युद्धकाण्ड, सर्ग 56
तद् दृष्ट्वा सुमहत् कर्म कृतं वानरसत्तमैः । क्रोधमाहारयामास युधि तीव्रमकम्पनः ॥ १ ॥
भावार्थ
उन वानरशिरोमणियोंद्वारा किये गये उस महान् पराक्रमको देखकर युद्धस्थलमें अकम्पनको बड़ा भारी एवं दुःसह क्रोध हुआ ॥ १ ॥
क्रोधमूर्च्छितरूपस्तु धुन्वन् परमकार्मुकम् । दृष्ट्वा तु कर्म शत्रूणां सारथिं वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥
भावार्थ
शत्रुओंका कर्म देख रोषसे उसका सारा शरीर व्याप्त हो गया और अपने उत्तम धनुषको हिलाते हुए उसने सारथिसे कहा—॥ २ ॥
तत्रैव तावत् त्वरितो रथं प्रापय सारथे । एते च बलिनो घ्नन्ति सुबहून् राक्षसान् रणे ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘सारथे ! ये बलवान् वानर युद्धमें बहुतेरे राक्षसोंका वध कर रहे हैं, अतः पहले वहां शीघ्रतापूर्वक मेरा रथ पहुँचाओ ॥ ३ ॥
एते च बलवन्तो वा भीमकोपाश्च वानराः । द्रुमशैलप्रहरणास्तिष्ठन्ति प्रमुखे मम ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘ये वानर बलवान् तो हैं ही, इनका क्रोध भी बड़ा भयानक है । ये वृक्षों और शिलाओंका प्रहार करते हुए मेरे सामने खड़े हैं ॥ ४ ॥
एतान् निहन्तुमिच्छामि समरश्लाघिनो ह्यहम् । एतैः प्रमथितं सर्वं रक्षसां दृश्यते बलम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘ये युद्धकी स्पृहा रखनेवाले हैं; अतः मैं इन सबका वध करना चाहता हूँ । इन्होंने सारी राक्षससेनाको मथ डाला है। यह साफ दिखायी देता है’ ॥ ५ ॥
ततः प्रचलिताश्वेन रथेन रथिनां वरः । हरीनभ्यपतद् दूराच्छरजालैरकम्पनः ॥ ६ ॥
भावार्थ
तदनन्तर तेज चलनेवाले घोड़ोंसे जुते हुए रथके द्वारा रथियोंमें श्रेष्ठ अकम्पन दूरसे ही बाणसमूहोंकी वर्षा करता हुआ उन वानरोंपर टूट पड़ा ॥ ६ ॥
न स्थातुं वानराः शेकुः किं पुनर्योद्धुमाहवे । अकम्पनशरैर्भग्नाः सर्वे एवाभिदुद्रुवुः ॥ ७ ॥
भावार्थ
अकम्पनके बाणोंसे घायल हो सभी वानर भाग चले । वे युद्धस्थलमें खड़े भी न रह सके; फिर युद्ध करनेकी तो बात ही क्या है ? ॥ ७ ॥
तान् मृत्युवशमापन्नानकम्पनशरानुगान् । समीक्ष्य हनुमाञ्ज्ञातीनुपतस्थे महाबलः ॥ ८ ॥
भावार्थ
अकम्पनके बाण वानरोंके पीछे लगे थे और वे मृत्युके अधीन होते जाते थे । अपने जाति-भाइयोंकी यह दशा देखकर महाबली हनुमान्जी अकम्पनके पास आये ॥ ८॥
तं महाप्लवगं दृष्ट्वा सर्वे ते प्लवगर्षभाः । समेत्य समरे वीराः संहृष्टाः पर्यवारयन् ॥ ९ ॥
भावार्थ
महाकपि हनुमान्जीको आया देख वे समस्त वीर वानरशिरोमणि एकत्र हो हर्षपूर्वक उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ९ ॥
व्यवस्थितं हनूमन्तं ते दृष्ट्वा प्लवगर्षभाः । बभूवुर्बलवन्तो हि बलवन्तमुपाश्रिताः ॥ १० ॥
भावार्थ
हनुमान्जीको युद्धके लिये डटा हुआ देख वे सभी श्रेष्ठ वानर उन बलवान् वीरका आश्रय ले स्वयं भी बलवान् हो गये ॥ १० ॥
