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युद्धकाण्ड, सर्ग 55

वज्रदंष्ट्रं हतं श्रुत्वा वालिपुत्रेण रावणः। बलाध्यक्षमुवाचेदं कृताञ्जलिमुपस्थितम् ॥ १ ॥

भावार्थ

वालिपुत्र अङ्गदके हाथसे वज्रदंष्ट्रके मारे जानेका समाचार सुनकर रावणने हाथ जोड़कर अपने पास खड़े हुए सेनापति प्रहस्तसे कहा—॥ १ ॥

शीघ्रं निर्यान्तु दुर्धर्षा राक्षसा भीमविक्रमाः। अकम्पनं पुरस्कृत्य सर्वशास्त्रास्त्रकोविदम् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘अकम्पन सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता हैं, अतः उन्हींको आगे करके भयंकर पराक्रमी दुर्धर्ष राक्षस शीघ्र यहाँसे युद्धके लिये जायँ ॥ २ ॥

एष शास्ता च गोप्ता च नेता च युधि सत्तमः। भूतिकामश्च मे नित्यं नित्यं च समरप्रियः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘अकम्पनको युद्ध सदा ही प्रिय है। ये सर्वदा मेरी उन्नति चाहते हैं। इन्हें युद्धमें एक श्रेष्ठ योद्धा माना गया है। ये शत्रुओंको दण्ड देने, अपने सैनिकोंकी रक्षा करने तथा रणभूमिमें सेनाका संचालन करनेमें समर्थ हैं ॥ ३ ॥

एष जेष्यति काकुत्स्थौ सुग्रीवं च महाबलम्। वानरांश्चापरान् घोरान् हनिष्यति न संशयः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘अकम्पन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणको तथा महाबली सुग्रीवको भी परास्त कर देंगे और दूसरे-दूसरे भयानक वानरोंका भी संहार कर डालेंगे, इसमें संशय नहीं है’ ॥ ४ ॥

परिगृह्य स तामाज्ञां रावणस्य महाबलः। बलं सम्प्रेरयामास तदा लघुपराक्रमः ॥ ५ ॥

भावार्थ

रावणकी उस आज्ञाको शिरोधार्य करके शीघ्रपराक्रमी महाबली सेनाध्यक्षने उस समय युद्धके लिये सेना भेजी ॥ ५ ॥

ततो नानाप्रहरणा भीमाक्षा भीमदर्शनाः। निष्पेतू राक्षसा मुख्या बलाध्यक्षप्रचोदिताः ॥ ६ ॥

भावार्थ

सेनापतिसे प्रेरित हो भयानक नेत्रोंवाले मुख्य-मुख्य भयंकर राक्षस नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये नगरसे बाहर निकले॥६॥

रथमास्थाय विपुलं तप्तकाञ्चनभूषणम्। मेघाभो मेघवर्णश्च मेघस्वनमहास्वनः ॥ ७ ॥ राक्षसैः संवृतो घोरैस्तदा निर्यात्यकम्पनः।

भावार्थ

उसी समय तपे हुए सोनेसे विभूषित विशाल रथपर आरूढ़ हो घोर राक्षसोंसे घिरा हुआ अकम्पन भी निकला। वह मेघके समान विशाल था, मेघके समान ही उसका रंग था और मेघके ही तुल्य उसकी गर्जना थी ॥ ७½ ॥

नहि कम्पयितुं शक्यः सुरैरपि महामृधे ॥ ८ ॥ अकम्पनस्ततस्तेषामादित्य इव तेजसा।

भावार्थ

महासमरमें देवता भी उसे कम्पित नहीं कर सकते थे, इसीलिये वह अकम्पन नामसे विख्यात था और राक्षसोंमें सूर्यके समान तेजस्वी था ॥ ८½ ॥

तस्य निर्घावमानस्य संरब्धस्य युयुत्सया ॥ ९ ॥ अकस्माद् दैन्यमागच्छद्धयानां रथवाहिनाम्।

भावार्थ

रोषावेशसे भरकर युद्धकी इच्छासे धावा करनेवाले अकम्पनके रथमें जुते हुए घोड़ोंका मन अकस्मात् दीनभाव-को प्राप्त हो गया ॥ ९½ ॥

व्यस्फुरन्नयनं चास्य सव्यं युद्धाभिनन्दिनः ॥ १० ॥ विवर्णो मुखवर्णश्च गद्गदश्चाभवत् स्वनः।

भावार्थ

यद्यपि अकम्पन युद्धका अभिनन्दन करनेवाला था, तथापि उस समय उसकी बायीं आँख फड़कने लगी। मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी और वाणी गद्गद हो गयी ॥ १०½ ॥

अभवत् सुदिने काले दुर्दिनं रूक्षमारुतम् ॥ ११ ॥ ऊचुः खगमृगाः सर्वे वाचः क्रूरा भयावहाः।

