युद्धकाण्ड, सर्ग 44
युध्यतामेव तेषां तु तदा वानररक्षसाम् । रविरस्तं गतो रात्रिः प्रवृत्ता प्राणहारिणी ॥ १ ॥
भावार्थ
इस प्रकार उन वानर और राक्षसोंमें युद्ध चल ही रहा था कि सूर्यदेव अस्त हो गये तथा प्राणोंका संहार करनेवाली रात्रिका आगमन हुआ ॥ १ ॥
अन्योन्यं बद्धवैराणां घोराणां जयमिच्छताम् । सम्प्रवृत्तं निशायुद्धं तदा वानरराक्षसाम् ॥ २ ॥
भावार्थ
वानरों और राक्षसोंमें परस्पर वैर बँध गया था । दोनों ही पक्षोंके योद्धा बड़े भयंकर थे तथा अपनी-अपनी विजय चाहते थे; अतः उस समय उनमें रात्रियुद्ध होने लगा ॥ २ ॥
राक्षसोऽसीति हरयो वानरोऽसीति राक्षसाः । अन्योन्यं समरे जघ्नुस्तस्मिंस्तमसि दारुणे ॥ ३ ॥
भावार्थ
उस दारुण अन्धकारमें वानरलोग अपने विपक्षीसे पूछते थे, क्या तुम राक्षस हो ? और राक्षसलोग भी पूछते थे, क्या तुम वानर हो ? इस प्रकार पूछ-पूछकर समराङ्गणमें वे एक दूसरेपर प्रहार करते थे ॥ ३ ॥
हत दारय चैहीति कथं विद्रवसीति च । एवं सुतुमुलः शब्दस्तस्मिन् सैन्ये तु शुश्रुवे ॥ ४ ॥
भावार्थ
सेनामें सब ओर ‘मारो, काटो, आओ तो, क्यों भागे जाते हो’—ये भयंकर शब्द सुनायी दे रहे थे ॥ ४ ॥
कालाः काञ्चनसंनाहास्तस्मिंस्तमसि राक्षसाः । सम्प्रदृश्यन्त शैलेन्द्रा दीप्तौषधिवना इव ॥ ५ ॥
भावार्थ
काले-काले राक्षस सुवर्णमय कवचोंसे विभूषित होकर उस अन्धकारमें ऐसे दिखायी देते थे, मानो चमकती हुई ओषधियोंके वनसे युक्त काले पहाड़ हों ॥ ५ ॥
तस्मिंस्तमसि दुष्पारे राक्षसाः क्रोधमूर्च्छिताः । परिपेतुर्महावेगा भक्षयन्तः प्लवङ्गमान् ॥ ६ ॥
भावार्थ
उस अन्धकारसे पार पाना कठिन हो रहा था । उसमें क्रोधसे अधीर हुए महान् वेगशाली राक्षस वानरोंको खाते हुए उनपर सब ओरसे टूट पड़े ॥ ६ ॥
ते हयान् काञ्चनापीडान् ध्वजांश्चाशीविषोपमान् । आप्लुत्य दशनैस्तीक्ष्णैर्भीमकोपा व्यदारयन् ॥ ७ ॥
भावार्थ
तब वानरोंका कोप बड़ा भयानक हो उठा । वे उछल-उछलकर अपने तीखे दाँतोंद्वारा सुनहरे साजसे सजे हुए राक्षस-दलके घोड़ोंको और विषधर सर्पोंके समान दिखायी देनेवाले उनके ध्वजोंको भी विदीर्ण कर देते थे ॥ ७ ॥
वानरा बलिनो युद्धेऽक्षोभयन् राक्षसीं चमूम् । कुञ्जरान् कुञ्जरारोहान् पताकाध्वजिनो रथान् ॥ ८ ॥ चकर्षुश्च ददंशुश्च दशनैः क्रोधमूर्च्छिताः ।
भावार्थ
बलवान् वानरोंने युद्धमें राक्षस-सेनाके भीतर हलचल मचा दी । वे सब-के-सब क्रोधसे पागल हो रहे थे; अतः हाथियों एवं हाथीसवारोंको तथा ध्वजा-पताकासे सुशोभित रथोंको भी खींच लेते और दाँतोंसे काट-काटकर क्षत-विक्षत कर देते थे ॥ ८½ ॥
लक्ष्मणश्चापि रामश्च शरैराशीविषोपमैः ॥ ९ ॥ दृश्यादृश्यानि रक्षांसि प्रवराणि निजघ्नतुः ।
भावार्थ
बड़े-बड़े राक्षस कभी प्रकट होकर युद्ध करते थे और कभी अदृश्य हो जाते थे; परंतु श्रीराम और लक्ष्मण विषधर सर्पोंके समान अपने बाणोंद्वारा दृश्य और अदृश्य सभी राक्षसोंको मार डालते थे ॥ ९½ ॥
