युद्धकाण्ड, सर्ग 32
सा सीता तच्छिरो दृष्ट्वा तच्च कार्मुकमुत्तमम् । सुग्रीवप्रतिसंसर्गमाख्यातं च हनूमता ॥ १ ॥ नयने मुखवर्णं च भर्तुस्तत्सदृशं मुखम् । केशान् केशान्तदेशं च तं च चूडामणिं शुभम् ॥ २ ॥ एतैः सर्वैरभिज्ञानैरभिज्ञाय सुदुःखिता । विजगर्हेऽत्र कैकेयीं क्रोशन्ती कुररी यथा ॥ ३ ॥
भावार्थ
सीताजीने उस मस्तक और उस उत्तम धनुषको देखकर तथा हनुमान्जीकी कही हुई सुग्रीवके साथ मैत्री-सम्बन्ध होनेकी बात याद करके अपने पतिके-जैसे ही नेत्र, मुखका वर्ण, मुखाकृति, केश, ललाट और उस सुन्दर चूडामणिको लक्ष्य किया । इन सब चिह्नोंसे पतिको पहचानकर वे बहुत दुखी हुईं और कुररीकी भाँति रो-रोकर कैकेयीकी निन्दा करने लगीं—॥ १–३ ॥
सकामा भव कैकेयि हतोऽयं कुलनन्दनः । कुलमुत्सादितं सर्वं त्वया कलहशीलया ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘कैकेयि ! अब तुम सफलमनोरथ हो जाओ, रघुकुलको आनन्दित करनेवाले ये मेरे पतिदेव मारे गये । तुम स्वभावसे ही कलहकारिणी हो । तुमने समस्त रघुकुलका संहार कर डाला ॥ ४ ॥
आर्येण किं नु कैकेय्याः कृतं रामेण विप्रियम् । यन्मया चीरवसनं दत्त्वा प्रव्राजितो वनम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘आर्य श्रीरामने कैकेयीका कौन-सा अपराध किया था, जिससे उसने इन्हें चीरवस्त्र देकर मेरे साथ वनमें भेज दिया था’ ॥ ५ ॥
एवमुक्त्वा तु वैदेही वेपमाना तपस्विनी । जगाम जगतीं बाला छिन्ना तु कदली यथा ॥ ६ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर दुःखकी मारी तपस्विनी वैदेही बाला थरथर काँपती हुई कटी कदलीके समान पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ ६ ॥
सा मुहूर्तात् समाश्वस्य परिलभ्याथ चेतनाम् । तच्छिरः समुपास्थाय विललापायतेक्षणा ॥ ७ ॥
भावार्थ
फिर दो घड़ीमें उनकी चेतना लौटी और वे विशाललोचना सीता कुछ धीरज धारणकर उस मस्तकको अपने निकट रखकर विलाप करने लगीं—॥ ७ ॥
हा हतास्मि महाबाहो वीरव्रतमनुव्रत । इमां ते पश्चिमावस्थां गतास्मि विधवा कृता ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘हाय ! महाबाहो ! मैं मारी गयी । आप वीरव्रत-का पालन करनेवाले थे । आपकी इस अन्तिम अवस्थाको मुझे अपनी आँखोंसे देखना पड़ा । आपने मुझे विधवा बना दिया ॥ ८ ॥
प्रथमं मरणं नार्या भर्तुर्वैगुण्यमुच्यते । सुवृत्तः साधुवृत्तायाः संवृत्तस्त्वं ममाग्रतः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘स्त्रीसे पहले पतिका मरना उसके लिये महान् अनर्थकारी दोष बताया जाता है । मुझ सती-साध्वीके रहते हुए मेरे सामने आप-जैसे सदाचारी पतिका निधन हुआ, यह मेरे लिये महान् दुःखकी बात है ॥ ९ ॥
महद् दुःखं प्रपन्नाया मग्नायाः शोकसागरे । यो हि मामुद्यतस्त्रातुं सोऽपि त्वं विनिपातितः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘मैं महान् संकटमें पड़ी हूँ, शोकके समुद्रमें डूबी हूँ, जो मेरा उद्धार करनेके लिये उद्यत थे, उन आप-जैसे वीरको भी शत्रुओंने मार गिराया ॥ १० ॥
