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युद्धकाण्ड, सर्ग 16

सुनिविष्टं हितं वाक्यमुक्तवन्तं विभीषणम् । अब्रवीत् परुषं वाक्यं रावणः कालचोदितः ॥ १ ॥

भावार्थ

रावणके सिरपर काल मँडरा रहा था, इसलिये उसने सुन्दर अर्थसे युक्त और हितकर बात कहनेपर भी विभीषणसे कठोर वाणीमें कहा— ॥ १ ॥

वसेत् सह सपत्नेन क्रुद्धेनाशीविषेण च । न तु मित्रप्रवादेन संवसेच्छत्रुसेविना ॥ २ ॥

भावार्थ

‘भाई ! शत्रु और कुपित विषधर सर्पके साथ रहना पड़े तो रह ले; परंतु जो मित्र कहलाकर भी शत्रुकी सेवा कर रहा हो, उसके साथ कदापि न रहे ॥ २ ॥

जानामि शीलं ज्ञातीनां सर्वलोकेषु राक्षस । हृष्यन्ति व्यसनेष्वेते ज्ञातीनां ज्ञातयः सदा ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘राक्षस ! सम्पूर्ण लोकोंमें सजातीय बन्धुओंका जो स्वभाव होता है, उसे मैं अच्छी तरह जानता हूँ । जातिवाले सर्वदा अपने अन्य सजातीयोंकी आपत्तियोंमें ही हर्ष मानते हैं ॥ ३ ॥

प्रधानं साधकं वैद्यं धर्मशीलं च राक्षस । ज्ञातयोऽप्यवमन्यन्ते शूरं परिभवन्ति च ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘निशाचर ! जो ज्येष्ठ होनेके कारण राज्य पाकर सबमें प्रधान हो गया हो, राज्यकार्यको अच्छी तरह चला रहा हो और विद्वान्, धर्मशील तथा शूरवीर हो, उसे भी कुटुम्बीजन अपमानित करते हैं और अवसर पाकर उसे नीचा दिखानेकी भी चेष्टा करते हैं ॥ ४ ॥

नित्यमन्योन्यसंहृष्टा व्यसनेष्वाततायिनः । प्रच्छन्नहृदया घोरा ज्ञातयस्तु भयावहाः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘जातिवाले सदा एक दूसरेपर संकट आनेपर हर्षका अनुभव करते हैं । वे बड़े आततायी होते हैं—मौका पड़नेपर आग लगाने, जहर देने, शस्त्र चलाने, धन हड़पने और क्षेत्र तथा स्त्रीका अपहरण करनेमें भी नहीं हिचकते हैं । अपना मनोभाव छिपाये रहते हैं; अतएव क्रूर और भयंकर होते हैं ॥ ५ ॥

श्रूयन्ते हस्तिभिर्गीताः श्लोकाः पद्मवने पुरा । पाशहस्तान् नरान् दृष्ट्वा श्रूणुष्व गदतो मम ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘पूर्वकालकी बात है, पद्मवनमें हाथियोंने अपने हृदयके उद्गार प्रकट किये थे, जो अब भी श्लोकोंके रूपमें गाये और सुने जाते हैं । एक बार कुछ लोगोंको हाथमें फंदा लिये आते देख हाथियोंने जो बातें कही थीं, उन्हें बता रहा हूँ, मुझसे सुनो ॥ ६ ॥

नाग्निर्नान्यानि शस्त्राणि न नः पाशा भयावहाः । घोराः स्वार्थप्रयुक्तास्तु ज्ञातयो नो भयावहाः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘हमें अग्नि, दूसरे-दूसरे शस्त्र तथा पाश भय नहीं दे सकते । हमारे लिये तो अपने स्वार्थी जाति-भाई ही भयानक और खतरेकी वस्तु हैं ॥ ७ ॥

उपायमेते वक्ष्यन्ति ग्रहणे नात्र संशयः । कृत्स्नाद् भयाज्ज्ञातिभयं कुकष्टं विहितं च नः ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘ये ही हमारे पकड़े जानेका उपाय बता देंगे, इसमें संशय नहीं; अतः सम्पूर्ण भयोंकी अपेक्षा हमें अपने जाति-भाइयोंसे प्राप्त होनेवाला भय ही अधिक कष्टदायक जान पड़ता है’ ॥ ८ ॥

