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युद्धकाण्ड, सर्ग 46

ततो द्यां पृथिवीं चैव वीक्षमाणा वनौकसः । दद्दशुः संततौ बाणैर्भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १ ॥

भावार्थ

तदनन्तर जब उपर्युक्त दस वानर पृथ्वी और आकाशकी छानबीन करके लौटे, तब उन्होंने दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणको बाणोंसे बिंधा हुआ देखा ॥ १ ॥

वृष्ट्वेवोपरते देवे कृतकर्मणि राक्षसे । आजगामाथ तं देशं ससुग्रीवो विभीषणः ॥ २ ॥

भावार्थ

जैसे वर्षा करके देवराज इन्द्र शान्त हो गये हों, उसी प्रकार वह राक्षस इन्द्रजित् जब अपना काम बनाकर बाणवर्षा-से विरत हो गया, तब सुग्रीवसहित विभीषण भी उस स्थानपर आये ॥ २ ॥

नीलश्च द्विविदो मैन्दः सुषेणः कुमुदोऽङ्गदः । तूर्णं हनुमता सार्धमन्वशोचन्त राघवौ ॥ ३ ॥ अचेष्टौ मन्दनिःश्वासौ शोणितेन परिप्लुतौ । शरजालाचितौ स्तब्धौ शयानौ शरतल्पगौ ॥ ४ ॥

भावार्थ

हनुमान्जीके साथ नील, द्विविद, मैन्द, सुषेण, कुमुद और अङ्गद तुरंत ही श्रीरघुनाथजीके लिये शोक करने लगे ।३। उस समय वे दोनों भाई खूनसे लथपथ होकर बाणशय्या-पर पड़े थे । बाणोंसे उनका सारा शरीर व्याप्त हो रहा था । वे निश्चल होकर धीरे-धीरे साँस ले रहे थे । उनकी चेष्टाएँ बंद हो गयी थीं ॥ ४ ॥

निःश्वसन्तौ यथा सर्पौ निश्चेष्टौ मन्दविक्रमौ । रुधिरस्रावदिग्धाङ्गौ तपनीयाविव ध्वजौ ॥ ५ ॥

भावार्थ

सर्पोंके समान साँस खांचते और निश्चेष्ट पड़े हुए उन दोनों भाइयोंका पराक्रम मन्द हो गया था । उनके सारे अङ्ग रक्त बहाकर उसीमें सन गये थे । वे दोनों टूटकर गिरे हुए दो सुवर्णमय ध्वजोंके समान जान पड़ते थे ॥ ५ ॥

तौ वीरशयने वीरौ शयानौ मन्दचेष्टितौ । यूथपैः स्वैः परिवृतौ बाष्पव्याकुललोचनैः ॥ ६ ॥

भावार्थ

वीरशय्यापर सोये हुए मन्द चेष्टावाले वे दोनों वीर आँसू भरे नेत्रोंवाले अपने यूथपतियोंसे घिरे हुए थे ॥ ६ ॥

राघवौ पतितौ दृष्ट्वा शरजालसमन्वितौ । बभूवुर्व्यथिताः सर्वे वानराः सविभीषणाः ॥ ७ ॥

भावार्थ

बाणोंके जालसे आवृत होकर पृथ्वीपर पड़े हुए उन दोनों रघुवंशी बन्धुओंको देखकर विभीषणसहित सब वानर व्यथित हो उठे ॥ ७ ॥

अन्तरिक्षं निरीक्षन्तो दिशः सर्वाश्च वानराः । न चैनं मायया छन्नं ददृशू रावणिं रणे ॥ ८ ॥

भावार्थ

समस्त वानर सम्पूर्ण दिशाओं और आकाशमें बारंबार दृष्टिपात करनेपर भी मायाच्छन्न रावणकुमार इन्द्रजित्को रण-भूमिमें नहीं देख पाते थे ॥ ८ ॥

तं तु मायाप्रतिच्छन्नं माययैव विभीषणः । वीक्षमाणो ददर्शाग्रे भ्रातुः पुत्रमवस्थितम् । तमप्रतिमकर्माणमप्रतिद्वन्द्वमाहवे ॥ ९ ॥

भावार्थ

तब विभीषणने मायासे ही देखना आरम्भ किया । उस समय उन्होंने मायासे ही छिपे हुए अपने उस भतीजेको सामने खड़ा देखा, जिसके कर्म अनुपम थे और युद्धस्थलमें जिसका सामना करनेवाला कोई योद्धा नहीं था ॥ ९ ॥

