर्णकी यह बात सुनकर श्रीरामने उसके ऊपर सुन्दर पंखवाले बहुत-से बाण मारे । वज्रके समान वेगवाले उन बाणोंकी गहरी चोट खानेपर भी वह देवद्रोही राक्षस न तो क्षुब्ध हुआ और न व्यथित ही ॥ १५१ ॥
यैः सायकैः सालवरा निकृत्ता वाली हतो वानरपुङ्गवश्च । ते कुम्भकर्णस्य तदा शरीरं वज्रोपमा न व्यथयाम्प्रचक्रुः ॥१५२॥
भावार्थ
जिन बाणोंसे श्रेष्ठ सालवृक्ष काटे गये और वानरराज वालीका वध हुआ, वे ही वज्रोपम बाण उस समय कुम्भकर्णके शरीरको व्यथा न पहुँचा सके ॥ १५२ ॥
स वारिधारा इव सायकांस्तान् पिबञ्शरीरेण महेन्द्रशत्रुः । जघान रामस्य शरप्रवेगं व्याविध्य तं मुद्गरमुग्रवेगम् ॥१५३॥
भावार्थ
देवराज इन्द्रका शत्रु कुम्भकर्ण जलकी धाराके समान श्रीरामकी बाणवर्षाको अपने शरीरसे पीने लगा और भयंकर वेगशाली मुद्गरको चारों ओरसे घुमा-घुमाकर उनके बाणोंके महान् वेगको नष्ट करने लगा ॥ १५३ ॥
ततस्तु रक्षः क्षतजानुलिप्तं वित्रासनं देवमहाचमूनाम् । व्याविध्य तं मुद्गरमुग्रवेगं विद्रावयामास चमूं हरीणाम् ॥१५४॥
भावार्थ
तदनन्तर वह राक्षस देवताओंकी विशाल सेनाको भयभीत करनेवाले और खूनसे लिपटे हुए उस उग्र वेगशाली मुद्गरको घुमा-घुमाकर वानरोंकी वाहिनीको खदेड़ने लगा ॥ १५४ ॥
वायव्यमादाय ततोऽपरास्त्रं रामः प्रचिक्षेप निशाचराय । समुद्गरं तेन जहार बाहुं स कृत्तबाहुस्तुमुलं ननाद ॥१५५॥
भावार्थ
यह देख भगवान् श्रीरामने वायव्य नामक दूसरे अस्त्रका संधान करके उसे कुम्भकर्णपर चलाया और उसके द्वारा उस निशाचरकी मुद्गरसहित दाहिनी बाँह काट डाली । बाँह कट जानेपर वह राक्षस भयानक आवाजमें चीत्कार करने लगा ॥ १५५ ॥
स तस्य बाहुर्गिरिशृङ्गकल्पः समुद्गरो राघवबाणकृत्तः । पपात तस्मिन् हरिराजसैन्ये जघान तां वानरवाहिनीं च ॥१५६॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीके बाणसे कटी हुई वह बाँह, जो पर्वतशिखरके समान जान पड़ती थी, मुद्गरके साथ ही वानरोंकी सेनामें गिरी । उसके नीचे दबकर कितने ही वानर-सैनिक अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे ॥ १५६ ॥
ते वानरा भग्नहतावशेषाः पर्यन्तमाश्रित्य तदा विषण्णाः । प्रपीडिताङ्गा दृदृशुः सुघोरं नरेन्द्ररक्षोऽधिपसंनिपातम् ॥१५७॥
भावार्थ
जो अङ्ग-भङ्ग होने या मरनेसे बचे, वे खिन्नचित्त हो किनारे जाकर खड़े हो गये । उनके शरीरमें बड़ी पीड़ा हो रही थी और वे चुपचाप महाराज श्रीराम और राक्षस कुम्भकर्णके घोर संग्रामको देखने लगे ॥ १५७ ॥
स कुम्भकर्णोऽस्त्रनिकृत्तबाहु- र्महासिकृत्ताग्र इवाचलेन्द्रः । उत्पाटयामास करेण वृक्षं ततोऽभिदुद्राव रणे नरेन्द्रम् ॥१५८॥
