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युद्धकाण्ड, सर्ग 28

सारणस्य वचः श्रुत्वा रावणं राक्षसाधिपम् । बलमादिश्य तत् सर्वं शुको वाक्यमथाब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

उस सारी वानरीसेनाका परिचय देकर जब सारण चुप हो गया, तब उसका कथन सुनकर शुकने राक्षसराज रावणसे कहा—॥ १ ॥

स्थितान् पश्यसि यानेतान् मत्तानिव महाद्विपान् । न्यग्रोधानिव गाङ्गेयान् सालान् हैमवतानिव ॥ २ ॥ एते दुष्प्रसहा राजन् बलिनः कामरूपिणः । दैत्यदानवसंकाशा युद्धे देवपराक्रमाः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! जिन्हें आप मतवाले महागजराजोंके समान वहाँ खड़ा देख रहे हैं, जो गङ्गातटके वटवृक्षों और हिमालयके शालवृक्षोंके समान जान पड़ते हैं; इनका वेग दुस्सह है । ये इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और बलवान् हैं । दैत्यों और दानवोंके समान शक्तिशाली तथा युद्धमें देवताओंके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले हैं ॥ २-३ ॥

एषां कोटिसहस्राणि नव पञ्च च सप्त च । तथा शङ्कुसहस्राणि तथा वृन्दशतानि च ॥ ४ ॥ एते सुग्रीवसचिवाः किष्किन्धानिलयाः सदा । हरयो देवगन्धर्वैरुत्पन्नाः कामरूपिणः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘इनकी संख्या इक्कीस कोटि सहस्र, सहस्र शङ्कु और सौ वृन्द है।* ये सब-के-सब वानर सदा किष्किन्धामें रहनेवाले सुग्रीवके मन्त्री हैं । इनकी उत्पत्ति देवताओं और गन्धर्वोंसे हुई है । ये सभी इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हैं ॥ ४-५ ॥

यौ तौ पश्यसि तिष्ठन्तौ कुमारौ देवरूपिणौ । मैन्दश्च द्विविदश्चैव ताभ्यां नास्ति समो युधि ॥ ६ ॥ ब्रह्मणा समनुज्ञातावमृतप्राशिनावुभौ । आशंसेते यथा लङ्कामेतौ मर्दितुमोजसा ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! आप इन वानरोंमें देवताओंके समान रूपवाले जिन दो वानरोंको खड़ा देख रहे हैं उनके नाम हैं मैन्द और द्विविद । युद्धमें उनकी बराबरी करनेवाला कोई नहीं है । ब्रह्माजीकी आज्ञासे उन दोनोंने अमृतपान किया है । ये दोनों वीर अपने बल-पराक्रमसे लङ्काको कुचल डालनेकी इच्छा रखते हैं ॥ ६-७ ॥

यं तु पश्यसि तिष्ठन्तं प्रभिन्नमिव कुञ्जरम् । यो बलात् क्षोभयेत् क्रुद्धः समुद्रमपि वानरः ॥ ८ ॥ एषोऽभिगन्ता लङ्कायां वैदेह्यास्तव च प्रभो । एनं पश्य पुरा दृष्टं वानरं पुनरागतम् ॥ ९ ॥ ज्येष्ठः केसरिणः पुत्रो वातात्मज इति श्रुतः । हनूमानिति विख्यातो लङ्घितो येन सागरः ॥ १० ॥

भावार्थ

‘इधर जिसे आप मदकी धारा बहानेवाले मतवाले हाथीकी भाँति खड़ा देख रहे हैं, जो वानर कुपित होनेपर समुद्रको भी विक्षुब्ध कर सकता है, जो लङ्कामें आपके पास आया था और विदेहनन्दिनी सीतासे भी मिलकर गया था,’ उसे देखिये । पहलेका देखा हुआ यह वानर फिर आया है । यह केसरीका बड़ा पुत्र है । पवनपुत्रके भी नामसे विख्यात है । उसे लोग हनुमान् कहते हैं । इसीने पहले समुद्र लाँघा था ॥८—१०॥

कामरूपो हरिश्रेष्ठो बलरूपसमन्वितः । अनिवार्यगतिश्चैव यथा सततगः प्रभुः ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘बल और रूपसे सम्पन्न यह श्रेष्ठ वानर अपनी इच्छाके अनुसार रूप धारण कर सकता है । इसकी गति कहीं नहीं रुकती । यह वायुके समान सर्वत्र जा सकता है ॥ ११ ॥

