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युद्धकाण्ड, सर्ग 64

तदुक्तमतिकायस्य बलिनो बाहुशालिनः । कुम्भकर्णस्य वचनं श्रुत्वोवाच महोदरः ॥ १ ॥ कुम्भकर्ण कुले जातो धृष्टः प्राकृतदर्शनः । अवलिप्तो न शक्नोषि कृत्यं सर्वत्र वेदितुम् ॥ २ ॥

भावार्थ

अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले विशालकाय एवं बलवान् राक्षस कुम्भकर्णका यह वचन सुनकर महोदरने कहा—॥ ‘कुम्भकर्ण ! तुम उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए हो; परंतु तुम्हारी दृष्टि ( बुद्धि ) निम्नश्रेणीके लोगोंके समान है । तुम ढीठ और घमंडी हो, इसलिये सभी विषयोंमें क्या कर्तव्य है— इस बातको नहीं जान सकते ॥ २ ॥

नहि राजा न जानीते कुम्भकर्ण नयानयौ । त्वं तु कैशोरकाद् धृष्टः केवलं वक्तुमिच्छसि ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘कुम्भकर्ण ! हमारे महाराज नीति और अनीतिको नहीं जानते हैं, ऐसी बात नहीं है । तुम केवल अपने बचपनके कारण धृष्टतापूर्वक इस तरहकी बातें कहना चाहते हो ॥ ३ ॥

स्थानं वृद्धिं च हानिं च देशकालविधानवित् । आत्मनश्च परेषां च बुध्यते राक्षसर्षभः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘राक्षसशिरोमणि रावण देश-कालके लिये उचित कर्तव्यको जानते हैं और अपने तथा शत्रुपक्षके स्थान, वृद्धि एवं क्षयको अच्छी तरह समझते हैं ॥ ४ ॥

यत् त्वशक्यं बलवता वक्तुं प्राकृतबुद्धिना । अनुपासितवृद्धेन कः कुर्यात् तादृशं बुधः ॥ ५ ॥ यांस्तु धर्मार्थकामांस्त्वं ब्रवीषि पृथगाश्रयान् । अवबोद्धुं स्वभावेन नहि लक्षणमस्ति तान् ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘जिसने वृद्ध पुरुषोंकी उपासना या सत्संग नहीं किया है और जिसकी बुद्धि गँवारोंके समान है, ऐसा बलवान् पुरुष भी जिस कर्मको नहीं कर सकता—जिसे अनुचित समझता है, वैसे कर्मको कोई बुद्धिमान् पुरुष कैसे कर सकता है ? ॥ ‘जिन अर्थ, धर्म और कामको तुम पृथक्-पृथक् आश्रय-वाले बता रहे हो, उन्हें ठीक-ठीक समझनेकी तुम्हारे भीतर शक्ति ही नहीं है ॥ ६ ॥

कर्म चैव हि सर्वेषां कारणानां प्रयोजनम् । श्रेयः पापीयसां चात्र फलं भवति कर्मणाम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘सुखके साधनभूत जो त्रिवर्ग ( धर्म, अर्थ एवं काम ) हैं, उन सबका एकमात्र कर्म ही प्रयोजक है ( क्योंकि जो कर्मानुष्ठानसे रहित है, उसका धर्म, अर्थ अथवा काम—कोई भी पुरुषार्थ सफल नहीं होता ) । इसी तरह एक पुरुषके प्रयत्नसे सिद्ध होनेवाले सभी शुभाशुभ व्यापारोंका फल यहाँ एक ही कर्ताको प्राप्त होता है ( इस प्रकार जब परस्पर विरुद्ध होनेपर भी धर्म और कामका अनुष्ठान एक ही पुरुषके द्वारा होता देखा जाता है, तब तुम्हारा यह कहना कि केवल धर्मका ही अनुष्ठान करना चाहिये, धर्मविरोधी कामका नहीं, कैसे संगत हो सकता है ? ) ॥ ७ ॥

निःश्रेयसफलावेव धर्मार्थावितरावपि । अधर्मानर्थयोः प्राप्तं फलं च प्रत्यवायिकम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘निष्कामभावसे किये गये धर्म ( जप, ध्यान आदि ) और अर्थ ( धनसाध्य यज्ञ, दान आदि )—ये चित्तशुद्धिके द्वारा यद्यपि निःश्रेयस ( मोक्ष ) रूप फलकी प्राप्ति करानेवाले हैं तथापि कामना-विशेषसे स्वर्ग एवं अभ्युदय आदि अन्य फलोंकी भी प्राप्ति कराते हैं । पूर्वोक्त जपादिरूप या क्रियामय नित्य-धर्मका लोप होनेपर अधर्म और अनर्थ प्राप्त होते हैं और उनके रहते हुए प्रत्यवायजनित फल भोगना पड़ता है ( परंतु काम्य-कर्म न करनेसे प्रत्यवाय नहीं होता, यह धर्म और अर्थकी अपेक्षा कामकी विशेषता है ) ॥ ८ ॥

