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युद्धकाण्ड, सर्ग 31

ततस्तमक्षोभ्यबलं लङ्कायां नृपतेश्चराः । सुवेले राघवं शैले निविष्टं प्रत्यवेदयन् ॥ १ ॥ चाराणां रावणः श्रुत्वा प्राप्तं रामं महाबलम् । जातोद्वेगोऽभवत् किंचित् सचिवानिदमब्रवीत् ॥ २ ॥

भावार्थ

राक्षसराज रावणके गुप्तचरोंने जब लङ्कामें लौटकर यह बताया कि श्रीरामचन्द्रजीकी सेना सुवेल पर्वतपर आकर ठहरी है और उसपर विजय पाना असम्भव है, तब उन गुप्तचरोंकी बात सुनकर और महाबली श्रीराम आ गये, यह जानकर रावणको कुछ उद्वेग हुआ । उसने अपने मन्त्रियोंसे इस प्रकार कहा—॥ १-२ ॥

मन्त्रिणः शीघ्रमायान्तु सर्वे वै सुसमाहिताः । अयं नो मन्त्रकालो हि सम्प्राप्त इति राक्षसाः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘मेरे सभी मन्त्री एकाग्रचित्त होकर शीघ्र यहाँ आ जायँ । राक्षसो ! यह हमारे लिये गुप्त मन्त्रणा करनेका अवसर आ गया है’ ॥ ३ ॥

तस्य तच्छासनं श्रुत्वा मन्त्रिणोऽभ्यागमन् द्रुतम् । ततः स मन्त्रयामास राक्षसैः सचिवैः सह ॥ ४ ॥

भावार्थ

रावणका आदेश सुनकर समस्त मन्त्री शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ गये । तब रावणने उन राक्षसजातीय सचिवोंके साथ बैठकर आवश्यक कर्तव्यपर विचार किया ॥ ४ ॥

मन्त्रयित्वा तु दुर्धर्षः क्षमं यत् तदनन्तरम् । विसर्जयित्वा सचिवान् प्रविवेश स्वमालयम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

दुर्धर्ष वीर रावणने जो उचित कर्तव्य था, उसके विषयमें शीघ्र ही विचार-विमर्श करके उन सचिवोंको विदा कर दिया और अपने भवनमें प्रवेश किया ॥ ५ ॥

ततो राक्षसमादाय विद्युज्जिह्वं महाबलम् । मायाविनं महामायं प्राविशद् यत्र मैथिली ॥ ६ ॥

भावार्थ

फिर उसने महाबली, महामायावी, मायाविशारद राक्षस विद्युज्जिह्वको साथ लेकर उस प्रमदावनमें प्रवेश किया, जहाँ मिथिलेशकुमारी सीता विद्यमान थीं ॥ ६ ॥

विद्युज्जिह्वं च मायाज्ञमब्रवीद् राक्षसाधिपः । मोहयिष्यावहे सीतां मायया जनकात्मजाम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

उस समय राक्षसराज रावणने माया जाननेवाले विद्युज्जिह्वसे कहा—‘हम दोनों मायाद्वारा जनकनन्दिनी सीताको मोहित करेंगे ॥ ७ ॥

शिरो मायामयं गृह्य राघवस्य निशाचर । मां त्वं समुपतिष्ठस्व महच्च सशरं धनुः ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘निशाचर ! तुम श्रीरामचन्द्रजीका मायानिर्मित मस्तक लेकर एक महान् धनुष-बाणके साथ मेरे पास आओ’ ॥८॥

एवमुक्तस्तथेत्याह विद्युज्जिह्वो निशाचरः । दर्शयामास तां मायां सुप्रयुक्तां स रावणे ॥ ९ ॥

भावार्थ

रावणकी यह आज्ञा पाकर निशाचर विद्युज्जिह्वने कहा—‘बहुत अच्छा’ । फिर उसने रावणको बड़ी कुशलतासे प्रकट की हुई अपनी माया दिखायी ॥ ९ ॥