उद्यन्तं भास्करं दृष्ट्वा बालः किल बुभुक्षितः । त्रियोजनसहस्रं तु अध्वानमवतीर्य हि ॥ १२ ॥ आदित्यमाहरिष्यामि न मे क्षुत् प्रतियास्यति । इति निश्चित्य मनसा पुप्लुवे बलदर्पितः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘जब यह बालक था उस समयकी बात है, एक दिन इसको बहुत भूख लगी थी । उस समय उगते हुए सूर्यको देखकर यह तीन हजार योजन ऊँचा उछल गया था । उस समय मन-ही-मन यह निश्चय करके कि ‘यहाँके फल आदिसे मेरी भूख नहीं जायगी, इसलिये सूर्यको ( जो आकाशका दिव्य फल है ) ले आऊँगा’ यह बलाभिमानी वानर ऊपरको उछला था ॥ १२-१३ ॥

अनाधृष्यतमं देवमपि देवर्षिराक्षसैः । अनासाद्यैव पतितो भास्करोदयने गिरौ ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘देवर्षि और राक्षस भी जिन्हें परास्त नहीं कर सकते, उन सूर्यदेवतक न पहुँचकर यह वानर उदयगिरिपर ही गिर पड़ा ॥ १४ ॥

पतितस्य कपेरस्य हनुरेका शिलातले । किंचिद् भिन्ना दृढहनुर्हनूमानेव तेन वै ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘वहाँके शिलाखण्डपर गिरनेके कारण इस वानरकी एक हनु ( ठोढ़ी ) कुछ कट गयी; साथ ही अत्यन्त दृढ़ हो गयी, इसलिये यह ‘हनुमान्’ नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १५ ॥

सत्यमागमयोगेन ममैष विदितो हरिः । नास्य शक्यं बलं रूपं प्रभावो वानुभाषितुम् ॥ १६ ॥ एष आशंसते लङ्कामेको मथितुमोजसा । येन जाज्वल्यतेऽसौ वै धूमकेतुस्तवाग्र्य वै । लङ्कायां निहितश्चापि कथं विस्मरसे कपिम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘विश्वसनीय व्यक्तियोंके सम्पर्कसे मैंने इस वानरका वृत्तान्त ठीक-ठीक जाना है । इसके बल, रूप और प्रभावका पूर्णरूपसे वर्णन करना किसीके लिये भी असम्भव है । यह अकेला ही सारी लङ्काको मसल देना चाहता है । जिसे आपने लङ्कामें रोक रक्खा था, उस अग्निको भी जिसने अपनी पूँछद्वारा प्रज्वलित करके सारी लङ्का जला डाली, उस वानरको आप भूलते कैसे हैं ? ॥ १६-१७ ॥

यश्चैषोऽनन्तरः शूरः श्यामः पद्मनिभेक्षणः । इक्ष्वाकूणामतिरथो लोके विश्रुतपौरुषः ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘हनुमान्जीके पास ही जो कमलके समान नेत्रवाले साँवले शूरवीर विराज रहे हैं, वे इक्ष्वाकुवंशके अतिरथी हैं । इनका पौरुष सम्पूर्ण लोकोंमें प्रसिद्ध है ॥ १८ ॥

यस्मिन् न चलते धर्मो यो धर्म नातिवर्तते । यो ब्राह्ममस्त्रं वेदांश्च वेद वेदविदां वरः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘धर्म उनसे कभी अलग नहीं होता । ये धर्मका कभी उल्लङ्घन नहीं करते तथा ब्रह्मास्त्र और वेद दोनोंके ज्ञाता हैं । वेदवेत्ताओंमें इनका बहुत ऊँचा स्थान है ॥ १९ ॥

यो भिन्द्याद् गगनं बाणैर्मेदिनीं वापि दारयेत् । यस्य मृत्योरिव क्रोधः शक्रस्येव पराक्रमः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘ये अपने बाणोंसे आकाशका भी भेदन कर सकते हैं, पृथ्वीको भी विदीर्ण करनेकी क्षमता रखते हैं । इनका क्रोध मृत्युके समान और पराक्रम इन्द्रके तुल्य है ॥ २० ॥

