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युद्धकाण्ड, सर्ग 43

युध्यतां तु ततस्तेषां वानराणां महात्मनाम् । रक्षसां सम्बभूवाथ बलरोषः सुदारुणः ॥ १ ॥

भावार्थ

तदनन्तर परस्पर युद्ध करते हुए महामना वानरों और राक्षसोंको एक दूसरेकी सेनाको देखकर बड़ा भयंकर रोष हुआ ॥ १ ॥

ते हयैः काञ्चनापीडैर्गजैश्चाग्निशिखोपमैः । रथैश्चादित्यसंकाशैः कवचैश्च मनोरमैः ॥ २ ॥ निर्ययू राक्षसा वीरा नादयन्तो दिशो दश । राक्षसा भीमकर्माणो रावणस्य जयैषिणः ॥ ३ ॥

भावार्थ

सोनेके आभूषणोंसे विभूषित घोड़ों, हाथियों, अग्निकी ज्वालाके समान देदीप्यमान रथों तथा सूर्यतुल्य तेजस्वी मनोरम कवचोंसे युक्त वे वीर राक्षस दसों दिशाओंको अपनी गर्जनासे गुँजाते हुए निकले । भयानक कर्म करनेवाले वे सभी निशाचर रावणकी विजय चाहते थे ॥ २-३ ॥

वानराणामपि चमूर्बृहती जयमिच्छताम् । अभ्यधावत तां सेनां रक्षसां घोरकर्मणाम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

भगवान् श्रीरामकी विजय चाहनेवाले वानरोंकी उस विशाल सेनाने भी घोर कर्म करनेवाले राक्षसोंकी सेनापर धावा किया ॥ ४ ॥

एतस्मिन्नन्तरे तेषामन्योन्यमभिधावताम् । रक्षसां वानराणां च द्वन्द्वयुद्धमवर्तत ॥ ५ ॥

भावार्थ

इसी समय एक दूसरेपर धावा बोलते हुए राक्षसों और वानरोंमें द्वन्द्वयुद्ध छिड़ गया ॥ ५ ॥

अङ्गदेनेन्द्रजित्सार्धं वालिपुत्रेण राक्षसः । अयुध्यत महातेजास्त्र्यम्बकेण यथान्धकः ॥ ६ ॥

भावार्थ

वालिपुत्र अङ्गदके साथ महातेजस्वी राक्षस इन्द्रजित् उसी तरह भिड़ गया, जैसे त्रिनेत्रधारी महादेवजीके साथ अन्धकासुर लड़ रहा हो ॥ ६ ॥

प्रजङ्घेन च सम्पातिर्नित्यं दुर्धर्षणो रणे । जम्बुमालिनमारब्धो हनूमानपि वानरः ॥ ७ ॥

भावार्थ

प्रजंघ नामक राक्षसके साथ सदा ही रणदुर्जय वीर सम्पातिने और जम्बुमालीके साथ वानर वीर हनुमान्जीने युद्ध आरम्भ किया ॥ ७ ॥

संगतस्तु महाक्रोधो राक्षसो रावणानुजः । समरे तीक्ष्णवेगेन शत्रुघ्नेन विभीषणः ॥ ८ ॥

भावार्थ

अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए रावणानुज राक्षस विभीषण समराङ्गणमें प्रचण्ड वेगशाली शत्रुघ्नके साथ उलझ गये ॥ ८ ॥

तपनेन गजः सार्धं राक्षसेन महाबलः । निकुम्भेन महातेजा नीलोऽपि समयुध्यत ॥ ९ ॥

भावार्थ

महाबली गज तपन नामक राक्षसके साथ लड़ने लगे । महातेजस्वी नील भी निकुम्भसे जूझने लगे ॥ ९ ॥

वानरेन्द्रस्तु सुग्रीवः प्रघसेन सुसंगतः । संगतः समरे श्रीमान् विरूपाक्षेण लक्ष्मणः ॥ १० ॥

भावार्थ

‘वानरराज सुग्रीव प्रघसके साथ और श्रीमान् लक्ष्मण समरभूमिमें विरूपाक्षके साथ युद्ध करने लगे ॥ १० ॥

