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युद्धकाण्ड, सर्ग 63

तस्य राक्षसराजस्य निशम्य परिदेवितम् । कुम्भकर्णो बभाषेदं वचनं प्रजहास च ॥ १ ॥

भावार्थ

राक्षसराज रावणका यह विलाप सुनकर कुम्भकर्ण ठहाका मारकर हँसने लगा और इस प्रकार बोला—॥ १ ॥

दृष्टो दोषो हि योऽस्माभिः पुरा मन्त्रविनिर्णये । हितेष्वनभियुक्तेन सोऽयमासादितस्त्वया ॥ २ ॥

भावार्थ

‘भाईसाहब ! पहले ( विभीषण आदिके साथ ) विचार करते समय हमलोगोंने जो दोष देखा था, वही तुम्हें इस समय प्राप्त हुआ है; क्योंकि तुमने हितैषी पुरुषों और उनकी बातोंपर विश्वास नहीं किया था ॥ २ ॥

शीघ्रं खल्वभ्युपेतं त्वां फलं पापस्य कर्मणः । निरयेष्वेव पतनं यथा दुष्कृतकर्मणः ॥ ३ ॥ प्रथमं वै महाराज कृत्यमेतदचिन्तितम् । केवलं वीर्यदर्पेण नानुबन्धो विचारितः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘तुम्हें शीघ्र ही अपने पापकर्मका फल मिल गया । जैसे कुकर्मी पुरुषोंका नरकोंमें पड़ना निश्चित है, उसी प्रकार तुम्हें भी अपने दुष्कर्मका फल मिलना अवश्यम्भावी था ॥ ‘महाराज ! केवल बलके घमंडसे तुमने पहले इस पाप-कर्मकी कोई परवा नहीं की । इसके परिणामका कुछ भी विचार नहीं किया था ॥ ४ ॥

यः पश्चात्पूर्वकार्याणि कुर्यादैश्वर्यमास्थितः । पूर्वं चोत्तरकार्याणि न स वेद नयानयौ ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘जो ऐश्वर्यके अभिमानमें आकर पहले करनेयोग्य कार्योंको पीछे करता है और पीछे करनेयोग्य कार्योंको पहले कर डालता है, वह नीति तथा अनीतिको नहीं जानता है ॥५॥

देशकालविहीनानि कर्माणि विपरीतवत् । क्रियमाणानि दुष्यन्ति हवींष्यप्रयतेष्विव ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘जो कार्य उचित देश-काल न होनेपर विपरीत स्थितिमें किये जाते हैं, वे संस्कारहीन अग्नियोंमें होमे गये हविष्यकी भाँति केवल दुःखके ही कारण होते हैं ॥ ६ ॥

त्रयाणां पञ्चधा योगं कर्मणां यः प्रपद्यते । सचिवैः समयं कृत्वा स सम्यग् वर्तते पथि ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘जो राजा सचिवोंके साथ विचार करके क्षय, वृद्धि और स्थानरूपसे उपलक्षित साम, दान और दण्ड—इन तीनों कर्मोंके पाँच प्रकारके प्रयोगको काममें लाता है, वही उत्तम नीति-मार्गपर विद्यमान है, ऐसा समझना चाहिये ॥ ७ ॥

यथागमं च यो राजा समयं च चिकीर्षति । बुध्यते सचिवैर्बुद्ध्या सुहृदश्चानुपश्यति ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘जो नरेश नीतिशास्त्रके अनुसार मन्त्रियोंके साथ क्षयै आदिके लिये उपयुक्त समयका विचार करके तदनुरूप कार्य करता है और अपनी बुद्धिसे सुहृदोंकी भी पहचान कर लेता है, वही कर्तव्य और अकर्तव्यका विवेक कर पाता है ॥ ८ ॥