यस्य भार्या जनस्थानात् सीता चापि हृता त्वया । स एष रामस्त्वां राजन् योद्धुं समभिवर्तते ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! जिनकी भार्या सीताको आप जनस्थानसे हर लाये हैं, वे ही ये श्रीराम आपसे युद्ध करनेके लिये सामने आकर खड़े हैं ॥ २१ ॥

यस्यैष दक्षिणे पार्श्वे शुद्धजाम्बूनदप्रभः । विशालवक्षास्ताम्राक्षो नीलकुञ्चितमूर्धजः ॥ २२ ॥ एषो हि लक्ष्मणो नाम भ्रातुः प्रियहिते रतः । नये युद्धे च कुशलः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘उनके दाहिने भागमें जो ये शुद्ध सुवर्णके समान कान्तिमान्, विशाल वक्षःस्थलसे सुशोभित, कुछ-कुछ लाल नेत्रवाले तथा मस्तकपर काले-काले घुँघराले केश धारण करनेवाले हैं, इनका नाम लक्ष्मण है । ये अपने भाईके प्रिय और हितमें लगे रहनेवाले हैं, राजनीति और युद्धमें कुशल हैं तथा सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं ॥ २२-२३ ॥

अमर्षी दुर्जयो जेता विक्रान्तश्च जयी बली । रामस्य दक्षिणो बाहुर्नित्यं प्राणो बहिश्चरः ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘ये अमर्षशील, दुर्जय, विजयी, पराक्रमी, शत्रुको पराजित करनेवाले तथा बलवान् हैं । लक्ष्मण सदा ही श्रीरामके दाहिने हाथ और बाहर विचरनेवाले प्राण हैं ॥२४॥

न ह्येष राघवस्यार्थे जीवितं परिरक्षति । एषैवाशंसते युद्धे निहन्तुं सर्वराक्षसान् ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘इन्हें श्रीरघुनाथजीके लिये अपने प्राणोंकी रक्षाका भी ध्यान नहीं रहता । ये अकेले ही युद्धमें सम्पूर्ण राक्षसोंका संहार कर देनेकी इच्छा रखते हैं ॥ २५ ॥

यस्तु सव्यमसौ पक्षं रामस्याश्रित्य तिष्ठति । रक्षोगणपरिक्षिप्तो राजा ह्येष विभीषणः ॥ २६ ॥ श्रीमता राजराजेन लङ्कायामभिषेचितः । त्वामसौ प्रतिसंरब्धो युद्धायैषोऽभिवर्तते ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘श्रीरामचन्द्रजीकी बायीं ओर जो राक्षसोंसे घिरे हुए खड़े हैं, ये राजा विभीषण हैं । राजाधिराज श्रीरामने इन्हें लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया है । अब ये आपपर कुपित होकर युद्धके लिये सामने आ गये हैं ॥ २६-२७ ॥

यं तु पश्यसि तिष्ठन्तं मध्ये गिरिमिवाचलम् । सर्वशाखामृगेन्द्राणां भर्तारममितौजसम् ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘जिन्हें आप सब वानरोंके बीचमें पर्वतके समान अविचल भावसे खड़ा देखते हैं, वे समस्त वानरोंके स्वामी अमित तेजस्वी सुग्रीव हैं ॥ २८ ॥

ते जसा यशसा बुद्ध्या बलेनाभिजनेन च । यः कपीनतिबभ्राज हिमवानिव पर्वतः ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘जैसे हिमालय सब पर्वतोंमें श्रेष्ठ है, उसी प्रकार वे तेज, यश, बुद्धि, बल और कुलकी दृष्टिसे समस्त वानरोंमें सर्वोपरि विराजमान हैं ॥ २९ ॥

किष्किन्धां यः समध्यास्ते गुहां सगहनद्रुमाम् । दुर्गां पर्वतदुर्गम्यां प्रधानैः सह यूथपैः ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘ये गहन वृक्षोंसे युक्त किष्किन्धा नामक दुर्गम गुफामें निवास करते हैं । पर्वतोंके कारण उसमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन है । इनके साथ वहाँ प्रधान-प्रधान यूथपति भी रहते हैं ॥ ३० ॥

