युद्धकाण्ड, सर्ग 65
स तथोक्तस्तु निर्भर्त्स्य कुम्भकर्णो महोदरम् । अब्रवीद् राक्षसश्रेष्ठं भ्रातरं रावणं ततः ॥ १ ॥
भावार्थ
महोदरके ऐसा कहनेपर कुम्भकर्णने उसे डाँटा और अपने भाई राक्षसशिरोमणि रावणसे कहा—॥ १ ॥
सोऽहं तव भयं घोरं वधात् तस्य दुरात्मनः । रामस्याद्य प्रमार्जामि निर्वैरो हि सुखी भव ॥ २ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! आज मैं उस दुरात्मा रामका वध करके तुम्हारे घोर भयको दूर कर दूँगा । तुम वैरभावसे मुक्त होकर सुखी हो जाओ ॥ २ ॥
गर्जन्ति न वृथा शूरा निर्जला इव तोयदाः । पश्य सम्पद्यमानं तु गर्जितं युधि कर्मणा ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘शूरवीर जलहीन बादलके समान व्यर्थ गर्जना नहीं किया करते । तुम देखना, अब युद्धस्थलमें मैं अपने पराक्रमके द्वारा ही गर्जना करूँगा ॥ ३ ॥
न मर्षयन्ति चात्मानं सम्भावयितुमात्मना । अदर्शयित्वा शूरास्तु कर्म कुर्वन्ति दुष्करम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘शूरवीरोंको अपने ही मुँहसे अपनी तारीफ करना सहन नहीं होता । वे वाणीके द्वारा प्रदर्शन न करके चुपचाप दुष्कर पराक्रम प्रकट करते हैं ॥ ४ ॥
विक्लवानां ह्यबुद्धीनां राज्ञां पण्डितमानिनाम् । रोचते त्वद्वचो नित्यं कथ्यमानं महोदर ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘महोदर ! जो भीरु, मूर्ख और झूठे ही अपनेको पण्डित माननेवाले होंगे, उन्हीं राजाओंको तुम्हारे द्वारा कही जानेवाली ये चिकनी-चुपड़ी बातें सदा अच्छी लगेंगी ॥ ५ ॥
युद्धे कापुरुषैर्नित्यं भवद्भिः प्रियवादिभिः । राजानमनुगच्छद्भिः सर्वं कृत्यं विनाशितम् ॥ ६ ॥ राजशेषा कृता लङ्का क्षीणः कोशो बलं हतम् । राजानमिममासाद्य सुहृच्चिह्नममित्रकम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘युद्धमें कायरता दिखानेवाले तुम-जैसे चापलूसोंने ही सदा राजाकी हाँ-में-हाँ मिलाकर सारा काम चौपट किया है ॥ ‘अब तो लङ्कामें केवल राजा शेष रह गये हैं । खजाना खाली हो गया और सेना मार डाली गयी । इस राजाको पाकर तुमलोगोंने मित्रके रूपमें शत्रुका काम किया है ॥ ७ ॥
एष नियोम्यहं युद्धमुद्यतः शत्रुनिर्जये । दुर्नयं भवतामद्य समीकर्तुं महाहवे ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘यह देखो, अब मैं शत्रुको जीतनेके लिये उद्यत होकर समरभूमिमें जा रहा हूँ । तुमलोगोंने अपनी खोटी नीतिके कारण जो विषम परिस्थिति उत्पन्न कर दी है, उसका आज महासमरमें समीकरण करना है—इस विषम संकटको सर्वदाके लिये टाल देना है’ ॥ ८ ॥
एवमुक्तवतो वाक्यं कुम्भकर्णस्य धीमतः । प्रत्युवाच ततो वाक्यं प्रहसन् राक्षसाधिपः ॥ ९ ॥
भावार्थ
बुद्धिमान् कुम्भकर्णने जब ऐसी वीरोचित बात कही, तब राक्षसराज रावणने हँसते हुए उत्तर दिया—॥ ९ ॥
महोदरोऽयं रामात् तु परित्रस्तो न संशयः । न हि रोचयते तात युद्धं युद्धविशारद ॥ १० ॥
भावार्थ
‘युद्धविशारद तात ! यह महोदर श्रीरामसे बहुत डर गया है, इसमें संशय नहीं है । इसीलिये यह युद्धको पसंद नहीं करता है ॥ १० ॥