धर्ममर्थं हि कामं वा सर्वान् वा रक्षसां पते । भजेत पुरुषः काले त्रीणि द्वन्द्वानि वा पुनः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘राक्षसराज ! नीतिज्ञ पुरुषको चाहिये कि धर्म, अर्थ या कामका अथवा सबका अपने समयपर सेवन करे अथवा तीनों द्वन्द्वोंका–धर्म-अर्थ, अर्थ-धर्म और काम-अर्थ इन सबका भी उपयुक्त समयमें ही सेवन करे॰ ॥ ९ ॥

त्रिषु चैतेषु यच्छ्रेष्ठं श्रुत्वा तन्नावबुध्यते । राजा वा राजमात्रो वा व्यर्थं तस्य बहुश्रुतम् ॥ १० ॥

भावार्थ

‘धर्म, अर्थ और काम—इन तीनोंमें धर्म ही श्रेष्ठ है; अतः विशेष अवसरोंपर अर्थ और कामकी उपेक्षा करके भी धर्मका ही सेवन करना चाहिये—इस बातको विश्वसनीय पुरुषोंसे सुनकर भी जो राजा या राजपुरुष नहीं समझता अथवा समझकर भी स्वीकार नहीं करता, उसका अनेक शास्त्रोंका अध्ययन व्यर्थ ही है ॥ १० ॥

उपप्रदानं सान्त्वं च भेदं काले च विक्रमम् । योगं च रक्षसां श्रेष्ठ ताबुभौ च नयानयौ ॥ ११ ॥ काले धर्मार्थकामान् यः सम्मन्त्य सचिवैः सह । निषेवेतात्मवाँल्लोके न स व्यसनमाप्नुयात् ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘राक्षसशिरोमणे ! जो मनस्वी राजा मन्त्रियोंसे अच्छी तरह सलाह करके समयके अनुसार दान, भेद और पराक्रमका, इनके पूर्वोक्त पाँच प्रकारके योगका, नय और अनयका तथा ठीक समयपर धर्म, अर्थ और कामका सेवन करता है, वह इस लोकमें कभी दुःख या विपत्तिका भागी नहीं होता ११-१२

हितानुबन्धमालोक्य कुर्यात् कार्यमिहात्मनः । राजा सहार्थतत्त्वज्ञैः सचिवैर्बुद्धिजीविभिः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘राजाको चाहिये कि वह अर्थतत्त्वज्ञ एवं बुद्धिजीवी मन्त्रियोंकी सलाह लेकर जो अपने लिये परिणाममें हितकर दिखायी देता हो, वही कार्य करे ॥ १३ ॥

अनभिज्ञाय शास्त्रार्थान् पुरुषाः पशुबुद्धयः । प्रागल्भ्याद् वक्तुमिच्छन्ति मन्त्रिष्वभ्यन्तरीकृताः ॥१४॥

भावार्थ

‘जो पशुके समान बुद्धिवाले किसी तरह मन्त्रियोंके भीतर सम्मिलित कर लिये गये हैं, वे शास्त्रके अर्थको तो जानते नहीं, केवल धृष्टतावश बातें बनाना चाहते हैं ॥ १४ ॥

अशास्त्रविदुषां तेषां कार्यं नाभिहितं वचः । अर्थशास्त्रानभिज्ञानां विपुलां श्रियमिच्छताम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘शास्त्रके ज्ञानसे शून्य और अर्थशास्त्रसे अनभिज्ञ होते हुए भी प्रचुर सम्पत्ति चाहनेवाले उन अयोग्य मन्त्रियोंकी कही हुई बात कभी नहीं माननी चाहिये ॥ १५ ॥

अहितं च हिताकारं धाष्टर्यादाजल्पन्ति ये नराः । अवश्यं मन्त्रबाह्यास्ते कर्तव्याः कृत्यदूषकाः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘जो लोग धृष्टताके कारण अहितकर बातको हितका रूप देकर कहते हैं, वे निश्चय ही सलाह लेने योग्य नहीं हैं । अतः उन्हें इस कार्यसे अलग कर देना चाहिये । वे तो काम बिगाड़नेवाले ही होते हैं ॥ १६ ॥

