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युद्धकाण्ड, सर्ग 37

नरवानरराजानौ स तु वायुसुतः कपिः । जाम्बवानृक्षराजश्च राक्षसश्च विभीषणः ॥ १ ॥ अङ्गदो वालिपुत्रश्च सौमित्रिः शरभः कपिः । सुषेणः सहदायादो मैन्दो द्विविद एव च ॥ २ ॥ गजो गवाक्षः कुमुदो नलोऽथ पनसस्तथा । अमित्रविषयं प्राप्ताः समवेताः समर्थयन् ॥ ३ ॥

भावार्थ

शत्रुके देशमें पहुँचे हुए नरराज श्रीराम, सुमित्राकुमार लक्ष्मण, वानरराज सुग्रीव,वायुपुत्र हनुमान्, ऋक्षराज जाम्बवान् राक्षस विभीषण, वालिपुत्र अङ्गद, शरभ, बन्धु-बान्धवोंसहित सुषेण, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, कुमुद, नल और पनस–ये सब आपसमें मिलकर विचार करने लगे— ॥ १-३ ॥

इयं सा लक्ष्यते लङ्का पुरी रावणपालिता । सासुरोरगगन्धर्वैरमरैरपि दुर्जया ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘यही वह लङ्कापुरी दिखायी देती है, जिसका पालन रावण करता है । असुर, नाग और गन्धर्वोंसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी इसपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है ॥ ४ ॥

कार्यसिद्धिं पुरस्कृत्य मन्त्रयध्वं विनिर्णये । नित्यं संनिहितो यत्र रावणो राक्षसाधिपः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘राक्षसराज रावण इस पुरीमें सदा निवास करता है । अब आपलोग इसपर विजय पानेके उपायोंका निर्णय करनेके लिये परस्पर विचार करें’ ॥ ५ ॥

अथ तेषु ब्रुवाणेषु रावणावरजोऽब्रवीत् । वाक्यमग्राम्यपदवत् पुष्कलार्थं विभीषणः ॥ ६ ॥

भावार्थ

उन सबके इस प्रकार कहनेपर रावणके छोटे भाई विभीषणने संस्कारयुक्त पद और प्रचुर अर्थसे भरी हुई वाणीमें कहा—॥ ६ ॥

अनलः पनसश्चैव सम्पातिः प्रमतिस्तथा । गत्वा लङ्कां ममामात्याः पुरीं पुनरिहागताः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘मेरे मन्त्री अनल, पनस, सम्पाति और प्रमति—ये चारों लङ्कापुरीमें जाकर फिर यहाँ लौट आये हैं ॥ ७ ॥

भूत्वा शकुनयः सर्वे प्रविष्टाश्च रिपोर्बलम् । विधानं विहितं यच्च तद् दृष्ट्वा समुपस्थिताः ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘ये सब लोग पक्षीका रूप धारण करके शत्रुकी सेनामें गये थे और वहाँ जो व्यवस्था की गयी है, उसे अपनी आँखों देखकर फिर यहाँ उपस्थित हुए हैं ॥ ८ ॥

संविधानं यथाहुस्ते रावणस्य दुरात्मनः । राम तद् ब्रुवतः सर्वं याथातथ्येन मे शृणु ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! इन्होंने दुरात्मा रावणके द्वारा किये गये नगर-रक्षाके प्रबन्धका जैसा वर्णन किया है, उसे मैं ठीक-ठीक बताता हूँ । आप वह सब मुझसे सुनिये ॥ ९ ॥

पूर्वं प्रहस्तः सबलो द्वारमासाद्य तिष्ठति । दक्षिणं च महावीर्यौ महापार्श्वमहोदरौ ॥ १० ॥

भावार्थ

‘सेनासहित प्रहस्त नगरके पूर्वद्वारका आश्रय लेकर खड़ा है । महापराक्रमी महापार्श्व और महोदर दक्षिण द्वारपर खड़े हैं ॥ १० ॥