तस्य तुष्टोऽभवद् राजा प्रददौ च विभूषणम् । अशोकवनिकायां च सीतादर्शनलालसः ॥ १० ॥ नैर्ऋतानामधिपतिः संविवेश महाबलः । ततो दीनामदैन्यार्हां ददर्श धनदानुजः ॥ ११ ॥ अधोमुखीं शोकपरामुपविष्टां महीतले । भर्तारं समनुध्यान्तीमशोकवनिकां गताम् ॥ १२ ॥

भावार्थ

इससे राजा रावण उसपर बहुत प्रसन्न हुआ और उसे अपना आभूषण उतारकर दे दिया । फिर वह महाबली राक्षसराज सीताजीको देखनेके लिये अशोकवाटिकामें गया ॥ कुबेरके छोटे भाई रावणने वहाँ सीताको दीन दशामें पड़ी देखा, जो उस दीनताके योग्य नहीं थीं । वे अशोकवाटिकामें रहकर भी शोकमग्न थीं और सिर नीचा किये पृथ्वीपर बैठकर अपने पतिदेवका चिन्तन कर रही थीं॥११-१२॥

उपास्यमानां घोराभी राक्षसीभिर्दूरतः । उपसृत्य ततः सीतां प्रहर्षं नाम कीर्तयन् ॥ १३ ॥ इदं च वचनं धृष्टमुवाच जनकात्मजाम् ।

भावार्थ

उनके आसपास बहुत-सी भयंकर राक्षसियाँ बैठी थीं । रावणने बड़े हर्षके साथ अपना नाम बताते हुए जनककिशोरी सीताके पास जाकर धृष्टतापूर्ण वचनोंमें कहा—॥ १३½ ॥

सान्त्व्यमाना मया भद्रे यमाश्रित्य विमन्यसे ॥ १४ ॥ खरहन्ता स ते भर्ता राघवः समरे हतः ।

भावार्थ

‘भद्रे ! मेरे बार-बार सान्त्वना देने और प्रार्थना करनेपर भी तुम जिनका आश्रय लेकर मेरी बात नहीं मानती थीं, खरका वध करनेवाले वे तुम्हारे पतिदेव श्रीराम समरभूमिमें मारे गये ॥ १४½ ॥

छिन्नं ते सर्वथा मूलं दर्पश्च निहतो मया ॥ १५॥ व्यसनेनात्मनः सीते मम भार्या भविष्यसि । विसृजैतां मतिं मूढे किं मृतेन करिष्यसि ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘तुम्हारी जो जड़ थी, सर्वथा कट गयी । तुम्हारे दर्पको मैंने चूर्ण कर दिया । अब अपने ऊपर आये हुए इस संकटसे ही विवश होकर तुम स्वयं मेरी भार्या बन जाओगी । मूढ़ सीते ! अब यह रामविषयक चिन्तन छोड़ दो । उस मरे हुए रामको लेकर क्या करोगी ॥ १५-१६ ॥

भवस्व भद्रे भार्याणां सर्वासामीश्वरी मम । अल्पपुण्ये निवृत्तार्थे मूढे पण्डितमानिनि । शृणु भर्तृवधं सीते घोरं वृत्रवधं यथा ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘भद्रे ! मेरी सब रानियोंकी स्वामिनी बन जाओ । मूढे ! तुम अपनेको बड़ी बुद्धिमती समझती थी न । तुम्हारा पुण्य बहुत कम हो गया था । इसीलिये ऐसा हुआ है । अब रामके मारे जानेसे तुम्हारा जो उनकी प्राप्तिरूप प्रयोजन था, वह समाप्त हो गया । सीते ! यदि सुनना चाहो तो वृत्रासुरके वधकी भयंकर घटनाके समान अपने पतिके मारे जानेका घोर समाचार सुन लो ॥ १७ ॥

