युद्धकाण्ड, सर्ग 35
तेन शङ्खविमिश्रेण भेरीशब्देन नादिना । उपयाति महाबाहू रामः परपुरंजयः ॥ १ ॥
भावार्थ
शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले महाबाहु श्रीरामने शङ्खध्वनिसे मिश्रित हो तुमुल नाद करनेवाली भेरीकी आवाजके साथ लङ्कापर आक्रमण किया ॥ १ ॥
तं निनादं निशम्याथ रावणो राक्षसेश्वरः । मुहूर्तं ध्यानमास्थाय सचिवानभ्युदैक्षत ॥ २ ॥
भावार्थ
उस भेरीनादको सुनकर राक्षसराज रावणने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार करनेके पश्चात् अपने मन्त्रियोंकी ओर देखा ॥ २ ॥
अथ तान् सचिवांस्तत्र सर्वानाभाष्य रावणः । सभां संनादयन् सर्वामित्युवाच महाबलः ॥ ३ ॥ जगत्संतापनः क्रूरोऽगर्हयन् राक्षसेश्वरः ।
भावार्थ
उन सब मन्त्रियोंको सम्बोधित करके जगत्को संताप देनेवाले, महाबली, क्रूर राक्षसराज रावणने सारी सभाको प्रतिध्वनित करके किसीपर आक्षेप न करते हुए कहा—॥ ३½ ॥
तरणं सागरस्यास्य विक्रमं बलपौरुषम् ॥ ४ ॥ यदुक्तवन्तो रामस्य भवन्तस्तन्मया श्रुतम् । भवतश्चाप्यहं वेद्मि युद्धे सत्यपराक्रमान् । तूष्णीकानीक्षतोऽन्योन्यं विदित्वा रामविक्रमम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘आपलोगोंने रामके पराक्रम, बल-पौरुष तथा समुद्र-लङ्घनकी जो बात बतायी है, वह सब मैंने सुन ली; परंतु मैं तो आपलोगोंको भी, जो इस समय रामके पराक्रमकी बातें जानकर चुपचाप एक दूसरेका मुँह देख रहे हैं, संग्रामभूमिमें सत्यपराक्रमी वीर समझता हूँ’ ॥ ४-५ ॥
ततस्तु सुमहाप्राज्ञो माल्यवान् नाम राक्षसः । रावणस्य वचः श्रुत्वा इति मातामहोऽब्रवीत् ॥ ६ ॥
भावार्थ
रावणके इस आक्षेपपूर्ण वचनको सुननेके पश्चात् महाबुद्धिमान् माल्यवान् नामक राक्षसने, जो रावणका नाना था, इस प्रकार कहा—॥ ६ ॥
विद्यास्वभिविनीतो यो राजा राजन् नयानुगः । स शास्ति चिरमैश्वर्यमरींश्च कुरुते वशे ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! जो राजा चौदहों विद्याओंमें सुशिक्षित और नीतिका अनुसरण करनेवाला होता है, वह दीर्घकालतक राज्यका शासन करता है । वह शत्रुओंको भी वशमें कर लेता है ॥ ७ ॥
संदधानो हि कालेन विगृह्णंश्चारिभिः सह । स्वपक्षे वर्धनं कुर्वन्महदैश्वर्यमश्नुते ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘जो समयके अनुसार आवश्यक होनेपर शत्रुओंके साथ संधि और विग्रह करता है तथा अपने पक्षकी वृद्धिमें लगा रहता है, वह महान् ऐश्वर्यका भागी होता है ॥ ८ ॥
हीयमानेन कर्तव्यो राज्ञा संधिः समेन च । न शत्रुमवमन्येत ज्यायान् कुर्वीत विग्रहम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘जिस राजाकी शक्ति क्षीण हो रही हो अथवा जो शत्रुके समान ही शक्ति रखता हो, उसे संधि कर लेनी चाहिये। अपनेसे अधिक या समान शक्तिवाले शत्रुका कभी अपमान न करे । यदि स्वयं ही शक्तिमें बढ़ा-चढ़ा हो, तभी शत्रुके साथ वह युद्ध ठाने ॥ ९ ॥