ददर्शान्तर्हितं वीरं वरदानाद् विभीषणः । तेजसा यशसा चैव विक्रमेण च संयुतः ॥ १० ॥

भावार्थ

तेज, यश और पराक्रमसे युक्त विभीषणने मायाके द्वारा ही वरदानके प्रभावसे छिपे हुए वीर इन्द्रजित्को देख लिया ॥ १० ॥

इन्द्रजित् त्वात्मनः कर्मतौ शयानौ समीक्ष्य च । उवाच परमप्रीतो हर्षयन् सर्वराक्षसान् ॥ ११ ॥

भावार्थ

श्रीराम और लक्ष्मणको युद्धभूमिमें सोते देख इन्द्रजित्को बड़ी प्रसन्नता हुई । उसने समस्त राक्षसोंका हर्ष बढ़ाते हुए अपने पराक्रमका वर्णन आरम्भ किया— ॥ ११ ॥

दूषणस्य च हन्तारौ खरस्य च महाबलौ । सादितौ मामकैर्बाणैर्भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘वह देखो, जिन्होंने खर और दूषणका वध किया था, वे दोनों भाई महाबली श्रीराम और लक्ष्मण मेरे बाणोंसे मारे गये ॥ १२ ॥

नेमौ मोक्षयितुं शक्यावेतस्मादिषुबन्धनात् । सर्वैरपि समागम्य सर्षिसङ्घैः सुरासुरैः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘यदि सारे मुनिसमूहोंसहित समस्त देवता और असुर भी आ जायँ तो वे इस बाण-बन्धनसे इन दोनोंको छुटकारा नहीं दिला सकते ॥ १३ ॥

यत्कृते चिन्तयानस्य शोकार्तस्य पितुर्मम । अस्पृष्ट्वा शयनं गात्रैर्विभावरी याति शर्वरी ॥ १४ ॥ कृत्स्नेयं यत्कृते लङ्का नदी वर्षास्विवाकुला । सोऽयं मूलहरोऽनर्थः सर्वेषां शमितो मया ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘जिसके कारण चिन्ता और शोकसे पीड़ित हुए मेरे पिताको सारी रात शय्याका स्पर्श किये बिना ही बितानी पड़ती थी तथा जिसके कारण यह सारी लङ्का वर्षाकालमें नदीकी भाँति व्याकुल रहा करती थी, हम सबकी जड़को काटनेवाले उस अनर्थको आज मैंने शान्त कर दिया ॥ १४-१५ ॥

रामस्य लक्ष्मणस्यैव सर्वेषां च वनौकसाम् । विक्रमा निष्फलाः सर्वे यथा शरदि तोयदाः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘जैसे शरद्ऋतुके सारे बादल पानी न बरसानेके कारण व्यर्थ होते हैं, उसी प्रकार श्रीराम, लक्ष्मण और सम्पूर्ण वानरोंके सारे बल-विक्रम निष्फल हो गये’ ॥ १६ ॥

एवमुक्त्वा तु तान् सर्वान् राक्षसान् परिपश्यतः । यूथपानपि तान् सर्वांस्ताडयत् स च रावणिः ॥ १७ ॥

भावार्थ

अपनी ओर देखते हुए उन सब राक्षसोंसे ऐसा कहकर रावणकुमार इन्द्रजित्ने वानरोंके उन समस्त सुप्रसिद्ध यूथपतियोंको भी मारना आरम्भ किया ॥ १७ ॥

नीलं नवभिराहत्य मैन्दं सद्विविदं तथा । त्रिभिस्त्रिभिरमित्रघ्नस्तताप परमेषुभिः ॥ १८ ॥

भावार्थ

उस शत्रुसूदन निशाचर वीरने नीलको नौ बाणोंसे घायल करके मैन्द और द्विविदको तीन-तीन उत्तम सायकोंद्वारा मारकर संतप्त कर दिया ॥ १८ ॥

जाम्बवन्तं महेष्वासो विद्ध्वा बाणेन वक्षसि । हनूमतो वेगवतो विससर्ज शरान् दश ॥ १९ ॥

भावार्थ

महाधनुर्धर इन्द्रजित्ने जाम्बवान्की छातीमें एक बाणसे गहरी चोट पहुँचाकर वेगशाली हनुमान्जीको भी दस बाण मारे ॥ १९ ॥

गवाक्षं शरभं चैव तावप्यमितविक्रमौ । द्वाभ्यां द्वाभ्यां महावेगो विव्याध युधि रावणिः ॥ २० ॥