कश्चिन्मे त्वत्समो नास्ति सौहृदेन बलेन च । गच्छ शत्रुवधाय त्वं कुम्भकर्ण जयाय च ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘कुम्भकर्ण ! मेरे आत्मीयजनोंमें सौहार्द और बलकी दृष्टिसे कोई भी तुम्हारी समानता करनेवाला नहीं है । तुम शत्रुओंका वध करने और विजय पानेके लिये युद्धभूमिमें जाओ ॥ ११ ॥
शयानः शत्रुनाशार्थं भवान् सम्बोधितो मया । अयं हि कालः सुमहान् राक्षसानामरिंदम ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘शत्रुदमन वीर ! तुम सो रहे थे । तुम्हारे द्वारा शत्रुओंका नाश करानेके लिये ही मैंने तुम्हें जगाया है । राक्षसोंकी युद्धयात्राके लिये यह सबसे उत्तम समय है ॥ १२ ॥
संगच्छ शूलमादाय पाशहस्त इवान्तकः । वानरान् राजपुत्रौ च भक्षयादित्यतेजसौ ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘तुम पाशधारी यमराजकी भाँति शूल लेकर जाओ और सूर्यके समान तेजस्वी उन दोनों राजकुमारों तथा वानरोंको मारकर खा जाओ ॥ १३ ॥
समालोक्य तु ते रूपं विद्रविष्यन्ति वानराः । रामलक्ष्मणयोश्चापि हृदये प्रस्फुटिष्यतः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘वानर तुम्हारा रूप देखते ही भाग जायँगे तथा राम और लक्ष्मणके हृदय भी विदीर्ण हो जायँगे’ ॥ १४ ॥
एवमुक्त्वा महातेजाः कुम्भकर्णं महाबलम् । पुनर्जातमिवात्मानं मेने राक्षसपुङ्गवः ॥ १५ ॥
भावार्थ
महाबली कुम्भकर्णसे ऐसा कहकर महातेजस्वी राक्षसराज रावणने अपना पुनः नया जन्म हुआ-सा माना ॥ १५ ॥
कुम्भकर्णबलाभिज्ञो जानंस्तस्य पराक्रमम् । बभूव मुदितो राजा शशाङ्क इव निर्मलः ॥ १६ ॥
भावार्थ
राजा रावण कुम्भकर्णके बलको अच्छी तरह जानता था; उसके पराक्रमसे भी पूर्ण परिचित था; इसलिये वह निर्मल चन्द्रमाके समान परम आह्लादसे भर गया ॥ १६ ॥
इत्येवमुक्तः संहृष्टो निर्जगाम महाबलः । राक्षस्तु वचनं श्रुत्वा योद्धुमुद्युक्तवांस्तदा ॥ १७ ॥
भावार्थ
रावणके ऐसा कहनेपर महाबली कुम्भकर्ण बहुत प्रसन्न हुआ । वह राजा रावणकी बात सुनकर उस समय युद्धके लिये उद्यत हो गया और लङ्कापुरीसे बाहर निकला ॥ १७ ॥
आददे निशितं शूलं वेगाच्छत्रुनिबर्हणः । सर्वं कालायसं दीप्तं तप्तकाञ्चनभूषणम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
शत्रुओंका संहार करनेवाले उस वीरने बड़े वेगसे तीखा शूल हाथमें लिया, जो सब-का-सब काले लोहेका बना हुआ, चमकीला और तपाये हुए सुवर्णसे विभूषित था ॥ १८ ॥
इन्द्राशनिसमप्रख्यं वज्रप्रतिमगौरवम् । देवदानवगन्धर्वयक्षपन्नगसूदनम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
उसकी कान्ति इन्द्रके अशनिके समान थी । वह वज्रके समान भारी था तथा देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, यक्षों और नागोंका संहार करनेवाला था ॥ १९ ॥
रक्तमाल्यमहादामं स्वतश्चोद्गतपावकम् । आदाय विपुलं शूलं शत्रुशोणितरञ्जितम् ॥ २० ॥ कुम्भकर्णो महातेजा रावणं वाक्यमब्रवीत् । गमिष्याम्यहमेकाकी तिष्ठत्विह बलं मम ॥ २१ ॥
भावार्थ
