युद्धकाण्ड, सर्ग 30
ततस्तमक्षोभ्यबलं लङ्काधिपतये चराः । सुवेले राघवं शैले निविष्टं प्रत्यवेदयन् ॥ १ ॥
भावार्थ
गुप्तचरोंने लङ्कापति रावणको यह बताया कि श्रीरामचन्द्रजीकी सेना सुवेल पर्वतके पास आकर ठहरी है और वह सर्वथा अजेय है ॥ १ ॥
चाराणां रावणः श्रुत्वा प्राप्तं रामं महाबलम् । जातोद्वेगोऽभवत् किंचिच्छार्दूलं वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥ अयथावच्च ते वर्णो दीनश्चासि निशाचर । नासि कच्चिदमित्राणां क्रुद्धानां वशमागतः ॥ ३ ॥
भावार्थ
गुप्तचरोंके मुँहसे यह सुनकर कि महाबली श्रीराम आ पहुँचे हैं, रावणको कुछ भय हो गया। वह शार्दूलसे बोला—॥ ‘निशाचर ! तुम्हारे शरीरकी कान्ति पहले-जैसी नहीं रह गयी है । तुम दीन ( दुखी ) दिखायी दे रहे हो । कहीं कुपित हुए शत्रुओंके वशमें तो नहीं पड़ गये थे ?’ ॥ ३ ॥
इति तेनानुशिष्टस्तु वाचं मन्दमुदीरयन् । तदा राक्षसशार्दूलं शार्दूलो भयविक्लवः ॥ ४ ॥
भावार्थ
उसके इस प्रकार पूछनेपर भयसे घबराये हुए शार्दूलने राक्षसप्रवर रावणसे मन्द स्वरमें कहा—॥ ४ ॥
न ते चारयितुं शक्या राजन् वानरपुङ्गवाः । विक्रान्ता बलवन्तश्च राघवेण च रक्षिताः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! उन श्रेष्ठ वानरोंकी गति-विधिका पता गुप्तचरोंद्वारा नहीं लगाया जा सकता । वे बड़े पराक्रमी, बलवान् तथा श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा सुरक्षित हैं ॥ ५ ॥
नापि सम्भाषितुं शक्याः सम्प्रश्नोऽत्र न लभ्यते । सर्वतो रक्ष्यते पन्था वानरैः पर्वतोपमैः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘उनसे वार्तालाप करना भी असम्भव है; अतः ‘आप कौन हैं, आपका क्या विचार है’ इत्यादि प्रश्नोंके लिये वहाँ अवकाश ही नहीं मिलता । पर्वतोंके समान विशालकाय वानर सब ओरसे मार्गकी रक्षा करते हैं; अतः वहाँ प्रवेश होना भी कठिन ही है ॥ ६ ॥
प्रविष्टमात्रे ज्ञातोऽहं बले तस्मिन् विचारिते । बलाद् गृहीतो रक्षोभिर्बहुधास्मि विचारितः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘उस सेनामें प्रवेश करके ज्यों ही उसकी गतिविधिका विचार करना आरम्भ किया, त्यों ही विभीषणके साथी राक्षसोंने मुझे पहचानकर बलपूर्वक पकड़ लिया और बारंबार इधर-उधर घुमाया ॥ ७ ॥
जानुभिर्मुष्टिभिर्दन्तैस्तलैश्चाभिहतो भृशम् । परिणीतोऽस्मि हरिभिर्बलमध्ये अमर्षणैः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘उस सेनाके बीच अमर्षसे भरे हुए वानरोंने घुटनों, मुक्कों, दाँतों और थप्पड़ोंसे मुझे बहुत मारा और सारी सेनामें मेरे अपराधकी घोषणा करते हुए सब ओर मुझे घुमाया ॥ ८ ॥
परिणीय च सर्वत्र नीतोऽहं रामसंसदि । रुधिरस्राविदीनाङ्गो विह्वलश्चलितेन्द्रियः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘सर्वत्र घुमाकर मुझे श्रीरामके दरबारमें ले जाया गया । उस समय मेरे शरीरसे खून निकल रहा था और अङ्ग-अङ्गमें दीनता छा रही थी । मैं व्याकुल हो गया था । मेरी इन्द्रियाँ विचलित हो रही थीं ॥ ९ ॥
हरिभिर्वध्यमानश्च याचमानः कृताञ्जलिः । राघवेण परित्रातो मा मेति च यदृच्छया ॥ १० ॥
भावार्थ
‘वानर पीट रहे थे और मैं हाथ जोड़कर रक्षाके लिये याचना कर रहा था । उस दशामें श्रीरामने अकस्मात् ‘मत मारो, मत मारो’ कहकर मेरी रक्षा की ॥ १० ॥
एष शैलशिलाभिस्तु पूरयित्वा महार्णवम् । द्वारमाश्रित्य लङ्काया रामस्तिष्ठति सायुधः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम पर्वतीय शिलाखण्डोंद्वारा समुद्रको पाटकर लङ्काके दरवाजेपर आ धमके हैं और हाथमें धनुष लिये खड़े हैं ॥ ११ ॥
गरुडव्यूहमास्थाय सर्वतो हरिभिर्वृतः । मां विसृज्य महातेजा लङ्कामेवातिवर्तते ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘वे महातेजस्वी रघुनाथजी गरुड़व्यूहका आश्रय ले वानरोंके बीचमें विराजमान हैं और मुझे विदा करके वे लङ्कापर चढ़े चले आ रहे हैं ॥ १२ ॥