विद्यते गोषु सम्पन्नं विद्यते ज्ञातितो भयम् । विद्यते स्त्रीषु चापल्यं विद्यते ब्राह्मणे तपः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘जैसे गौओंमें हव्य-कव्यकी सम्पत्ति दूध होता है, स्त्रियोंमें चपलता होती है और ब्राह्मणमें तपस्या रहा करती है, उसी प्रकार जाति-भाइयोंसे भय अवश्य प्राप्त होता है ॥ ९ ॥

ततो नेष्टमिदं सौम्य यदहं लोकसत्कृतः । ऐश्वर्यमभिजातश्च रिपूणां मूर्ध्नि च स्थितः ॥ १० ॥

भावार्थ

‘अतः सौम्य ! आज जो सारा संसार मेरा सम्मान करता है और मैं जो ऐश्वर्यवान्, कुलीन और शत्रुओंके सिरपर स्थित हूँ, यह सब तुम्हें अभीष्ट नहीं है ॥ १० ॥

यथा पुष्करपत्रेषु पतितास्तोयबिन्दवः । न श्लेषमभिगच्छन्ति तथानार्येषु सौहृदम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘जैसे कमलके पत्तेपर गिरी हुई पानीकी बूँदें उसमें सटती नहीं हैं, उसी प्रकार अनार्योंके हृदयमें सौहार्द नहीं टिकता है ॥ ११ ॥

यथा शरदि मेघानां सिञ्चतामपि गर्जताम् । न भवत्यम्बुसंक्लेदस्तथानार्येषु सौहृदम् ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘जैसे शरद् ऋतुमें गर्जते और बरसते हुए मेघोंके जलसे धरती गीली नहीं होती है, उसी प्रकार अनार्योंके हृदयमें स्नेहजनित आर्द्रता नहीं होती है ॥ १२ ॥

यथा मधुकरस्तर्षाद् रसं विन्दन्न तिष्ठति । तथा त्वमपि तत्रैव तथानार्येषु सौहृदम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘जैसे भौंरा बड़ी चाहसे फूलोंका रस पीता हुआ भी वहाँ ठहरता नहीं है, उसी प्रकार अनार्योंमें सुहृज्जनोचित स्नेह नहीं टिक पाता है । तुम भी ऐसे ही अनार्य हो ॥ १३ ॥

यथा मधुकरस्तर्षात् काशपुष्पं पिबन्नपि । रसमत्र न विन्देत तथानार्येषु सौहृदम् ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘जैसे भ्रमर रसकी इच्छासे काशके फूलका पान करे तो उसमें रस नहीं पा सकता, उसी प्रकार अनार्योंमें जो स्नेह होता है, वह किसीके लिये लाभदायक नहीं होता ॥ १४ ॥

यथा पूर्वं गजः स्नात्वा गृह्य हस्तेन वै रजः । दूषयत्यात्मनो देहं तथानार्येषु सौहृदम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘जैसे हाथी पहले स्नान करके फिर सूँड़से धूल उछालकर अपने शरीरको गँदला कर लेता है, उसी प्रकार दुर्जनोंकी मैत्री दूषित होती है ॥ १५ ॥

योऽन्यस्त्वेवंविधं ब्रूयाद् वाक्यमेतन्निशाचर । अस्मिन् मुहूर्ते न भवेत् त्वां तु धिक् कुलपांसन ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘कुलकलङ्क निशाचर ! तुझे धिक्कार है । यदि तेरे सिवा दूसरा कोई ऐसी बातें कहता तो उसे इसी मुहूर्तमें अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ता’ ॥ १६ ॥

इत्युक्तः परुषं वाक्यं न्यायवादी विभीषणः । उत्पपात गदापाणिश्चतुर्भिः सह राक्षसैः ॥ १७ ॥

भावार्थ

विभीषण न्यायानुकूल बातें कह रहे थे तो भी रावणने जब उनसे ऐसे कठोर वचन कहे, तब वे हाथमें गदा लेकर अन्य चार राक्षसोंके साथ उसी समय उछलकर आकाशमें चले गये ॥ १७ ॥

अब्रवीच्च तदा वाक्यं जातक्रोधो विभीषणः । अन्तरिक्षगतः श्रीमान् भ्राता वै राक्षसाधिपम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

उस समय अन्तरिक्षमें खड़े हुए तेजस्वी भ्राता विभीषणने कुपित होकर राक्षसराज रावणसे कहा—॥ १८ ॥