भावार्थ

रावणकुमारका वेग उस समय बहुत बढ़ा हुआ था। उसने युद्धस्थलमें अमित पराक्रमी गवाक्ष और शरभको भी दो-दो बाण मारकर घायल कर दिया ॥ २० ॥

गोलाङ्गूलेश्वरं चैव वालिपुत्रमथाङ्गदम् । विव्याध बहुभिर्बाणैस्त्वरमाणोऽथ रावणिः ॥ २१ ॥

भावार्थ

तदनन्तर बड़ी उतावलीके साथ बाण चलाते हुए रावणकुमार इन्द्रजित्ने पुनः बहुसंख्यक बाणोंद्वारा लंगूरोंके राजा ( गवाक्ष ) को और वालिपुत्र अङ्गदको भी गहरी चोट पहुँचायी ॥ २१ ॥

तान् वानरवरान् भित्त्वा शरैरग्निशिखोपमैः । ननाद बलवांस्तत्र महासत्त्वः स रावणिः ॥ २२ ॥

भावार्थ

इस प्रकार अग्नितुल्य तेजस्वी सायकोंसे उन मुख्य-मुख्य वानरोंको घायल करके महान् धैर्यशाली और बलवान् रावणकुमार वहाँ जोर-जोरसे गर्जना करने लगा ॥ २२ ॥

तानर्दयित्वा बाणौघैस्त्रासयित्वा च वानरान् । प्रजहास महाबाहुर्वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २३ ॥

भावार्थ

अपने बाणसमूहोंसे उन वानरोंको पीड़ित तथा भयभीत करके महाबाहु इन्द्रजित् अट्टहास करने लगा और इस प्रकार बोला—॥ २३ ॥

शरबन्धेन घोरेण मया बद्धौ चमूमुखे । सहितौ भ्रातरावेतौ निशामयत राक्षसाः ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘राक्षसो ! देख लो, मैंने युद्धके मुहानेपर भयंकर बाणोंके पाशसे इन दोनों भाइयों श्रीराम और लक्ष्मणको एक साथ ही बाँध लिया है’ ॥ २४ ॥

एवमुक्तास्तु ते सर्वे राक्षसाः कूटयोधिनः । परं विस्मयमापन्नाः कर्मणा तेन हर्षिताः ॥ २५ ॥

भावार्थ

इन्द्रजित्के ऐसा कहनेपर कूट-युद्ध करनेवाले वे सब राक्षस बड़े चकित हुए और उसके उस कर्मसे उन्हें बड़ा हर्ष भी हुआ ॥ २५ ॥

विनेदुश्च महानादान् सर्वे ते जलदोपमाः । हतो राम इति ज्ञात्वा रावणिं समपूजयन् ॥ २६ ॥

भावार्थ

वे सब-के-सब मेघोंके समान गम्भीर स्वरसे महान् सिंहनाद करने लगे तथा यह समझकर कि श्रीराम मारे गये, उन्होंने रावणकुमारका बड़ा अभिनन्दन किया ॥ २६ ॥

निष्पन्दौ तु तदा दृष्ट्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । वसुधायां निरुच्छ्वासौ हतावित्यन्वमन्यत ॥ २७ ॥

भावार्थ

इन्द्रजित्ने भी जब यह देखा कि श्रीराम और लक्ष्मण— दोनों भाई पृथ्वीपर निश्चेष्ट पड़े हैं तथा उनका श्वास भी नहीं चल रहा है, तब उन दोनोंको मरा हुआ ही समझा ॥ २७ ॥

हर्षेण तु समाविष्ट इन्द्रजित् समितिञ्जयः । प्रविवेश पुरीं लङ्कां हर्षयन् सर्वनैर्ऋतान् ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘इससे युद्धविजयी इन्द्रजित्को बड़ा हर्ष हुआ तथा वह समस्त राक्षसोंका हर्ष बढ़ाता हुआ लङ्कापुरीमें चला गया ॥ २८ ॥

रामलक्ष्मणयोर्दृष्ट्वा शरीरे सायकैश्चिते । सर्वाणि चाङ्गोपाङ्गानि सुग्रीवं भयमाविशत् ॥ २९ ॥

भावार्थ

श्रीराम और लक्ष्मणके शरीरों तथा सभी अङ्ग-उपाङ्गोंको बाणोंसे व्याप्त देख सुग्रीवके मनमें भय समा गया ॥ २९ ॥

तमुवाच परित्रस्तं वानरेन्द्रं विभीषणः । सवाष्पवदनं दीनं शोकव्याकुललोचनम् ॥ ३० ॥ अलं त्रासेन सुग्रीव बाष्पवेगो निगृह्यताम् ।