इन्द्रजित् पश्चिमं द्वारं राक्षसैर्बहुभिर्वृतः । पट्टिशासिधनुष्मद्भिः शूलमुद्गरपाणिभिः ॥ ११ ॥ नानाप्रहरणैः शूरैरावृतो रावणात्मजः ।

भावार्थ

‘बहुसंख्यक राक्षसोंसे घिरा हुआ इन्द्रजित् नगरके पश्चिम द्वारपर खड़ा है । उसके साथी राक्षस पट्टिश, खड्ग, धनुष, शूल और मुद्गर आदि अस्त्र-शस्त्र हाथोंमें लिये हुए हैं । नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले शूरवीरोंसे घिरा हुआ वह रावणकुमार पश्चिमद्वारकी रक्षाके लिये डटा है ॥ ११½ ॥

राक्षसानां सहस्रैस्तु बहुभिः शस्त्रपाणिभिः ॥ १२ ॥ युक्तः परमसंविग्नो राक्षसैः सह मन्त्रवित् । उत्तरं नगरद्वारं रावणः स्वयमास्थितः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘स्वयं मन्त्रवेत्ता रावण शुक, सारण आदि कई सहस्र शस्त्रधारी राक्षसोंके साथ नगरके उत्तर द्वारपर सावधानीके साथ खड़ा है । वह मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न जान पड़ता है ॥१२-१३॥

विरूपाक्षस्तु महता शूलखड्गधनुष्मता । बलेन राक्षसैः सार्धं मध्यमं गुल्ममाश्रितः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘विरूपाक्ष शूल, खड्ग और धनुष धारण करनेवाली विशाल राक्षससेनाके साथ नगरके बीचकी छावनीपर खड़ा है ॥ १४ ॥

एतानेवंविधान् गुल्माँल्लङ्कायां समुदीक्ष्य ते । मामका मन्त्रिणः सर्वे शीघ्रं पुनरिहागताः ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘इस प्रकार मेरे सारे मन्त्री लङ्कामें विभिन्न स्थानोंपर नियुक्त हुई इन सेनाओंका निरीक्षण करके फिर शीघ्र यहाँ लौटे हैं ॥१५॥

गजानां दशसाहस्रं रथानामयुतं तथा । हयानामयुते द्वे च साग्रकोटिश्च रक्षसाम् ॥ १६ ॥ विक्रान्ता बलवन्तश्च संयुगेष्वाततायिनः । इष्टा राक्षसराजस्य नित्यमेते निशाचराः ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘रावणकी सेनामें दस हजार हाथी, दस हजार रथ, बीस हजार घोड़े और एक करोड़से भी ऊपर पैदल राक्षस हैं ॥ ‘वे सभी बड़े वीर, बल-पराक्रमसे सम्पन्न और युद्धमें आततायी हैं । ये सभी निशाचर राक्षसराज रावणको सदा ही प्रिय हैं ॥ १७ ॥

एकैकस्यात्र युद्धार्थे राक्षसस्य विशाम्पते । परीवारः सहस्राणां सहस्रमुपतिष्ठते ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘प्रजानाथ ! इनमेंसे एक-एक राक्षसके पास युद्धके लिये दस-दस लाखका परिवार उपस्थित है’ ॥ १८ ॥

एतां प्रवृत्तिं लङ्कायां मन्त्रिप्रोक्तां विभीषणः । एवमुक्त्वा महाबाहू राक्षसांस्तानदर्शयत् ॥ १९ ॥ लङ्कायां सचिवैः सर्वं रामाय प्रत्यवेदयत् ।

भावार्थ

महाबाहु विभीषणने मन्त्रियोंद्वारा बताये गये लङ्काविषयक समाचारको इस प्रकार बताकर उन मन्त्रीस्वरूप राक्षसोंको भी श्रीरामसे मिलाया और उनके द्वारा लङ्काका सारा वृत्तान्त पुनः उनसे कहलाया ॥ १९½ ॥

रामं कमलपत्राक्षमिदमुत्तरमब्रवीत् ॥ २० ॥ रावणावरजः श्रीमान् रामप्रियचिकीर्षया ।

भावार्थ

तदनन्तर रावणके छोटे भाई श्रीमान् विभीषणने कमलनयन श्रीरामसे उनका प्रिय करनेके लिये स्वयं भी यह उत्तम बात कही--॥ २०½ ॥

कुबेरं तु यदा राम रावणः प्रतियुद्ध्यति ॥ २१ ॥ षष्टिः शतसहस्राणि तदा निर्यान्ति राक्षसाः । पराक्रमेण वीर्येण तेजसा सत्त्वगौरवात् । सदृशा ह्यत्र दर्पेण रावणस्य दुरात्मनः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! जब रावणने कुबेरके साथ युद्ध किया था, उस समय साठ लाख राक्षस उसके साथ गये थे । वे सब-के-सब बल, पराक्रम, तेज, धैर्यकी अधिकता और दर्पकी दृष्टिसे दुरात्मा रावणके ही समान थे ॥ २१-२२ ॥

अत्र मन्युर्न कर्तव्यः कोपये त्वां न भीषये । समर्थो ह्यसि वीर्येण सुराणामपि निग्रहे ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘मैंने जो रावणकी शक्तिका वर्णन किया है, इसको लेकर न तो आपको अपने मनमें दीनता लानी चाहिये और न मुझपर रोष ही करना चाहिये । मैं आपको डराता नहीं, शत्रुके प्रति आपके क्रोधको उभाड़ रहा हूँ; क्योंकि आप अपने बल-पराक्रमद्वारा देवताओंका भी दमन करनेमें समर्थ हैं ॥२३॥

तद्भवांश्चतुरङ्गेण बलेन महता वृतम् । व्यूहेदं वानरानीकं निर्मथिष्यसि रावणम् ॥ २४ ॥ रावणावरजे वाक्यमेवं ब्रुवति राघवः । शत्रूणां प्रतिघातार्थमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘इसलिये आप इस वानरसेनाका व्यूह बनाकर ही विशाल चतुरङ्गिणी सेनासे घिरे हुए रावणका विनाश कर सकेंगे’ ।२४। विभीषणके ऐसी बात कहनेपर भगवान् श्रीरामने शत्रुओंको परास्त करनेके लिये इस प्रकार कहा–॥ २५ ॥

पूर्वद्वारं तु लङ्काया नीलो वानरपुङ्गवः । प्रहस्तं प्रतियोद्धा स्याद् वानरैर्बहुभिर्वृतः ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘बहुसंख्यक वानरोंसे घिरे हुए कपिश्रेष्ठ नील पूर्व द्वारपर जाकर प्रहस्तका सामना करें ॥ २६ ॥

अङ्गदो वालिपुत्रस्तु बलेन महता वृतः । दक्षिणे बाधतां द्वारे महापार्श्वमहोदरौ ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘विशाल वाहिनीसे युक्त वालिकुमार अङ्गद दक्षिण द्वारपर स्थित हो महापार्श्व और महोदरके कार्यमें बाधा दें ॥ २७ ॥

हनूमान् पश्चिमद्वारं निष्पीड्य पवनात्मजः । प्रविशत्वप्रमेयात्मा बहुभिः कपिभिर्वृतः ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘पवनकुमार हनुमान् अप्रमेय आत्मबलसे सम्पन्न हैं । ये बहुत-से वानरोंके साथ लङ्काके पश्चिम फाटकमें प्रवेश करें ॥ २८ ॥

दैत्यदानवसङ्घानामृषीणां च महात्मनाम् । विप्रकारप्रियः क्षुद्रो वरदानबलान्वितः ॥ २९ ॥ परिक्रमति यः सर्वाँल्लोकान् संतापयन् प्रजाः । तस्याहं राक्षसेन्द्रस्य स्वयमेव वधे धृतः ॥ ३० ॥ उत्तरं नगरद्वारमहं सौमित्रिणा सह । निपीड्याभिप्रवेक्ष्यामि सबलो यत्र रावणः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘दैत्यों, दानवसमूहों तथा महात्मा ऋषियोंका अपकार करना ही जिसे प्रिय लगता है, जिसका स्वभाव क्षुद्र है, जो वरदानकी शक्तिसे सम्पन्न है और प्रजाजनोंको संताप देता हुआ सम्पूर्ण लोकोंमें घूमता रहता है, उस राक्षसराज रावणके वधका दृढ़ निश्चय लेकर मैं स्वयं ही सुमित्राकुमार लक्ष्मणके साथ नगरके उत्तर फाटकपर आक्रमण करके उसके भीतर प्रवेश करूँगा,—जहाँ सेनासहित रावण विद्यमान है ॥ २९–३१ ॥

वानरेन्द्रश्च बलवानृक्षराजश्च वीर्यवान् । राक्षसेन्द्रानुजश्चैव गुल्मे भवतु मध्यमे ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘बलवान् वानरराज सुग्रीव, रीछोंके पराक्रमी राजा जाम्बवान् तथा राक्षसराज रावणके छोटे भाई विभीषण—ये लोग नगरके बीचके मोर्चेपर आक्रमण करें ॥ ३२ ॥

न चैव मानुषं रूपं कार्यं हरिभिराहवे । एषा भवतु नः संज्ञा युद्धेऽस्मिन् वानरे बले ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘वानरोंको युद्धमें मनुष्यका रूप नहीं धारण करना चाहिये । इस युद्धमें वानरोंकी सेनाका हमारे लिये यही संकेत या चिह्न होगा ॥ ३३ ॥

वानरा एव नश्चिह्नं स्वजनेऽस्मिन् भविष्यति । वयं तु मानुषेणैव सप्त योत्स्यामहे परान् ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘इस स्वजनवर्गमें वानर ही हमारे चिह्न होंगे । केवल हम सात व्यक्ति ही मनुष्यरूपमें रहकर शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे ॥ ३४ ॥

अहमेव सह भ्रात्रा लक्ष्मणेन महौजसा । आत्मना पञ्चमश्चायं सखा मम विभीषणः ॥ ३५ ॥ स रामः कृत्यसिद्ध्यर्थमेवमुक्त्वा विभीषणम् । सुवेलारोहणे बुद्धिं चकार मतिमान् प्रभुः । रमणीयतरं दृष्ट्वा सुवेलस्य गिरेस्तटम् ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘मैं अपने महातेजस्वी भाई लक्ष्मणके साथ रहूँगा और ये मेरे मित्र विभीषण अपने चार मन्त्रियोंके साथ पाँचवें होंगे ( इस प्रकार हम सात व्यक्ति मनुष्यरूपमें रहकर युद्ध करेंगे)’ अपने विजयरूपी प्रयोजनकी सिद्धिके लिये विभीषणसे ऐसा कहकर बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामने सुवेल पर्वतपर चढ़नेका विचार किया । सुवेलपर्वतका तटप्रान्त बड़ा ही रमणीय था, उसे देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३६ ॥

ततस्तु रामो महता बलेन प्रच्छाद्य सर्वां पृथिवीं महात्मा । प्रहृष्टरूपोऽभिजगाम लङ्कां कृत्वा मतिं सोऽरिवधे महात्मा ॥ ३७ ॥

भावार्थ

तदनन्तर महामना महात्मा श्रीराम अपनी विशाल सेनाके द्वारा वहाँकी सारी पृथ्वीको आच्छादित करके शत्रुवधका निश्चय किये बड़े हर्ष और उत्साहसे लङ्काकी ओर चले ॥ ३७ ॥

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