युद्धकाण्ड, सर्ग 29
शुकेन तु समादिष्टान् दृष्ट्वा स हरियूथपान् । लक्ष्मणं च महावीर्यं भुजं रामस्य दक्षिणम् ॥ १ ॥ समीपस्थं च रामस्य भ्रातरं च विभीषणम् । सर्ववानरराजं च सुग्रीवं भीमविक्रमम् ॥ २ ॥ अङ्गदं चापि बलिनं वज्रहस्तात्मजात्मजम् । हनूमन्तं च विक्रान्तं जाम्बवन्तं च दुर्जयम् ॥ ३ ॥ सुषेणं कुमुदं नीलं नलं च प्लवगर्षभम् । गजं गवाक्षं शरभं मैन्दं च द्विविदं तथा ॥ ४ ॥
भावार्थ
शुकके बताये अनुसार रावणने समस्त यूथपतियोंको देखकर श्रीरामकी दाहिनी बाँह महापराक्रमी लक्ष्मणको, श्रीरामके निकट बैठे हुए अपने भाई विभीषणको, समस्त वानरोंके राजा भयंकर पराक्रमी सुग्रीवको, इन्द्रपुत्र वालीके बेटे बलवान् अङ्गदको, बल-विक्रमशाली हनुमान्को, दुर्जय वीर जाम्बवान्को तथा सुषेण, कुमुद, नील, वानरश्रेष्ठ नल, गज, गवाक्ष, शरभ, मैन्द एवं द्विविदको भी देखा ॥ १—४ ॥
किंचिदाविग्नहृदयो जातक्रोधश्च रावणः । भर्त्सयामास तौ वीरौ कथान्ते शुकसारणौ ॥ ५ ॥
भावार्थ
उन सबको देखकर रावणका हृदय कुछ उद्विग्न हो उठा । उसे क्रोध आ गया और उसने बात समाप्त होनेपर वीर शुक और सारणको फटकारा ॥ ५ ॥
अधोमुखौ तौ प्रणतावब्रवीच्छुकसारणौ । रोषगद्गदया वाचा संरब्धं परुषं तथा ॥ ६ ॥
भावार्थ
बेचारे शुक और सारण विनीत भावसे नीचे मुँह किये खड़े रहे और रावणने रोषगद्गद वाणीमें क्रोधपूर्वक यह कठोर बात कही—॥ ६ ॥
न तावत् सदृशं नाम सचिवैरुपजीविभिः । विप्रियं नृपतेर्वक्तुं निग्रहे प्रग्रहे प्रभोः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘राजा निग्रह और अनुग्रह करनेमें भी समर्थ होता है । उसके सहारे जीविका चलानेवाले मन्त्रियोंको ऐसी कोई बात नहीं कहनी चाहिये, जो उसे अप्रिय लगे ॥ ७ ॥
रिपूणां प्रतिकूलानां युद्धार्थमभिवर्तताम् । उभाभ्यां सदृशं नाम वक्तुमप्रस्तवे स्तवम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘जो शत्रु अपने विरोधी हैं और युद्धके लिये सामने आये हैं, उनकी बिना किसी प्रसङ्गके ही स्तुति करना क्या तुम दोनोंके लिये उचित था ? ॥ ८ ॥
आचार्या गुरवो वृद्धा वृथा वां पर्युपासिताः । सारं यद् राजशास्त्राणामनुजीव्यं न गृह्यते ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘तुमलोगोंने आचार्य, गुरु और वृद्धोंकी व्यर्थ ही सेवा की है; क्योंकि राजनीतिका जो संग्रहणीय सार है, उसे तुम नहीं ग्रहण कर सके ॥ ९ ॥
गृहीतो वा न विज्ञातो भारोऽज्ञानस्य वाह्यते । ईदृशैः सचिवैर्युक्तो मूर्खैर्दिष्ट्या धराम्यहम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘यदि तुमने उसे ग्रहण भी किया हो तो भी इस समय तुम्हें उसका ज्ञान नहीं रह गया है—तुमने उसे भुला दिया है । तुमलोग केवल अज्ञानका बोझ ढो रहे हो। ऐसे मूर्ख मन्त्रियोंके सम्पर्कमें रहते हुए भी जो मैं अपने राज्यको सुरक्षित रख सका हूँ, यह सौभाग्यकी ही बात है ॥१०॥