तुरंगखुरविध्वस्तं रथनेमिसमुत्थितम् ॥ १० ॥ रुरोध कर्णनेत्राणि युध्यतां धरणीरजः । वर्तमाने तथा घोरे संग्रामे लोमहर्षणे । रुधिरौघा महाघोरा नद्यस्तत्र विसुस्रुवुः ॥ ११ ॥
भावार्थ
घोड़ोंकी टापसे चूर्ण होकर रथके पहियोंसे उड़ायी हुई धरतीकी धूल योद्धाओंके कान और नेत्र बंद कर देती थी ॥ इस प्रकार रोमाञ्चकारी भयंकर संग्रामके छिड़ जानेपर वहाँ रक्तके प्रवाहको बहानेवाली खूनकी बड़ी भयंकर नदियाँ बहने लगीं ॥ ११ ॥
ततो भेरीमृदङ्गानां पणवानां च निःस्वनः । शङ्खनेमिस्वनोन्मिश्रः सम्बभूवाद्भुतोपमः ॥ १२ ॥
भावार्थ
तदनन्तर भेरी, मृदङ्ग और पणव आदि बाजोंकी ध्वनि होने लगी, जो शङ्खोंके शब्द तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटसे मिलकर बड़ी अद्भुत जान पड़ती थी ॥ १२ ॥
हतानां स्तनमानानां राक्षसानां च निःस्वनः । शस्तानां वानराणां च सम्बभूवात्र दारुणः ॥ १३ ॥
भावार्थ
घायल होकर कराहते हुए राक्षसों और शस्त्रोंसे क्षत-विक्षत हुए बानरोंका आर्तनाद वहाँ बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ १३ ॥
हतैर्वानरमुख्यैश्च शक्तिशूलपरश्वधैः । निहतैः पर्वताकारै राक्षसैः कामरूपिभिः ॥ १४ ॥ शस्त्रपुष्पोपहारा च तत्रासीद् युद्धमेदिनी । दुर्ज्ञेया दुर्निवेशा च शोणितास्रावकर्दमा ॥ १५ ॥
भावार्थ
शक्ति, शूल और फरसोंसे मारे गये मुख्य-मुख्य वानरों तथा वानरोंद्वारा कालके गालमें डाले गये इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ पर्वताकार राक्षसोंसे उपलक्षित उस युद्धभूमिमें रक्तके प्रवाहसे कीच हो गयी थी । उसे पहचानना कठिन हो रहा था तथा वहाँ ठहरना तो और मुश्किल हो गया था । ऐसा जान पड़ता था उस भूमिको शस्त्ररूपी पुष्पोंका उपहार अर्पित किया गया है ॥ १४-१५ ॥
सा बभूव निशा घोरा हरिराक्षसहारिणी । कालरात्रीव भूतानां सर्वेषां दुरतिक्रमा ॥ १६ ॥
भावार्थ
बानरों और राक्षसोंका संहार करनेवाली वह भयंकर रजनी कालरात्रिके समान समस्त प्राणियोंके लिये दुर्लङ्घ्य हो गयी थी ॥ १६ ॥
ततस्ते राक्षसास्तत्र तस्मिंस्तमसि दारुणे । राममेवाभ्यवर्तन्त संहृष्टाः शरवृष्टिभिः ॥ १७ ॥
भावार्थ
तदनन्तर उस दारुण अन्धकारमें वहाँ वे सब राक्षस हर्ष और उत्साहमें भरकर बाणोंकी वर्षा करते हुए श्रीरामपर ही धावा करने लगे ॥ १७ ॥
तेषामापततां शब्दः क्रुद्धानामपि गर्जताम् । उद्वर्त इव सप्तानां समुद्राणामभूत् स्वनः ॥ १८ ॥
भावार्थ
उस समय कुपित हो गर्जना करते हुए उन आक्रमणकारी राक्षसोंका शब्द प्रलयके समय सातों समुद्रोंके महान् कोलाहल-सा जान पड़ता था ॥ १८ ॥
तेषां रामः शरैः षड्भिः षड् जघान निशाचरान् । निमेषान्तरमात्रेण शरैरग्निशिखोपमैः ॥ १९ ॥
भावार्थ
तब श्रीरामचन्द्रजीने पलक मारते-मारते अग्निज्वालाके समान छः भयानक बाणोंसे निम्नाङ्कित छः निशाचरोंको घायल कर दिया ॥ १९ ॥
यज्ञशत्रुश्च दुर्धर्षो महापार्श्वमहोदरौ । वज्रदंष्ट्रो महाकायस्तौ चोभौ शुकसारणौ ॥ २० ॥ ते तु रामेण बाणौघैः सर्वमर्मसु ताडिताः । युद्धादपसृतास्तत्र सावशेषायुषोऽभवन् ॥ २१ ॥
भावार्थ