अग्निकेतुः सुदुर्धर्षो रश्मिकेतुश्च राक्षसः । सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च रामेण सह संगताः ॥ ११ ॥

भावार्थ

दुर्जय वीर अग्निकेतु, रश्मिकेतु, सुप्तघ्न और यज्ञकोप-ये सब राक्षस श्रीरामचन्द्रजीके साथ जूझने लगे ॥ ११ ॥

वज्रमुष्टिश्च मैन्देन द्विविदेनाशनिप्रभः । राक्षसाभ्यां सुघोराभ्यां कपिमुख्यौ समागतौ ॥ १२ ॥

भावार्थ

मैन्दके साथ वज्रमुष्टि और द्विविदके साथ अशनिप्रभ युद्ध करने लगे । इस प्रकार इन दोनों भयानक राक्षसोंके साथ वे दोनों कपिशिरोमणि वीर भिड़े हुए थे ॥ १२ ॥

वीरः प्रतपनो घोरो राक्षसो रणदुर्धरः । समरे तीक्ष्णवेगेन नलेन समयुध्यत ॥ १३ ॥ धर्मस्य पुत्रो बलवान् सुषेण इति विश्रुतः । स विद्युन्मालिना सार्धमयुध्यत महाकपिः ॥ १४ ॥

भावार्थ

प्रतपन नामसे प्रसिद्ध एक घोर राक्षस था, जिसे रणभूमिमें परास्त करना अत्यन्त कठिन था । वह वीर निशाचर समराङ्गणमें प्रचण्ड वेगशाली नलके साथ युद्ध करने लगा ।१३। धर्मके बलवान् पुत्र महाकपि सुषेण राक्षस विद्युन्मालीके साथ लोहा लेने लगे ॥ १४ ॥

वानराश्चापरे घोरा राक्षसैरपरैः सह । द्वन्द्वं समीयुः सहसा युद्ध्वा च बहुभिः सह ॥ १५ ॥

भावार्थ

इसी प्रकार अन्यान्य भयानक वानर बहुतोंके साथ युद्ध करनेके पश्चात् दूसरे-दूसरे राक्षसोंके साथ सहसा द्वन्द्वयुद्ध करने लगे ॥ १५ ॥

तत्रासीत् सुमहद् युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् । रक्षसां वानराणां च वीराणां जयमिच्छताम् ॥ १६ ॥ हरिराक्षसदेहेभ्यः प्रभूताः केशशाद्वलाः । शरीरसंघाटवहाः प्रसुस्रुः शोणितापगाः ॥ १७ ॥

भावार्थ

वहाँ राक्षस और वानरवीर अपनी-अपनी विजय चाहते थे । उनमें बड़ा भयंकर और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा ॥ वानरों और राक्षसोंके शरीरोंसे निकलकर बहुत-सी खूनकी नदियाँ बहने लगीं । उनके सिरके बाल ही वहाँ शैवाल ( सेवार ) के समान जान पड़ते थे । वे नदियाँ सैनिकोंकी लाशरूपी काष्ठसमूहोंको बहाये लिये जाती थीं ॥ १७ ॥

आजघानेन्द्रजित् क्रुद्धो वज्रेणेव शतक्रतुः । अङ्गदं गदया वीरं शत्रुसैन्यविदारणम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

जिस प्रकार इन्द्र वज्रसे प्रहार करते हैं, उसी तरह इन्द्रजित् मेघनादने शत्रुसेनाको विदीर्ण करनेवाले वीर अङ्गदपर गदासे आघात किया ॥ १८ ॥

तस्य काञ्चनचित्राङ्गं रथं साश्वं ससारथिम् । जघान गदया श्रीमानङ्गदो वेगवान् हरिः ॥ १९ ॥

भावार्थ

किंतु वेगशाली वानर श्रीमान् अङ्गदने उसकी गदा हाथसे पकड़ ली और उसी गदासे इन्द्रजित्के सुवर्णजटित रथको सारथि और घोड़ोंसहित चूर-चूर कर डाला ॥ १९ ॥

