युद्धकाण्ड, सर्ग 33
सीतां तु मोहितां दृष्ट्वा सरमा नाम राक्षसी । आससादाथ वैदेहीं प्रियां प्रणयिनी सखीम् ॥ १ ॥
भावार्थ
विदेहनन्दिनी सीताको मोहमें पड़ी हुई देख सरमा नामकी राक्षसी उनके पास उसी तरह आयी, जैसे प्रेम रखनेवाली सखी अपनी प्यारी सखीके पास जाती है ॥ १ ॥
मोहितां राक्षसेन्द्रेण सीतां परमदुःखिताम् । आश्वासयामास तदा सरमा मृदुभाषिणी ॥ २ ॥
भावार्थ
सीता राक्षसराजकी मायासे मोहित हो बड़े दुःखमें पड़ गयी थीं । उस समय मृदुभाषिणी सरमाने उन्हें अपने वचनोंद्वारा सान्त्वना दी ॥ २ ॥
सा हि तत्र कृता मित्रं सीतया रक्ष्यमाणया । रक्षन्ती रावणादिष्टा सानुक्रोशा दृढव्रता ॥ ३ ॥
भावार्थ
सरमा रावणकी आज्ञासे सीताजीकी रक्षा करती थी । उसने अपनी रक्षणीया सीताके साथ मैत्री कर ली थी । वह बड़ी दयालु और दृढ़-संकल्प थी ॥ ३ ॥
सा ददर्श सखी सीतां सरमा नष्टचेतनाम् । उपावृत्योत्थितां ध्वस्तां वडवामिव पांसुषु ॥ ४ ॥ तां समाश्वासयामास सखीस्नेहेन सुव्रताम् । समाश्वसिहि वैदेहि मा भूत् ते मनसो व्यथा । उक्ता यद् रावणेन त्वं प्रत्युक्तश्च स्वयं त्वया ॥ ५ ॥ सखीस्नेहेन तद् भीरु मया सर्वं प्रतिश्रुतम् । लीनया गहने शून्ये भयमुत्सृज्य रावणात् । तव हेतोर्विशालाक्षि नहि मे रावणाद् भयम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
सरमाने सखी सीताको देखा । उनकी चेतना नष्ट-सी हो रही थी । जैसे परिश्रमसे थकी हुई घोड़ी धरतीकी धूलमें लोटकर खड़ी हुई हो, उसी प्रकार सीता भी पृथ्वीपर लोटकर रोने और विलाप करनेके कारण धूलिधूसरित हो रही थीं ॥ उसने एक सखीके स्नेहसे उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सीताको आश्वासन दिया—‘विदेहनन्दिनी ! धैर्य धारण करो । तुम्हारे मनमें व्यथा नहीं होनी चाहिये । भीरु ! रावणने तुमसे जो कुछ कहा है और स्वयं तुमने उसे जो उत्तर दिया है, वह सब मैंने सखीके प्रति स्नेह होनेके कारण सुन लिया है । विशाललोचने ! तुम्हारे लिये मैं रावणका भय छोड़कर अशोकवाटिकाके सूने गहन स्थानमें छिपकर सारी बातें सुन रही थी । मुझे रावणसे कोई डर नहीं है ॥ ५-६ ॥
स सम्भ्रान्तश्च निष्क्रान्तो यत्कृते राक्षसेश्वरः । तत्र मे विदितं सर्वमभिनिष्क्रम्य मैथिलि ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘मिथिलेशकुमारी ! राक्षसराज रावण जिस कारण यहाँसे घबराकर निकल गया है, उसका भी मैं वहाँ जाकर पूर्णरूपसे पता लगा आयी हूँ ॥ ७ ॥
न शक्यं सौप्तिकं कर्तुं रामस्य विदितात्मनः । वधश्च पुरुषव्याघ्रे तस्मिन् नैवोपपद्यते ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘भगवान् श्रीराम अपने स्वरूपको जाननेवाले सर्वज्ञ परमात्मा हैं । उनका सोते समय वध करना किसीके लिये भी सर्वथा असम्भव है । पुरुषसिंह श्रीरामके विषयमें इस तरह उनके वध होनेकी बात युक्तिसंगत नहीं जान पड़ती ॥ ८ ॥
न त्वेवं वानरा हन्तुं शक्याः पादपयोधिनः । सुरा देवर्षभेणेव रामेण हि सुरक्षिताः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘वानरलोग वृक्षोंके द्वारा युद्ध करनेवाले हैं । उनका भी इस तरह मारा जाना कदापि सम्भव नहीं है; क्योंकि जैसे देवतालोग देवराज इन्द्रसे पालित होते हैं, उसी प्रकार ये वानर श्रीरामचन्द्रजीसे भलीभाँति सुरक्षित हैं ॥ ९ ॥