किं नु मृत्योर्भयं नास्ति मां वक्तुं परुषं वचः । यस्य मे शासतो जिह्वा प्रयच्छति शुभाशुभम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘मैं इस राज्यका शासक हूँ। मेरी जिह्वा ही तुम्हें शुभ या अशुभकी प्राप्ति करा सकती है—मैं वाणीमात्रसे तुमपर निग्रह और अनुग्रह कर सकता हूँ; फिर भी तुम दोनोंने मेरे सामने कठोर बात कहनेका साहस किया । क्या तुम्हें मृत्युका भय नहीं है ?॥ ११ ॥
अप्येव दहनं स्पृष्ट्वा वने तिष्ठन्ति पादपाः । राजदण्डपरामृष्टास्तिष्ठन्ते नापराधिनः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘वनमें दावानलका स्पर्श करके भी वहाँके वृक्ष खड़े रह जायँ, यह सम्भव है; परंतु राजदण्डके अधिकारी अपराधी नहीं टिक सकते । वे सर्वथा नष्ट हो जाते हैं ॥ १२ ॥
हन्यामहं त्विमौ पापौ शत्रुपक्षप्रशंसिनौ । यदि पूर्वोपकारैर्मे क्रोधो न मृदुतां व्रजेत् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘यदि इनके पहलेके उपकारोंको याद करके मेरा क्रोध नरम न पड़ जाता तो शत्रुपक्षकी प्रशंसा करनेवाले इन दोनों पापियोंको मैं अभी मार डालता ॥ १३ ॥
अपध्वंसत नश्यध्वं संनिकर्षादितो मम । नहि वां हन्तुमिच्छामि स्मराम्युपकृतानि वाम् । हतावेव कृतघ्नौ द्वौ मयि स्नेहपराङ्मुखौ ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘अब तुम दोनों मेरी सभामें प्रवेशके अधिकारसे वञ्चित हो । मेरे पाससे चले जाओ; फिर कभी मुझे अपना मुँह न दिखाना । मैं तुम दोनोंका वध करना नहीं चाहता; क्योंकि तुम दोनोंके किये हुए उपकारोंको सदा स्मरण रखता हूँ । तुम दोनों मेरे स्नेहसे विमुख और कृतघ्न हो, अतः मरे हुएके ही समान हो’ ॥ १४ ॥
एवमुक्तौ तु सव्रीडौ तौ दृष्ट्वा शुकसारणौ । रावणं जयशब्देन प्रतिनन्द्याभिनिःसृतौ ॥ १५ ॥
भावार्थ
उसके ऐसा कहनेपर शुक और सारण बहुत लज्जित हुए और जय-जयकारके द्वारा रावणका अभिनन्दन करके वहाँसे निकल गये ॥ १५ ॥
अब्रवीच्च दशग्रीवः समीपस्थं महोदरम् । उपस्थापय मे शीघ्रं चारानिति निशाचरः । महोदरस्तथोक्तस्तु शीघ्रमाज्ञापयच्चरान् ॥ १६ ॥
भावार्थ
इसके पश्चात् दशमुख रावणने अपने पास बैठे हुए महोदरसे कहा—‘मेरे सामने शीघ्र ही गुप्तचरोंको उपस्थित होनेकी आज्ञा दो ।’ यह आदेश पाकर निशाचर महोदरने शीघ्र ही गुप्तचरोंको हाजिर होनेकी आज्ञा दी ॥ १६ ॥
ततश्चाराः संत्वरिताः प्राप्ताः पार्थिवशासनात् । उपस्थिताः प्राञ्जलयो वर्धयित्वा जयाशिषः ॥ १७ ॥
भावार्थ
राजाकी आज्ञा पाकर गुप्तचर उसी समय विजयसूचक आशीर्वाद दे हाथ जोड़े सेवामें उपस्थित हुए ॥ १७ ॥
तानब्रवीत् ततो वाक्यं रावणो राक्षसाधिपः । चारान् प्रत्यायिकाञ्शूरान् धीरान् विगतसाध्वसान् ॥१८॥
भावार्थ
वे सभी गुप्तचर विश्वासपात्र, शूरवीर, धीर एवं निर्भय थे । राक्षसराज रावणने उनसे यह बात कही—॥ १८ ॥
इतो गच्छत रामस्य व्यवसायं परीक्षितुम् । मन्त्रेष्वभ्यन्तरा येऽस्य प्रीत्या तेन समागताः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘तुमलोग अभी वानरसेनामें रामका क्या निश्चय है, यह जाननेके लिये तथा गुप्तमन्त्रणामें भाग लेनेवाले जो उनके अन्तरङ्ग मन्त्री हैं और जो लोग प्रेमपूर्वक उनसे मिले हैं—उनके मित्र हो गये हैं; उन सबके भी निश्चित विचार क्या हैं, इसकी जाँच करनेके लिये यहाँसे जाओ ॥१९॥