सा श्वश्रूर्मम कौसल्या त्वया पुत्रेण राघव । वत्सेनेव यथा धेनुर्विवत्सा वत्सला कृता ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! जैसे कोई बछड़ेके प्रति स्नेहसे भरी हुई गायको उस बछड़ेसे विलग कर दे, यही दशा मेरी सास कौसल्याकी हुई है । वे दयामयी जननी आप-जैसे पुत्रसे बिछुड़ गयीं ॥ ११ ॥
उद्दिष्टं दीर्घमायुस्ते दैवज्ञैरपि राघव । अनृतं वचनं तेषामल्पायुरसि राघव ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘रघुवीर ! ज्योतिषियोंने तो आपकी आयु बहुत बड़ी बतायी थी, किंतु उनकी बात झूठी सिद्ध हुई । रघुनन्दन ! आप बड़े अल्पायु निकले ॥ १२ ॥
अथवा नश्यति प्रज्ञा प्राज्ञस्यापि सतस्तव । पचत्येनं तथा कालो भूतानां प्रभवो ह्ययम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘अथवा बुद्धिमान् होकर भी आपकी बुद्धि मारी गयी । तभी तो आप सोते हुए ही शत्रुके वशमें पड़ गये अथवा यह काल ही समस्त प्राणियोंके उद्भवमें हेतु है । अतः वही प्राणि-मात्रको पकाता है—उन्हें शुभाशुभ कर्मोंके फलसे संयुक्त करता है ॥ १३ ॥
अदृष्टं मृत्युमापन्नः कस्मात् त्वं नयशास्त्रवित् । व्यसनानामुपायज्ञः कुशलो ह्यसि वर्जने ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘आप तो नीतिशास्त्रके विद्वान् थे । संकटसे बचनेके उपायोंको जानते थे और व्यसनोंके निवारणमें कुशल थे तो भी कैसे आपको ऐसी मृत्यु प्राप्त हुई, जो दूसरे किसी वीर पुरुषको प्राप्त होती नहीं देखी गयी थी ? ॥ १४ ॥
तथा त्वं सम्परिष्वज्य रौद्रयातिनृशंसया । कालरात्र्या ममाच्छिद्य हृतः कमललोचन ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘कमलनयन ! भीषण और अत्यन्त क्रूर कालरात्रि आपको हृदयसे लगाकर मुझसे हठात् छीन ले गयी ॥ १५ ॥
इह शेषे महाबाहो मां विहाय तपस्विनीम् । प्रियामिव यथा नारीं पृथिवीं पुरुषर्षभ ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘पुरुषोत्तम ! महाबाहो ! आप मुझ तपस्विनीको त्यागकर अपनी प्रियतमा नारीकी भाँति इस पृथ्वीका आलिङ्गन करके यहाँ सो रहे हैं ॥ १६ ॥
अर्चितं सततं यत्नाद् गन्धमाल्यैर्मया तव । इदं ते मत्प्रियं वीर धनुः काञ्चनभूषितम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘वीर ! जिसका मैं प्रयत्नपूर्वक गन्ध और पुष्पमाला आदिके द्वारा नित्यप्रति पूजन करती थी तथा जो मुझे बहुत प्रिय था, यह आपका वही स्वर्णभूषित धनुष है ॥ १७ ॥
पित्रा दशरथेन त्वं श्वशुरेण ममानघ । सर्वैश्च पितृभिः सार्धं नूनं स्वर्गं समागतः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘निष्पाप रघुनन्दन ! निश्चय ही आप स्वर्गमें जाकर मेरे श्वशुर तथा अपने पिता महाराज दशरथसे और अन्य सब पितरोंसे भी मिले होंगे ॥ १८ ॥