विनाशयन्तो भर्तारं सहिताः शत्रुभिर्बुधैः । विपरीतानि कृत्यानि कारयन्तीह मन्त्रिणः ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘कुछ बुरे मन्त्री साम आदि उपायोंके ज्ञाता शत्रुओंके साथ मिल जाते हैं और अपने स्वामीका विनाश करनेके लिये ही उससे विपरीत कर्म करवाते हैं ॥ १७ ॥

तान् भर्ता मित्रसंकाशानमित्रान् मन्त्रनिर्णये । व्यवहारेण जानीयात् सचिवानुपसंहितान् ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘जब किसी वस्तु या कार्यके निश्चयके लिये मन्त्रियोंकी सलाह ली जा रही हो, उस समय राजा व्यवहारके द्वारा ही उन मन्त्रियोंको पहचाननेका प्रयत्न करे, जो घूस आदि लेकर शत्रुओंसे मिल गये हैं और अपने मित्र-से बने रहकर वास्तवमें शत्रुका काम करते हैं ॥ १८ ॥

चपलस्येह कृत्यानि सहसानुप्रधावतः । छिद्रमन्ये प्रपद्यन्ते क्रौञ्चस्य खमिव द्विजाः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘जो राजा चञ्चल है—आपातरमणीय वचनोंको सुनकर ही संतुष्ट हो जाता है और सहसा बिना सोचे-विचारे ही किसी भी कार्यकी ओर दौड़ पड़ता है, उसके इस छिद्र ( दुर्बलता ) को शत्रुलोग उसी तरह ताड़ जाते हैं, जैसे क्रौञ्च पर्वतके छेद-को पक्षी । ( क्रौञ्चपर्वतके छेदसे होकर पक्षी जैसे पर्वतके उस पार आते-जाते हैं, उसी तरह शत्रु भी राजाके उस छिद्र या कमजोरीसे लाभ उठाते हैं ) ॥ १९ ॥

यो हि शत्रुमवज्ञाय आत्मानं नाभिरक्षति । अवाप्नोति हि सोऽनर्थान् स्थानाच्च व्यवरोप्यते ॥ २० ॥

भावार्थ

‘जो राजा शत्रुकी अवहेलना करके अपनी रक्षाका प्रबन्ध नहीं करता है, वह अनेक अनर्थोंका भागी होता और अपने स्थान ( राज्य ) से नीचे उतार दिया जाता है ॥ २० ॥

यदुक्तमिह ते पूर्वं प्रियया मेऽनुजेन च । तदेव नो हितं वाक्यं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘तुम्हारी प्रिय पत्नी मन्दोदरी और मेरे छोटे भाई विभीषणने पहले तुमसे जो कुछ कहा था, वही हमारे लिये हितकर था । यों तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो’ ॥ २१ ॥

तत् तु श्रुत्वा दशग्रीवः कुम्भकर्णस्य भाषितम् । भ्रुकुटिं चैव संचक्रे क्रुद्धश्चैनमभाषत ॥ २२ ॥

भावार्थ

कुम्भकर्णकी यह बात सुनकर दशमुख रावणने भौंहें टेढ़ी कर लीं और कुपित होकर उससे कहा—॥ २२ ॥

मान्यो गुरुरिवाचार्यः किं मां त्वमनुशाससे । किमेवं वाक्श्रमं कृत्वा यद् युक्तं तद् विधीयताम् ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘तुम माननीय गुरु और आचार्यकी भाँति मुझे उपदेश क्यों दे रहे हो ? इस तरह भाषण देनेका परिश्रम करनेसे क्या लाभ होगा ? इस समय जो उचित और आवश्यक हो, वह काम करो ॥ २३ ॥

विभ्रमाच्चित्तमोहाद् वा बलवीर्याश्रयेण वा । नाभिपन्नमिदानीं यद् व्यर्था तस्य पुनः कथा ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘मैंने भ्रमसे, चित्तके मोहसे अथवा अपने बल-पराक्रमके भरोसे पहले जो तुमलोगोंकी बात नहीं मानी थी, उसकी इस समय पुनः चर्चा करना व्यर्थ है ॥ २४ ॥