ऐहलौकिकपारक्यं कर्म पुंभिर्निषेव्यते । कर्माण्यपि तु कल्यानि लभते काममास्थितः ॥ ९ ॥ तत्र कृत्स्नमिदं राज्ञा हृदि कार्यं मतं च नः । शत्रौ हि साहसं यत् तत् किमिवात्रापनीयते ॥ १० ॥

भावार्थ

‘जीवोंको धर्म और अधर्मके फल इस लोक और परलोकमें भी भोगने पड़ते हैं । परंतु जो कामना-विशेषके उद्देश्यसे यत्नपूर्वक कर्मोंका अनुष्ठान करता है, उसे यहाँ भी उसके सुख-मनोरथकी प्राप्ति हो जाती है । धर्म आदिके फलकी भाँति उसके लिये कालान्तर या लोकान्तरकी अपेक्षा नहीं होती है ( इस तरह काम धर्म और अर्थसे विलक्षण सिद्ध होता है ) ॥ ‘यहाँ राजाके लिये कामरूपी पुरुषार्थका सेवन उचित है ही* । ऐसा ही राक्षसराजने अपने हृदयमें निश्चित किया है और यही हम मन्त्रियोंकी भी सम्मति है । शत्रुके प्रति साहसपूर्ण कार्य करना कौन-सी अनीति है ( अतः इन्होंने जो कुछ किया है, उचित ही किया है ) ॥ १० ॥

एकस्यैवाभियाने तु हेतुर्यः प्राहृतस्त्वया । तत्राप्यनुपपन्नं ते वक्ष्यामि यदसाधु च ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘तुमने युद्धके लिये अकेले अपने ही प्रस्थान करनेके विषयमें जो हेतु दिया है ( अपने महान् बलके द्वारा शत्रुको परास्त कर देनेकी जो घोषणा की है ) उसमें भी जो असंगत एवं अनुचित बात कही गयी है, उसे मैं तुम्हारे सामने रखता हूँ ॥ ११ ॥

येन पूर्वं जनस्थाने बहवोऽतिबला हताः । राक्षसा राघवं तं त्वं कथमेको जयिष्यसि ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘जिन्होंने पहले जनस्थानमें बहुत-से अत्यन्त बलशाली राक्षसोंको मार डाला था, उन्हीं रघुवंशी वीर श्रीरामको तुम अकेले ही कैसे परास्त करोगे ? ॥ १२ ॥

ये पूर्वे निर्जितास्तेन जनस्थाने महौजसः । राक्षसांस्तान् पुरे सर्वान् भीतानद्य न पश्यसि ॥१३॥

भावार्थ

‘जनस्थानमें श्रीरामने पहले जिन महान् बलशाली निशाचरोंको मार भगाया था, वे आज भी इस लङ्कापुरीमें विद्यमान हैं और उनका वह भय अबतक दूर नहीं हुआ है । क्या तुम उन राक्षसोंको नहीं देखते हो ? ॥ १३ ॥

तं सिंहमिव संक्रुद्धं रामं दशरथात्मजम् । सर्पं सुप्तमहो बुद्ध्वा प्रबोधयितुमिच्छसि ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘दशरथकुमार श्रीराम अत्यन्त कुपित हुए सिंहके समान पराक्रमी एवं भयंकर हैं, क्या तुम उनसे भिड़नेका साहस करते हो ? क्या जान-बूझकर सोये हुए सर्पको जगाना चाहते हो ? तुम्हारी मूर्खतापर आश्चर्य होता है ! ॥ १४ ॥

ज्वलन्तं तेजसा नित्यं क्रोधेन च दुरासदम् । कस्तं मृत्युमिवासह्यमासादयितुमर्हति ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम सदा ही अपने तेजसे देदीप्यमान हैं । वे क्रोध करनेपर अत्यन्त दुर्जय और मृत्युके समान असह्य हो उठते हैं । भला कौन योद्धा उनका सामना कर सकता है ? ॥१५॥

संशयस्थमिदं सर्वं शत्रोः प्रतिसमासने । एकस्य गमनं तात नहि मे रोचते भृशम् ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘हमारी यह सारी सेना भी यदि उस अजेय शत्रुका सामना करनेके लिये खड़ी हो तो उसका जीवन भी संशयमें पड़ सकता है । अतः तात ! युद्धके लिये तुम्हारा अकेले जाना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता है ॥ १६ ॥