सम्पातिस्तु प्रजङ्घेन त्रिभिर्बाणैः समाहतः । निजघानाश्वकर्णेन प्रजङ्घं रणमूर्धनि ॥ २० ॥

भावार्थ

प्रजङ्घने सम्पातिको तीन बाणोंसे घायल कर दिया । तब सम्पातिने भी अश्वकर्ण नामक वृक्षसे युद्धके मुहानेपर प्रजङ्घको मार डाला ॥ २० ॥

जम्बुमाली रथस्थस्तु रथशक्त्या महाबलः । बिभेद समरे क्रुद्धो हनूमन्तं स्तनान्तरे ॥ २१ ॥

भावार्थ

महाबली जम्बुमाली रथपर बैठा हुआ था । उसने कुपित होकर समराङ्गणमें एक रथ-शक्तिके द्वारा हनुमान्जीकी छातीपर चोट की ॥ २१ ॥

तस्य तं रथमास्थाय हनूमान् मारुतात्मजः । प्रममाथ तलेनाशु सह तेनैव रक्षसा ॥ २२ ॥

भावार्थ

परंतु पवननन्दन हनुमान् उछलकर उसके उस रथपर चढ़ गये और तुरंत ही थप्पड़से मारकर उन्होंने उस राक्षसके साथ ही उस रथको भी चौपट कर दिया ( जम्बुमाली मर गया ) ॥ २२ ॥

नदन् प्रतपनो घोरो नलं सोऽभ्यनुधावत । नलः प्रतपनस्याशु पातयामास चक्षुषी ॥ २३ ॥ भिन्नगात्रः शरैस्तीक्ष्णैः क्षिप्रहस्तेन रक्षसा ।

भावार्थ

दूसरी ओर भयानक राक्षस प्रतपन भीषण गर्जना करके नलकी ओर दौड़ा । शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले उस राक्षसने अपने तीखे बाणोंसे नलके शरीरको क्षत-विक्षत कर दिया । तब नलने तत्काल ही उसकी दोनों आँखें निकाल लीं ॥२३½॥

ग्रसन्तमिव सैन्यानि प्रघसं वानराधिपः ॥ २४ ॥ सुग्रीवः सप्तपर्णेन निजघान जवेन च ।

भावार्थ

उधर राक्षस प्रघस वानरसेनाको कालका ग्रास बना रहा था । यह देख वानरराज सुग्रीवने सप्तपर्णनामक वृक्षसे उसे वेगपूर्वक मार गिराया ॥ २४½ ॥

प्रपीड्य शरवर्षेण राक्षसं भीमदर्शनम् ॥ २५ ॥ निजघान विरूपाक्षं शरेणैकेन लक्ष्मणः ।

भावार्थ

लक्ष्मणने पहले बाणोंकी वर्षा करके भयंकर दृष्टिवाले राक्षस विरूपाक्षको बहुत पीड़ा दी । फिर एक बाणसे मारकर उसे मौतके घाट उतार दिया ॥ २५½ ॥

अग्निकेतुश्च दुर्धर्षो रश्मिकेतुश्च राक्षसः । सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च रामं निर्बिभिदुः शरैः ॥ २६ ॥ तेषां चतुर्णां रामस्तु शिरांसि समरे शरैः । क्रुद्धश्चतुर्भिश्चिच्छेद घोरैरग्निशिखोपमैः ॥ २७ ॥

भावार्थ

अग्निकेतु, दुर्जय रश्मिकेतु, सुप्तघ्न और यज्ञकोप नामक राक्षसोंने श्रीरामचन्द्रजीको अपने बाणोंसे घायल कर दिया ॥ तब श्रीरामने कुपित हो अग्निशिखाके समान भयंकर बाणोंद्वारा समराङ्गणमें उन चारोंके सिर काट लिये ॥ २७ ॥

वज्रमुष्टिस्तु मैन्देन मुष्टिना निहतो रणे । पपात सरथः साश्वः सुराट्ट इव भूतले ॥ २८ ॥

भावार्थ

उस युद्धस्थलमें मैन्दने वज्रमुष्टिपर मुक्केका प्रहार किया, जिससे वह रथ और घोड़ोंसहित उसी तरह पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो देवताओंका विमान धराशायी हो गया हो ॥ २८ ॥