समायातः समुद्रान्तं हन्तुं मां किल राघवः । वानरेन्द्रप्रणीतेन बलेन महता वृतः ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘कहा जाता है राम मुझे मारनेके लिये समुद्रके किनारेतक आये थे । उनके साथ वानरराज सुग्रीवकी लायी हुई विशाल सेना भी थी ॥१८॥

संनिविष्टः समुद्रस्य पीड्य तीरमथोत्तरम् । बलेन महता रामो व्रजत्यस्तं दिवाकरे ॥ १९ ॥ अथाध्वनि परिश्रान्तमर्धरात्रे स्थितं बलम् । सुखसुप्तं समासाद्य चरितं प्रथमं चरैः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘उस विशाल सेनाके द्वारा राम समुद्रके उत्तर तटको दबाकर ठहरे । उस समय सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये थे ॥ ‘जब आधी रात हुई, उस समय रास्तेकी थकी-माँदी सारी सेना सुखपूर्वक सो गयी थी । उस अवस्थामें वहाँ पहुँचकर मेरे गुप्तचरोंने पहले तो उसका भलीभाँति निरीक्षण किया ॥ २० ॥

तत्प्रहस्तप्रणीतेन बलेन महता मम । बलमस्य हतं रात्रौ यत्र रामः सलक्ष्मणः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘फिर प्रहस्तके सेनापतित्वमें वहाँ गयी हुई मेरी बहुत बड़ी सेनाने रातमें, जहाँ राम और लक्ष्मण थे, उस वानर-सेनाको नष्ट कर दिया ॥ २१ ॥

पट्टिशान् परिघांश्चक्रानृष्टीन् दण्डान् महायुधान् । बाणजालानि शूलानि भास्वरान् कूटमुद्गरान् ॥ २२ ॥ यष्टीश्च तोमरान् प्रासांश्चक्राणि मुसलानि च । उद्यम्योद्यम्य रक्षोभिर्वानरेषु निपातिताः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘उस समय राक्षसोंने पट्टिश, परिघ, चक्र, ऋष्टि, दण्ड, बड़े-बड़े आयुध, बाणोंके समूह, त्रिशूल; चमकीले कूट और मुद्गर, डंडे, तोमर, प्रास तथा मूसल उठा-उठाकर वानरोंपर प्रहार किया था ॥ २२-२३ ॥

अथ सुप्तस्य रामस्य प्रहस्तेन प्रमाथिना । असक्तं कृतहस्तेन शिरश्छिन्नं महासिना ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘तदनन्तर शत्रुओंको मथ डालनेवाले प्रहस्तने, जिसके हाथ खूब सधे हुए हैं, बहुत बड़ी तलवार हाथमें लेकर उससे बिना किसी रुकावटके रामका मस्तक काट डाला ॥ २४ ॥

विभीषणः समुत्पत्य निगृहीतो यदृच्छया । दिशः प्रव्राजितः सैन्यैर्लक्ष्मणः प्लवगैः सह ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘फिर अकस्मात् उछलकर उसने विभीषणको पकड़ लिया और वानरसैनिकोंसहित लक्ष्मणको विभिन्न दिशाओंमें भाग जानेको विवश किया ॥ २५ ॥

सुग्रीवो ग्रीवया सीते भग्नया प्लवगाधिपः । निरस्तहनुकः सीते हनूमान् राक्षसैर्हतः ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘सीते ! वानरराज सुग्रीवकी ग्रीवा काट दी गयी, हनुमान्की हनु ( ठोढ़ी ) नष्ट करके उसे राक्षसोंने मार डाला ॥ २६ ॥

जाम्बवानथ जानुभ्यामुत्पतन् निहतो युधि । पट्टिशैर्बहुभिश्छिन्नो निकृत्तः पादपो यथा ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘जाम्बवान् ऊपरको उछल रहे थे, उसी समय युद्धस्थलमें राक्षसोंने बहुत-से पट्टिशोंद्वारा उनके दोनों घुटनोंपर प्रहार किया। वे छिन्न-भिन्न होकर कटे हुए पेड़की भाँति धराशायी हो गये ॥ २७ ॥