पुरा प्राकारमायाति क्षिप्रमेकतरं कुरु । सीतां वापि प्रयच्छाशु युद्धं वापि प्रदीयताम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘जबतक वे लङ्काके परकोटेतक पहुँचें, उसके पहले ही आप शीघ्रतापूर्वक दोनोंसे एक काम अवश्य कर डालिये—या तो उन्हें सीताजीको लौटा दीजिये या युद्धस्थलमें खड़े होकर उनका सामना कीजिये’ ॥ १३ ॥
मनसा तत् तदा प्रेक्ष्य तच्छ्रुत्वा राक्षसाधिपः । शार्दूलं सुमहद्वाक्यमथोवाच स रावणः ॥ १४ ॥
भावार्थ
उसकी बात सुनकर मन-ही-मन उसपर विचार करनेके पश्चात् राक्षसराज रावणने शार्दूलसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही—॥ १४ ॥
यदि मां प्रतियुध्यन्ते देवगन्धर्वदानवाः । नैव सीतां प्रदास्यामि सर्वलोकभयादपि ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘यदि देवता, गन्धर्व और दानव मुझसे युद्ध करें और सम्पूर्ण लोक मुझे भय देने लगे तो भी मैं सीताको नहीं लौटाऊँगा’ ॥ १५ ॥
एवमुक्त्वा महातेजा रावणः पुनरब्रवीत् । चरिता भवता सेना केऽत्र शूराः प्लवंगमाः ॥ १६ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर महातेजस्वी रावण फिर बोला—‘तुम तो वानरोंकी सेनामें विचरण कर चुके हो; उसमें कौन-कौन-से वानर अधिक शूरवीर हैं ? ॥ १६ ॥
किंप्रभाः कीदृशाः सौम्य वानरा ये दुरासदाः । कस्य पुत्राश्च पौत्राश्च तत्त्वमाख्याहि राक्षस ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! जो दुर्जय वानर हैं, वे कैसे हैं ? उनका प्रभाव कैसा है ? तथा वे किसके पुत्र और पौत्र हैं ? राक्षस ! ये सब बातें ठीक-ठीक बताओ ॥ १७ ॥
तथात्र प्रतिपत्स्यामि ज्ञात्वा तेषां बलाबलम् । अवश्यं खलु संख्यानं कर्तव्यं युद्धमिच्छता ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘उन वानरोंका बलाबल जानकर तदनुसार कर्तव्यका निश्चय करूँगा । युद्धकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको अपने तथा शत्रुपक्षकी सेनाकी गणना—उसके विषयकी आवश्यक जानकारी अवश्य करनी चाहिये’ ॥ १८ ॥
अथैवमुक्तः शार्दूलो रावणेनोत्तमश्चरः । इदं वचनमारेभे वक्तुं रावणसंनिधौ ॥ १९ ॥
भावार्थ
रावणके इस प्रकार पूछनेपर श्रेष्ठ गुप्तचर शार्दूलने उसके समीप यों कहना आरम्भ किया—॥ १९ ॥
अथर्क्षरजसः पुत्रो युधि राजन् सुदुर्जयः । गद्गदस्याथ पुत्रोऽत्र जाम्बवानिति विश्रुतः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘राजन् ! उस वानरसेनामें जाम्बवान् नामसे प्रसिद्ध एक वीर है, जिसको युद्धमें परास्त करना बहुत ही कठिन है । वह ऋक्षरजा तथा गद्गदका पुत्र है ॥ २० ॥
गद्गदस्याथ पुत्रोऽन्यो गुरुपुत्रः शतक्रतोः । कदनं यस्य पुत्रेण कृतमेकेन रक्षसाम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘गद्गदका एक दूसरा पुत्र भी है ( जिसका नाम धूम्र है ) । इन्द्रके गुरु बृहस्पतिका पुत्र केसरी है, जिसके पुत्र हनुमान्ने अकेले ही यहाँ आकर पहले बहुत-से राक्षसोंका संहार कर डाला था ॥ २१ ॥
सुषेणश्चात्र धर्मात्मा पुत्रो धर्मस्य वीर्यवान् । सौम्यः सोमात्मजश्चात्र राजन् दधिमुखः कपिः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘धर्मात्मा और पराक्रमी सुषेण धर्मका पुत्र है । राजन् ! दधिमुख नामक सौम्य वानर चन्द्रमाका बेटा है ॥ २२ ॥
सुमुखो दुर्मुखश्चात्र वेगदर्शी च वानरः । मृत्युर्वानररूपेण नूनं सृष्टः स्वयंभुवा ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘सुमुख, दुर्मुख और वेगदर्शी नामक वानर—ये मृत्युके पुत्र हैं । निश्चय ही स्वयम्भू ब्रह्माने मृत्युकी ही इन वानरोंके रूपमें सृष्टि की है ॥ २३ ॥