सत्वं भ्रान्तोऽसि मे राजन् ब्रूहि मां यद् यदिच्छसि । ज्येष्ठो मान्यः पितृसमो न च धर्मपथे स्थितः । इदं हि परुषं वाक्यं न क्षमाम्यग्रजस्य ते ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! तुम्हारी बुद्धि भ्रममें पड़ी हुई है । तुम धर्मके मार्गपर नहीं हो । यों तो मेरे बड़े भाई होनेके कारण तुम पिताके समान आदरणीय हो । इसलिये मुझे जो-जो चाहो, कह लो; परंतु अग्रज होनेपर भी तुम्हारे इस कठोर वचनको कदापि नहीं सह सकता ॥ १९ ॥

सुनीतं हितकामेन वाक्यमुक्तं दशानन । न गृह्णन्त्यकृतात्मानः कालस्य वशमागताः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘दशानन ! जो अजितेन्द्रिय पुरुष कालके वशीभूत हो जाते हैं, वे हितकी कामनासे कहे हुए सुन्दर नीतियुक्त वचनोंको भी नहीं ग्रहण करते हैं ॥ २० ॥

सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः । अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! सदा प्रिय लगनेवाली मीठी-मीठी बातें कहनेवाले लोग तो सुगमतासे मिल सकते हैं; परंतु जो सुननेमें अप्रिय किंतु परिणाममें हितकर हो, ऐसी बात कहने और सुननेवाले दुर्लभ होते हैं ॥ २१ ॥

बद्धं कालस्य पाशेन सर्वभूतापहारिणः । न नश्यन्तमुपेक्षे त्वां प्रदीप्तं शरणं यथा ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘तुम समस्त प्राणियोंका संहार करनेवाले कालके पाशमें बँध चुके हो । जिसमें आग लग गयी हो, उस घरकी भाँति नष्ट हो रहे हो । ऐसी दशामें मैं तुम्हारी उपेक्षा नहीं कर सकता था, इसीलिये तुम्हें हितकी बात सुझा दी थी ॥ २२॥

दीप्तपावकसंकाशैः शितैः काञ्चनभूषणैः । न त्वामिच्छाम्यहं द्रष्टुं रामेण निहतं शरैः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘श्रीरामके सुवर्णभूषित बाण प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी और तीखे हैं । मैं श्रीरामके द्वारा उन बाणोंसे तुम्हारी मृत्यु नहीं देखना चाहता था, इसीलिये तुम्हें समझानेकी चेष्टा की थी ॥ २३ ॥

शूराश्च बलवन्तश्च कृतास्त्राश्च नरा रणे । कालाभिपन्नाः सीदन्ति यथा वालुकसेतवः ॥ २४ ॥ तन्मर्षयतु यच्चोक्तं गुरुत्वाद्धितमिच्छता । आत्मानं सर्वथा रक्ष पुरीं चेमां सराक्षसाम् । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सुखी भव मया विना ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘कालके वशीभूत होनेपर बड़े-बड़े शूर-वीर, बलवान् और अस्त्रवेत्ता भी बालूकी भीति या बाँधके समान नष्ट हो जाते हैं ॥ ‘राक्षसराज ! मैं तुम्हारा हित चाहता हूँ । इसीलिये जो कुछ भी कहा है, वह यदि तुम्हें अच्छा नहीं लगा तो उसके लिये मुझे क्षमा कर दो; क्योंकि तुम मेरे बड़े भाई हो । अब तुम अपनी तथा राक्षसोंसहित इस समस्त लङ्कापुरीकी सब प्रकारसे रक्षा करो । तुम्हारा कल्याण हो । अब मैं यहाँसे चला जाऊँगा । तुम मेरे बिना सुखी हो जाओ ॥ २५ ॥

निवार्यमाणस्य मया हितैषिणा न रोचते ते वचनं निशाचर । परान्तकाले हि गतायुषो नरा हितं न गृह्णन्ति सुहृद्भिरीरितम् ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘निशाचरराज ! मैं तुम्हारा हितैषी हूँ । इसीलिये मैंने तुम्हें बार-बार अनुचित मार्गपर चलनेसे रोका है, किंतु तुम्हें मेरी बात अच्छी नहीं लगती है। वास्तवमें जिन लोगोंकी आयु समाप्त हो जाती है, वे जीवनके अन्तकालमें अपने सुहृदोंकी कही हुई हितकर बात भी नहीं मानते हैं’ ॥ २६ ॥

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