दीर्घवृत्तभुजः श्रीमान् महोरस्कः प्रतापवान् । धन्वी संनहनोपेतो धर्मात्मा भुवि विश्रुतः ॥ १० ॥ विक्रान्तो रक्षिता नित्यमात्मनश्च परस्य च । लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा कुलीनो नयशास्त्रवित् ॥ ११ ॥ हन्ता परबलौघानामचिन्त्यबलपौरुषः । न हतो राघवः श्रीमान् सीते शत्रुनिबर्हणः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘सीते ! श्रीमान् राम गोलाकार बड़ी-बड़ी भुजाओंसे सुशोभित, चौड़ी छातीवाले, प्रतापी, धनुर्धर, सुगठित शरीरसे युक्त और भूमण्डलमें सुविख्यात धर्मात्मा हैं । उनमें महान् पराक्रम है । वे भाई लक्ष्मणकी सहायतासे अपनी तथा दूसरेकी भी रक्षा करनेमें समर्थ हैं । नीतिशास्त्रके ज्ञाता और कुलीन हैं । उनके बल और पौरुष अचिन्त्य हैं । वे शत्रुपक्षके सैन्यसमूहोंका संहार करनेकी शक्ति रखते हैं । शत्रुसूदन श्रीराम कदापि मारे नहीं गये हैं ॥ १०–१२ ॥
अयुक्तबुद्धिकृत्येन सर्वभूतविरोधिना । एवं प्रयुक्ता रौद्रेण माया मायाविना त्वयि ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘रावणकी बुद्धि और कर्म दोनों ही बुरे हैं । वह समस्त प्राणियोंका विरोधी, क्रूर और मायावी है । उसने तुमपर यह मायाका प्रयोग किया था ( वह मस्तक और धनुष मायाद्वारा रचे गये थे ) ॥ १३ ॥
शोकस्ते विगतः सर्वकल्याणं त्वामुपस्थितम् । ध्रुवं त्वां भजते लक्ष्मीः प्रियं ते भवति शृणु ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘अब तुम्हारे शोकके दिन बीत गये । सब प्रकारसे कल्याणका अवसर उपस्थित हुआ है । निश्चय ही लक्ष्मी तुम्हारा सेवन करती हैं । तुम्हारा प्रिय कार्य होने जा रहा है । उसे बताती हूँ, सुनो ॥ १४ ॥
उत्तीर्य सागरं रामः सह वानरसेनया । संनिविष्टः समुद्रस्य तीरमासाद्य दक्षिणम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामचन्द्रजी वानरसेनाके साथ समुद्रको लाँघकर इस पार आ गये हैं । उन्होंने सागरके दक्षिणतटपर पड़ाव डाला है ॥ १५ ॥
दृष्टो मे परिपूर्णार्थः काकुत्स्थः सहलक्ष्मणः । सहितैः सागरान्तस्थैर्बलैस्तिष्ठति रक्षितः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘मैंने स्वयं लक्ष्मणसहित पूर्णकाम श्रीरामका दर्शन किया है । वे समुद्रतटपर ठहरी हुई अपनी संगठित सेनाओंद्वारा सर्वथा सुरक्षित हैं ॥ १६ ॥
अनेन प्रेषिता ये च राक्षसा लघुविक्रमाः । राघवस्तीर्ण इत्येवं प्रवृत्तिस्तैरिहाहृता ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘रावणने जो-जो शीघ्रगामी राक्षस भेजे थे, वे सब यहाँ यही समाचार लाये हैं कि ‘श्रीरघुनाथजी समुद्रको पार करके आ गये’ ॥ १७ ॥
स तां श्रुत्वा विशालाक्षि प्रवृत्तिं राक्षसाधिपः । एष मन्त्रयते सर्वैः सचिवैः सह रावणः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘विशाललोचने ! इस समाचारको सुनकर यह राक्षसराज रावण अपने सभी मन्त्रियोंके साथ गुप्त परामर्श कर रहा है’ ॥ १८ ॥
इति ब्रुवाणा सरमा राक्षसी सीतया सह । सर्वोद्योगेन सैन्यानां शब्दं शुश्राव भैरवम् ॥ १९ ॥ दण्डनिर्घातवादिन्याः श्रुत्वा भेर्या महास्वनम् । उवाच सरमा सीतामिदं मधुरभाषिणी ॥ २० ॥