हीनार्थस्तु समृद्धार्थं को रिपुं प्राकृतं यथा । निश्चितं जीवितत्यागे वशमानेतुमिच्छति ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘जो सहायकोंसे सम्पन्न और प्राणोंकी बाजी लगाकर शत्रुओंका संहार करनेके लिये निश्चित विचार रखनेवाला हो, ऐसे शत्रुको अत्यन्त साधारण मानकर कौन असहाय योद्धा वशमें लानेकी इच्छा कर सकता है ? ॥ १७ ॥

यस्य नास्ति मनुष्येषु सदृशो राक्षसोत्तम । कथमाशंससे योद्धुं तुल्येनेन्द्रविवस्वतोः ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘राक्षसशिरोमणे ! मनुष्योंमें जिनकी समता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है तथा जो इन्द्र और सूर्यके समान तेजस्वी हैं, उन श्रीरामके साथ युद्ध करनेका हौसला तुम्हें कैसे हो रहा है ?’ ॥ १८ ॥

एवमुक्त्वा तु संरब्धं कुम्भकर्णं महोदरः । उवाच रक्षसां मध्ये रावणं लोकरावणम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

रोषके आवेशसे युक्त कुम्भकर्णसे ऐसा कहकर महोदरने समस्त राक्षसोंके बीचमें बैठे हुए लोकोंको रुलानेवाले रावणसे कहा—॥ १९ ॥

लब्ध्वा पुरस्ताद् वैदेहीं किमर्थं त्वं विलम्बसे । यदीच्छसि तदा सीता वशगा ते भविष्यति ॥ २० ॥

भावार्थ

‘महाराज ! आप विदेहकुमारीको अपने सामने पाकर भी किसलिये विलम्ब कर रहे हैं ? आप जब चाहें तभी सीता आपके वशमें हो जायगी ॥ २० ॥

दृष्टः कश्चिदुपायो मे सीतोपस्थानकारकः । रुचितश्चेत् स्वया बुद्ध्या राक्षसेन्द्र ततः शृणु ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘राक्षसराज ! मुझे एक ऐसा उपाय सूझा है, जो सीताको आपकी सेवामें उपस्थित करके ही रहेगा । आप उसे सुनिये । सुनकर अपनी बुद्धिसे उसपर विचार कीजिये और ठीक जँचे तो उसे कामें लाइये ॥ २१ ॥

अहं द्विजिह्वः संह्रादी कुम्भकर्णो वितर्दनः । पञ्च रामवधायैते निर्यान्तीत्यवघोषय ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘आप नगरमें यह घोषित करा दें कि महोदर, द्विजिह्व, संह्रादी, कुम्भकर्ण और वितर्दन—ये पाँच राक्षस रामका वध करनेके लिये जा रहे हैं ॥ २२ ॥

ततो गत्वा वयं युद्धं दास्यामस्तस्य यत्नतः । जेष्यामो यदि ते शत्रून् नोपायैः कार्यमस्ति नः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘हमलोग रणभूमिमें जाकर प्रयत्नपूर्वक श्रीरामके साथ युद्ध करेंगे । यदि आपके शत्रुओंपर हम विजय पा गये तो हमारे लिये सीताको वशमें करनेके निमित्त दूसरे किसी उपाय-की आवश्यकता ही नहीं रह जायगी ॥ २३ ॥

अथ जीवति नः शत्रुर्वयं च कृतसंयुगाः । ततः समभिपत्स्यामो मनसा यत् समीक्षितम् ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘यदि हमारा शत्रु अजेय होनेके कारण जीवित ही रह गया और हम भी युद्ध करते-करते मारे नहीं गये तो हम उस उपायको काममें लायेंगे, जिसे हमने मनसे सोचकर निश्चित किया है ॥ २४ ॥

वयं युद्धादिहैष्यामो रुधिरेण समुक्षिताः । विदार्य स्वतनुं बाणै रामनामाङ्कितैः शरैः ॥ २५ ॥ भक्षितो राघवोऽस्माभिर्लक्ष्मणश्चेति वादिनः । ततः पादौ ग्रहीष्यामस्त्वं नः कामं प्रपूरय ॥ २६ ॥ ततोऽवघोषय पुरे गजस्कन्धेन पार्थिव । हतो रामः सह भ्रात्रा ससैन्य इति सर्वतः ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘रामनामसे अङ्कित बाणोंद्वारा अपने शरीरको घायल कराकर खूनसे लथपथ हो हम यह कहते हुए युद्धभूमिसे यहाँ लौटेंगे कि हमने राम और लक्ष्मणको खा लिया है । उस समय हम आपके पैर पकड़कर यह भी कहेंगे कि हमने शत्रुको मारा है । इसलिये आप हमारी इच्छा पूरी कीजिये ॥ ‘पृथ्वीनाथ ! तब आप हाथीकी पीठपर किसीको बिठाकर सारे नगरमें यह घोषणा करा दें कि भाई और सेनाके सहित राम मारा गया ॥ २७ ॥

