युद्धकाण्ड, सर्ग 45
स तस्य गतिमन्विच्छन् राजपुत्रः प्रतापवान् । दिदेशातिबलो रामो दश वानरयूथपान् ॥ १ ॥
भावार्थ
तदनन्तर अत्यन्त बलशाली प्रतापी राजकुमार श्रीरामने इन्द्रजित्का पता लगानेके लिये दस वानर-यूथपतियोंको आज्ञा दी ॥ १ ॥
द्वौ सुषेणस्य दायादौ नीलं च प्लवगाधिपम् । अङ्गदं वालिपुत्रं च शरभं च तरस्विनम् ॥ २ ॥ द्विविदं च हनूमन्तं सानुप्रस्थं महाबलम् । ऋषभं चर्षभस्कन्धमादिदेश परंतपः ॥ ३ ॥
भावार्थ
उनमें दो तो सुषेणके पुत्र थे और शेष आठ वानरराज नील, वालिपुत्र अङ्गद, वेगशाली वानर शरभ, द्विविद, हनुमान्, महाबली सानुप्रस्थ, ऋषभ तथा ऋषभस्कन्ध थे । शत्रुओंको संताप देनेवाले इन दसोंको उसका अनुसंधान करनेके लिये आज्ञा दी ॥ २-३ ॥
ते सम्प्रहृष्टा हरयो भीमानुद्यम्य पादपान् । आकाशं विविशुः सर्वे मार्गमाणा दिशो दश ॥ ४ ॥
भावार्थ
तब वे सभी वानर भयंकर वृक्ष उठाकर दसों दिशाओंमें खोजते हुए बड़े हर्षके साथ आकाशमार्गसे चले ॥ ४ ॥
तेषां वेगवतां वेगमिषुभिर्वेगवत्तरैः । अस्त्रवित् परमास्त्रस्तु वारयामास रावणिः ॥ ५ ॥
भावार्थ
किंतु अस्त्रोंके ज्ञाता रावणकुमार इन्द्रजित्ने अत्यन्त वेगशाली बाणोंकी वर्षा करके अपने उत्तम अस्त्रोंद्वारा उन वेगवान् वानरोंके वेगको रोक दिया ॥ ५ ॥
तं भीमवेगा हरयो नाराचैः क्षतविक्षताः । अन्धकारे न ददृशुर्मेघैः सूर्यमिवावृतम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
बाणोंसे क्षत-विक्षत हो जानेपर भी वे भयानक वेगशाली वानर अन्धकारमें मेघोंसे ढके हुए सूर्यकी भाँति इन्द्रजित्को न देख सके ॥ ६ ॥
रामलक्ष्मणयोरेव सर्वदेहभिदः शरान् । भृशमावेशयामास रावणिः समितिंजयः ॥ ७ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् युद्धविजयी रावणपुत्र इन्द्रजित् फिर श्रीराम और लक्ष्मणपर ही उनके सम्पूर्ण अङ्गोंको विदीर्ण करनेवाले बाणोंकी बारंबार वर्षा करने लगा ॥ ७ ॥
निरन्तरशरीरौ तु तावुभौ रामलक्ष्मणौ । क्रुद्धेनेन्द्रजिता वीरौ पन्नगैः शरतां गतैः ॥ ८ ॥
भावार्थ
कुपित हुए इन्द्रजित्ने उन दोनों वीर श्रीराम और लक्ष्मणको बाणरूपधारी सर्पोंद्वारा इस तरह बींधा कि उनके शरीरमें थोड़ा-सा भी ऐसा स्थान नहीं रह गया, जहाँ बाण न लगे हों ॥ ८ ॥
तयोः क्षतजमार्गेण सुस्राव रुधिरं बहु । तावुभौ च प्रकाशेते पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ९ ॥
भावार्थ
उन दोनोंके अङ्गोंमें जो घाव हो गये थे, उनके मार्गसे बहुत रक्त बहने लगा । उस समय वे दोनों भाई खिले हुए दो पलाश वृक्षोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ९ ॥
ततः पर्यन्तरक्ताक्षो भिन्नाञ्जनचयोपमः । रावणिर्भ्रातरौ वाक्यमन्तर्धानगतोऽब्रवीत् ॥ १० ॥
भावार्थ
इसी समय जिसके नेत्रप्रान्त कुछ लाल थे और शरीर खानसे काटकर निकाले गये कोयलोंके ढेरकी भाँति काला था, वह रावणकुमार इन्द्रजित् अन्तर्धान-अवस्थामें ही उन दोनों भाइयोंसे इस प्रकार बोला—॥ १० ॥