भावार्थ
वायव्यास्त्रसे एक बाँह कट जानेपर कुम्भकर्ण शिखरहीन पर्वतके समान प्रतीत होने लगा । उसने एक ही हाथसे एक ताड़का वृक्ष उखाड़ लिया और उसे लेकर रणभूमिमें महाराज श्रीरामपर धावा किया ॥ १५८ ॥
तं तस्य बाहुं सहतालवृक्षं समुद्यतं पन्नगभोगकल्पम् । ऐन्द्रास्त्रयुक्तेन जघान रामो बाणेन जाम्बूनदचित्रितेन ॥१५९॥
भावार्थ
तब श्रीरामने एक सुवर्णभूषित बाण निकालकर उसे ऐन्द्रास्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उसके द्वारा सर्पके समान उठी हुई राक्षसकी दूसरी बाँहको भी वृक्षसहित काट गिराया ॥ १५९ ॥
स कुम्भकर्णस्य भुजो निकृत्तः पपात भूमौ गिरिसंनिकाशः । विचेष्टमानो निजघान वृक्षा- न्शैलान्शिलावानरराक्षसांश्च ॥१६०॥
भावार्थ
कुम्भकर्णकी वह कटी हुई बाँह पर्वतशिखरके समान पृथ्वीपर गिरी और छटपटाने लगी । उसने कितने ही वृक्षों, शैलशिखरों, शिलाओं, वानरों और राक्षसोंको भी कुचल डाला ॥ १६० ॥
तं छिन्नबाहुं समवेक्ष्य रामः समापतन्तं सहसा नदन्तम् । द्वावर्धचन्द्रौ निशितौ प्रगृह्य चिच्छेद पादौ युधि राक्षसस्य ॥१६१॥ तौ तस्य पादौ प्रदिशो दिशश्च गिरेर्गुहाश्चैव महार्णवं च । लङ्कां च सेनां कपिराक्षसानां विनादयन्तौ विनिपेततुश्च ॥१६२॥
भावार्थ
उन दोनों भुजाओंके कट जानेपर वह राक्षस सहसा आर्तनाद करता हुआ श्रीरामपर टूट पड़ा । उसे आक्रमण करते देख श्रीरामने दो तीखे अर्धचन्द्राकार बाण लेकर उनके द्वारा युद्धस्थलमें उस राक्षसके दोनों पैर भी उड़ा दिये ॥ उसके दोनों पैर दिशा-विदिशा, पर्वतकी कन्दरा, महासागर, लङ्कापुरी तथा वानरों और राक्षसोंकी सेनाओंको भी प्रतिध्वनित करते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १६२ ॥
निकृत्तबाहुर्विनिकृत्तपादो विदार्य वक्त्रं वडवामुखाभम् । दुद्राव रामं सहसाभिगर्जन् राहुर्यथा चन्द्रमिवान्तरिक्षे ॥१६३॥ अपूरयत् तस्य मुखं शिताग्रै रामः शरैर्हेमपिनद्धपुङ्खैः । सम्पूर्णवक्त्रो न शशाक वक्तुं चुकूज कृच्छ्रेण मुमूर्च्छ चापि ॥१६४॥
भावार्थ
दोनों बाँहों और पैरोंके कट जानेपर उसने वडवानलके समान अपने विकराल मुखको फैलाया और जैसे राहु आकाशमें चन्द्रमाको ग्रस लेता है, उसी प्रकार वह श्रीरामको ग्रसनेके लिये भयानक गर्जना करता हुआ सहसा उनके ऊपर टूट पड़ा॥ तब श्रीरामचन्द्रजीने सुवर्णजटित पंखवाले अपने तीखे बाणोंसे उसका मुँह भर दिया । मुँह भर जानेपर वह बोलनेमें भी असमर्थ हो गया और बड़ी कठिनाईसे आर्तनाद करके मूर्छित हो गया ॥ १६४ ॥