भावार्थ
जब राक्षसी सरमा सीतासे ये बातें कह रही थी, उसी समय उसने युद्धके लिये पूर्णतः उद्योगशील सैनिकोंका भैरव नाद सुना ॥ डंडेकी चोटसे बजनेवाले धौंसेका गम्भीर नाद सुनकर मधुरभाषिणी सरमाने सीतासे कहा—॥ २० ॥
संनाहजननी ह्येषा भैरवा भीरु भेरिका । भेरीनादं च गम्भीरं शृणु तोयदनिःस्वनम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘भीरु ! यह भयानक भेरीनाद युद्धके लिये तैयारीकी सूचना दे रहा है । मेघकी गर्जनाके समान रणभेरीका गम्भीर घोष तुम भी सुन लो ॥ २१ ॥
कल्प्यन्ते मत्तमातङ्गा युज्यन्ते रथवाजिनः । दृश्यन्ते तुरगारूढाः प्रासहस्ताः सहस्रशः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘मतवाले हाथी सजाये जा रहे हैं । रथमें घोड़े जोते जा रहे हैं और हजारों घुड़सवार हाथमें भाला लिये दृष्टिगोचर हो रहे हैं ॥ २२ ॥
तत्र तत्र च संनद्धाः सम्पतन्ति सहस्रशः । आपूर्यन्ते राजमार्गाः सैन्यैरद्भुतदर्शनैः ॥ २३ ॥ वेगवद्भिर्नदद्भिश्च तोयौघैरिव सागरः ।
भावार्थ
‘जहाँ-तहाँसे युद्धके लिये संनद्ध हुए सहस्रों सैनिक दौड़े चले आ रहे हैं । सारी सड़कें अद्भुत वेषमें सजे और बड़े वेगसे गर्जना करते हुए सैनिकोंसे उसी तरह भरती जा रही हैं जैसे जलके असंख्य प्रवाह सागरमें मिल रहे हों ॥ २३½ ॥
शस्त्राणां च प्रसन्नानां चर्मणां वर्मणां तथा ॥ २४ ॥ रथवाजिगजानां च राक्षसेन्द्रानुयायिनाम् । सम्भ्रमो रक्षसामेष हृषितानां तरस्विनाम् ॥ २५ ॥ प्रभां विसृजतां पश्य नानावर्णसमुत्थिताम् । वनं निर्दहतो घर्मे यथा रूपं विभावसोः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘नाना प्रकारकी प्रभा बिखेरनेवाले चमचमाते हुए अस्त्र-शस्त्रों, ढालों और कवचोंकी वह चमक देखो । राक्षसराज रावणका अनुगमन करनेवाले रथों, घोड़ों, हाथियों तथा रोमाञ्चित हुए वेगशाली राक्षसोंमें इस समय यह बड़ी हड़बड़ी दिखायी देती है । ग्रीष्म ऋतुमें वनको जलाते हुए दावानलका जैसा जाज्वल्यमान रूप होता है, वैसी ही प्रभा इन अस्त्र-शस्त्र आदिकी दिखायी देती है ॥ २४—२६ ॥
घण्टानां श्रूयते घोषं रथानां शृणु निःस्वनम् । हयानां हेषमाणानां शृणु तूर्यध्वनिं तथा ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘हाथियोंपर बजते हुए घण्टोंका गम्भीर घोष सुनो, रथोंकी घर्घराहट सुनो और हिनहिनाते हुए घोड़ों तथा भाँति-भाँतिके बाजोंकी आवाज भी सुन लो ॥ २७ ॥
उद्यतायुधहस्तानां राक्षसेन्द्रानुयायिनाम् । सम्भ्रमो रक्षसामेष तुमुलो लोमहर्षणम् ॥ २८ ॥ श्रीस्त्वां भजति शोकघ्नी रक्षसां भयमागतम् । रामः कमलपत्राक्षो दैत्यानामिव वासवः ॥ २९ ॥ अवजित्य जितक्रोधस्तमचिन्त्यपराक्रमः । रावणं समरे हत्वा भर्ता त्वाधिगमिष्यति ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘हाथोंमें हथियार लिये रावणके अनुगामी राक्षसोंमें इस समय बड़ी घबराहट है । इससे यह जान लो कि उनपर कोई बड़ा भारी रोमाञ्चकारी भय उपस्थित हुआ है और शोकका निवारण करनेवाली लक्ष्मी तुम्हारी सेवामें उपस्थित हो रही है ॥ ‘तुम्हारे पति कमलनयन श्रीराम क्रोधको जीत चुके हैं । उनका पराक्रम अचिन्त्य है । वे दैत्योंको परास्त करनेवाले इन्द्रकी भाँति राक्षसोंको हराकर समराङ्गणमें रावणका वध करके तुम्हें प्राप्त कर लेंगे ॥ २९-३० ॥