अकम्पनस्तु शैलाभं हनूमन्तमवस्थितम् । महेन्द्र इव धाराभिः शरैरभिववर्ष ह ॥ ११ ॥
भावार्थ
पर्वतके समान विशालकाय हनुमान्जीको अपने सामने उपस्थित देख अकम्पन उनपर बाणोंकी फिर वर्षा करने लगा, मानो देवराज इन्द्र जलकी धारा बरसा रहे हों ॥११॥
अचिन्तयित्वा बाणौघाञ्शरीरे पातितान् कपिः । अकम्पनवधार्थाय मनो दध्रे महाबलः ॥ १२ ॥
भावार्थ
अपने शरीरपर गिराये गये उन बाण-समूहोंकी परवा न करके महाबली हनुमान्ने अकम्पनको मार डालनेका विचार किया ॥ १२ ॥
स प्रहस्य महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः । अभिदुद्राव तद्रक्षः कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
फिर तो महातेजस्वी पवनकुमार हनुमान् महान् अट्टहास करके पृथ्वीको कँपाते हुए-से उस राक्षसकी ओर दौड़े ॥१३॥
तस्याथ नर्दमानस्य दीप्यमानस्य तेजसा । बभूव रूपं दुर्धर्षं दीप्तस्येव विभावसोः ॥ १४ ॥
भावार्थ
उस समय वहाँ गर्जते और तेजसे देदीप्यमान होते हुए हनुमान्जीका रूप प्रज्वलित अग्निके समान दुर्धर्ष हो गया था ॥ १४ ॥
आत्मानं त्वप्रहरणं ज्ञात्वा क्रोधसमन्वितः । शैलमुत्पाटयामास वेगेन हरिपुङ्गवः ॥ १५ ॥
भावार्थ
अपने हाथमें कोई हथियार नहीं है, यह जानकर क्रोधसे भरे हुए वानरशिरोमणि हनुमान्ने बड़े वेगसे पर्वत उखाड़ लिया ॥ १५ ॥
गृहीत्वा सुमहाशैलं पाणिनैकेन मारुतिः । स विनद्य महानादं भ्रामयामास वीर्यवान् ॥ १६ ॥ ततस्तमभिदुद्राव राक्षसेन्द्रमकम्पनम् । पुरा हि नमुचिं संख्ये वज्रेणेव पुरंदरः ॥ १७ ॥
भावार्थ
उस महान् पर्वतको एक ही हाथसे लेकर पराक्रमी पवनकुमार बड़े जोर-जोरसे गर्जना करते हुए उसे घुमाने लगे ॥ फिर उन्होंने राक्षसराज अकम्पनपर धावा किया, ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकालमें देवेन्द्रने वज्र लेकर युद्धस्थलमें नमुचिपर आक्रमण किया था ॥ १७ ॥
अकम्पनस्तु तद् दृष्ट्वा गिरिशृङ्गं समुद्यतम् । दूरादेव महावाणैरर्धचन्द्रैर्व्यदारयत् ॥ १८ ॥
भावार्थ
अकम्पनने उस उठे हुए पर्वतशिखरको देख अर्धचन्द्राकार विशाल बाणोंके द्वारा उसे दूरसे ही विदीर्ण कर दिया ॥ १८ ॥
तं पर्वताग्रमाकाशे रक्षोबाणविदारितम् । विकीर्णं पतितं दृष्ट्वा हनूमान् क्रोधमूर्च्छितः ॥ १९ ॥
भावार्थ
उस राक्षसके बाणसे विदीर्ण हो वह पर्वतशिखर आकाशमें ही बिखरकर गिर पड़ा । यह देख हनुमान्जीके क्रोधकी सीमा न रही ॥ १९ ॥
सोऽश्वकर्णं समासाद्य रोषदर्पान्वितो हरिः । तूर्णमुत्पाटयामास महागिरिमिवोच्छ्रितम् ॥ २० ॥
भावार्थ
फिर रोष और दर्पसे उन वानरवीरने महान् पर्वतके समान ऊँचे अश्वकर्ण नामक वृक्षके पास जाकर उसे शीघ्रतापूर्वक उखाड़ लिया ॥ २० ॥
तं गृहीत्वा महास्कन्धं सोऽश्वकर्णं महाद्युतिः । प्रगृह्य परया प्रीत्या भ्रामयामास संयुगे ॥ २१ ॥
भावार्थ