उसमें लाल फूलोंकी बहुत बड़ी माला लटक रही थी और उससे आगकी चिनगारियाँ झड़ रही थीं । शत्रुओंके रक्तसे रँगे हुए उस विशाल शूलको हाथमें लेकर महातेजस्वी कुम्भकर्ण रावणसे बोला—‘मैं अकेला ही युद्धके लिये जाऊँगा । अपनी यह सारी सेना यहीं रहे ॥ २०-२१ ॥
अद्य तान् क्षुधितः क्रुद्धो भक्षयिष्यामि वानरान् । कुम्भकर्णवचः श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘आज मैं भूखा हूँ और मेरा क्रोध भी बढ़ा हुआ है । इसलिये समस्त वानरोंको भक्षण कर जाऊँगा ।’ कुम्भकर्णकी यह बात सुनकर रावण बोला—॥ २२ ॥
सैन्यैः परिवृतो गच्छ शूलमुद्गरपाणिभिः । वानरा हि महात्मानः शूराः सुव्यवसायिनः ॥ २३ ॥ एकाकिनं प्रमत्तं वा नयेयुर्दर्शनैः क्षयम् । तस्मात् परमदुर्धर्षः सैन्यैः परिवृतो व्रज । रक्षसामहितं सर्वं शत्रुपक्षं निषूदय ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘कुम्भकर्ण ! तुम हाथोंमें शूल और मुद्गर धारण करनेवाले सैनिकोंसे घिरे रहकर युद्धके लिये यात्रा करो, क्योंकि महामनस्वी वानर बड़े वीर और अत्यन्त उद्योगी हैं । वे तुम्हें अकेला या असावधान देख दाँतोंसे काट-काटकर नष्ट कर डालेंगे; इसलिये सेनासे घिरकर सब ओरसे सुरक्षित हो यहाँसे जाओ । उस दशामें तुम्हें परास्त करना शत्रुओंके लिये बहुत कठिन होगा । तुम राक्षसोंका अहित करनेवाले समस्त शत्रुदल-का संहार करो’ ॥ २३-२४ ॥
अथासनात् समुत्पत्य स्रजं मणिकृताङ्गराम् । आबबन्ध महातेजाः कुम्भकर्णस्य रावणः ॥ २५ ॥
भावार्थ
यों कहकर महातेजस्वी रावण अपने आसनसे उठा और एक सोनेकी माला, जिसके बीच-बीचमें मणियाँ पिरोयी हुई थीं, लेकर उसने कुम्भकर्णके गलेमें पहना दी ॥ २५ ॥
अङ्गदान्यङ्गुलीवेष्टान् वराण्याभरणानि च । हारं च शशिसंकाशमाबबन्ध महात्मनः ॥ २६ ॥
भावार्थ
बाजूबंद, अँगूठियाँ, अच्छे-अच्छे आभूषण और चन्द्रमाके समान चमकीला हार—इन सबको उसने महाकाय कुम्भकर्णके अङ्गोंमें पहनाया ॥ २६ ॥
दिव्यानि च सुगन्धीनि माल्यदामानि रावणः । गात्रेषु सज्जयामास श्रोत्रयोश्चास्य कुण्डले ॥ २७ ॥
भावार्थ
उतना ही नहीं, रावणने उसके विभिन्न अङ्गोंमें दिव्य सुगन्धित फूलोंकी मालाएँ भी बँधवा दीं और दोनों कानोंमें कुण्डल पहना दिये ॥ २७ ॥
काञ्चनाङ्गदकेयूरनिष्काभरणभूषितः । कुम्भकर्णो बृहत्कर्णः सुहुतोऽग्निरिवाबभौ ॥ २८ ॥
भावार्थ
सोनेके अङ्गद, केयूर और पदक आदि आभूषणोंसे भूषित तथा घड़ेके समान विशाल कानोंवाला कुम्भकर्ण घीकी उत्तम आहुति पाकर प्रज्वलित हुई अग्निके समान प्रकाशित हो उठा ॥ २८ ॥
श्रोणीसूत्रेण महता मेचकेन व्यराजत । अमृतोत्पादने नद्धो भुजङ्गेनेव मन्दरः ॥ २९ ॥
भावार्थ
उसके कटिप्रदेशमें काले रंगकी एक विशाल करधनी थी, जिससे वह अमृतकी उत्पत्तिके लिये किये गये समुद्रमन्थनके समय नागराज वासुकिसे लिपटे हुए मन्दराचलके समान शोभा पाता था ॥ २९ ॥
स काञ्चनं भारसहं निवातं विद्युत्प्रभं दीप्तमिवात्मभासा । आबध्यमानः कवचं रराज संध्याभ्रसंवीत इवाद्रिराजः ॥ ३० ॥
भावार्थ
तदनन्तर कुम्भकर्णकी छातीमें एक सोनेका कवच बाँधा गया, जो भारी-से-भारी आघात सहन करनेमें समर्थ, अस्त्र-शस्त्रोंसे अभेद्य तथा अपनी प्रभासे विद्युत्के समान देदीप्यमान था । उसे धारण करके कुम्भकर्ण संध्याकालके लाल बादलोंसे संयुक्त गिरिराज अस्ताचलके समान सुशोभित हो रहा था ॥ ३० ॥
सर्वाभरणसर्वाङ्गः शूलपाणिः स राक्षसः । त्रिविक्रमकृतोत्साहो नारायण इवाबभौ ॥ ३१ ॥
भावार्थ
सारे अङ्गोंमें सभी आवश्यक आभूषण धारण करके हाथोंमें शूल लिये वह राक्षस कुम्भकर्ण जब आगे बढ़ा, उस समय त्रिलोकीको नापनेके लिये तीन डग बढ़ानेको उत्साहित हुए भगवान् नारायण ( वामन ) के समान जान पड़ा ॥३१॥
भ्रातरं सम्परिष्वज्य कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । प्रणम्य शिरसा तस्मै प्रतस्थे स महाबलः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
भाईको हृदयसे लगाकर उसकी परिक्रमा करके उस महाबली वीरने उसे मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् वह युद्धके लिये चला ॥ ३२ ॥
तमाशीर्भिः प्रशस्ताभिः प्रेषयामास रावणः । शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैः सैन्यैश्चापि वरायुधैः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
उस समय रावणने उत्तम आशीर्वाद देकर श्रेष्ठ आयुधोंसे सुसज्जित सेनाओंके साथ उसे युद्धके लिये बिदा किया । यात्राके समय उसने शङ्ख और दुन्दुभि आदि बाजे भी बजवाये ॥ ३३ ॥
तं गजैश्च तुरंगैश्च स्यन्दनैश्चाम्बुदस्वनैः । अनुजग्मुर्महात्मानो रथिनो रथिनां वरम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
हाथी, घोड़े और मेघोंकी गर्जनाके समान घर्घराहट पैदा करनेवाले रथोंपर सवार हो अनेकानेक महामनस्वी रथी वीर रथियोंमें श्रेष्ठ कुम्भकर्णके साथ गये ॥ ३४ ॥
सर्पैरुष्ट्रैः खरैश्चैव सिंहद्विपमृगद्विजैः । अनुजग्मुश्च तं घोरं कुम्भकर्णं महाबलम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
कितने ही राक्षस साँप, ऊँट, गधे, सिंह, हाथी, मृग और पक्षियोंपर सवार हो-होकर उस भयंकर महाबली कुम्भकर्णके पीछे-पीछे गये ॥ ३५ ॥
स पुष्पवर्षैरवकीर्यमाणो धूतातपत्रः शितशूलपाणिः । मदोत्कटः शोणितगन्धमत्तो विनिर्ययौ दानवदेवशत्रुः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
उस समय उसके ऊपर फूलोंकी वर्षा हो रही थी । सिरपर श्वेत छत्र तना हुआ था और उसने हाथमें तीखा त्रिशूल ले रक्खा था। इस प्रकार देवताओं और दानवोंका शत्रु तथा रक्तकी गन्धसे मतवाला कुम्भकर्ण, जो स्वाभाविक मदसे भी उन्मत्त हो रहा था, युद्धके लिये निकला ॥ ३६ ॥
पदातयश्च बहवो महानादा महाबलाः । अन्वयू राक्षसा भीमा भीमाक्षाः शस्त्रपाणयः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
उसके साथ बहुत-से पैदल राक्षस भी गये, जो बड़े बलवान्, जोर-जोरसे गर्जना करनेवाले, भीषण नेत्रधारी और भयानक रूपवाले थे । उन सबके हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र थे ॥ ३७ ॥
रक्ताक्षाः सुबहुव्यामा नीलाञ्जनचयोपमाः । शूलानुद्यम्य खड्गांश्च निशितांश्च परश्वधान् ॥ ३८ ॥ भिन्दिपालांश्च परिघान् गदाश्च मुसलानि च । तालस्कन्धांश्च विपुलान् क्षेपणीयान् दुरासदान् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