प्रीतो नाम ततो भूत्वा भृत्यानां त्वमरिंदम । भोगांश्च परिवारांश्च कामान् वसु च दापय ॥ २८ ॥ ततो माल्यानि वासांसि वीराणामनुलेपनम् । पेयं च बहु योधेभ्यः स्वयं च मुदितः पिब ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘शत्रुदमन ! इतना ही नहीं, आप प्रसन्नता दिखाते हुए अपने वीर सेवकोंको उनकी अभीष्ट वस्तुएँ, तरह-तरहकी भोग-सामग्रियाँ, दास-दासी आदि, धन-रत्न, आभूषण, वस्त्र और अनुलेपन दिलावें । अन्य योद्धाओंको भी बहुत-से उपहार दें तथा स्वयं भी खुशी मनाते हुए मद्यपान करें ॥२८-२९॥

ततोऽस्मिन् बहुलीभूते कौलीने सर्वतो गते । भक्षितः ससुहृद् रामो राक्षसैरिति विश्रुते ॥ ३० ॥ प्रविश्याश्वास्य चापि त्वं सीतां रहसि सान्त्वयन् । धनधान्यैश्च कामैश्च रत्नैश्चैनां प्रलोभय ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘तदनन्तर जब लोगोंमें सब ओर यह चर्चा फैल जाय कि राम अपने सुहृदोंसहित राक्षसोंके आहार बन गये और सीताके कानोंमें भी यह बात पड़ जाय, तब आप सीताको समझानेके लिये एकान्तमें उसके वासस्थानपर जायँ और तरह-तरहसे धीरज बँधाकर उसे धन-धान्य, भाँति-भाँतिके भोग और रत्न आदिका लोभ दिखावें ॥ ३०-३१ ॥

अनयोपधया राजन् भूयः शोकानुबन्धया । अकामा त्वद्वशं सीता नष्टनाथा गमिष्यति ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! इस प्रवञ्चनासे अपनेको अनाथ माननेवाली सीताका शोक और भी बढ़ जायगा और वह इच्छा न होनेपर भी आपके अधीन हो जायगी ॥ ३२ ॥

रमणीयं हि भर्तारं विनष्टमधिगम्य सा । नैराश्यात् स्त्रीलघुत्वाच्च त्वद्वशं प्रतिपत्स्यते ॥ ३३ ॥ सा पुरा सुखसंवृद्धा सुखार्हा दुःखकर्शिता । त्वय्यधीनं सुखं ज्ञात्वा सर्वथैव गमिष्यति ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘अपने रमणीय पतिको विनष्ट हुआ जान वह निराशा तथा नारी-सुलभ चपलताके कारण आपके वशमें आ जायगी॥ ‘वह पहले सुखमें पली हुई है और सुख भोगनेके योग्य है; परंतु इन दिनों दुःखसे दुर्बल हो गयी है । ऐसी दशामें अब आपके ही अधीन अपना सुख समझकर सर्वथा आपकी सेवामें आ जायगी ॥ ३४ ॥

एतत् सुनीतं मम दर्शनेन रामं हि दृष्ट्वैव भवेदनर्थः । इहैव ते सेत्स्यति मोत्सुको भू- र्महानयुद्धेन सुखस्य लाभः ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘मेरे देखनेमें यही सबसे सुन्दर नीति है । युद्धमें तो श्रीरामका दर्शन करते ही आपको अनर्थ ( मृत्यु ) की प्राप्ति हो सकती है; अतः आप युद्धस्थलमें जानेके लिये उत्सुक न हों, यहीं आपके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि हो जायगी । बिना युद्धके ही आपको सुखका महान् लाभ होगा ॥ ३५ ॥

अनष्टसैन्यो ह्यनवाप्तसंशयो रिपुं त्वयुद्धेन जयन्नराधिपः । यशश्च पुण्यं च महान्महीपते श्रियं च कीर्तिं च चिरं समश्नुते ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! जो राजा बिना युद्धके ही शत्रुपर विजय पाता है, उसकी सेना नष्ट नहीं होती । उसका जीवन भी संशयमें नहीं पड़ता, वह पवित्र एवं महान् यश पाता तथा दीर्घकालतक लक्ष्मी एवं उत्तम कीर्तिका उपभोग करता है’ ॥

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