उनके नाम इस प्रकार हैं—दुर्धर्ष वीर यज्ञशत्रु, महापार्श्व, महोदर, महाकाय, वज्रदंष्ट्र तथा वे दोनों शुक और सारण ॥ श्रीरामके बाणसमूहोंसे सारे मर्मस्थानोंमें चोट पहुँचनेके कारण वे छहों राक्षस युद्ध छोड़कर भाग गये; इसीलिये उनकी आयु शेष रह गयी—जान बच गयी ॥ २१ ॥
निमेषान्तरमात्रेण घोरैरग्निशिखोपमैः । दिशश्चकार विमलाः प्रदिशश्च महारथः ॥ २२ ॥
भावार्थ
महारथी श्रीरामने अग्नि-शिखाके समान प्रज्वलित भयंकर बाणोंद्वारा पलक मारते-मारते सम्पूर्ण दिशाओं और उनके कोणोंको निर्मल ( प्रकाशपूर्ण ) कर दिया ॥ २२ ॥
ये त्वन्ये राक्षसा वीरा रामस्याभिमुखे स्थिताः । तेऽपि नष्टाः समासाद्य पतङ्गा इव पावकम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
दूसरे भी जो-जो राक्षसवीर श्रीरामके सामने खड़े थे, वे भी उसी प्रकार नष्ट हो गये, जैसे आगमें पड़कर पतिंगे जल जाते हैं ॥ २३ ॥
सुवर्णपुङ्खैर्विशिखैः सम्पतद्भिः समन्ततः । बभूव रजनी चित्रा खद्योतैरिव शारदी ॥ २४ ॥
भावार्थ
चारों ओर सुवर्णमय पङ्खवाले बाण गिर रहे थे । उनकी प्रभासे वह रजनी जुगुनुओंसे विचित्र दिखायी देनेवाली शरद् ऋतुकी रात्रिके समान अद्भुत प्रतीत होती थी ॥२४॥
राक्षसानां च निनदैर्भेरीणां चैव निःस्वनैः । सा बभूव निशा घोरा भूयो घोरतराभवत् ॥ २५ ॥
भावार्थ
राक्षसोंके सिंहनादों और भेरियोंकी आवाजोंसे वह भयानक रात्रि और भी भयंकर हो उठी थी ॥ २५ ॥
तेन शब्देन महता प्रवृद्धेन समन्ततः । त्रिकूटः कंदराकीर्णः प्रव्याहरदिवाचलः ॥ २६ ॥
भावार्थ
सब ओर फैले हुए उस महान् शब्दसे प्रतिध्वनित हो कन्दराओंसे व्याप्त त्रिकूट पर्वत मानो किसीकी बातका उत्तर देता-सा जान पड़ता था ॥ २६ ॥
गोलाङ्गूला महाकायास्तमसा तुल्यवर्चसः । सम्परिष्वज्य बाहुभ्यां भक्षयन् रजनीचरान् ॥ २७ ॥
भावार्थ
लंगूर जातिके विशालकाय बानर जो अन्धकारके समान काले थे, निशाचरोंको दोनों भुजाओंमें कसकर मार डालते और उन्हें कुत्ते आदिको खिला देते थे ॥ २७ ॥
अङ्गदस्तु रणे शत्रून् निहन्तुं समुपस्थितः । रावणिं निजघानाशु सारथिं च हयानपि ॥ २८ ॥
भावार्थ
दूसरी ओर अङ्गद रणभूमिमें शत्रुओंका संहार करनेके लिये आगे बढ़े । उन्होंने रावणपुत्र इन्द्रजित्को घायल कर दिया तथा उसके सारथि और घोड़ोंको भी यमलोक पहुँचा दिया ॥ २८ ॥
इन्द्रजित् तु रथं त्यक्त्वा हताश्वो हतसारथिः । अङ्गदेन महायस्तस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ २९ ॥
भावार्थ
अङ्गदके द्वारा घोड़े और सारथिके मारे जानेपर महान् कष्टमें पड़ा हुआ इन्द्रजित् रथको छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गया ॥ २९ ॥
तत् कर्म वालिपुत्रस्य सर्वे देवाः सहर्षिभिः । तुष्टुवुः पूजनार्हस्य तौ चोभौ रामलक्ष्मणौ ॥ ३० ॥
भावार्थ
प्रशंसाके योग्य वालिकुमार अङ्गदके उस पराक्रमकी ऋषियोंसहित देवताओं तथा दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणने भी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ३० ॥