निकुम्भस्तु रणे नीलं नीलाञ्जनचयप्रभम् । निर्बिभेद शरैस्तीक्ष्णैः करैर्मेघमिवांशुमान् ॥ २९ ॥

भावार्थ

निकुम्भने काले कोयलेके समूहकी भाँति नील वर्णवाले नीलको रणक्षेत्रमें अपने पैने बाणोंद्वारा उसी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया, जैसे सूर्यदेव अपनी प्रचण्ड किरणोंद्वारा बादलोंको फाड़ देते हैं ॥ २९ ॥

पुनः शरशतेनाथ क्षिप्रहस्तो निशाचरः । बिभेद समरे नीलं निकुम्भः प्रजहास च ॥ ३० ॥

भावार्थ

परंतु शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले उस निशाचरने समराङ्गणमें नीलको पुनः सौ बाणोंसे घायल कर दिया । ऐसा करके निकुम्भ जोर-जोरसे हँसने लगा ॥ ३० ॥

तस्यैव रथचक्रेण नीलो विष्णुरिवाहवे । शिरश्चिच्छेद समरे निकुम्भस्य च सारथेः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

यह देख नीलने उसीके रथके पहियेसे युद्धस्थलमें निकुम्भ तथा उसके सारथिका उसी तरह सिर काट लिया, जैसे भगवान् विष्णु संग्राममभूमिमें अपने चक्रसे दैत्योंके मस्तक उड़ा देते हैं ॥ ३१ ॥

वज्राशनिसमस्पर्शो द्विविदोऽप्यशनिप्रभम् । जघान गिरिशृङ्गेण मिषतां सर्वरक्षसाम् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

द्विविदका स्पर्श वज्र और अशनिके समान दुःसह था । उन्होंने सब राक्षसोंके देखते-देखते अशनिप्रभ नामक निशाचरपर एक पर्वतशिखरसे प्रहार किया ॥ ३२ ॥

द्विविदं वानरेन्द्रं तु द्रुमयोधिनमाहवे । शरैरशनिसंकाशैः स विव्याधाशनिप्रभः ॥ ३३ ॥

भावार्थ

तब अशनिप्रभने युद्धस्थलमें वृक्ष लेकर युद्ध करनेवाले वानरराज द्विविदको वज्रतुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ३३ ॥

स शरैरभिविद्धाङ्गो द्विविदः क्रोधमूर्च्छितः । सालेन सरथं साश्वं निजघानाशनिप्रभम् ॥ ३४ ॥

भावार्थ

द्विविदका सारा शरीर बाणोंसे क्षत-विक्षत हो गया था, इससे उन्हें बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने एक सालवृक्षसे रथ और घोड़ोंसहित अशनिप्रभको मार गिराया ॥ ३४ ॥

विद्युन्माली रथस्थस्तु शरैः काञ्चनभूषणैः । सुषेणं ताडयामास ननाद च मुहुर्मुहुः ॥ ३५ ॥

भावार्थ

रथपर बैठे हुए विद्युन्मालीने अपने सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा सुषेणको बारंबार घायल किया । फिर वह जोर-जोरसे गर्जना करने लगा ॥ ३५ ॥

तं रथस्थमथो दृष्ट्वा सुषेणो वानरोत्तमः । गिरिशृङ्गेण महता रथमाशु न्यपातयत् ॥ ३६ ॥

भावार्थ

उसे रथपर बैठा देख वानरशिरोमणि सुषेणने एक विशाल पर्वत-शिखर चलाकर उसके रथको शीघ्र ही चूर-चूर कर डाला ॥ ३६ ॥

लाघवेन तु संयुक्तो विद्युन्माली निशाचरः । अपक्रम्य रथात् तूर्णं गदापाणिः क्षितौ स्थितः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

निशाचर विद्युन्माली तुरंत ही बड़ी फुर्तीके साथ रथसे नीचे कूद पड़ा और हाथमें गदा लेकर पृथ्वीपर खड़ा हो गया ॥३७॥