कथं स्वपिति जागर्ति किमद्य च करिष्यति । विज्ञाय निपुणं सर्वमागन्तव्यमशेषतः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘वे कैसे सोते हैं ? किस तरह जागते हैं और आज क्या करेंगे ?—इन सब बातोंका पूर्णरूपसे अच्छी तरह पता लगाकर लौट आओ ॥ २० ॥
चारेण विदितः शत्रुः पण्डितैर्वसुधाधिपैः । युद्धे स्वल्पेन यत्नेन समासाद्य निरस्यते ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘गुप्तचरके द्वारा यदि शत्रुकी गति-विधिका पता चल जाय तो बुद्धिमान् राजा थोड़े-से ही प्रयत्नके द्वारा युद्धमें उसे घर दबाते और मार भगाते हैं’ ॥ २१ ॥
चारास्तु ते तथेत्युक्त्वा प्रहृष्टा राक्षसेश्वरम् । शार्दूलमग्रतः कृत्वा ततश्चक्रुः प्रदक्षिणम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर हर्षमें भरे हुए गुप्तचरोंने शार्दूलको आगे करके राक्षसराज रावणकी परिक्रमा की ॥२२॥
ततस्तं तु महात्मानं चारा राक्षससत्तमम् । कृत्वा प्रदक्षिणं जग्मुर्यत्र रामः सलक्ष्मणः ॥ २३ ॥
भावार्थ
इस प्रकार वे गुप्तचर राक्षसशिरोमणि महाकाय रावणकी परिक्रमा करके उस स्थानपर गये, जहाँ लक्ष्मणसहित श्रीराम विराजमान थे ॥ २३ ॥
ते सुवेलस्य शैलस्य समीपे रामलक्ष्मणौ । प्रच्छन्ना ददृशुर्गत्वा ससुग्रीवविभीषणौ ॥ २४ ॥
भावार्थ
सुवेल पर्वतके निकट जाकर उन गुप्तचरोंने छिपे रहकर श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषणको देखा ॥ २४ ॥
प्रेक्षमाणाश्चमूं तां च बभूवुर्भयविह्वलाः । ते तु धर्मात्मना दृष्टा राक्षसेन्द्रेण राक्षसाः ॥ २५ ॥
भावार्थ
वानरोंकी उस सेनाको देखकर वे भयसे व्याकुल हो उठे । इतनेहीमें धर्मात्मा राक्षसराज विभीषणने उन सब राक्षसोंको देख लिया ॥ २५ ॥
विभीषणेन तत्रस्था निगृहीता यदृच्छया । शार्दूलो ग्राहितस्त्वेकः पापोऽयमिति राक्षसः ॥ २६ ॥
भावार्थ
तब उन्होंने अकस्मात् वहाँ आये हुए राक्षसोंको फटकारा और अकेले शार्दूलको यह सोचकर पकड़वा लिया कि यह राक्षस बड़ा पापी है ॥ २६ ॥
मोचितः सोऽपि रामेण वध्यमानः प्लवंगमैः । आनृशंस्येन रामेण मोचिता राक्षसाः परे ॥ २७ ॥
भावार्थ
फिर तो वानर उसे पीटने लगे । तब भगवान् श्रीरामने दयावश उसे तथा अन्य राक्षसोंको भी छुड़ा दिया ॥ २७ ॥
वानरैरर्दितास्ते तु विक्रान्तैर्लघुविक्रमैः । पुनर्लङ्कामनुप्राप्ताः श्वसन्तो नष्टचेतसः ॥ २८ ॥
भावार्थ
बल-विक्रमसम्पन्न शीघ्र पराक्रमी वानरोंसे पीड़ित हो उन राक्षसोंके होश उड़ गये और वे हाँफते-हाँफते फिर लङ्कामें जा पहुँचे ॥ २८ ॥
ततो दशग्रीवमुपस्थितास्ते चारा बहिर्नित्यचरा निशाचराः । गिरेः सुवेलस्य समीपवासिनं न्यवेदयन् रामबलं महाबलाः ॥ २९ ॥
भावार्थ
तदनन्तर रावणकी सेवामें उपस्थित हो चरके वेशमें सदा बाहर विचरनेवाले उन महाबली निशाचरोंने यह सूचना दी कि श्रीरामचन्द्रजीकी सेना सुवेल पर्वतके निकट डेरा डाले पड़ी है ॥ २९ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें