युद्धकाण्ड, सर्ग 54
स्वबलस्य च घातेन अङ्गदस्य बलेन च । राक्षसः क्रोधमाविष्टो वज्रदंष्ट्रो महाबलः ॥ १ ॥
भावार्थ
अङ्गदके पराक्रमसे अपनी सेनाका संहार होता देख महाबली राक्षस वज्रदंष्ट्र अत्यन्त कुपित हो उठा ॥ १ ॥
विस्फार्य च धनुर्घोरं शक्राशनिसमप्रभम् । वानराणामनीकानि प्राकिरच्छरवृष्टिभिः ॥ २ ॥
भावार्थ
वह इन्द्रके वज्रके समान तेजस्वी अपना भयंकर धनुष खींचकर वानरोंकी सेनापर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ २ ॥
राक्षसाश्चापि मुख्यास्ते रथेषु समवस्थिताः । नानाप्रहरणाः शूराः प्रायुध्यन्त तदा रणे ॥ ३ ॥
भावार्थ
उसके साथ अन्य प्रधान-प्रधान शूरवीर राक्षस भी रथोंपर बैठकर हाथोंमें तरह-तरहके हथियार लिये संग्रामभूमिमें युद्ध करने लगे ॥ ३ ॥
वानराणां च शूरास्तु ते सर्वे प्लवगर्षभाः । अयुध्यन्त शिलाहस्ताः समवेताः समन्ततः ॥ ४ ॥
भावार्थ
वानरोंमें भी जो विशेष शूरवीर थे, वे सभी वानरशिरोमणि सब ओरसे एकत्र हो हाथोंमें शिलाएँ लिये जूझने लगे ॥ ४ ॥
तत्रायुधसहस्राणि तस्मिन्नायोधने भृशम् । राक्षसाः कपिमुख्येषु पातयांचक्रिरे तदा ॥ ५ ॥
भावार्थ
उस समय इस रणभूमिमें राक्षसोंने मुख्य-मुख्य वानरोंपर हजारों अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा की ॥ ५ ॥
वानराश्चैव रक्षःसु गिरिवृक्षान् महाशिलाः । प्रवीराः पातयामासुर्मत्तवारणसंनिभाः ॥ ६ ॥
भावार्थ
मतवाले हाथीके समान विशालकाय वीर वानरोंने भी राक्षसोंपर अनेकानेक पर्वत, वृक्ष और बड़ी-बड़ी शिलाएँ गिरायीं ॥ ६ ॥
शूराणां युध्यमानानां समरेष्वनिवर्तिनाम् । तद् राक्षसगणानां च सुयुद्धं समवर्तत ॥ ७ ॥
भावार्थ
युद्धमें पीठ न दिखानेवाले और उत्साहपूर्वक जूझनेवाले शूरवीर वानरों और राक्षसोंका वह युद्ध उत्तरोत्तर बढ़ता गया ॥ ७ ॥
प्रभिन्नशिरसः केचिच्छिन्नैः पादैश्च बाहुभिः । शस्त्रैर्दर्दितदेहास्तु रुधिरेण समुक्षिताः ॥ ८ ॥
भावार्थ
किन्हींके सिर फूटे, किन्हींके हाथ और पैर कट गये और बहुत-से योद्धाओंके शरीर शस्त्रोंके आघातसे पीड़ित हो रक्तसे नहा गये ॥ ८ ॥
हरयो राक्षसाश्चैव शेरते गां समाश्रिताः । कङ्कगृध्रबलाढ्याश्च गोमायुकुलसंकुलाः ॥ ९ ॥
भावार्थ
वानर और राक्षस दोनों ही धराशायी हो गये । उनपर कङ्क, गीध और कौए टूट पड़े । गीदड़ोंकी जमातें छा गयीं ॥ ९ ॥
कबन्धानि समुत्पेतुर्भीरूणां भीषणानि वै । भुजपाणिशिरश्छिन्नाश्छिन्नकायाश्च भूतले ॥ १० ॥
भावार्थ
वहाँ जिनके मस्तक कट गये थे, ऐसे धड़ सब ओर उछलने लगे, जो भीरु स्वभाववाले सैनिकोंको भयभीत करते थे । योद्धाओंकी कटी हुई भुजाएँ, हाथ, सिर तथा शरीरके मध्यभाग पृथ्वीपर पड़े हुए थे ॥ १० ॥
वानरा राक्षसाश्चापि निपेतुस्तत्र भूतले । ततो वानरसैन्येन हन्यमानं निशाचरम् ॥ ११ ॥ प्राभज्यत बलं सर्वं वज्रदंष्ट्रस्य पश्यतः ।