तन्मह्यं रोचते संधिः सह रामेण रावण । यदर्थमभियुक्तोऽसि सीता तस्मै प्रदीयताम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘इसलिये रावण ! मुझे तो श्रीरामके साथ संधि करना ही अच्छा लगता है । जिसके लिये तुम्हारे ऊपर आक्रमण हो रहा है, वह सीता तुम श्रीरामको लौटा दो ॥ १० ॥
तस्य देवर्षयः सर्वे गन्धर्वाश्च जयैषिणः । विरोधं मा गमस्तेन संधिस्ते तेन रोचताम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘देखो, देवता, ऋषि और गन्धर्व सभी श्रीरामकी विजय चाहते हैं, अतः तुम उनसे विरोध न करो । उनके साथ संधि कर लेनेकी ही इच्छा करो ॥ ११ ॥
असृजद् भगवान् पक्षौ द्वावेव हि पितामहः । सुराणामसुराणां च धर्माधर्मौ तदाश्रयौ ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘भगवान् ब्रह्माने सुर और असुर दो ही पक्षोंकी सृष्टि की है । धर्म और अधर्म ही इनके आश्रय हैं ॥१२॥
धर्मो हि श्रूयते पक्ष अमराणां महात्मनाम् । अधर्मो रक्षसां पक्षो ह्यसुराणां च राक्षस ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘सुना जाता है महात्मा देवताओंका पक्ष धर्म है । राक्षसराज ! राक्षसों और असुरोंका पक्ष अधर्म है ॥ १३ ॥
धर्मो वै ग्रसतेऽधर्मं यदा कृतमभूद् युगम् । अधर्मो ग्रसते धर्मं यदा तिष्यः प्रवर्तते ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘जब सत्ययुग होता है, तब धर्म बलवान् होकर अधर्मको ग्रस लेता है और जब कलियुग आता है, तब अधर्म ही धर्मको दबा देता है ॥ १४ ॥
तत् त्वया चरता लोकान् धर्मोऽपि निहतो महान् । अधर्मः प्रगृहीतश्च तेनास्मद् बलिनः परे ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘तुमने दिग्विजयके लिये सब लोकोंमें भ्रमण करते हुए महान् धर्मका नाश किया है और अधर्मको गले लगाया है, इसलिये हमारे शत्रु हमसे प्रबल हैं ॥ १५ ॥
स प्रमादात् प्रवृद्धस्तेऽधर्मोऽहिर्ग्रसते हि नः । विवर्धयति पक्षं च सुराणां सुरभावनः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘तुम्हारे प्रमादसे बढ़ा हुआ अधर्मरूपी अजगर अब हमें निगल जाना चाहता है और देवताओंद्वारा पालित धर्म उनके पक्षकी वृद्धि कर रहा है ॥ १६ ॥
विषयेषु प्रसक्तेन यत्किंचित्कारिणा त्वया । ऋषीणामग्निकल्पानामुद्वेगो जनितो महान् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘विषयोंमें आसक्त होकर जो कुछ भी कर डालनेवाले तुमने जो मनमाना आचरण किया है, इससे अग्निके समान तेजस्वी ऋषियोंको बड़ा ही उद्वेग प्राप्त हुआ है ॥ १७ ॥
तेषां प्रभावो दुर्धर्षः प्रदीप्त इव पावकः । तपसा भावितात्मानो धर्मस्यानुग्रहे रताः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘उनका प्रभाव प्रज्वलित अग्निके समान दुर्धर्ष है। वे ऋषि-मुनि तपस्याके द्वारा अपने अन्तःकरणको शुद्ध करके धर्मके ही संग्रहमें तत्पर रहते हैं ॥ १८ ॥
मुख्यैर्यज्ञैर्यजन्त्येते तैस्तैर्यत्तै द्विजातयः । जुह्वत्यग्नींश्च विधिवद् वेदांश्चोच्चैरधीयते ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘ये द्विजगण मुख्य-मुख्य यज्ञोंद्वारा यजन करते, विधिवत् अग्निमें आहुति देते और उच्चस्वरसे वेदोंका पाठ करते हैं ॥ १९ ॥