उनके नेत्र रोषसे लाल हो रहे थे । वे सभी कई व्याम ऊँचे और काले कोयलेके ढेरकी भाँति काले थे । उन्होंने अपने हाथोंमें शूल, तलवार, तीखी धारवाले फरसे, भिन्दिपाल, परिघ, गदा, मुसल, बड़े-बड़े ताड़के वृक्षोंके तने और जिन्हें कोई काट न सके, ऐसी गुलेलें ले रक्खी थीं ॥ ३८-३९ ॥
अथान्यद्वपुरादाय दारुणं घोरदर्शनम् । निष्पपात महातेजाः कुम्भकर्णो महाबलः ॥ ४० ॥
भावार्थ
तदनन्तर महातेजस्वी महाबली कुम्भकर्णने बड़ा उग्र रूप धारण किया, जिसे देखनेपर भय मालूम होता था । ऐसा रूप धारण करके वह युद्धके लिये चल पड़ा ॥ ४० ॥
धनुःशतपरीणाहः स षट्शतसमुच्छ्रितः । रौद्रः शकटचक्राक्षो महापर्वतसंनिभः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
उस समय वह छः सौ धनुषके बराबर विस्तृत और सौ धनुषके बराबर ऊँचा हो गया । उसकी आँखें दो गाड़ीके पहियोंके समान जान पड़ती थीं । वह विशाल पर्वतके समान भयंकर दिखायी देता था ॥ ४१ ॥
संनिपत्य च रक्षांसि दग्धशैलोपमो महान् । कुम्भकर्णो महावक्त्रः प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥ ४२ ॥
भावार्थ
पहले तो उसने राक्षस-सेनाकी व्यूह-रचना की । फिर दावानलसे दग्ध हुए पर्वतके समान महाकाय कुम्भकर्ण अपना विशाल मुख फैलाकर अट्टहास करता हुआ इस प्रकार बोला—॥ ४२ ॥
अद्य वानरमुख्यानां तानि यूथानि भागशः । निर्दहिष्यामि संक्रुद्धः पतङ्गानिव पावकः ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘राक्षसो ! जैसे आग पतंगोंको जलाती है, उसी प्रकार मैं भी कुपित होकर आज प्रधान-प्रधान वानरोंके एक-एक यूथ-को भस्म कर डालूँगा ॥ ४३ ॥
नापराध्यन्ति मे कामं वानरा वनचारिणः । जातिरस्मद्विधानां सा पुरोद्यानविभूषणम् ॥ ४४ ॥ पुररोधस्य मूलं तु राघवः सहलक्ष्मणः । हते तस्मिन् हतं सर्वं तं वधिष्यामि संयुगे ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘यों तो वनमें विचरनेवाले बेचारे वानर स्वेच्छासे मेरा कोई अपराध नहीं कर रहे हैं; अतः वे वधके योग्य नहीं हैं । वानरोंकी जाति तो हम-जैसे लोगोंके नगरोद्यानका आभूषण है॥ ‘वास्तवमें लङ्कापुरीपर घेरा डालनेके प्रधान कारण हैं— लक्ष्मणसहित राम । अतः सबसे पहले मैं उन्हींको युद्धमें मारूँगा । उनके मारे जानेपर सारी वानर-सेना स्वतः मरी हुई-सी हो जायगी’ ॥ ४५ ॥
एवं तस्य ब्रुवाणस्य कुम्भकर्णस्य राक्षसाः । नादं चक्रुर्महाघोरं कम्पयन्त इवार्णवम् ॥ ४६ ॥
भावार्थ
कुम्भकर्णके ऐसा कहनेपर राक्षसोंने समुद्रको कम्पित-सा करते हुए बड़ी भयानक गर्जना की ॥ ४६ ॥
तस्य निष्पततस्तूर्णं कुम्भकर्णस्य धीमतः । बभूवुर्घोररूपाणि निमित्तानि समन्ततः ॥ ४७ ॥
भावार्थ
बुद्धिमान् राक्षस कुम्भकर्णके रणभूमिकी ओर पैर बढ़ाते ही चारों ओर घोर अपशकुन होने लगे ॥ ४७ ॥
उल्काशनियुता मेघा बभूवुर्गर्दभारुणाः । ससागरवना चैव वसुधा समकम्पत ॥ ४८ ॥
भावार्थ
गदहोंके समान भूरे रंगवाले बादल घिर आये । साथ ही उल्कापात हुआ और बिजलियाँ गिरीं । समुद्र और वनोंसहित सारी पृथ्वी काँपने लगी ॥ ४८ ॥