युध्यमानमनालक्ष्यं शक्रोऽपि त्रिदशेश्वरः । द्रष्टुमासादितुं वापि न शक्तः किं पुनर्युवाम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘युद्धके समय अलक्ष्य हो जानेपर तो मुझे देवराज इन्द्र भी नहीं देख या पा सकता; फिर तुम दोनोंकी क्या बिसात है ? ॥ ११ ॥
प्रापिताविषुजालेन राघवौ कङ्कपत्रिणा । एष रोषपरीतात्मा नयामि यमसादनम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘मैंने तुम दोनों रघुवंशियोंको कंकपत्रयुक्त बाणके जालमें फँसा लिया है । अब रोषसे भरकर मैं अभी तुम दोनोंको यमलोक भेजे देता हूँ’ ॥ १२ ॥
एवमुक्त्वा तु धर्मज्ञौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । निर्बिभेद शितैर्बाणैः प्रजहर्ष ननाद च ॥ १३ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर वह धर्मके ज्ञाता दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणको पैने बाणोंसे बींधने लगा और हर्षका अनुभव करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगा ॥ १३ ॥
भिन्नाञ्जनचयश्यामो विस्फार्य विपुलं धनुः । भूय एव शरान् घोरान् विससर्ज महामृधे ॥ १४ ॥
भावार्थ
कटे-छटे कोयलेकी राशिके समान काला इन्द्रजित् फिर अपने विशाल धनुषको फैलाकर उस महासमरमें घोर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ १४ ॥
ततो मर्मसु मर्मज्ञो मज्जयन् निशिताञ्छरान् । रामलक्ष्मणयोर्वीरो ननाद च मुहुर्मुहुः ॥ १५ ॥
भावार्थ
मर्मस्थलको जाननेवाला वह वीर श्रीराम और लक्ष्मणके मर्मस्थानोंमें अपने पैने बाणोंको डुबोता हुआ बारबार गर्जना करने लगा ॥ १५ ॥
बद्धौ तु शरबन्धेन तावुभौ रणमूर्धनि । निमेषान्तरमात्रेण न शेकतुरवेक्षितुम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
युद्धके मुहानेपर बाणके बन्धनसे बँधे हुए वे दोनों बन्धु पलक मारते-मारते ऐसी दशाको पहुँच गये कि उनमें आँख उठाकर देखनेकी भी शक्ति नहीं रह गयी ( वास्तवमें यह उनकी मनुष्यताका नाट्य करनेवाली लीलामात्र थी । वे तो कालके भी काल हैं । उन्हें कौन बाँध सकता था ? ) ॥ १६ ॥
ततो विभिन्नसर्वाङ्गौ शरशल्याचितौ कृतौ । ध्वजाविव महेन्द्रस्य रज्जुमुक्तौ प्रकम्पितौ ॥ १७ ॥
भावार्थ
इस प्रकार उनके सारे अङ्ग बिंध गये थे । बाणोंसे व्याप्त हो गये थे । वे रस्सीसे मुक्त हुए देवराज इन्द्रके दो ध्वजोंके समान कम्पित होने लगे ॥ १७ ॥
तौ सम्प्रचलितौ वीरौ मर्मभेदेन कर्शितौ । निपेततुर्महेष्वासौ जगत्यां जगतीपती ॥ १८ ॥
भावार्थ
वे महान् धनुर्धर वीर भूपाल मर्मस्थलके भेदनसे विचलित एवं कृशकाय हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १८ ॥
तौ वीरशयने वीरौ शयानौ रुधिरोक्षितौ । शरवेष्टितसर्वाङ्गावार्तौ परमपीडितौ ॥ १९ ॥
भावार्थ
युद्धभूमिमें वीरशय्यापर सोये हुए वे दोनों वीर रक्तसे नहा उठे थे । उनके सारे अङ्गोंमें बाणरूपधारी नाग लिपटे हुए थे तथा वे अत्यन्त पीड़ित एवं व्यथित हो रहे थे ॥१९॥
नह्यविद्धं तयोर्गात्रे बभूवाङ्गुलमन्तरम् । नानिर्विण्णं न चाध्वस्तमाकराग्रादजिह्मगैः ॥ २० ॥