प्रभावं सर्वभूतानि विदुरिन्द्रजितो युधि । ततस्ते तं महात्मानं दृष्ट्वा तुष्टाः प्रधर्षितम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
सम्पूर्ण प्राणी युद्धमें इन्द्रजित्के प्रभावको जानते थे; अतः अङ्गदके द्वारा उसको पराजित हुआ देख उन महात्मा अङ्गदपर दृष्टिपात करके सबको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३१ ॥
ततः प्रहृष्टाः कपयः ससुग्रीवविभीषणाः । साधुसाध्विति नेदुश्च दृष्ट्वा शत्रुं पराजितम् ॥ ३२ ॥ इन्द्रजित् तु तदानेन निर्जितो भीमकर्मणा । संयुगे बालिपुत्रेण क्रोधं चक्रे सुदारुणम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
शत्रुको पराजित हुआ देख सुग्रीव और विभीषणसहित सब बानर बड़े प्रसन्न हुए और अङ्गदको साधुवाद देने लगे ॥ युद्धस्थलमें भयानक कर्म करनेवाले वालिपुत्र अङ्गदसे पराजित होकर इन्द्रजित्ने बड़ा भयंकर क्रोध प्रकट किया ॥३३॥
सोऽन्तर्धानगतः पापो रावणी रणकर्शितः । ब्रह्मदत्तवरो वीरो रावणिः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ३४ ॥ अदृश्यो निशितान् बाणान् मुमोचाशनिवर्चसः ।
भावार्थ
रावणकुमार वीर इन्द्रजित् ब्रह्माजीसे वर प्राप्त कर चुका था। युद्धमें अधिक कष्ट पानेके कारण वह पापी रावणपुत्र क्रोधसे अचेत-सा हो रहा था; अतः अन्तर्धान-विद्याका आश्रय ले अदृश्य हो उसने वज्रके समान तेजस्वी और तीखे बाण बरसाने आरम्भ किये ॥ ३४½ ॥
रामं च लक्ष्मणं चैव घोरैर्नागमयैः शरैः ॥ ३५ ॥ बिभेद समरे क्रुद्धः सर्वगात्रेषु राक्षसः ।
भावार्थ
समराङ्गणमें कुपित हुए इन्द्रजित्ने घोर सर्पमय बाणोंद्वारा श्रीराम और लक्ष्मणको घायल कर दिया । वे दोनों रघुवंशी बन्धु अपने सभी अङ्गोंमें चोट खाकर क्षत-विक्षत हो रहे थे ॥ ३५½ ॥
मायया संवृतस्तत्र मोहयन् राघवौ युधि ॥ ३६ ॥ अदृश्यः सर्वभूतानां कूटयोधी निशाचरः । बबन्ध शरबन्धेन भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ३७ ॥
भावार्थ
मायासे आवृत हो समस्त प्राणियोंके लिये अदृश्य होकर वहाँ कूटयुद्ध करनेवाले उस निशाचरने युद्धस्थलमें दोनों रघुवंशी बन्धु श्रीराम और लक्ष्मणको मोहमें डालते हुए उन्हें सर्पाकार बाणोंके बन्धनमें बाँध लिया ॥ ३६-३७ ॥
तौ तेन पुरुषव्याघ्रौ क्रुद्धेनाशीविषैः शरैः । सहसाभिहतौ वीरौ तदा प्रेक्षन्त वानराः ॥ ३८ ॥
भावार्थ
इस प्रकार क्रोधसे भरे हुए इन्द्रजित्ने उन दोनों पुरुषप्रवर वीरोंको सहसा सर्पाकार बाणोंद्वारा बाँध लिया । उस समय वानरोंने उन्हें नागपाशमें बद्ध देखा ॥ ३८ ॥
प्रकाशरूपस्तु यदा न शक्त- स्तौ बाधितुं राक्षसराजपुत्रः । मायां प्रयोक्तुं समुपाजगाम बबन्ध तौ राजसुतौ दुरात्मा ॥ ३९ ॥
भावार्थ
प्रकटरूपसे युद्ध करते समय जब राक्षसराजकुमार इन्द्रजित् उन दोनों राजकुमारोंको बाधा देनेमें समर्थ न हो सका, तब उनपर मायाका प्रयोग करनेको उतारू हो गया और उन दोनों भाइयोंको उस दुरात्माने बाँध लिया ॥ ३९ ॥
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