अस्मिन् काले तु यद् युक्तं तदिदानीं विचिन्त्यताम् । गतं तु नानुशोचन्ति गतं तु गतमेव हि ॥ २५ ॥ ममापनयजं दोषं विक्रमेण समीकुरु ।

भावार्थ

‘जो बात बीत गयी, सो तो बीत ही गयी । बुद्धिमान् लोग बीती बातके लिये बारंबार शोक नहीं करते हैं । अब इस समय हमें क्या करना चाहिये, इसका विचार करो । अपने पराक्रमसे मेरे अनीतिजनित दुःखको शान्त कर दो॥ २५½ ॥

यदि खल्वस्ति मे स्नेहो विक्रमं वाधिगच्छसि ॥ २६ ॥ यदि कार्यं ममैतत्ते हृदि कार्यतमं मतम् ।

भावार्थ

‘यदि मुझपर तुम्हारा स्नेह है, यदि अपने भीतर यथेष्ट पराक्रम समझते हो और यदि मेरे इस कार्यको परम कर्तव्य समझकर हृदयमें स्थान देते हो तो युद्ध करो॥ २६½ ॥

स सुहृद् यो विपन्नार्थं दीनमभ्युपपद्यते ॥ २७ ॥ स बन्धुर्योऽपनीतेषु साहाय्यायोपकल्पते ।

भावार्थ

‘वही सुहृद् है, जो सारा कार्य नष्ट हो जानेसे दुखी हुए स्वजनपर अकारण अनुग्रह करता है तथा वही बन्धु है, जो अनीतिके मार्गपर चलनेसे संकटमें पड़े हुए पुरुषोंकी सहायता करता है’ ॥ २७½ ॥

तमथैवं ब्रुवाणं स वचनं धीरदारुणम् ॥ २८ ॥ रुष्टोऽयमिति विज्ञाय शनैः श्लक्ष्णमुवाच ह ।

भावार्थ

रावणको इस प्रकार धीर एवं दारुण वचन बोलते देख उसे रुष्ट समझकर कुम्भकर्ण धीरे-धीरे मधुर वाणीमें कुछ कहनेको उद्यत हुआ ॥ २८½ ॥

अतीव हि समालक्ष्य भ्रातरं क्षुभितेन्द्रियम् ॥ २९ ॥ कुम्भकर्णः शनैर्वाक्यं बभाषे परिसान्त्वयन् ।

भावार्थ

उसने देखा मेरे भाईकी सारी इन्द्रियाँ अत्यन्त विक्षुब्ध हो उठी हैं; अतः कुम्भकर्णने धीरे-धीरे उसे सान्त्वना देते हुए कहा—॥ २९½ ॥

शृणु राजन्नवहितो मम वाक्यमरिंदम ॥ ३० ॥ अलं राक्षसराजेन्द्र संतापमुपपद्य ते । रोषं च सम्परित्यज्य स्वस्थो भवितुमर्हसि ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘शत्रुदमन महाराज ! सावधान होकर मेरी बात सुनो । राक्षसराज ! संताप करना व्यर्थ है । अब तुम्हें रोष त्यागकर स्वस्थ हो जाना चाहिये ॥ ३०-३१ ॥

नैतन्मनसि कर्तव्यं मयि जीवति पार्थिव । तमहं नाशयिष्यामि यत् कृते परितप्यते ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘पृथ्वीनाथ ! मेरे जीते-जी तुम्हें मनमें ऐसा भाव नहीं लाना चाहिये । तुम्हें जिसके कारण संतप्त होना पड़ रहा है, उसे मैं नष्ट कर दूँगा ॥ ३२ ॥