अथाददे सूर्यमरीचिकल्पं स ब्रह्मदण्डान्तककालकल्पम् । अरिघ्नमैन्द्रं निशितं सुपुङ्खं रामः शरं मारुततुल्यवेगम् ॥१६५॥ तं वज्रजाम्बूनदचारुपुङ्खं प्रदीप्तसूर्यज्वलनप्रकाशम् । महेन्द्रवज्राशनितुल्यवेगं रामः प्रचिक्षेप निशाचराय ॥१६६॥
भावार्थ
इसके बाद भगवान् श्रीरामने ब्रह्मदण्ड तथा विनाशकारी कालके समान भयंकर एवं तीखा बाण, जो सूर्यकी किरणोंके समान उद्दीप्त, इन्द्रास्त्रसे अभिमन्त्रित, शत्रुनाशक, तेजस्वी सूर्य और प्रज्वलित अग्निके समान देदीप्यमान, हीरे और सुवर्णसे विभूषित सुन्दर पंखसे युक्त, वायु तथा इन्द्रके वज्र और अशनिके समान वेगशाली था, हाथमें लिया और उस निशाचरको लक्ष्य करके छोड़ दिया ॥ १६५-१६६ ॥
स सायको राघवबाहुचोदितो दिशः स्वभासा दश सम्प्रकाशयन् । विधूमवैश्वानरभीमदर्शनो जगाम शक्राशनिभीमविक्रमः ॥१६७॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीकी भुजाओंसे प्रेरित होकर वह बाण अपनी प्रभासे दसों दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ इन्द्रके वज्रकी भाँति भयंकर वेगसे चला । वह धूमरहित अग्निके समान भयानक दिखायी देता था ॥ १६७ ॥
स तन्महापर्वतकूटसंनिभं सुवृत्तदंष्ट्रं चलचारुकुण्डलम् । चकर्त रक्षोऽधिपतेः शिरस्तदा यथैव वृत्रस्य पुरा पुरंदरः ॥१६८॥
भावार्थ
जैसे पूर्वकालमें देवराज इन्द्रने वृत्रासुरका मस्तक काट डाला था, उसी प्रकार उस बाणने राक्षसराज कुम्भकर्णके महान् पर्वतशिखरके समान ऊँचे, सुन्दर गोलाकार दाढ़ोंसे युक्त तथा हिलते हुए मनोहर कुण्डलोंसे अलंकृत मस्तकको धड़से अलग कर दिया ॥ १६८ ॥
कुम्भकर्णशिरो भाति कुण्डलालंकृतं महत् । आदित्येऽभ्युदिते रात्रौ मध्यस्थ इव चन्द्रमाः ॥१६९॥
भावार्थ
कुम्भकर्णका वह कुण्डलोंसे अलंकृत विशाल मस्तक प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर आकाशके मध्यमें विराजमान चन्द्रमाकी भाँति निस्तेज प्रतीत होता था ॥ १६९ ॥
तद् रामबाणाभिहतं पपात रक्षःशिरः पर्वतसंनिकाशम् । बभञ्ज चर्यागृहगोपुराणि प्राकारमुच्चं तमपातयच्च ॥१७०॥
भावार्थ
श्रीरामके बाणोंसे कटा हुआ राक्षसका वह पर्वताकार मस्तक लङ्कामें जा गिरा । उसने अपने धक्केसे सड़कके आसपासके कितने ही मकानों, दरवाजों और ऊँचे परकोटेको भी धराशायी कर दिया ॥ १७० ॥
तच्चातिकायं हिमवत् प्रकाशं रक्षस्तदा तोयनिधौ पपात । ग्राहान् परान् मीनवरान् भुजंगमान् ममर्द भूमिं च तथा विवेश ॥१७१॥
भावार्थ
इसी प्रकार उस राक्षसका विशाल धड़ भी, जो हिमालयके समान जान पड़ता था, तत्काल समुद्रके जलमें गिर पड़ा और बड़े-बड़े ग्राहों, मत्स्यों तथा साँपोंको पीसता हुआ पृथ्वीके भीतर समा गया ॥ १७१ ॥