भावार्थ

उनके मुखपर दीनता छा गयी, आँसुओंकी धारा बह चली और नेत्र शोकसे व्याकुल हो उठे । उस समय अत्यन्त भयभीत हुए वानरराजसे विभीषणने कहा—‘सुग्रीव ! डरो मत। डरनेसे कोई लाभ नहीं । आँसुओंका यह वेग रोको ३०½

एवंप्रायाणि युद्धानि विजयो नास्ति नैष्ठिकः ॥ ३१ ॥ सभाग्यशेषतास्माकं यदि वीर भविष्यति । मोहमेतौ प्रहास्येते महात्मानौ महाबलौ ॥ ३२ ॥ पर्यवस्थापयात्मानमनाथं मां च वानर । सत्यधर्माभिरक्तानां नास्ति मृत्युकृतं भयम् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘वीर ! सभी युद्धोंकी प्रायः ऐसी ही स्थिति होती है, उनमें विजय निश्चित नहीं हुआ करती । यदि हमलोगोंका भाग्य शेष होगा तो ये दोनों महाबली महात्मा अवश्य मूर्छा-त्याग देंगे । वानरराज ! तुम अपनेको और मुझ अनाथको भी सँभालो । जो लोग सत्य-धर्ममें अनुराग रखते हैं, उन्हें मृत्युका भय नहीं होता है’ ॥ ३१-३३ ॥

एवमुक्त्वा ततस्तस्य जलक्लिन्नेन पाणिना । सुग्रीवस्य शुभे नेत्रे प्रममार्ज विभीषणः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर विभीषणने जलसे भीगे हुए हाथसे सुग्रीवके दोनों सुन्दर नेत्र पोंछ दिये ॥ ३४ ॥

ततः सलिलमादाय विद्यया परिजप्य च । सुग्रीवनेत्रे धर्मात्मा प्रममार्ज विभीषणः ॥ ३५ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् हाथमें जल लेकर उसे मन्त्रपूत करके धर्मात्मा विभीषणने सुग्रीवके नेत्रोंमें लगाया ॥ ३५ ॥

विमृज्य वदनं तस्य कपिराजस्य धीमतः । अब्रवीत् कालसम्प्राप्तमसम्भ्रान्तमिदं वचः ॥ ३६ ॥

भावार्थ

फिर बुद्धिमान् वानरराजके भीगे हुए मुखको पोंछकर उन्होंने बिना किसी घबराहटके यह समयोचित बात कही—॥३६॥

न कालः कपिराजेन्द्र वैक्लव्यमवलम्बितुम् । अतिस्नेहोऽपि काले ऽस्मिन् मरणायोपकल्पते ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘वानरसम्राट् ! यह समय घबरानेका नहीं है । ऐसे समयमें अधिक स्नेहका प्रदर्शन भी मौतका भय उपस्थित कर देता है ॥ ३७ ॥

तस्मादुत्सृज्य वैक्लव्यं सर्वकार्यविनाशनम् । हितं रामपुरोगाणां सैन्यानामनुचिन्तय ॥ ३८ ॥

भावार्थ

‘इसलिये सब कामोंको बिगाड़ देनेवाली इस घबराहटको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजी जिनके अगुआ अथवा स्वामी हैं, उन सेनाओंके हितका विचार करो ॥ ३८ ॥

अथ वा रक्ष्यतां रामो यावत्संज्ञाविपर्ययः । लब्धसंज्ञो हि काकुत्स्थौ भयं नौ व्यपनेष्यतः ॥ ३९ ॥

भावार्थ

‘अथवा जबतक श्रीरामचन्द्रजीको चेत न हो, तबतक इनकी रक्षा करनी चाहिये । होशमें आ जानेपर ये दोनों रघुवंशी वीर हमारा सारा भय दूर कर देंगे ॥ ३९ ॥

नैतत् किंचन रामस्य न च रामो मुमूर्षति । नह्येनं हास्यते लक्ष्मीर्दुर्लभा या गतायुषाम् ॥ ४० ॥

भावार्थ

‘श्रीरामके लिये यह संकट कुछ भी नहीं है । ये मर नहीं सकते हैं; क्योंकि जिनकी आयु समाप्त हो चली है, उनके लिये जो दुर्लभ लक्ष्मी ( शोभा ) है, वह इनका त्याग नहीं कर रही है ॥ ४० ॥