दिवि नक्षत्रभूतं च महत्कर्मकृतं तथा । पुण्यं राजर्षिवंशं त्वमात्मनः समुपेक्षसे ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘आप पिताकी आज्ञाका पालनरूपी महान् कर्म करके अद्भुत पुण्यका उपार्जन कर यहाँसे अपने उस राजर्षिकुलकी उपेक्षा करके ( उसे छोड़कर ) जा रहे हैं, जो आकाशमें नक्षत्र बनकर प्रकाशित होता है ( आपको ऐसा नहीं करना चाहिये ) ॥ १९ ॥
किं मां न प्रेक्षसे राजन् किं वा न प्रतिभाषसे । बालां बालेन सम्प्राप्तां भार्यां मां सहचारिणीम् ॥ २० ॥ संश्रुतं गृह्णता पाणिं चरिष्यामीति यत् त्वया । स्मर तन्नाम काकुत्स्थ नय मामपि दुःखिताम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! आपने अपनी छोटी अवस्थामें ही जब कि मेरी भी छोटी ही अवस्था थी, मुझे पत्नीरूपमें प्राप्त किया । मैं सदा आपके साथ विचरनेवाली सहधर्मिणी हूँ । आप मेरी ओर क्यों नहीं देखते हैं अथवा मेरी बातका उत्तर क्यों नहीं देते हैं ? ॥ ‘काकुत्स्थ ! मेरा पाणिग्रहण करते समय जो आपने प्रतिज्ञा की थी कि मैं तुम्हारे साथ धर्माचरण करूँगा; उसका स्मरण कीजिये और मुझ दुःखिनीको भी साथ ही ले चलिये ॥२१॥
कस्मान्मामपहाय त्वं गतो गतिमतां वर । अस्माल्लोकादमुं लोकं त्यक्त्वा मामपि दुःखिताम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘गतिमानोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! आप मुझे अपने साथ वनमें लाकर और यहाँ मुझ दुःखिनीको छोड़कर इस लोकसे परलोकको क्यों चले गये ? ॥ २२ ॥
कल्याणे रुचिरं गात्रं परिष्वक्तं मयैव तु । क्रव्यादैस्तच्छरीरं ते नूनं विपरिकृष्यते ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘मैंने ही अनेक मङ्गलमय उपचारोंसे सुन्दर आपके जिस श्रीविग्रहका आलिङ्गन किया था, आज उसीको मांसभक्षी हिंसक जन्तु अवश्य इधर-उधर घसीट रहे होंगे ॥ २३ ॥
अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैरिष्ट्वानाप्तदक्षिणैः । अग्निहोत्रेण संस्कारं केन त्वं न तु लप्स्यसे ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘आपने तो पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना की है; फिर क्या कारण है कि अग्निहोत्रकी अग्निसे दाह-संस्कारका सुयोग आपको नहीं मिल रहा है ॥ २४ ॥
प्रव्रज्यामुपपन्नानां त्रयाणामेकमागतम् । परिप्रेक्ष्यति कौसल्या लक्ष्मणं शोकलालसा ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘हम तीन व्यक्ति एक साथ वनमें आये थे; परंतु अब शोकाकुल हुई माता कौसल्या केवल एक व्यक्ति लक्ष्मणको ही घर लौटा हुआ देख सकेंगी ॥ २५ ॥
स तस्याः परिपृच्छन्त्या वधं मित्रबलस्य ते । तव चाख्यास्यते नूनं निशायां राक्षसैर्वधम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘उनके पूछनेपर लक्ष्मण उन्हें रात्रिके समय राक्षसोंके हाथसे आपके मित्रकी सेनाके तथा सोते हुए आपके भी वधका समाचार अवश्य सुनायेंगे ॥ २६ ॥