यस्यैषा काञ्चनी माला शोभते शतपुष्करा । कान्ता देवमनुष्याणां यस्यां लक्ष्मीः प्रतिष्ठिता ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘इनके गलेमें जो सौ कमलोंकी सुवर्णमयी माला सुशोभित है, उसमें सर्वदा लक्ष्मीदेवीका निवास है । उसे देवता और मनुष्य सभी पाना चाहते हैं ॥ ३१ ॥

एतां मालां च तारां च कपिराज्यं च शाश्वतम् । सुग्रीवो वालिनं हत्वा रामेण प्रतिपादितः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘भगवान् श्रीरामने वालीको मारकर यह माला, तारा और वानरोंका राज्य—ये सब वस्तुएँ सुग्रीवको समर्पित कर दीं ॥ ३२ ॥

शतं शतसहस्राणां कोटिमाहुर्मनीषिणः । शतं कोटिसहस्राणां शङ्कुरित्यभिधीयते ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘मनीषी पुरुष सौ लाखकी संख्याको एक कोटि कहते हैं और सौ सहस्र कोटि ( एक नील ) को एक शङ्कु कहा जाता है ॥ ३३ ॥

शतं शङ्कुसहस्राणां महाशङ्कुरिति स्मृतः । महाशङ्कुसहस्राणां शतं वृन्दमिहोच्यते ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘एक लाख शङ्कुको महाशङ्कु नाम दिया गया है । एक लाख महाशङ्कुको वृन्द कहते हैं ॥ ३४ ॥

शतं वृन्दसहस्राणां महावृन्दमिति स्मृतम् । महावृन्दसहस्राणां शतं पद्ममिहोच्यते ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘एक लाख वृन्दका नाम महावृन्द है । एक लाख महावृन्दको पद्म कहते हैं ॥ ३५ ॥

शतं पद्मसहस्राणां महापद्ममिति स्मृतम् । महापद्मसहस्राणां शतं खर्वमिहोच्यते ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘एक लाख पद्मको महापद्म माना गया है । एक लाख महापद्मको खर्व कहते हैं ॥ ३६ ॥

शतं खर्वसहस्राणां महाखर्वमिति स्मृतम् । महाखर्वसहस्राणां समुद्रमभिधीयते । शतं समुद्रसाहस्रमोघ इत्यभिधीयते ॥ ३७ ॥ शतमोघसहस्राणां महौघा इति विश्रुतः ।

भावार्थ

‘एक लाख खर्वका महाखर्व होता है । एक सहस्र महाखर्वको समुद्र कहते हैं । एक लाख समुद्रको ओघ कहते हैं और एक लाख ओघकी महौघ संज्ञा है ॥ ३७½ ॥

एवं कोटिसहस्रेण शङ्कूनां च शतेन च । महाशङ्कुसहस्रेण तथा वृन्दशतेन च ॥ ३८ ॥ महावृन्दसहस्रेण तथा पद्मशतेन च । महापद्मसहस्रेण तथा खर्वशतेन च ॥ ३९ ॥ समुद्रेण च तेनैव महौघेन तथैव च । एष कोटिमहौघेन समुद्रसदृशेन च ॥ ४० ॥ विभीषणेन वीरेण सचिवैः परिवारितः । सुग्रीवो वानरेन्द्रस्त्वां युद्धार्थमनुवर्तते । महाबलवृतो नित्यं महाबलपराक्रमः ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘इस प्रकार सहस्र कोटि, सौ शङ्कु, सहस्र महाशङ्कु, सौ वृन्द, सहस्र महावृन्द, सौ पद्म, सहस्र महापद्म, सौ खर्व, सौ समुद्र, सौ महौघ तथा समुद्र-सदृश ( सौ ) कोटि महौघ सैनिकोंसे, वीर विभीषणसे तथा अपने सचिवोंसे घिरे हुए वानरराज सुग्रीव आपको युद्धके लिये ललकारते हुए सामने आ रहे हैं । विशाल सेनासे घिरे हुए सुग्रीव महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न हैं ॥ ३८–४१ ॥

इमां महाराज समीक्ष्य वाहिनी- मुपस्थितां प्रज्वलितग्रहोपमाम् । ततः प्रयत्नः परमो विधीयतां यथा जयः स्यान्न परैः पराभवः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! यह सेना एक प्रकाशमान ग्रहके समान है । इसे उपस्थित देख आप कोई ऐसा उपाय करें, जिससे आपकी विजय हो और शत्रुओंके सामने आपको नीचा न देखना पड़े’ ॥ ४२ ॥

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