विशाल तनेवाले उस अश्वकर्णको हाथमें लेकर महातेजस्वी हनुमान्ने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसे युद्धभूमिमें घुमाना आरम्भ किया ॥ २१ ॥
प्रधावन्नुरुवेगेन बभञ्ज तरसा द्रुमान् । हनूमान् परमकुद्धश्चरणैर्दारयन् महीम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
प्रचण्ड क्रोधसे भरे हुए हनुमान्ने बड़े वेगसे दौड़कर कितने ही वृक्षोंको तोड़ डाला और पैरोंकी धमकसे वे पृथ्वीको भी विदीर्ण-सी करने लगे ॥ २२ ॥
गजांश्च सगजारोहान् सरथान् रथिनस्तथा । जघान हनुमान् धीमान् राक्षसांश्च पदातिगान् ॥ २३ ॥
भावार्थ
सवारोंसहित हाथियों, रथोंसहित रथियों तथा पैदल राक्षसोंको भी बुद्धिमान् हनुमान्जी मौतके घाट उतारने लगे ॥२३॥
तमन्तकमिव क्रुद्धं सद्रुमं प्राणहारिणम् । हनूमन्तमभिप्रेक्ष्य राक्षसा विप्रदुद्रुवुः ॥ २४ ॥
भावार्थ
क्रोधसे भरे हुए यमराजकी भाँति वृक्ष हाथमें लिये प्राणहारी हनुमान्को देख राक्षस भागने लगे ॥ २४ ॥
तमापतन्तं संक्रुद्धं राक्षसानां भयावहम् । ददर्शाकम्पनो वीरश्चुक्षोभ च ननाद च ॥ २५ ॥
भावार्थ
राक्षसोंको भय देनेवाले हनुमान् अत्यन्त कुपित होकर शत्रुओंपर आक्रमण कर रहे थे । उस समय वीर अकम्पनने उन्हें देखा । देखते ही वह क्षोभसे भर गया और जोर-जोरसे गर्जना करने लगा ॥ २५ ॥
स चतुर्दशभिर्बाणैर्निशितैर्देहदारणैः । निर्बिभेद महावीर्यं हनूमन्तमकम्पनः ॥ २६ ॥
भावार्थ
अकम्पनने देहको विदीर्ण कर देनेवाले चौदह पैने बाण मारकर महापराक्रमी हनुमान्को घायल कर दिया ॥ २६ ॥
स तथा विप्रकीर्णस्तु नाराचैः शितशक्तिभिः । हनूमान् दद्दशे वीरः प्ररूढ इव सानुमान् ॥ २७ ॥
भावार्थ
इस प्रकार नाराचों और तीखी शक्तियोंसे छिदे हुए वीर हनुमान् उस समय वृक्षोंसे व्याप्त पर्वतके समान दिखायी देते थे ॥ २७ ॥
विरराज महावीर्यो महाकायो महाबलः । पुष्पिताशोकसंकाशो विधूम इव पावकः ॥ २८ ॥ ततोऽन्यं वृक्षमुत्पाट्य कृत्वा वेगमनुत्तमम् । शिरस्यभिजघानाशु राक्षसेन्द्रमकम्पनम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
उनका सारा शरीर रक्तसे रँग गया था, इसलिये वे महापराक्रमी महाबली और महाकाय हनुमान् खिले हुए अशोक एवं धूमरहित अग्निके समान शोभा पा रहे थे ॥ तदनन्तर महान् वेग प्रकट करके हनुमान्जीने एक दूसरा वृक्ष उखाड़ लिया और तुरंत ही उसे राक्षसराज अकम्पनके सिरपर दे मारा ॥ २९ ॥
स वृक्षेण हतस्तेन सक्रोधेन महात्मना । राक्षसो वानरेन्द्रेण पपात च ममार च ॥ ३० ॥
भावार्थ
क्रोधसे भरे वानरश्रेष्ठ महात्मा हनुमान्के चलाये हुए उस वृक्षकी गहरी चोट खाकर राक्षस अकम्पन पृथ्वीपर गिरा और मर गया ॥ ३० ॥
तं दृष्ट्वा निहतं भूमौ राक्षसेन्द्रमकम्पनम् । व्यथिता राक्षसाः सर्वे क्षितिकम्प इव द्रुमाः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