अभिभूय च रक्षांसि ब्रह्मघोषानुदीरयन् । दिशो विप्रद्रुताः सर्वाः स्तनयित्नुरिवोष्णगे ॥ २० ॥
भावार्थ
‘उन्होंने राक्षसोंको अभिभूत करके वेदमन्त्रोंकी ध्वनिका विस्तार किया है, इसलिये ग्रीष्म ऋतुमें मेघकी भाँति राक्षस सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग खड़े हुए हैं ॥ २० ॥
ऋषीणामग्निकल्पानामग्निहोत्रसमुत्थितः । आदत्ते रक्षसां तेजो धूमो व्याप्य दिशो दश ॥ २१ ॥ तेषु तेषु च देशेषु पुण्येष्वेव दृढव्रतैः । चर्यमाणं तपस्तीव्रं संतापयति राक्षसान् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘अग्नितुल्य तेजस्वी ऋषियोंके अग्निहोत्रसे प्रकट हुआ धूम दसों दिशाओंमें व्याप्त होकर राक्षसोंके तेजको हर लेता है॥ ‘भिन्न-भिन्न देशोंमें पुण्य कर्मोंमें ही लगे रहकर दृढतापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषिलोग जो तीव्र तपस्या करते हैं, वही राक्षसोंको संताप दे रही है ॥२२॥
देवदानवयक्षेभ्यो गृहीतश्च वरस्त्वया । मनुष्या वानरा ऋक्षा गोलाङ्गूला महाबलाः । बलवन्त इहागम्य गर्जन्ति दृढविक्रमाः ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘तुमने देवताओं, दानवों और यक्षोंसे ही अवध्य होनेका वर प्राप्त किया है, मनुष्य आदिसे नहीं । परंतु यहाँ तो मनुष्य, वानर, रीछ और लंगूर आकर गरज रहे हैं । वे सब-के-सब हैं भी बड़े बलवान्, सैनिकशक्तिसे सम्पन्न तथा सुदृढ़ पराक्रमी ॥ २३ ॥
उत्पातान् विविधान् दृष्ट्वा घोरान् बहुविधान् बहून् । विनाशमनुपश्यामि सर्वेषां रक्षसामहम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘नाना प्रकारके बहुत-से भयंकर उत्पातोंको लक्ष्य करके मैं तो इन समस्त राक्षसोंके विनाशका ही अवसर उपस्थित देख रहा हूँ ॥ २४ ॥
खराभिस्तनिता घोरा मेघाः प्रतिभयंकराः । शोणितेनाभिवर्षन्ति लङ्कामुष्णेन सर्वतः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘घोर एवं भयंकर मेघ प्रचण्ड गर्जन-तर्जनके साथ लङ्कापर सब ओरसे गर्म खूनकी वर्षा कर रहे हैं ॥ २५ ॥
रुदतां वाहनानां च प्रपतन्त्यश्रुबिन्दवः । रजोध्वस्ता विवर्णाश्च न प्रभान्ति यथापुरम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘घोड़े-हाथी आदि वाहन रो रहे हैं और उनके नेत्रोंसे अश्रुबिन्दु झर रहे हैं। दिशाएँ धूल भर जानेसे मलिन हो अब पहलेकी भाँति प्रकाशित नहीं हो रही हैं ॥ २६ ॥
व्याला गोमायवो गृध्रा वाश्यन्ति च सुभैरवम् । प्रविश्य लङ्कामारामे समवायांश्च कुर्वते ॥ २७ ॥
भावार्थ
मांसभक्षी हिंसक पशु, गीदड़ और गीध भयंकर बोली बोलते हैं तथा लङ्काके उपवनमें घुसकर झुंड बनाकर बैठते हैं ॥ २७ ॥
कालिकाः पाण्डुरैर्दन्तैः प्रहसन्त्यग्रतः स्थिताः । स्त्रियः स्वप्नेषु मुष्णन्त्यो गृहाणि प्रतिभाष्य च ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘सपनेमें काले रंगकी स्त्रियाँ अपने पीले दाँत दिखाती हुई सामने आकर खड़ी हो जाती और प्रतिकूल बातें कहकर घरके सामान चुराती हुई जोर-जोरसे हँसती हैं ॥ २८ ॥