भावार्थ
उनके शरीरमें एक अङ्गुल भी जगह ऐसी नहीं थी, जो बाणोंसे बिंधी न हो तथा हाथोंके अग्रभागतक कोई भी अङ्ग ऐसा नहीं था, जो बाणोंसे विदीर्ण अथवा क्षुब्ध न हुआ हो ॥ २० ॥
तौ तु क्रूरेण निहतौ रक्षसा कामरूपिणा । असृक्सुस्रुवतुस्तीव्रं जलं प्रस्रवणाविव ॥ २१ ॥
भावार्थ
जैसे झरने जल गिराते रहते हैं, उसी प्रकार वे दोनों भाई इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उस क्रूर राक्षसके बाणोंसे घायल हो तीव्र वेगसे रक्तकी धारा बहा रहे थे ॥ २१ ॥
पपात प्रथमं रामो विद्धो मर्मसु मार्गणैः । क्रोधादिन्द्रजिता येन पुरा शक्रो विनिर्जितः ॥ २२ ॥
भावार्थ
जिसने पूर्वकालमें इन्द्रको परास्त किया था, उस इन्द्रजित्के क्रोधपूर्वक चलाये हुए बाणोंद्वारा मर्मस्थलमें आहत होनेके कारण पहले श्रीराम ही धराशायी हुए ॥ २२ ॥
रुक्मपुङ्खैः प्रसन्नाग्रै रजोगतिभिराशुगैः । नाराचैरर्धनाराचैर्भल्लैरञ्जलिकैरपि । विव्याध वत्सदन्तैश्च सिंहदंष्ट्रैः क्षुरैस्तथा ॥ २३ ॥
भावार्थ
इन्द्रजितने उन्हें सोनेके पंख, स्वच्छ अग्रभाग और धूल-के समान गतिवाले ( अर्थात् धूलकी भाँति छिद्ररहित स्थानमें भी प्रवेश करनेवाले ) शीघ्रगामी नाराँच, अर्धनाराँच, भल्लँ, अञ्जलिँक, वत्सदन्त, सिंहँदंष्ट्र और क्षुरँ जातिके बाणोंद्वारा घायल कर दिया था ॥ २३ ॥
स वीरशयने शिश्येऽविज्यमाविध्य कार्मुकम् । भिन्नमुष्टिपरीणाहं त्रिनतं रुक्मभूषितम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
जिसकी प्रत्यञ्चा चढ़ी हुई थी, किंतु मुट्ठीका बन्धन ढीला पड़ गया था, जो दोनों पार्श्वभाग और मध्यभाग तीनों स्थानोंमें झुका हुआ तथा सुवर्णसे भूषित था, उस धनुषको त्यागकर भगवान् श्रीराम वीरशय्यापर सोये हुए थे ॥ २४ ॥
बाणपातान्तरे रामं पतितं पुरुषर्षभम् । स तत्र लक्ष्मणो दृष्ट्वा निराशो जीवितेऽभवत् ॥ २५ ॥
भावार्थ
फेंका हुआ बाण जितनी दूरीपर गिरता है, अपनेसे उतनी ही दूरीपर धरतीपर पड़े हुए पुरुषप्रवर श्रीरामको देखकर लक्ष्मण वहाँ अपने जीवनसे निराश हो गये ॥ २५ ॥
रामं कमलपत्राक्षं शरण्यं रणतोषिणम् । शुशोच भ्रातरं दृष्ट्वा पतितं धरणीतले ॥ २६ ॥
भावार्थ
सबको शरण देनेवाले और युद्धसे संतुष्ट होनेवाले अपने भाई कमलनयन श्रीरामको पृथ्वीपर पड़ा देख लक्ष्मणको बड़ा शोक हुआ ॥ २६ ॥
हरयश्चापि तं दृष्ट्वा संतापं परमं गताः । शोकार्ताश्चुक्रुशुर्घोरमश्रुपूरितलोचनाः ॥ २७ ॥
भावार्थ
उन्हें उस अवस्थामें देखकर वानरोंको भी बड़ा संताप हुआ । वे शोकसे आतुर हो नेत्रोंमें आँसू भरकर घोर आर्तनाद करने लगे ॥ २७ ॥
बद्धौ तु तौ वीरशये शयानौ ते वानराः सम्परिवार्य तस्थुः । समागता वायुसुतप्रमुख्या विषादमार्ताः परमं च जग्मुः ॥ २८ ॥
भावार्थ
नागपाशमें बँधकर वीरशय्यापर सोये हुए उन दोनों भाइयोंको चारों ओरसे घेरकर सब वानर खड़े हो गये । वहाँ आये हुए हनुमान् आदि मुख्य-मुख्य वानर व्यथित हो बड़े विषादमें पड़ गये ॥ २८ ॥
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