जैसे भूकम्प आनेपर सारे वृक्ष काँपने लगते हैं, उसी प्रकार राक्षसराज अकम्पनको रणभूमिमें मारा गया देख समस्त राक्षस व्यथित हो उठे ॥ ३१ ॥
त्यक्तप्रहरणाः सर्वे राक्षसास्ते पराजिताः । लङ्कामभियुत्रासाद् वानरैस्तैरभिद्रुताः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
वानरोंके खदेड़नेपर वहाँ परास्त हुए वे सब राक्षस अपने अस्त्र-शस्त्र फेंककर डरके मारे लङ्कामें भाग गये ॥ ३२ ॥
ते मुक्तकेशाः सम्भ्रान्ता भग्नमानाः पराजिताः । भयाच्छ्रमजलैरङ्गैः प्रस्रवद्भिर्विंदुद्रुवुः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
उनके केश खुले हुए थे । वे घबरा गये थे और पराजित होनेसे उनका घमंड चूर-चूर हो गया था । भयके कारण उनके अङ्गोंसे पसीने चू रहे थे और इसी अवस्थामें वे भाग रहे थे ॥ ३३ ॥
अन्योन्यं ये प्रमथ्नन्तो विविशुर्नगरं भयात् । पृष्ठतस्ते तु सम्मूढाः प्रेक्षमाणा मुहुर्मुहुः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
भयके कारण एक दूसरेको कुचलते हुए वे भागकर लङ्कापुरीमें घुस गये । भागते समय वे बारंबार पीछे घूम-घूमकर देखते रहते थे ॥ ३४ ॥
तेषु लङ्कां प्रविष्टेषु राक्षसेषु महाबलाः । समेत्य हरयः सर्वे हनूमन्तमपूजयन् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
उन राक्षसोंके लङ्कामें घुस जानेपर समस्त महाबली वानरोंने एकत्र हो वहाँ हनुमान्जीका अभिनन्दन किया ॥ ३५ ॥
सोऽपि प्रवृद्धस्तान् सर्वान् हरीन् सम्प्रत्यपूजयत् । हनूमान् सत्त्वसम्पन्नो यथार्हमनुकूलतः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
उन शक्तिशाली हनुमान्जीने भी उत्साहित हो यथायोग्य अनुकूल बर्ताव करते हुए उन समस्त वानरोंका समादर किया ॥ ३६ ॥
विनेदुश्च यथाप्राणं हरयो जितकाशिनः । चक्रुषुश्च पुनस्तत्र सप्राणानेव राक्षसान् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् विजयोल्लाससे सुशोभित होनेवाले वानरोंने पूरा बल लगाकर उच्चस्वरसे गर्जना की और वहाँ जीवित राक्षसोंको ही पकड़-पकड़कर घसीटना आरम्भ किया ॥ ३७ ॥
स वीरशोभामभजन्महाकपिः समेत्य रक्षांसि निहत्य मारुतिः । महासुरं भीमममित्रनाशनं विष्णुर्यथैवोरुबलं चमूमुखे ॥ ३८ ॥
भावार्थ
जैसे भगवान् विष्णुने शत्रुनाशन, महाबली, भयंकर एवं महान् असुर मधुकैटभ आदिका वध करके वीर-शोभा ( विजयलक्ष्मी ) का वरण किया था, उसी प्रकार महाकपि हनुमान्ने राक्षसोंके पास पहुँचकर उन्हें मौतके घाट उतार वीरोचित शोभाको धारण किया ॥ ३८ ॥
अपूजयन् देवगणास्तदा कपिं स्वयं च रामोऽतिबलश्च लक्ष्मणः । तथैव सुग्रीवमुखाः प्लवंगमा विभीषणश्चैव महाबलस्तदा ॥ ३९ ॥
भावार्थ
उस समय देवता, महाबली श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव आदि वानर तथा अत्यन्त बलशाली विभीषणने भी कपिवर हनुमान्जीका यथोचित सत्कार किया ॥ ३९ ॥
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