अवश्यं तु हितं वाच्यं सर्वावस्थं मया तव । बन्धुभावादभिहितं भ्रातृस्नेहाच्च पार्थिव ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! अवश्य ही सब अवस्थाओंमें मुझे तुम्हारे हितकी बात कहनी चाहिये । अतः मैंने बन्धुभाव और भ्रातृस्नेहके कारण ही ये बातें कही हैं ॥ ३३ ॥

सदृशं यच्च कालेऽस्मिन् कर्तुं स्नेहेन बन्धुना । शत्रूणां कदनं पश्य क्रियमाणं मया रणे ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘इस समय एक भाईको स्नेहवश जो कुछ करना उचित है, वही करूँगा । अब रणभूमिमें मेरे द्वारा किया जानेवाला शत्रुओंका संहार देखो ॥ ३४ ॥

अद्य पश्य महाबाहो मया समरमूर्धनि । हते रामे सह भ्रात्रा द्रवन्तीं हरिवाहिनीम् ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘महाबाहो ! आज युद्धके मुहानेपर मेरे द्वारा भाईसहित रामके मारे जानेके पश्चात् तुम देखोगे कि वानरोंकी सेना किस तरह भागी जा रही है ॥ ३५ ॥

अद्य रामस्य तद् दृष्ट्वा मयाऽऽनीतं रणाच्छिरः । सुखी भव महाबाहो सीता भवतु दुःखिता ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘महाबाहो ! आज मैं संग्रामभूमिसे रामका सिर काट लाऊँगा । उसे देखकर तुम सुखी होना और सीता दुःखमें डूब जायगी ॥ ३६ ॥

अद्य रामस्य पश्यन्तु निधनं सुमहत् प्रियम् । लङ्कायां राक्षसाः सर्वे ये ते निहतबान्धवाः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘लङ्कामें जिन राक्षसोंके सगे-सम्बन्धी मारे गये हैं, वे भी आज रामकी मृत्यु देख लें । यह उनके लिये बहुत ही प्रिय बात होगी ॥ ३७ ॥

अद्य शोकपरीतानां स्वबन्धुवधशोचिनाम् । शत्रोर्युधि विनाशेन करोम्यश्रुप्रमार्जनम् ॥ ३८ ॥

भावार्थ

‘अपने भाई-बन्धुओंके मारे जानेसे जो लोग अत्यन्त शोकमें डूबे हुए हैं; आज युद्धमें शत्रुका नाश करके मैं उनके आँसू पोंछूँगा ॥ ३८ ॥

अद्य पर्वतसंकाशं ससूर्यमिव तोयदम् । विकीर्णं पश्य समरे सुग्रीवं प्लवगेश्वरम् ॥ ३९ ॥

भावार्थ

‘आज पर्वतके समान विशालकाय वानरराज सुग्रीवको समराङ्गणमें खूनसे लथपथ होकर गिरे हुए देखोगे, जो सूर्य-सहित मेघके समान दृष्टिगोचर होंगे ॥ ३९ ॥

कथं च राक्षसैरेभिर्मया च परिसान्त्वितः । जिघांसुभिर्दाशरथिं व्यथसे त्वं सदानघ ॥ ४० ॥

भावार्थ

‘निष्पाप निशाचरराज ! ये राक्षस तथा मैं-सब लोग दशरथपुत्र रामको मार डालनेकी इच्छा रखते हैं और तुम्हें इस बातके लिये आश्वासन देते हैं तो भी तुम सदा व्यथित क्यों रहते हो ? ॥ ४० ॥

मां निहत्य किल त्वां हि निहनिष्यति राघवः । नाहमात्मनि संतापं गच्छेयं राक्षसाधिप ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘राक्षसराज ! पहले मेरा वध करके ही राम तुम्हें मार सकेंगे; किंतु मैं अपने विषयमें रामसे संताप या भय नहीं मानता ॥ ४१ ॥

कामं त्विदानीमपि मां व्यादिश त्वं परंतप । न परः प्रेक्षणीयस्ते युद्धायातुलविक्रम ॥ ४२ ॥