गृहाणां बलिकर्माणि श्वानः पर्युपभुञ्जते । खरा गोषु प्रजायन्ते मूषका नकुलेषु च ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘घरोंमें जो बलिकर्म किये जाते हैं, उस बलि-सामग्रीको कुत्ते खा जाते हैं। गौओंसे गधे और नेवलोंसे चूहे पैदा होते हैं ॥ २९ ॥
मार्जारा द्वीपिभिः सार्धं सूकराः शुनकैः सह । किंनरा राक्षसैश्चापि समेयुर्मानुषैः सह ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘बाघोंके साथ बिलाव, कुत्तोंके साथ सूअर तथा राक्षसों और मनुष्योंके साथ किन्नर समागम करते हैं ॥ ३० ॥
पाण्डुरा रक्तपादाश्च विहगाः कालचोदिताः । राक्षसानां विनाशाय कपोता विचरन्ति च ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘जिनकी पाँखें सफेद और पंजे लाल हैं, वे कबूतर पक्षी दैवसे प्रेरित हो राक्षसोंका भावी विनाश सूचित करनेके लिये यहाँ सब ओर विचरते हैं ॥ ३१ ॥
चीचीकूचीति वाशन्त्यः शारिका वेश्मसु स्थिताः । पतन्ति प्रथिताश्चापि निर्जिताः कलहैविभिः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘घरोंमें रहनेवाली सारिकाएँ कलहकी इच्छावाले दूसरे पक्षियोंसे चैं-चैं करती हुई गुँथ जाती हैं और उनसे पराजित हो पृथ्वीपर गिर पड़ती हैं ॥ ३२ ॥
पक्षिणश्च मृगाः सर्वे प्रत्यादित्यं रुदन्ति ते । करालो विकटो मुण्डः पुरुषः कृष्णपिङ्गलः ॥ ३३ ॥ कालो गृहाणि सर्वेषां काले कालेऽन्वेक्षते ।
भावार्थ
‘पक्षी और मृग सभी सूर्यकी ओर मुँह करके रोते हैं । विकराल, विकट, काले और भूरे रंगके मूड़ मुड़ाये हुए पुरुषका रूप धारण करके काल समय-समयपर हम सबके घरोंकी ओर देखता है ॥ ३३½ ॥
एतान्यन्यानि दुष्टानि निमित्तान्युत्पतन्ति च ॥ ३४ ॥ विष्णुं मन्यामहे रामं मानुषं रूपमास्थितम् । नहि मानुषमात्रोऽसौ राघवो दृढविक्रमः ॥ ३५ ॥ येन बद्धः समुद्रे च सेतुः स परमाद्भुतः । कुरुष्व नरराजेन संधिं रामेण रावण । ज्ञात्वावधार्य कर्माणि क्रियतामायतिक्षमम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘ये तथा और भी बहुत-से अपशकुन हो रहे हैं । मैं ऐसा समझता हूँ कि साक्षात् भगवान् विष्णु ही मानवरूप धारण करके राम होकर आये हैं । जिन्होंने समुद्रमें अत्यन्त अद्भुत सेतु बाँधा है, वे दृढ़पराक्रमी रघुवीर साधारण मनुष्यमात्र नहीं हैं । रावण ! तुम नरराज श्रीरामके साथ संधि कर लो । श्रीरामके अलौकिक कर्मों और लङ्कामें होनेवाले उत्पातोंको जानकर जो कार्य भविष्यमें सुख देनेवाला हो, उसका निश्चय करके वही करो’ ॥ ३४–३६ ॥
इदं वचस्तस्य निगद्य माल्यवान् परीक्ष्य रक्षोधिपतेर्मनः पुनः । अनुत्तमेषूत्तमपौरुषो बली बभूव तूष्णीं समवेक्ष्य रावणम् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
यह बात कहकर तथा राक्षसराज रावणके मनोभावकी परीक्षा करके उत्तम मन्त्रियोंमें श्रेष्ठ पौरुषशाली महाबली माल्यवान् रावणकी ओर देखता हुआ चुप हो गया ॥ ३७ ॥
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