मैन्दश्च द्विविदश्चोभौ तौ वानरवर्षभौ । निःश्वसन्तौ रुदन्तौ च रुधिरेण परिप्लुतौ ॥ २८ ॥ असिना व्यायतौ छिन्नौ मध्ये हारिनिषूदनौ ।

भावार्थ

‘मैन्द और द्विविद दोनों श्रेष्ठ वानर खूनसे लथपथ होकर पड़े हैं । वे लंबी साँसें खींचते और रोते थे । उसी अवस्थामें उन दोनों विशालकाय शत्रुसूदन वानरोंको तलवारद्वारा बीचसे ही काट डाला गया है ॥ २८३ ॥

अनुश्वसिति मेदिन्यां पनसः पनसो यथा ॥ २९ ॥ नाराचैर्बहुभिश्छिन्नः शेते दर्यां दरीमुखः । कुमुदस्तु महातेजा निष्कूजन् सायकैर्हतः ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘पनस नामका वानर पककर फटे हुए पनस ( कटहल ) के समान पृथ्वीपर पड़ा-पड़ा अन्तिम साँसें ले रहा है। दरीमुख अनेक नाराचोंसे छिन्न-भिन्न हो किसी दरी ( कन्दरा ) में पड़ा सो रहा है । महातेजस्वी कुमुद सायकोंसे घायल हो चीखता-चिल्लाता हुआ मर गया ॥ २९-३० ॥

अङ्गदो बहुभिश्छिन्नः शरैरासाद्य राक्षसैः । परितो रुधिरोद्गारी क्षितौ निपतितोऽङ्गदः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘अङ्गदधारी अङ्गदपर आक्रमण करके बहुत-से राक्षसोंने उन्हें बाणोंद्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया है । वे सब अङ्गोंसे रक्त बहाते हुए पृथ्वीपर पड़े हैं ॥ ३१ ॥

हरयो मथिता नागै रथजालैस्तथापरे । शयाना मृदितास्तत्र वायुवेगैरिवाम्बुदाः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘जैसे बादल वायुके वेगसे फट जाते हैं, उसी प्रकार बड़े-बड़े हाथियों तथा रथसमूहोंने वहाँ सोये हुए वानरोंको रौंदकर मथ डाला ॥ ३२ ॥

प्रसृताश्च परे त्रस्ता हन्यमाना जघन्यतः । अनुद्रुतास्तु रक्षोभिः सिंहैरिव महाद्विपाः ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘जैसे सिंहके खदेड़नेसे बड़े-बड़े हाथी भागते हैं, उसी प्रकार राक्षसोंके पीछा करनेपर बहुत-से वानर पीठपर बाणोंकी मार खाते हुए भाग गये हैं ॥ ३३ ॥

सागरे पतिताः केचित् केचिद् गगनमाश्रिताः । ऋक्षा वृक्षानुपारूढा वानरीं वृत्तिमाश्रिताः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘कोई समुद्रमें कूद पड़े और कोई आकाशमें उड़ गये हैं । बहुत-से रीछ वानरी वृत्तिका आश्रय ले पेड़ोंपर चढ़ गये हैं ॥ ३४ ॥

सागरस्य च तीरेषु शैलेषु च वनेषु च । पिङ्गलास्ते विरूपाक्षै राक्षसैर्बहवो हताः ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘विकराल नेत्रोंवाले राक्षसोंने इन बहुसंख्यक भूरे बंदरोंको समुद्रतट, पर्वत और वनोंमें खदेड़-खदेड़कर मार डाला है ॥ ३५ ॥

एवं तव हतो भर्ता ससैन्यो मम सेनया । क्षतजार्द्रं रजोध्वस्तमिदं चास्याहृतं शिरः ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘इस प्रकार मेरी सेनाने सैनिकोंसहित तुम्हारे पतिको मौतके घाट उतार दिया । खूनसे भीगा और धूलमें सना हुआ उनका यह मस्तक यहाँ लाया गया है’ ॥ ३६ ॥