भावार्थ
वानर और राक्षस दोनों ही दलोंके लोग वहाँ धराशायी हो रहे थे । तत्पश्चात् कुछ ही देरमें वानर-सैनिकोंके प्रहारोंसे पीड़ित हो सारी निशाचरसेना वज्रदंष्ट्रके देखते-देखते भाग चली ॥ ११½ ॥
राक्षसान् भयवित्रस्तान् हन्यमानान् प्लवंगमैः ॥ १२ ॥ दृष्ट्वा स रोषताम्राक्षो वज्रदंष्ट्रः प्रतापवान् ।
भावार्थ
वानरोंकी मारसे राक्षसोंको भयभीत हुआ देख प्रतापी वज्रदंष्ट्रकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं ॥ १२½ ॥
प्रविवेश धनुष्पाणिस्त्रासयन् हरिवाहिनीम् ॥ १३ ॥ शरैर्विदारयामास कङ्कपत्रैरजिह्मगैः ।
भावार्थ
वह हाथमें धनुष ले वानरसेनाको भयभीत करता हुआ उसके भीतर घुस गया और सीधे जानेवाले कङ्कपत्रयुक्त बाणोंद्वारा शत्रुओंको विदीर्ण करने लगा ॥ १३½ ॥
विभेद वानरांस्तत्र सप्ताष्टौ नव पञ्च च ॥ १४ ॥ विव्याध परमक्रुद्धो वज्रदंष्ट्रः प्रतापवान् ।
भावार्थ
अत्यन्त क्रोधसे भरा हुआ प्रतापी वज्रदंष्ट्र वहाँ एक-एक प्रहारसे पाँच, सात, आठ और नौ-नौ वानरोंको घायल कर देता था । इस तरह उसने वानर-सैनिकोंको गहरी चोट पहुँचायी ॥ १४½ ॥
त्रस्ताः सर्वे हरिगणाः शरैः संकृत्तदेहिनः । अङ्गदं सम्प्रधावन्ति प्रजापतिमिव प्रजाः ॥ १५ ॥
भावार्थ
बाणोंसे जिनके शरीर छिन्न-भिन्न हो गये थे, वे समस्त वानरगण भयभीत हो अङ्गदकी ओर दौड़े, मानो प्रजा प्रजापतिकी शरणमें जा रही हो ॥ १५ ॥
ततो हरिगणान् भग्नान् दृष्ट्वा वालिसुतस्तदा । क्रोधेन वज्रदंष्ट्रं तमुदीक्षन्तमुदैक्षत ॥ १६ ॥
भावार्थ
उस समय वानरोंको भागते देख वालिकुमार अङ्गदने अपनी ओर देखते हुए वज्रदंष्ट्रको क्रोधपूर्वक देखा ॥१६॥
वज्रदंष्ट्रोऽङ्गदश्चोभौ योयुध्येते परस्परम् । चेरतुः परमक्रुद्धौ हरिमत्तगजाविव ॥ १७ ॥
भावार्थ
फिर तो वज्रदंष्ट्र और अङ्गद अत्यन्त कुपित हो एक दूसरेसे वेगपूर्वक युद्ध करने लगे । वे दोनों रणभूमिमें बाघ और मतवाले हाथीके समान विचर रहे थे ॥ १७ ॥
ततः शतसहस्रेण हरिपुत्रं महाबलम् । जघान मर्मदेशेषु शरैरग्निशिखोपमैः ॥ १८ ॥
भावार्थ
उस समय वज्रदंष्ट्रने महाबली वालिपुत्र अङ्गदके मर्मस्थानोंमें अग्नि-शिखाके समान तेजस्वी एक लाख बाण मारे ॥ १८ ॥
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गो वालिसूनुर्महाबलः । चिक्षेप वज्रदंष्ट्राय वृक्षं भीमपराक्रमः ॥ १९ ॥ दृष्ट्वा पतन्तं तं वृक्षमसम्भ्रान्तश्च राक्षसः । चिच्छेद बहुधा सोऽपि मथितः प्रापतद् भुवि ॥ २० ॥
भावार्थ
इससे उनके सारे अङ्ग लहू-लुहान हो उठे । तब भयानक पराक्रमी महाबली वालिकुमारने वज्रदंष्ट्रपर एक वृक्ष चलाया ॥ उस वृक्षको अपनी ओर आते देखकर भी वज्रदंष्ट्रके मनमें घबराहट नहीं हुई । उसने बाण मारकर उस वृक्षके कई टुकड़े कर दिये । इस प्रकार खण्डित होकर वह वृक्ष पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २० ॥