तस्मादाश्वासयात्मानं बलं चाश्वासय स्वकम् । यावत् सैन्यानि सर्वाणि पुनः संस्थापयाम्यहम् ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘अतः तुम अपनेको सँभालो और अपनी सेनाको आश्वासन दो । तबतक मैं इस घबरायी हुई सेनाको फिरसे धैर्य बँधाकर सुस्थिर करता हूँ ॥ ४१ ॥

एते हि फुल्लनयनास्त्रासादागतसाध्वसाः । कर्णे कर्णे प्रकथिता हरयो हरिसत्तम ॥ ४२ ॥

भावार्थ

‘कपिश्रेष्ठ ! देखो, इन वानरोंके मनमें भय समा गया है, इसीलिये ये आँखें फाड़-फाड़कर देखते हैं और आपसमें कानाफूँसी करते हैं ॥ ४२ ॥

मां तु दृष्ट्वा प्रधावन्तमनीकं सम्प्रहर्षितम् । त्यजन्तु हरयस्त्रासं भुक्तपूर्वामिव स्रजम् ॥ ४३ ॥

भावार्थ

‘( अतः मैं इन्हें आश्वासन देने जाता हूँ ) मुझे हर्षपूर्वक इधर-उधर दौड़ते देख और मेरे द्वारा धैर्य बँधायी हुई सेनाको प्रसन्न होती जान ये सभी वानर पहलेकी भोगी हुई मालाकी भाँति अपनी सारी भय-शङ्काको त्याग दें’ ॥ ४३ ॥

समाश्वास्य तु सुग्रीवं राक्षसेन्द्रो विभीषणः । विद्रुतं वानरानीकं तत् समाश्वासयत् पुनः ॥ ४४ ॥

भावार्थ

इस प्रकार सुग्रीवको आश्वासन दे राक्षसराज विभीषणने भागनेके लिये उद्यत हुई वानर-सेनाको फिरसे सान्त्वना दी ॥ ४४ ॥

इन्द्रजित् तु महामायः सर्वसैन्यसमावृतः । विवेश नगरीं लङ्कां पितरं चाभ्युपागमत् ॥ ४५ ॥

भावार्थ

इधर महामायावी इन्द्रजित् सारी सेनाके साथ लङ्कापुरीमें लौटा और अपने पिताके पास आया ॥ ४५ ॥

तत्र रावणमासाद्य अभिवाद्य कृताञ्जलिः । आचचक्षे प्रियं पित्रे निहतौ रामलक्ष्मणौ ॥ ४६ ॥

भावार्थ

वहाँ रावणके पास पहुँचकर उसने उसे हाथ जोड़कर प्रणाम किया और श्रीराम-लक्ष्मणके मारे जानेका प्रिय संवाद सुनाया ॥ ४६ ॥

उत्पपात ततो हृष्टः पुत्रं च परिषस्वजे । रावणो रक्षसां मध्ये श्रुत्वा शत्रू निपातितौ ॥ ४७ ॥

भावार्थ

राक्षसोंके बीचमें अपने दोनों शत्रुओंके मारे जानेका समाचार सुनकर रावण हर्षसे उछल पड़ा और उसने अपने पुत्रको हृदयसे लगा लिया ॥ ४७ ॥

उपाघ्राय च तं मूर्ध्नि पप्रच्छ प्रीतमानसः । पृच्छते च यथावृत्तं पित्रे तस्मै न्यवेदयत् ॥ ४८ ॥ यथा तौ शरबन्धेन निश्चेष्टौ निष्प्रभौ कृतौ ॥ ४९ ॥

भावार्थ

फिर उसका मस्तक सूँघकर उसने प्रसन्नचित्त होकर उस घटनाका पूरा विवरण पूछा । पूछनेपर इन्द्रजित्ने पिताको सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों निवेदन किया और यह बताया कि किस प्रकार बाणोंके बन्धनमें बाँधकर श्रीराम और लक्ष्मणको निश्चेष्ट एवं निस्तेज किया गया है ॥ ४८-४९ ॥

स हर्षवेगानुगतान्तरात्मा श्रुत्वा गिरं तस्य महारथस्य । जहौ ज्वरं दाशरथेः समुत्थं प्रहृष्टवाचाभिननन्द पुत्रम् ॥ ५० ॥

भावार्थ

महारथी इन्द्रजित्की उस बातको सुनकर रावणकी अन्तरात्मा हर्षके उद्रेकसे खिल उठी । दशरथनन्दन श्रीरामकी ओरसे जो उसे भय और चिन्ता प्राप्त हुई थी, उसे उसने त्याग दिया और प्रसन्नतापूर्ण वचनोंद्वारा अपने पुत्रका अभिनन्दन किया ॥

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