भावार्थ

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले अनुपम पराक्रमी वीर ! इस समय तुम इच्छानुसार मुझे युद्धके लिये आदेश दो । शत्रुओंसे जूझनेके लिये तुम्हें दूसरे किसीकी ओर देखनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ४२ ॥

अहमुत्सादयिष्यामि शत्रूंस्तव महाबलान् । यदि शक्रो यदि यमो यदि पावकमारुतौ ॥ ४३ ॥ तानहं योधयिष्यामि कुबेरवरुणावपि ।

भावार्थ

‘तुम्हारे महाबली शत्रु यदि इन्द्र, यम, अग्नि, वायु, कुबेर और वरुण भी हों तो मैं उनसे भी युद्ध करूँगा तथा उन सबको उखाड़ फेंकूँगा ॥ ४३½ ॥

गिरिमात्रशरीरस्य शितशूलधरस्य मे ॥ ४४ ॥ नर्दतस्तीक्ष्णदंष्ट्रस्य बिभीयाद् वै पुरंदरः ।

भावार्थ

‘मेरा पर्वतके समान विशाल शरीर है । मैं हाथमें तीखा त्रिशूल धारण करता हूँ और मेरी दाढ़ें भी बहुत तीखी हैं । मेरे सिंहनाद करनेपर इन्द्र भी भयसे थर्रा उठेंगे ॥ ४४½ ॥

अथ वा त्यक्तशस्त्रस्य मृद्नतस्तरसा रिपून् ॥ ४५ ॥ न मे प्रतिमुखः कश्चित् स्थातुं शक्तो जिजीविषुः ।

भावार्थ

‘अथवा यदि मैं शस्त्र त्याग करके भी वेगपूर्वक शत्रुओंको रौंदता हुआ रणभूमिमें विचरने लगूँ तो कोई भी जीवित रहनेकी इच्छावाला पुरुष मेरे सामने नहीं ठहर सकता ।४५½॥

नैव शक्त्या न गदया नासिना निशितैः शरैः ॥ ४६ ॥ हस्ताभ्यामेव संरभ्य हनिष्यामि सवज्रिणम् ।

भावार्थ

‘मैं न तो शक्तिसे, न गदासे, न तलवारसे और न पैने बाणोंसे ही काम लूँगा । रोषसे भरकर केवल दोनों हाथोंसे ही वज्रधारी इन्द्र-जैसे शत्रुको भी मौतके घाट उतार दूँगा ।४६½॥

यदि मे मुष्टिवेगं स राघवोऽद्य सहिष्यति ॥ ४७ ॥ ततः पास्यन्ति बाणौघा रुधिरं राघवस्य मे ।

भावार्थ

‘यदि राम आज मेरी मुट्ठीका वेग सह लेंगे तो मेरे बाणसमूह अवश्य ही उनका रक्त पान करेंगे ॥ ४७½ ॥

चिन्तया तप्यसे राजन् किमर्थं मयि तिष्ठति ॥ ४८ ॥ सोऽहं शत्रुविनाशाय तव निर्यातुमुद्यतः ।

भावार्थ

‘राजन् ! मेरे रहते हुए तुम किसलिये चिन्ताकी आगसे झुलस रहे हो ? मैं तुम्हारे शत्रुओंका विनाश करनेके लिये अभी रणभूमिमें जानेको उद्यत हूँ ॥ ४८½ ॥

मुञ्च रामाद् भयं घोरं निहनिष्यामि संयुगे ॥ ४९ ॥ राघवं लक्ष्मणं चैव सुग्रीवं च महाबलम् ।

भावार्थ

‘तुम्हें रामसे जो घोर भय हो रहा है, उसे त्याग दो । मैं रणभूमिमें राम, लक्ष्मण और महाबली सुग्रीवको अवश्य मार डालूँगा ॥ ४९½ ॥

हनूमन्तं च रक्षोघ्नं येन लङ्का प्रदीपिता ॥ ५० ॥ हरींश्च भक्षयिष्यामि संयुगे समुपस्थिते । असाधारणमिच्छामि तव दातुं महद् यशः ॥ ५१ ॥