तं दृष्ट्वा वज्रदंष्ट्रस्य विक्रमं प्लवगर्षभः । प्रगृह्य विपुलं शैलं चिक्षेप च ननाद च ॥ २१ ॥
भावार्थ
वज्रदंष्ट्रके उस पराक्रमको देखकर वानरशिरोमणि अङ्गदने एक विशाल चट्टान लेकर उसके ऊपर दे मारी और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ २१ ॥
तमापतन्तं दृष्ट्वा स रथादाप्लुत्य वीर्यवान् । गदापाणिरसम्भ्रान्तः पृथिव्यां समतिष्ठत ॥ २२ ॥
भावार्थ
उस चट्टानको आती देख वह पराक्रमी राक्षस बिना किसी घबराहटके रथसे कूद पड़ा और केवल गदा हाथमें लेकर पृथ्वीपर खड़ा हो गया ॥ २२ ॥
अङ्गदेन शिला क्षिप्ता गत्वा तु रणमूर्धनि । सचक्रकूबरं साश्वं प्रममाथ रथं तदा ॥ २३ ॥
भावार्थ
अङ्गदकी फेंकी हुई वह चट्टान उसके रथपर पहुँच गयी और युद्धके मुहानेपर उसने पहिये, कूबर तथा घोड़ोंसहित उस रथको तत्काल चूर-चूर कर डाला ॥ २३ ॥
ततोऽन्यच्छिखरं गृह्य विपुलं द्रुमभूषितम् । वज्रदंष्ट्रस्य शिरसि पातयामास वानरः ॥ २४ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् वानरवीर अङ्गदने वृक्षोंसे अलंकृत दूसरा विशाल शिखर हाथमें लेकर उसे वज्रदंष्ट्रके मस्तकपर दे मारा ॥ २४ ॥
अभवच्छोणितोद्गारी वज्रदंष्ट्रः सुमूर्च्छितः । मुहूर्तमभवन्मूढो गदामालिङ्गय निःश्वसन् ॥ २५ ॥
भावार्थ
वज्रदंष्ट्र उसकी चोटसे मूर्च्छित हो गया और रक्त वमन करने लगा । वह गदाको हृदयसे लगाये दो घड़ीतक अचेत पड़ा रहा । केवल उसकी साँस चलती रही ॥ २५ ॥
स लब्धसंज्ञो गद्या वालिपुत्रमवस्थितम् । जघान परमक्रुद्धो वक्षोदेशे निशाचरः ॥ २६ ॥ गदां त्यक्त्वा ततस्तत्र मुष्टियुद्धमकुर्वत । अन्योन्यं जघ्नतुस्तत्र तावुभौ हरिराक्षसौ ॥ २७ ॥
भावार्थ
होशमें आनेपर उस निशाचरने अत्यन्त कुपित हो सामने खड़े हुए वालिपुत्रकी छातीमें गदासे प्रहार किया ॥ फिर गदा त्यागकर वह वहाँ मुक्केसे युद्ध करने लगा । वे वानर और राक्षस दोनों वीर एक दूसरेको मुक्कोंसे मारने लगे ॥ २७ ॥
रुधिरोद्गारिणौ तौ तु प्रहारैर्जनितश्रमौ । बभूवतुः सुविक्रान्तावङ्गारकबुधाविव ॥ २८ ॥
भावार्थ
दोनों ही बड़े पराक्रमी थे और परस्पर जूझते हुए मङ्गल एवं बुधके समान जान पड़ते थे । आपसके प्रहारोंसे पीड़ित हो दोनों ही थक गये और मुँहसे रक्त वमन करने लगे ॥ २८ ॥
ततः परमतेजस्वी अङ्गदः प्लवगर्षभः । उत्पाट्य वृक्षं स्थितवानासीत् पुष्पफलैर्युतः ॥ २९ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् परम तेजस्वी वानरशिरोमणि अङ्गद एक वृक्ष उखाड़कर खड़े हो गये । वे वहाँ उस वृक्षसम्बन्धी फल-फूलोंके कारण स्वयं भी फल और फूलोंसे युक्त दिखायी देते थे ॥ २९ ॥
जग्राह चार्षभं चर्म खड्गं च विपुलं शुभम् । किङ्किणीजालसंछन्नं चर्मणा च परिष्कृतम् ॥ ३० ॥