तस्मिन् हते ब्राह्मणदेवशत्रौ महाबले संयति कुम्भकर्णे । चचाल भूर्भूमिधराश्च सर्वे हर्षाच्च देवास्तुमुलं प्रणेदुः ॥१७२॥
भावार्थ
ब्राह्मणों और देवताओंके शत्रु महाबली कुम्भकर्णके युद्धमें मारे जानेपर पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत हिलने लगे और सम्पूर्ण देवता हर्षसे भरकर तुमुल नाद करने लगे ॥ १७२ ॥
ततस्तु देवर्षिमहर्षिपन्नगाः सुराश्च भूतानि सुपर्णगुह्यकाः । सयक्षगन्धर्वगणा नभोगताः प्रहर्षिता रामपराक्रमेण ॥१७३॥
भावार्थ
उस समय आकाशमें खड़े हुए देवर्षि, महर्षि, सर्प, देवता, भूतगण, गरुड़, गुह्यक, यक्ष और गन्धर्वगण श्रीरामका पराक्रम देखकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ १७३ ॥
ततस्तु ते तस्य वधेन भूरिणा मनस्विनो नैर्ऋतराजबान्धवाः । विनेदुरुच्चैर्व्यथिता रघूत्तमं हरिं समीक्ष्यैव यथा मतंगजाः ॥१७४॥ स देवलोकस्य तमो निहत्य सूर्यो यथा राहुमुखाद् विमुक्तः । तथा व्यभासीद्धरिसैन्यमध्ये निहत्य रामो युधि कुम्भकर्णम् ॥१७५॥
भावार्थ
कुम्भकर्णके महान् वधसे राक्षसराज रावणके मनस्वी बन्धुओंको बड़ा दुःख हुआ । वे रघुकुलतिलक श्रीरामकी ओर देखकर उसी तरह उच्च स्वरसे रोने-कल्पने लगे, जैसे सिंहपर दृष्टि पड़ते ही मतवाले हाथी चीत्कार कर उठते हैं ॥ देवसमूहको दुःख देनेवाले कुम्भकर्णका युद्धमें वध करके वानर-सेनाके बीचमें खड़े हुए भगवान् श्रीराम अन्धकारका नाश करके राहुके मुखसे छूटे हुए सूर्यदेवके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ १७५ ॥
प्रहर्षमीयुर्बहवश्च वानराः प्रबुद्धपद्मप्रतिमैरिवाननैः । अपूजयन् राघवमिष्टभागिनं हते रिपौ भीमबले नृपात्मजम् ॥१७६॥
भावार्थ
भयानक बलशाली शत्रुके मारे जानेसे बहुसंख्यक वानरोंको बड़ी प्रसन्नता हुई । उनके मुख विकसित कमलकी भाँति हर्षोल्लाससे खिल उठे तथा उन्होंने सफलमनोरथ हुए राजकुमार भगवान् श्रीरामकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥१७६॥
स कुम्भकर्णं सुरसैन्यमर्दनं महत्सु युद्धेषु कदाचनाजितम् । ननन्द हत्वा भरताग्रजो रणे महासुरं वृत्रमिवामराधिपः ॥१७७॥
भावार्थ
जो बड़े-बड़े युद्धोंमें कभी पराजित नहीं हुआ था तथा देवताओंकी सेनाको भी कुचल डालनेवाला था, उस महान् राक्षस कुम्भकर्णको रणभूमिमें मारकर रघुनाथजीको वैसी ही प्रसन्नता हुई जैसी वृत्रासुरका वध करके देवराज इन्द्रको हुई थी ॥
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