सा त्वां सुप्तं हतं ज्ञात्वा मां च रक्षोगृहं गताम् । हृदयेनावदीर्णेन न भविष्यति राघव ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! जब उन्हें यह ज्ञात होगा कि आप सोते समय मारे गये और मैं राक्षसके घरमें हर लायी गयी हूँ तो उनका हृदय विदीर्ण हो जायगा और वे अपने प्राण त्याग देंगी ॥ २७ ॥
मम हेतोरनार्याया अनघः पार्थिवात्मजः । रामः सागरमुत्तीर्य वीर्यवान् गोष्पदे हतः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘हाय ! मुझ अनार्याके लिये निष्पाप राजकुमार श्रीराम, जो महान् पराक्रमी थे, समुद्रलङ्घन-जैसा महान् कर्म करके भी गायकी खुरीके बराबर जलमें डूब गये— बिना युद्ध किये सोते समय मारे गये ॥ २८ ॥
अहं दाशरथेनोढा मोहात् स्वकुलपांसनी । आर्यपुत्रस्य रामस्य भार्या मृत्युरजायत ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘हाय ! दशरथनन्दन श्रीराम मुझ-जैसी कुलकलङ्किनी नारीको मोहवश ब्याह लाये । पत्नी ही आर्यपुत्र श्रीरामके लिये मृत्युरूप बन गयी ॥ २९ ॥
नूनमन्यां मया जातिं वारितं दानमुत्तमम् । याहमद्यैव शोचामि भार्या सर्वातिथेरिह ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘जिनके यहाँ सब लोग याचक बनकर आते थे एवं सभी अतिथि जिन्हें प्रिय थे, उन्हीं श्रीरामकी पत्नी होकर जो मैं आज शोक कर रही हूँ, इससे जान पड़ता है कि मैंने दूसरे जन्ममें निश्चय ही उत्तम दानधर्ममें बाधा डाली थी ॥ ३० ॥
साधु घातय मां क्षिप्रं रामस्योपरि रावण । समानय पतिं पत्न्या कुरु कल्याणमुत्तमम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘रावण ! मुझे भी श्रीरामके शवके ऊपर रखकर मेरा वध करा डालो; इस प्रकार पतिको पत्नीसे मिला दो; यह उत्तम कल्याणकारी कार्य है, इसे अवश्य करो ॥ ३१ ॥
शिरसा मे शिरश्चास्य कायं कायेन योजय । रावणानुगमिष्यामि गतिं भर्तुर्महात्मनः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘रावण ! मेरे सिरसे पतिके सिरका और मेरे शरीरसे उनके शरीरका संयोग करा दो । इस प्रकार मैं अपने महात्मा पतिकी गतिका ही अनुसरण करूँगी’ ॥ ३२ ॥
इतीव दुःखसंतप्ता विललापायतेक्षणा । भर्तुः शिरो धनुश्चैव ददर्श जनकात्मजा ॥ ३३ ॥
भावार्थ
इस प्रकार दुःखसे संतप्त हुई विशाललोचना जनकनन्दिनी सीता पतिके मस्तक तथा धनुषको देखने और विलाप करने लगीं ॥ ३३ ॥
एवं लालप्यमानायां सीतायां तत्र राक्षसः । अभिचक्राम भर्तारमनीकस्थः कृताञ्जलिः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
जब सीता इस तरह विलाप कर रही थीं, उसी समय वहाँ रावणकी सेनाका एक राक्षस हाथ जोड़े हुए अपने स्वामीके पास आया ॥ ३४ ॥
विजयस्वार्यपुत्रेति सोऽभिवाद्य प्रसाद्य च । न्यवेदयदनुप्राप्तं प्रहस्तं वाहिनीपतिम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