विक्रमिष्यति रक्षःसु भर्ता ते सहलक्ष्मणः । यथा शत्रुषु शत्रुघ्नो विष्णुना सह वासवः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘जैसे शत्रुसूदन इन्द्रने उपेन्द्रकी सहायतासे शत्रुओंपर पराक्रम प्रकट किया था, उसी प्रकार तुम्हारे पतिदेव श्रीराम अपने भाई लक्ष्मणके सहयोगसे राक्षसोंपर अपने बल-विक्रमका प्रदर्शन करेंगे ॥ ३१ ॥
आगतस्य हि रामस्य क्षिप्रमङ्कागतां सतीम् । अहं द्रक्ष्यामि सिद्धार्थां त्वां शत्रौ विनिपातिते ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘शत्रु रावणका संहार हो जानेपर मैं शीघ्र ही तुम-जैसी सती-साध्वीको यहाँ पधारे हुए श्रीरघुनाथजीकी गोदमें समोद बैठी देखूँगी । अब शीघ्र ही तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा ॥३२॥
अस्राण्यानन्दजानि त्वं वर्तयिष्यसि जानकि । समागम्य परिष्वक्ता तस्योरसि महोरसः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘जनकनन्दिनि ! विशाल वक्षःस्थलसे विभूषित श्रीरामके मिलनेपर उनकी छातीसे लगकर तुम शीघ्र ही नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाओगी ॥ ३३ ॥
अचिरान्मोक्ष्यते सीते देवि ते जघनं गताम् । धृतामेकां बहून् मासान् वेणीं रामो महाबलः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘देवि सीते ! कई महीनोंसे तुम्हारे केशोंकी एक ही वेणी जटाके रूपमें परिणत हो जो कटिप्रदेशतक लटक रही है, उसे महावली श्रीराम शीघ्र ही अपने हाथोंसे खोलेंगे ॥३४॥
तस्य दृष्ट्वा मुखं देवि पूर्णचन्द्रमिवोदितम् । मोक्ष्यसे शोकजं वारि निर्मोकमिव पन्नगी ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘देवि ! जैसे नागिन केंचुल छोड़ती है, उसी प्रकार तुम उदित हुए पूर्णचन्द्रके समान अपने पतिका मुदित मुख देखकर शोकके आँसू बहाना छोड़ दोगी ॥ ३५ ॥
रावणं समरे हत्वा नचिरादेव मैथिलि । त्वया समग्रः प्रियया सुखार्होः लप्स्यते सुखम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘मिथिलेशकुमारी ! समराङ्गणमें शीघ्र ही रावणका वध करके सुख भोगनेके योग्य श्रीराम सफलमनोरथ हो तुझ प्रियतमाके साथ मनोवाञ्छित सुख प्राप्त करेंगे ।: ३६ ॥
सभाजिता त्वं रामेण मोदिष्यसि महात्मना । सुवर्षेण समायुक्ता यथा सस्येन मेदिनी ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘जैसे पृथ्वी उत्तम वर्षासे अभिषिक्त होनेपर हरी-भरी खेतीसे लहलहा उठती है, उसी प्रकार तुम महात्मा श्रीरामसे सम्मानित हो आनन्दमग्न हो जाओगी ॥ ३७ ॥
गिरिवरमभितो विवर्तमानो हय इव मण्डलमाशु यः करोति । तमिह शरणमभ्युपैहि देवि दिवसकरं प्रभवो ह्ययं प्रजानाम् ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘देवि ! जो गिरिवर मेरुके चारों ओर घूमते हुए अश्वकी भाँति शीघ्रतापूर्वक मण्डलाकार-गतिसे चलते हैं, उन्हीं भगवान् सूर्यकी ( जो तुम्हारे कुलके देवता हैं ) तुम यहाँ शरण लो; क्योंकि ये प्रजाजनोंको सुख देने तथा उनका दुःख दूर करनेमें समर्थ हैं’ ॥ ३८ ॥
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