भावार्थ

यद्यपि वह समय सुदिनका था, तथापि सहसा रूखी हवासे युक्त दुर्दिन छा गया। सभी पशु और पक्षी क्रूर एवं भयदायक बोली बोलने लगे ॥ ११½ ॥

स सिंहोपचितस्कन्धः शार्दूलसमविक्रमः ॥ १२ ॥ तानुत्पातानचिन्त्यैव निर्जगाम रणाजिरम्।

भावार्थ

अकम्पनके कंधे सिंहके समान पुष्ट थे। उसका पराक्रम व्याघ्रके समान था। वह पूर्वोक्त उत्पातोंकी कोई परवा न करके रणभूमिकी ओर चला ॥ १२½ ॥

तथा निर्गच्छतस्तस्य रक्षसः सह राक्षसैः ॥ १३ ॥ बभूव सुमहान् नादः क्षोभयन्निव सागरम्।

भावार्थ

जिस समय वह राक्षस दूसरे राक्षसोंके साथ लङ्कासे निकला, उस समय ऐसा महान् कोलाहल हुआ कि समुद्रमें भी हलचल-सी मच गयी ॥ १३½ ॥

तेन शब्देन वित्रस्ता वानराणां महाचमूः ॥ १४ ॥ द्रुमशैलप्रहाराणां योद्धुं समुपतिष्ठताम्। तेषां युद्धं महारौद्रं संजज्ञे कपिरक्षसाम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

उस महान् कोलाहलसे वानरोंकी वह विशाल सेना भयभीत हो गयी। युद्धके लिये उपस्थित हो वृक्षों और शैल-शिखरोंका प्रहार करनेवाले उन वानरों और राक्षसोंमें महाभयंकर युद्ध होने लगा ॥ १४-१५ ॥

रामरावणयोरर्थे समभित्यक्तदेहिनः । सर्वे ह्यतिबलाः शूराः सर्वे पर्वतसंनिभाः ॥ १६ ॥

भावार्थ

श्रीराम और रावणके निमित्त आत्मत्यागके लिये उद्यत हुए वे समस्त शूरवीर अत्यन्त बलशाली और पर्वतके समान विशालकाय थे ॥ १६ ॥

हरयो राक्षसाश्चैव परस्परजिघांसया । तेषां विनर्दतां शब्दः संयुगेऽतितरस्विनाम् ॥ १७ ॥ शुश्रुवे सुमहान् कोपादन्योन्यमभिगर्जताम् ।

भावार्थ

वानर तथा राक्षस एक दूसरेके वधकी इच्छासे वहाँ एकत्र हुए थे । वे युद्धस्थलमें अत्यन्त वेगशाली थे । कोलाहल करते और एक दूसरेको लक्ष्य करके क्रोधपूर्वक गर्जते थे । उनका महान् शब्द सुदूरतक सुनायी देता था ॥ १७½ ॥

रजश्चारुणवर्णाभं सुभीममभवद् भृशम् ॥ १८ ॥ उद्धृतं हरिरक्षोभिः संरुरोध दिशो दश ।

भावार्थ

वानरों और राक्षसोंद्वारा उड़ायी गयी लाल रंगकी धूल बड़ी भयंकर जान पड़ती थी । उसने दसों दिशाओंको आच्छादित कर लिया था ॥ १८½ ॥

अन्योन्यं रजसा तेन कौशेयोद्धतपाण्डुना ॥ १९ ॥ संवृतानि च भूतानि ददृशुर्न रणाजिरे ।

भावार्थ

परस्पर उड़ायी हुई वह धूल हिलते हुए रेशमी वस्त्रके समान पाण्डुवर्णकी दिखायी देती थी । उसके द्वारा समराङ्गणमें समस्त प्राणी ढक गये थे । अतः वानर और राक्षस उन्हें देख नहीं पाते थे ॥ १९½ ॥

न ध्वजो न पताका वा चर्म वा तुरगोऽपि वा ॥ २० ॥ आयुधं स्यन्दनो वापि ददृशे तेन रेणुना ।

भावार्थ

उस धूलसे आच्छादित होनेके कारण ध्वज, पताका, ढाल, घोड़ा, अस्त्र-शस्त्र अथवा रथ कोई भी वस्तु दिखायी नहीं देती थी ॥ २०½ ॥

शब्दश्च सुमहांस्तेषां नर्दतामभिधावताम् ॥ २१ ॥ श्रूयते तुमुलो युद्धे न रूपाणि चकाशिरे ।

भावार्थ

उन गर्जते और दौड़ते हुए प्राणियोंका महाभयंकर शब्द युद्धस्थलमें सबको सुनायी पड़ता था, परंतु उनके रूप नहीं दिखायी देते थे ॥ २१½ ॥

