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युद्धकाण्ड, सर्ग 36

तत् तु माल्यवतो वाक्यं हितमुक्तं दशाननः । न मर्षयति दुष्टात्मा कालस्य वशमागतः ॥ १ ॥

भावार्थ

दुष्टात्मा दशमुख रावण कालके अधीन हो रहा था, इसलिये माल्यवान्की कही हुई हितकर बातको भी वह सहन नहीं कर सका ॥ १ ॥

स बद्ध्वा भ्रुकुटिं वक्त्रे क्रोधस्य वशमागतः । अमर्षात् परिवृत्ताक्षो माल्यवन्तमथाब्रवीत् ॥ २ ॥ हितबुद्ध्या यदहितं वचः परुषमुच्यते । परपक्षं प्रविश्यैव नैतच्छ्रोत्रगतं मम ॥ ३ ॥

भावार्थ

वह क्रोधके वशीभूत हो गया । अमर्षसे उसके नेत्र घूमने लगे । उसने भौंहें टेढ़ी करके माल्यवान्से कहा—॥ ‘तुमने शत्रुका पक्ष लेकर हित-बुद्धिसे जो मेरे अहितकी कठोर बात कही है, वह पूरी तौरसे मेरे कानोंतक नहीं पहुँची ॥ ३ ॥

मानुषं कृपणं राममेकं शाखामृगाश्रयम् । समर्थं मन्यसे केन त्यक्तं पित्रा वनाश्रयम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘बेचारा राम एक मनुष्य ही तो है, जिसने सहारा लिया है कुछ बंदरोंका । पिताके त्याग देनेसे उसने वनकी शरण ली है । उसमें कौन-सी ऐसी विशेषता है, जिससे तुम उसे बड़ा सामर्थ्यशाली मान रहे हो ॥ ४ ॥

रक्षसामीश्वरं मां च देवानां च भयंकरम् । हीनं मां मन्यसे केन अहीनं सर्वविक्रमैः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘मैं राक्षसोंका स्वामी तथा सभी प्रकारके पराक्रमोंसे सम्पन्न हूँ, देवताओंके मनमें भी भय उत्पन्न करता हूँ; फिर किस कारणसे तुम मुझे रामकी अपेक्षा हीन समझते हो ? ॥ ५ ॥

वीरद्वेषेण वा शङ्के पक्षपातेन वा रिपोः । त्वयाहं परुषाण्युक्तो परप्रोत्साहनेन वा ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘तुमने जो मुझे कठोर बातें सुनायी हैं, उनके विषयमें मुझे शङ्का है कि तुम या तो मुझ-जैसे वीरसे द्वेष रखते हो या शत्रुसे मिले हुए हो अथवा शत्रुओंने ऐसा कहने या करनेके लिये तुम्हें प्रोत्साहन दिया है ॥ ६ ॥

प्रभवन्तं पदस्थं हि परुषं कोऽभिभाषते । पण्डितः शास्त्रतत्त्वज्ञो विना प्रोत्साहनेन वा ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘जो प्रभावशाली होनेके साथ ही अपने राज्यपर प्रतिष्ठित है, ऐसे पुरुषको कौन शास्त्रतत्त्वज्ञ विद्वान् शत्रुका प्रोत्साहन पाये बिना कटुवचन सुना सकता है ? ॥ ७ ॥

आनीय च वनात् सीतां पद्महीनामिव श्रियम् । किमर्थं प्रतिदास्यामि राघवस्य भयादहम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘कमलहीन कमलाकी भाँति सुन्दरी सीताको वनसे ले आकर अब केवल रामके भयसे मैं कैसे लौटा दूँ ? ॥ ८ ॥

वृतं वानरकोटीभिः ससुग्रीवं सलक्ष्मणम् । पश्य कैश्चिदहोभिश्च राघवं निहतं मया ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘करोड़ों वानरोंसे घिरे हुए सुग्रीव और लक्ष्मणसहित रामको मैं कुछ ही दिनोंमें मार डालूँगा, यह तुम अपनी आँखों देख लेना ॥ ९ ॥

द्वन्द्वे यस्य न तिष्ठन्ति दैवतान्यपि संयुगे । स कस्माद् रावणो युद्धे भयमाहारयिष्यति ॥ १० ॥

भावार्थ

‘जिसके सामने द्वन्द्वयुद्धमें देवता भी नहीं ठहर पाते हैं, वही रावण युद्धमें किससे भयभीत होगा ॥ १० ॥

द्विधा भज्येयमप्येवं न नमेयं तु कस्यचित् । एष मे सहजो दोषः स्वभावो दुरतिक्रमः ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘मैं बीचसे दो टूक हो जाऊँगा, पर किसीके सामने झुक नहीं सकूँगा; यह मेरा सहज दोष है और स्वभाव किसीके लिये भी दुर्लङ्घ्य होता है ॥ ११ ॥