पुत्रो हुतवहस्यात्र नीलः सेनापतिः स्वयम् । अनिलस्य तु पुत्रोऽत्र हनूमानिति विश्रुतः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘स्वयं सेनापति नील अग्निका पुत्र है । सुविख्यात वीर हनुमान् वायुका बेटा है ॥ २४ ॥
नप्ता शक्रस्य दुर्धर्षो बलवानङ्गदो युवा । मैन्दश्च द्विविदश्चोभौ बलिनावश्विसम्भवौ ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘बलवान् एवं दुर्जय वीर अङ्गद इन्द्रका नाती है । वह अभी नौजवान है । बलवान् वानर मैन्द और द्विविद—ये दोनों अश्विनीकुमारोंके पुत्र हैं ॥ २५ ॥
पुत्रा वैवस्वतस्याथ पञ्च कालान्तकोपमाः । गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन—ये पाँच यमराजके पुत्र हैं और काल एवं अन्तकके समान पराक्रमी हैं ॥ २६ ॥
दश वानरकोट्यश्च शूराणां युद्धकाङ्क्षिणाम् । श्रीमतां देवपुत्राणां शेषं नाख्यातुमुत्सहे ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार देवताओंसे उत्पन्न हुए तेजस्वी शूरवीर वानरोंकी संख्या दस करोड़ है । वे सब-के-सब युद्धकी इच्छा रखनेवाले हैं । इनके अतिरिक्त जो शेष वानर हैं, उनके विषयमें मैं कुछ नहीं कह सकता; क्योंकि उनकी गणना असम्भव है ॥ २७ ॥
पुत्रो दशरथस्यैष सिंहसंहननो युवा । दूषणो निहतो येन खरश्च त्रिशिरास्तथा ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘दशरथनन्दन श्रीरामका श्रीविग्रह सिंहके समान सुगठित है । इनकी युवावस्था है । इन्होंने अकेले ही खर-दूषण और त्रिशिराका संहार किया था ॥ २८ ॥
नास्ति रामस्य सदृशो विक्रमे भुवि कश्चन । विराधो निहतो येन कबन्धश्चान्तकोपमः ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘इस भूमण्डलमें श्रीरामचन्द्रजीके समान पराक्रमी वीर दूसरा कोई नहीं है । इन्होंने ही विराधका और कालके समान विकराल कबन्धका भी वध किया था ॥ २९ ॥
वक्तुं न शक्तो रामस्य गुणान् कश्चिन्नरः क्षितौ । जनस्थानगता येन तावन्तो राक्षसा हताः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘इस भूतलपर कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है, जो श्रीरामके गुणोंका पूर्णरूपसे वर्णन कर सके । श्रीरामने ही जनस्थानमें उतने राक्षसोंका संहार किया था ॥ ३० ॥
लक्ष्मणश्चात्र धर्मात्मा मातंगानामिवर्षभः । यस्य बाणपथं प्राप्य न जीवेदपि वासवः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘धर्मात्मा लक्ष्मण भी श्रेष्ठ गजराजके समान पराक्रमी हैं, उनके बाणोंका निशाना बन जानेपर देवराज इन्द्र भी जीवित नहीं रह सकते ॥ ३१ ॥
श्वेतो ज्योतिर्मुखश्चात्र भास्करस्यात्मसम्भवौ । वरुणस्याथ पुत्रोऽथ हेमकूटः प्लवंगमः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘इनके सिवा उस सेनामें श्वेत और ज्योतिर्मुख—ये दो वानर भगवान् सूर्यके औरस पुत्र हैं । हेमकूट नामका वानर वरुणका पुत्र बताया जाता है ॥ ३२ ॥
विश्वकर्मसुतो वीरो नलः प्लवगसत्तमः । विक्रान्तो वेगवानत्र वसुपुत्रः स दुर्धरः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘वानरशिरोमणि वीरवर नल विश्वकर्माके पुत्र हैं । वेगशाली और पराक्रमी दुर्धर वसु देवताका पुत्र है ॥ ३३ ॥
राक्षसानां वरिष्ठश्च तव भ्राता विभीषणः । प्रतिगृह्य पुरीं लङ्कां राघवस्य हिते रतः ॥ ३४ ॥ इति सर्वं समाख्यातं तथा वै वानरं बलम् । सुवेलेऽधिष्ठितं शैले शेषकार्ये भवान् गतिः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘आपके भाई राक्षसशिरोमणि विभीषण भी लङ्कापुरीका राज्य लेकर श्रीरघुनाथजीके ही हितसाधनमें तत्पर रहते हैं ॥ ‘इस प्रकार मैंने सुवेल पर्वतपर ठहरी हुई वानर-सेनाका पूरा-पूरा वर्णन कर दिया । अब जो शेष कार्य है, वह आपके ही हाथ है’* ॥ ३५ ॥
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