भावार्थ
उधर वज्रदंष्ट्रने ऋषभके चर्मकी बनी हुई ढाल और सुन्दर एवं विशाल तलवार ले ली । वह तलवार छोटी-छोटी घण्टियोंके जालसे आच्छादित तथा चमड़ेकी म्यानसे सुशोभित थी ॥ ३० ॥
चित्रांश्च रुचिरान् मार्गांश्चेरतुः कपिराक्षसौ । जघ्नतुश्च तदान्योन्यं नर्दन्तौ जयकाङ्क्षिणौ ॥ ३१ ॥
भावार्थ
उस समय परस्पर विजयकी इच्छा रखनेवाले वे वानर और राक्षस वीर सुन्दर एवं विचित्र पैंतरे बदलने तथा गर्जते हुए एक दूसरेपर चोट करने लगे ॥ ३१ ॥
व्रणैः साम्रैरशोभेतां पुष्पिताविव किंशुकौ । युध्यमानौ परिश्रान्तौ जानुभ्यामवनीं गतौ ॥ ३२ ॥
भावार्थ
दोनोंके घावोंसे रक्तकी धारा बहने लगी, जिससे वे खिले हुए पलाश वृक्षोंके समान शोभा पाने लगे । लड़ते-लड़ते थक जानेके कारण दोनोंने ही पृथ्वीपर घुटने टेक दिये ॥ ३२ ॥
निमेषान्तरमात्रेण अङ्गदः कपिकुञ्जरः । उदतिष्ठत दीप्ताक्षो दण्डाहत इवोरगः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
किंतु पलक मारते-मारते कपिश्रेष्ठ अङ्गद उठकर खड़े हो गये । उनके नेत्र रोषसे उद्दीप्त हो उठे थे और वे डंडेकी चोट खाये हुए सर्पके समान उत्तेजित हो रहे थे ॥३३॥
निर्मलेन सुधौतेन खड्गेनास्य महच्छिरः । जघान वज्रदंष्ट्रस्य वालिसूनुर्महाबलः ॥ ३४ ॥ रुधिरोक्षितगात्रस्य बभूव पतितं द्विधा । तच्च तस्य परीताक्षं शुभं खड्गहतं शिरः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
महाबली वालिकुमारने अपनी निर्मल एवं तेज धारवाली चमकीली तलवारसे वज्रदंष्ट्रका विशाल मस्तक काट डाला ॥ खूनसे लथपथ शरीरवाले उस राक्षसका वह खड्गसे कटा हुआ सुन्दर मस्तक, जिसके नेत्र उलट गये थे, धरतीपर गिरकर दो टुकड़ोंमें विभक्त हो गया ॥ ३५ ॥
वज्रदंष्ट्रं हतं दृष्ट्वा राक्षसा भयमोहिताः । त्रस्ता ह्यभ्यद्रवॅल्लङ्कां वध्यमानाः प्लवङ्गमैः । विषण्णवदना दीना ह्रिया किंचिदवाङ्मुखाः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
वज्रदंष्ट्रको मारा गया देख राक्षस भयसे अचेत हो गये । वे वानरोंकी मार खाकर भयके मारे लङ्कामें भाग गये । उनके मुखपर विषाद छा रहा था । वे बहुत दुखी थे और लज्जाके कारण उन्होंने अपना मुँह कुछ नीचा कर लिया था ॥ ३६ ॥
निहत्य तं वज्रधरः प्रतापवान् स वालिसूनुः कपिसैन्यमध्ये । जगाम हर्षं महितो महाबलः सहस्रनेत्रस्त्रिदशैरिवावृतः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
वज्रधारी इन्द्रके समान प्रतापी महाबली वालिकुमार अङ्गद उस निशाचर वज्रदंष्ट्रको मारकर वानरसेनामें सम्मानित हो देवताओंसे घिरे हुए सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके समान बड़े हर्षको प्राप्त हुए ॥ ३७ ॥
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