हरीनेव सुसंरुद्धा हरयो जघ्नुराहवे ॥ २२ ॥ राक्षसा राक्षसांश्चापि निजघ्नुस्तिमिरे तदा ।

भावार्थ

अन्धकारसे आच्छादित युद्धस्थलमें अत्यन्त कुपित हुए वानर वानरोंपर ही प्रहार कर बैठते थे तथा राक्षस राक्षसोंको ही मारने लगते थे ॥ २२½ ॥

ते परांश्च विनिघ्नन्तः स्वांश्च वानरराक्षसाः ॥ २३ ॥ रुधिरार्द्रां तदा चक्रुर्महीं पङ्कानुलेपनाम् ।

भावार्थ

अपने तथा शत्रुपक्षके योद्धाओंको मारते हुए वानरों तथा राक्षसोंने उस रणभूमिको रक्तकी धारासे भिगो दिया और वहाँ कीच मचा दी ॥ २३½ ॥

ततस्तु रुधिरौघेण सिक्तं ह्यपगतं रजः ॥ २४ ॥ शरीरशवसंकीर्णा बभूव च वसुंधरा ।

भावार्थ

तदनन्तर रक्तके प्रवाहसे सिंच जानेके कारण वहाँकी धूल बैठ गयी और सारी युद्धभूमि लाशोंसे भर गयी ॥ २४½ ॥

द्रुमशक्तिगदाप्रासैः शिलापरिघतोमरैः ॥ २५ ॥ राक्षसा हरयस्तूर्णं जघ्नुरन्योन्यमोजसा ।

भावार्थ

वानर और राक्षस एक दूसरेपर वृक्ष, शक्ति, गदा, प्रास, शिला, परिघ और तोमर आदिसे बलपूर्वक जल्दी-जल्दी प्रहार करने लगे ॥ २५½ ॥

बाहुभिः परिघाकारैर्युध्यन्तः पर्वतोपमान् ॥ २६ ॥ हरयो भीमकर्माणो राक्षसाञ्जघ्नुराहवे ।

भावार्थ

भयंकर कर्म करनेवाले वानर अपनी परिघके समान भुजाओंद्वारा पर्वताकार राक्षसोंके साथ युद्ध करते हुए रणभूमिमें उन्हें मारने लगे ॥ २६½ ॥

राक्षसास्त्वभिसंक्रुद्धाः प्रासतोमरपाणयः ॥ २७ ॥ कपीन् निजघ्निरे तत्र शस्त्रैः परमदारुणैः ।

भावार्थ

उधर राक्षसलोग भी अत्यन्त कुपित हो हाथोंमें प्रास और तोमर लिये अत्यन्त भयंकर शस्त्रोंद्वारा वानरोंका वध करने लगे ॥ २७½ ॥

अकम्पनः सुसंक्रुद्धो राक्षसानां चमूपतिः ॥ २८ ॥ संहर्षयति तान् सर्वान् राक्षसान् भीमविक्रमान् ।

भावार्थ

इस समय अधिक रोषसे भरा हुआ राक्षस-सेनापति अकम्पन भी भयानक पराक्रम प्रकट करनेवाले उन सभी राक्षसोंका हर्ष बढ़ाने लगा ॥ २८½ ॥

हरयस्त्वपि रक्षांसि महाद्रुममहाश्मभिः ॥ २९ ॥ विदारयन्त्यभिक्रम्य शस्त्राण्याच्छिद्य वीर्यतः ।

भावार्थ

वानर भी बलपूर्वक आक्रमण करके राक्षसोंके अस्त्र-शस्त्र छीनकर बड़े-बड़े वृक्षों और शिलाओंद्वारा उन्हें विदीर्ण करने लगे ॥ २९½ ॥

एतस्मिन्नन्तरे वीरा हरयः कुमुदो नलः ॥ ३० ॥ मैन्दश्च द्विविदः क्रुद्धाश्चक्रुर्वेगमनुत्तमम् ।

भावार्थ

इसी समय वीर वानर कुमुद, नल, मैन्द और द्विविदने कुपित हो अपना परम उत्तम वेग प्रकट किया ॥ ३०½ ॥

ते तु वृक्षैर्महावीरा राक्षसानां चमूमुखे ॥ ३१ ॥ कदनं सुमहच्चक्रुर्लीलया हरिपुंगवाः । ममन्थू राक्षसान् सर्वे नानाप्रहरणैर्भृशम् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

उन महावीर वानरशिरोमणियोंने युद्धके मुहानेपर वृक्षोंद्वारा खेल-खेलमें ही राक्षसोंका बड़ा भारी संहार किया । उन सबने नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा राक्षसोंको भलीभाँति मथ डाला ॥ ३१-३२ ॥

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