भावार्थ

‘युद्ध उपस्थित होनेपर मैं राक्षसोंका संहार करनेवाले उस हनुमान्को भी जीवित नहीं छोड़ूँगा, जिसने लङ्का जलायी थी । साथ ही अन्य वानरोंको भी खा जाऊँगा । आज मैं तुम्हें अलौकिक एवं महान् यश प्रदान करना चाहता हूँ ॥ ५०-५१ ॥

यदि चेन्द्राद् भयं राजन् यदि चापि स्वयंभुवः । ततोऽहं नाशयिष्यामि नैशं तम इवांशुमान् ॥ ५२ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! यदि तुम्हें इन्द्र अथवा स्वयम्भू ब्रह्मासे भी भय है तो मैं उस भयको भी उसी तरह नष्ट कर दूँगा, जैसे सूर्य रात्रिके अन्धकारको ॥ ५२ ॥

अपि देवाः शयिष्यन्ते मयि क्रुद्धे महीतले । यमं च शमयिष्यामि भक्षयिष्यामि पावकम् ॥ ५३ ॥

भावार्थ

‘मेरे कुपित होनेपर देवता भी धराशायी हो जायँगे । ( फिर मनुष्यों और वानरोंकी तो बात ही क्या है ? ) मैं यमराजको भी शान्त कर दूँगा । सर्वभक्षी अग्निका भी भक्षण कर जाऊँगा ॥ ५३ ॥

आदित्यं पातयिष्यामि सनक्षत्रं महीतले । शतक्रतुं वधिष्यामि पास्यामि वरुणालयम् ॥ ५४ ॥

भावार्थ

‘नक्षत्रोंसहित सूर्यको भी पृथ्वीपर मार गिराऊँगा, इन्द्रका भी वध कर डालूँगा और समुद्रको भी पी जाऊँगा ॥ ५४ ॥

पर्वतांश्चर्णयिष्यामि दारयिष्यामि मेदिनीम् । दीर्घकालं प्रसुप्तस्य कुम्भकर्णस्य विक्रमम् ॥ ५५ ॥ अद्य पश्यन्तु भूतानि भक्ष्यमाणानि सर्वशः । न त्विदं त्रिदिवं सर्वमाहारो मम पूर्यते ॥ ५६ ॥

भावार्थ

‘पर्वतोंको चूर-चूर कर दूँगा । भूमण्डलको विदीर्ण कर डालूँगा । आज मेरे द्वारा खाये जानेवाले सब प्राणी दीर्घकालतक सोकर उठे हुए मुझ कुम्भकर्णका पराक्रम देखें । यह सारी त्रिलोकी आहार बन जाय तो भी मेरा पेट नहीं भर सकता ॥ ५५-५६ ॥

वधेन ते दाशरथेः सुखावहं सुखं समाहर्तुमहं व्रजामि । निहत्य रामं सह लक्ष्मणेन खादामि सर्वान् हरियूथमुख्यान् ॥ ५७ ॥

भावार्थ

‘दशरथकुमार श्रीरामका वध करके मैं तुम्हें उत्तरोत्तर सुखकी प्राप्ति करानेवाले सुख-सौभाग्यको देना चाहता हूँ । लक्ष्मणसहित रामका वध करके सभी प्रधान-प्रधान वानरयूथपतियोंको खा जाऊँगा ॥ ५७ ॥

रमस्व राजन् पिब चाद्य वारुणीं कुरुष्व कृत्यानि विनीय दुःखम् । मयाद्य रामे गमिते यमक्षयं चिराय सीता वशगा भविष्यति ॥ ५८ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! अब मौज करो, मदिरा पीओ और मानसिक दुःखको दूर करके सब कार्य करो । आज मेरे द्वारा राम यमलोक पहुँचा दिये जायँगे; फिर तो सीता चिरकाल ( सदा ) के लिये तुम्हारे अधीन हो जायगी’ ॥ ५८ ॥

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