ततः क्रोधसमाविष्टः सुषेणो हरिपुङ्गवः । शिलां सुमहतीं गृह्य निशाचरमभिद्रवत् ॥ ३८ ॥

भावार्थ

तदनन्तर क्रोधसे भरे हुए वानरशिरोमणि सुषेण एक बहुत बड़ी शिला लेकर उस निशाचरकी ओर दौड़े ॥ ३८ ॥

तमापतन्तं गदया विद्युन्माली निशाचरः । वक्षस्यभिजघानाशु सुषेणं हरिपुङ्गवम् ॥ ३९ ॥

भावार्थ

कपिश्रेष्ठ सुषेणको आक्रमण करते देख निशाचर विद्युन्मालीने तत्काल ही गदासे उनकी छातीपर प्रहार किया ॥३९॥

गदाप्रहारं तं घोरमचिन्त्य प्लवगोत्तमः । तां तूर्णीं पातयामास तस्योरसि महामृधे ॥ ४० ॥

भावार्थ

गदाके उस भीषण प्रहारकी कुछ भी परवा न करके वानरप्रवर सुषेणने उसी पहलेवाली शिलाको चुपचाप उठा लिया और उस महासमरमें उसे विद्युन्मालीकी छातीपर दे मारा ॥ ४० ॥

शिलाप्रहाराभिहतो विद्युन्माली निशाचरः । निष्पिष्टहृदयो भूमौ गतासुर्निपपात ह ॥ ४१ ॥

भावार्थ

शिलाके प्रहारसे घायल हुए निशाचर विद्युन्मालीकी छाती चूर-चूर हो गयी और वह प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ४१ ॥

एवं तैर्वानरैः शूरैः शूरास्ते रजनीचराः । द्वन्द्वे विमथितास्तत्र दैत्या इव दिवौकसैः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

इस प्रकार वे शूरवीर निशाचर शौर्यसम्पन्न वानर वीरोंद्वारा वहाँ द्वन्द्वयुद्धमें उसी तरह कुचल दिये गये जैसे देवताओंद्वारा दैत्य मथ डाले गये थे ॥ ४२ ॥

भल्लैश्चान्यैर्गदाभिश्च शक्तितोमरसायकैः । अपविद्धैश्चापि रथैस्तथा सांग्रामिकैर्हयैः ॥ ४३ ॥ निहतैः कुञ्जरैर्मत्तैस्तथा वानरराक्षसैः । चक्राक्षयुगदण्डैश्च भग्नैर्धरणिसंश्रितैः ॥ ४४ ॥ बभूवायोधनं घोरं गोमायुगणसेवितम् । कबन्धानि समुत्पेतुर्दिक्षु वानररक्षसाम् । विमर्दे तुमुले तस्मिन् देवासुररणोपमे ॥ ४५ ॥

भावार्थ

उस समय भालों, अन्यान्य बाणों, गदाओं, शक्तियों, तोमरों, सायकों, टूटे और फेंके हुए रथों, फौजी घोड़ों, मरे हुए मतवाले हाथियों, वानरों, राक्षसों, पहियों तथा टूटे हुए जूओंसे, जो धरतीपर बिखरे पड़े थे, वह युद्धभूमि बड़ी भयानक हो रही थी । गीदड़ोंके समुदाय वहाँ सब ओर विचर रहे थे । देवासुर-संग्रामके समान उस भयानक मार-काटमें वानरों और राक्षसोंके कबन्ध ( मस्तकरहित धड़ ) सम्पूर्ण दिशाओंमें उछल रहे थे ॥ ४३--४५ ॥

निहन्यमाना हरिपुङ्गवैस्तदा निशाचराः शोणितगन्धमूर्च्छिताः । पुनः सुयुद्धं तरसा समाश्रिता दिवाकरस्यास्तमयाभिकाङ्क्षिणः ॥ ४६ ॥

भावार्थ

उस समय उन वानरशिरोमणियोंद्वारा मारे जाते हुए निशाचर रक्तकी गन्धसे मतवाले हो रहे थे । वे सूर्यके अस्त होनेकी प्रतीक्षा करते हुए पुनः बड़े वेगसे घमासान युद्धमें तत्पर हो गये* ॥ ४६ ॥

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