यदि तावत् समुद्रे तु सेतुर्बद्धो यदृच्छया । रामेण विस्मयः कोऽत्र येन ते भयमागतम् ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘यदि रामने दैववश समुद्रपर सेतु बाँध लिया तो इसमें विस्मयकी कौन बात है, जिससे तुम्हें इतना भय हो गया है ? ॥ १२ ॥

स तु तीर्त्वार्णवं रामः सह वानरसेनया । प्रतिजानामि ते सत्यं न जीवन् प्रतियास्यति ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘मैं तुम्हारे आगे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि समुद्र पार करके वानरसेनासहित आये हुए राम यहाँसे जीवित नहीं लौट सकेंगे’ ॥ १३ ॥

एवं ब्रुवाणं संरब्धं रुष्टं विज्ञाय रावणम् । व्रीडितो माल्यवान् वाक्यं नोत्तरं प्रत्यपद्यत ॥ १४ ॥

भावार्थ

ऐसी बातें कहते हुए रावणको क्रोधसे भरा हुआ एवं रुष्ट जानकर माल्यवान् बहुत लज्जित हुआ और उसने कोई उत्तर नहीं दिया ॥ १४ ॥

जयाशिषा तु राजानं वर्धयित्वा यथोचितम् । माल्यवानभ्यनुज्ञातो जगाम स्वं निवेशनम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

माल्यवान्ने ‘महाराजकी जय हो’ इस विजयसूचक आशीर्वादसे राजाको यथोचित बढ़ावा दिया और उससे आज्ञा लेकर वह अपने घर चला गया ॥ १५ ॥

रावणस्तु सहामात्यो मन्त्रयित्वा विमृश्य च । लङ्कायास्तु तदा गुप्तिं कारयामास राक्षसः ॥ १६ ॥

भावार्थ

तदनन्तर मन्त्रियोंसहित राक्षस रावणने परस्पर विचार-विमर्श करके तत्काल लङ्काकी रक्षाका प्रबन्ध किया ॥ १६ ॥

व्यादिदेश च पूर्वस्यां प्रहस्तं द्वारि राक्षसम् । दक्षिणस्यां महावीर्यौ महापार्श्वमहोदरौ ॥ १७ ॥ पश्चिमायामथ द्वारि पुत्रमिन्द्रजितं तदा । व्यादिदेश महामायं राक्षसैर्बहुभिर्वृतम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

उसने पूर्व द्वारपर उसकी रक्षाके लिये राक्षस प्रहस्तको तैनात किया, दक्षिण द्वारपर महापराक्रमी महापार्श्व और महोदरको नियुक्त किया तथा पश्चिम द्वारपर अपने पुत्र इन्द्रजित्को रक्खा, जो महान् मायावी था । वह बहुत-से राक्षसोंद्वारा घिरा हुआ था ॥ १७-१८ ॥

उत्तरस्यां पुरद्वारि व्यादिश्य शुकसारणौ । स्वयं चात्र गमिष्यामि मन्त्रिणस्तानुवाच ह ॥ १९ ॥

भावार्थ

तदनन्तर नगरके उत्तर द्वारपर शुक और सारणको रक्षाके लिये जानेकी आज्ञा दे मन्त्रियोंसे रावणने कहा—‘मैं स्वयं भी उत्तर द्वारपर जाऊँगा’ ॥ १९ ॥

राक्षसं तु विरूपाक्षं महावीर्यपराक्रमम् । मध्यमेऽस्थापयद् गुल्मे बहुभिः सह राक्षसैः ॥ २० ॥

भावार्थ

नगरके बीचकी छावनीपर उसने बहुसंख्यक राक्षसोंके साथ महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न राक्षस विरूपाक्षको स्थापित किया ॥ २० ॥

एवं विधानं लङ्कायां कृत्वा राक्षसपुंगवः । कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यते कालचोदितः ॥ २१ ॥

भावार्थ

इस प्रकार लङ्कामें पुरीकी रक्षाका प्रबन्ध करके कालप्रेरित राक्षसशिरोमणि रावण अपने आपको कृतकृत्य मानने लगा ॥ २१ ॥

विसर्जयामास ततः स मन्त्रिणो विधानमाज्ञाप्य पुरस्य पुष्कलम् । जयाशिषा मन्त्रिगणेन पूजितो विवेश सोऽन्तःपुरमृद्धिमन्महत् ॥ २२ ॥

भावार्थ

इस तरह नगरके संरक्षणकी प्रचुर व्यवस्थाके लिये आज्ञा देकर रावणने सब मन्त्रियोंको विदा कर दिया और स्वयं भी उनके विजयसूचक आशीर्वादसे सम्मानित हो अपने समृद्धिशाली एवं विशाल अन्तःपुरमें चला गया ॥ २२ ॥

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