घोररूपाः शिवा नेदुः सज्वालकवलैर्मुखैः । मण्डलान्यपसव्यानि बबन्धुश्च विहंगमाः ॥ ४९ ॥
भावार्थ
भयानक गीदड़ियाँ मुँहसे आग उगलती हुई अमङ्गलसूचक बोली बोलने लगीं । पक्षी मण्डल बाँधकर उसकी दक्षिणावर्त परिक्रमा करने लगे ॥ ४९ ॥
निष्पपात च गृध्रोऽस्य शूले वै पथि गच्छतः । प्रास्फुरन्नयनं चास्य सव्यो बाहुरकम्पत ॥ ५० ॥
भावार्थ
रास्तेमें चलते समय कुम्भकर्णके शूलपर गीध आ बैठा । उसकी बायीं आँख फड़कने लगी और बायीं भुजा कम्पित होने लगी ॥ ५० ॥
निष्पपात तदा चोल्का ज्वलन्ती भीमनिःस्वना । आदित्यो निष्प्रभश्चासीन्न वाति च सुखोऽनिलः ॥५१॥
भावार्थ
फिर उसी समय जलती हुई उल्का भयंकर आवाजके साथ गिरी । सूर्यकी प्रभा क्षीण हो गयी और हवा इतने वेगसे चल रही थी कि सुखद नहीं जान पड़ती थी ॥ ५१ ॥
अचिन्तयन् महोत्पातानुदितान् रोमहर्षणान् । निर्ययौ कुम्भकर्णस्तु कृतान्तबलचोदितः ॥ ५२ ॥
भावार्थ
इस प्रकार रोंगटे खड़े कर देनेवाले बहुत-से बड़े-बड़े उत्पात प्रकट हुए; किंतु उनकी कुछ भी परवा न करके कालकी शक्तिसे प्रेरित हुआ कुम्भकर्ण युद्धके लिये निकल पड़ा ॥ ५२ ॥
स लङ्घयित्वा प्राकारं पद्भ्यां पर्वतसंनिभः । ददर्शाभ्रघनप्रख्यं वानरानीकमद्भुतम् ॥ ५३ ॥
भावार्थ
वह पर्वतके समान ऊँचा था । उसने लङ्काकी चहार-दीवारीको दोनों पैरोंसे लाँघकर देखा कि वानरोंकी अद्भुत सेना मेघोंकी घनीभूत घटाके समान छा रही है ॥ ५३ ॥
ते दृष्ट्वा राक्षसश्रेष्ठं वानराः पर्वतोपमम् । वायुनुन्ना इव घना ययुः सर्वा दिशस्तदा ॥ ५४ ॥
भावार्थ
उस पर्वताकार श्रेष्ठ राक्षसको देखते ही समस्त वानर हवासे उड़ाये गये बादलोंके समान तत्काल सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग चले ॥ ५४ ॥
तद् वानरानीकमतिप्रचण्डं दिशो द्रवद्भिन्नमिवाभ्रजालम् । स कुम्भकर्णः समवेक्ष्य हर्षा- न्ननाद भूयो घनवद्घनाभः ॥ ५५ ॥
भावार्थ
छिन्न-भिन्न हुए बादलोंके समूहकी भाँति उस अतिशय प्रचण्ड वानर-वाहिनीको सम्पूर्ण दिशाओंमें भागती देख मेघोंके समान काला कुम्भकर्ण बड़े हर्षके साथ सजल जलधरके सदृश गम्भीर स्वरमें बारंबार गर्जना करने लगा ॥ ५५ ॥
ते तस्य घोरं निनदं निशम्य यथा निनादं दिवि वारिदस्य । पेतुर्धरण्यां बहवः प्लवङ्गा निकृत्तमूला इव शालवृक्षाः ॥ ५६ ॥
भावार्थ
आकाशमें जैसी मेघोंकी गर्जना होती है, उसीके समान उस राक्षसका घोर सिंहनाद सुनकर बहुत-से वानर जड़से कटे हुए सालवृक्षोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५६ ॥
विपुलपरिघवान् स कुम्भकर्णो रिपुनिधनाय विनिःसृतो महात्मा । कपिगणभयमाददत् सुभीमं प्रभुरिव किंकरदण्डवान् युगान्ते ॥ ५७ ॥
भावार्थ
महाकाय कुम्भकर्णने शूलकी ही भाँति अपने एक हाथमें विशाल परिघ भी ले रक्खा था । वह वानर-समूहोंको अत्यन्त घोर भय प्रदान करता हुआ प्रलयकालमें संहारके साधनभूत कालदण्डोंसे युक्त भगवान् कालरुद्रके समान शत्रुओंका विनाश करनेके लिये पुरीसे बाहर निकला ॥ ५७ ॥
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