उसने ‘आर्यपुत्र महाराजकी जय हो’ कहकर रावणका अभिवादन किया और उसे प्रसन्न करके यह सूचना दी कि ‘सेनापति प्रहस्त पधारे हैं ॥ ३५ ॥
अमात्यैः सहितः सर्वैः प्रहस्तस्त्वामुपस्थितः । तेन दर्शनकामेन अहं प्रस्थापितः प्रभो ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! सब मन्त्रियोंके साथ प्रहस्त महाराजकी सेवामें उपस्थित हुए हैं । वे आपका दर्शन करना चाहते हैं, इसीलिये उन्होंने मुझे यहाँ भेजा है ॥ ३६ ॥
नूनमस्ति महाराज राजभावात् क्षमान्वित । किंचिदात्ययिकं कार्यं तेषां त्वं दर्शनं कुरु ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘क्षमाशील महाराज ! निश्चय ही कोई अत्यन्त आवश्यक राजकीय कार्य आ पड़ा है, अतः आप उन्हें दर्शन देनेका कष्ट करें १’ ॥ ३७ ॥
एतच्छ्रुत्वा दशग्रीवो राक्षसप्रतिवेदितम् । अशोकवनिकां त्यक्त्वा मन्त्रिणां दर्शनं ययौ ॥ ३८ ॥
भावार्थ
राक्षसकी कही हुई यह बात सुनकर दशग्रीव रावण अशोकवाटिका छोड़कर मन्त्रियोंसे मिलनेके लिये चला गया ॥ ३८ ॥
स तु सर्वं समर्थ्यैव मन्त्रिभिः कृत्यमात्मनः । सभां प्रविश्य विदधे विदित्वा रामविक्रमम् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
उसने मन्त्रियोंसे अपने सारे कृत्यका समर्थन कराया और श्रीरामचन्द्रजीके पराक्रमका पता लगाकर सभाभवनमें प्रवेश करके वह प्रस्तुत कार्यकी व्यवस्था करने लगा ॥ ३९ ॥
अन्तर्धानं तु तच्छीर्षं तच्च कार्मुकमुत्तमम् । जगाम रावणस्यैव निर्याणसमनन्तरम् ॥ ४० ॥
भावार्थ
रावणके वहाँसे निकलते ही वह सिर और उत्तम धनुष दोनों अदृश्य हो गये ॥ ४० ॥
राक्षसेन्द्रस्तु तैः सार्धं मन्त्रिभिर्भीमविक्रमैः । समर्थयामास तदा रामकार्यविनिश्चयम् ॥ ४१ ॥
भावार्थ
राक्षसराज रावणने अपने उन भयानक मन्त्रियोंके साथ बैठकर रामके प्रति किये जानेवाले तत्कालोचित कर्तव्यका निश्चय किया ॥ ४१ ॥
अविदूरस्थितान् सर्वान् बलाध्यक्षान् हितैषिणः । अब्रवीत् कालसदृशं रावणो राक्षसाधिपः ॥ ४२ ॥
भावार्थ
फिर राक्षसराज रावणने पास ही खड़े हुए अपने हितैषी सेनापतियोंसे इस प्रकार समयानुकूल बात कही–॥ ४२ ॥
शीघ्रं भेरीनिनादेन स्फुटं कोणाहतेन मे । समानयध्वं सैन्यानि वक्तव्यं च न कारणम् ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘तुम सब लोग शीघ्र ही डंडेसे पीट-पीटकर धौंसा बजाते हुए समस्त सैनिकोंको एकत्र करो; परंतु उन्हें इसका कारण नहीं बताना चाहिये’ ॥ ४३ ॥
ततस्तथेति प्रतिगृह्य तद्वच- स्तदैव दूताः सहसा महद् बलम् । समानयंश्चैव समागतं च न्यवेदयन् भर्तरि युद्धकाङ्क्षिणि ॥ ४४ ॥
भावार्थ
तब दूतोंने ‘तथास्तु’ कहकर रावणकी आज्ञा स्वीकार की और उसी समय सहसा विशाल सेनाको एकत्र कर दिया; फिर युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले अपने स्वामीको यह सूचना दी कि ‘सारी सेना आ गयी’ ॥ ४४ ॥
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