ततः परमदुर्धर्षो रावणो राक्षसेश्वरः । सीतायामुपशृण्वत्यां राक्षसीमिदमब्रवीत् ॥ ३७ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर अत्यन्त दुर्जय राक्षसराज रावणने सीताके सुनते-सुनते एक राक्षसीसे कहा—॥ ३७ ॥

राक्षसं क्रूरकर्माणं विद्युज्जिह्वं समानय । येन तद्राघवशिरः संग्रामात् स्वयमाहृतम् ॥ ३८ ॥

भावार्थ

‘तुम क्रूरकर्मा राक्षस विद्युज्जिह्वको बुला ले आओ, जो स्वयं संग्रामभूमिसे रामका सिर यहाँ ले आया है’ ॥ ३८ ॥

विद्युज्जिह्वस्तदा गृह्य शिरस्तत्सशरासनम् । प्रणामं शिरसा कृत्वा रावणस्याग्रतः स्थितः ॥ ३९ ॥ तमब्रवीत् ततो राजा रावणो राक्षसं स्थितम् । विद्युज्जिह्वं महाजिह्वं समीपपरिवर्तिनम् ॥ ४० ॥

भावार्थ

तब विद्युज्जिह्व धनुषसहित उस मस्तकको लेकर आया और सिर झुका रावणको प्रणाम करके उसके सामने खड़ा हो गया । उस समय अपने पास खड़े हुए विशाल जिह्वावाले राक्षस विद्युज्जिह्वसे राजा रावण यों बोला—॥ ३९-४० ॥

अग्रतः कुरु सीतायाः शीघ्रं दाशरथेः शिरः । अवस्थां पश्चिमां भर्तुः कृपणा साधु पश्यतु ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘तुम दशरथकुमार रामका मस्तक शीघ्र ही सीताके आगे रख दो, जिससे यह बेचारी अपने पतिकी अन्तिम अवस्थाका अच्छी तरह दर्शन कर ले’ ॥ ४१ ॥

एवमुक्तं तु तद् रक्षः शिरस्तत् प्रियदर्शनम् । उपनिक्षिप्य सीतायाः क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ ४२ ॥

भावार्थ

रावणके ऐसा कहनेपर वह राक्षस उस सुन्दर मस्तकको सीताके निकट रखकर तत्काल अदृश्य हो गया ॥ ४२ ॥

रावणश्चापि चिक्षेप भास्वरं कार्मुकं महत् । त्रिषु लोकेषु विख्यातं रामस्यैतदिति ब्रुवन् ॥ ४३ ॥

भावार्थ

रावणने भी उस विशाल चमकीले धनुषको यह कहकर सीताके सामने डाल दिया कि यही रामका त्रिभुवनविख्यात धनुष है ॥ ४३ ॥

इदं तत् तव रामस्य कार्मुकं ज्यासमावृतम् । इह प्रहस्तेनानीतं तं हत्वा निशि मानुषम् ॥ ४४ ॥

भावार्थ

फिर बोला—‘सीते ! यही तुम्हारे रामका प्रत्यञ्चासहित धनुष है । रातके समय उस मनुष्यको मारकर प्रहस्त इस धनुषको यहाँ ले आया है’ ॥ ४४ ॥

स विद्युज्जिह्वेन सहैव तच्छिरो धनुश्च भूमौ विनिकीर्यमाणः । विदेहराजस्य सुतां यशस्विनीं ततोऽब्रवीत् तां भव मे वशानुगा ॥ ४५ ॥

भावार्थ

जब विद्युज्जिह्वने मस्तक वहाँ रक्खा, उसके साथ ही रावणने वह धनुष पृथ्वीपर डाल दिया । तत्पश्चात् वह विदेहराजकुमारी यशस्विनी सीतासे बोला—‘अब तुम मेरे वशमें हो जाओ’ ॥ ४५ ॥

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