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युद्धकाण्ड, सर्ग 17

इत्युक्त्वा परुषं वाक्यं रावणं रावणानुजः। आजगाम मुहूर्तेन यत्र रामः सलक्ष्मणः ॥ १ ॥

भावार्थ

रावणसे ऐसे कठोर वचन कहकर उसके छोटे भाई विभीषण दो ही घड़ीमें उस स्थानपर आ गये, जहाँ लक्ष्मणसहित श्रीराम विराजमान थे ॥ १ ॥

तं मेरुशिखराकारं दीप्तामिव शतह्रदाम्। गगनस्थं महीस्थास्ते ददृशुर्वानराधिपाः ॥ २ ॥

भावार्थ

विभीषणका शरीर सुमेरु पर्वतके शिखरके समान ऊँचा था। वे आकाशमें चमकती हुई बिजलीके समान जान पड़ते थे। पृथ्वीपर खड़े हुए वानरयूथपतियोंने उन्हें आकाशमें स्थित देखा ॥ २ ॥

ते चाप्यनुचरास्तस्य चत्वारो भीमविक्रमाः। तेऽपि वर्मायुधोपेता भूषणोत्तमभूषिताः ॥ ३ ॥

भावार्थ

उनके साथ जो चार अनुचर थे। वे भी बड़ा भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाले थे। उन्होंने भी कवच धारण करके अस्त्र-शस्त्र ले रक्खे थे और वे सब-के-सब उत्तम आभूषणोंसे विभूषित थे ॥ ३ ॥

स च मेघाचलप्रख्यो वज्रायुधसमप्रभः। वरायुधधरो वीरो दिव्याभरणभूषितः ॥ ४ ॥

भावार्थ

वीर विभीषण भी मेघ और पर्वतके समान जान पड़ते थे। वज्रधारी इन्द्रके समान तेजस्वी, उत्तम आयुधधारी और दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत थे ॥ ४ ॥

तमात्मपञ्चमं दृष्ट्वा सुग्रीवो वानराधिपः। वानरैः सह दुर्धर्षश्चिन्तयामास बुद्धिमान् ॥ ५ ॥

भावार्थ

उन चारों राक्षसोंके साथ पाँचवें विभीषणको देखकर दुर्धर्ष एवं बुद्धिमान् वीर वानरराज सुग्रीवने वानरोंके साथ विचार किया ॥ ५ ॥

चिन्तयित्वा मुहूर्तं तु वानरांस्तानुवाच ह। हनुमत्प्रमुखान् सर्वानिदं वचनमुत्तमम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

थोड़ी देरतक सोचकर उन्होंने हनुमान् आदि सब वानरोंसे यह उत्तम बात कही—॥ ६ ॥

एष सर्वायुधोपेतश्चतुर्भिः सह राक्षसैः। राक्षसोऽभ्येति पश्यध्वमस्मान् हन्तुं न संशयः॥ ७ ॥

भावार्थ

‘देखो, सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न यह राक्षस दूसरे चार निशाचरोंके साथ आ रहा है। इसमें संदेह नहीं कि यह हमें मारनेके लिये ही आता है’ ॥ ७ ॥

सुग्रीवस्य वचः श्रुत्वा सर्वे ते वानरोत्तमाः। शालानुद्यम्य शैलांश्च इदं वचनमब्रुवन् ॥ ८ ॥

भावार्थ

सुग्रीवकी यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर सालवृक्ष और पर्वतकी शिलाएँ उठाकर इस प्रकार बोले—॥ ८ ॥

शीघ्रं व्यादिश नो राजन् वधायैषां दुरात्मनाम्। निपतन्ति हता यावद् धरण्यामल्पचेतनाः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘राजन्! आप शीघ्र ही हमें इन दुरात्माओंके वधकी आज्ञा दीजिये, जिससे ये मन्दमति निशाचर मरकर ही इस पृथ्वीपर गिरें’ ॥ ९ ॥

तेषां सम्भाषमाणानामन्योन्यं स विभीषणः। उत्तरं तीरमासाद्य खस्थ एव व्यतिष्ठत ॥ १० ॥

भावार्थ

आपसमें वे इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि विभीषण समुद्रके उत्तर तटपर आकर आकाशमें ही खड़े हो गये ॥१०॥

स उवाच महाप्राज्ञः स्वरेण महता महान्। सुग्रीवं तांश्च सम्प्रेक्ष्य खस्थ एव विभीषणः ॥ ११ ॥

भावार्थ

महाबुद्धिमान् महापुरुष विभीषणने आकाशमें ही स्थित रहकर सुग्रीव तथा उन वानरोंकी ओर देखते हुए उच्च स्वरसे कहा—॥ ११ ॥

रावणो नाम दुर्वृत्तो राक्षसो राक्षसेश्वरः। तस्याहमनुजो भ्राता विभीषण इति श्रुतः ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘रावण नामका जो दुराचारी राक्षस निशाचरोंका राजा है, उसीका मैं छोटा भाई हूँ। मेरा नाम विभीषण है ॥ १२ ॥

तेन सीता जनस्थानाद्हृता हत्वा जटायुषम्। रुद्धा च विवशा दीना राक्षसीभिः सुरक्षिता ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘रावणने जटायुको मारकर जनस्थानसे सीताका अपहरण किया था । उसीने दीन एवं असहाय सीताको रोक रक्खा है । इन दिनों सीता राक्षसियोंके पहरेमें रहती हैं ॥ १३ ॥

तमहं हेतुभिर्वाक्यैर्विविधैश्च न्यदर्शयम् । साधु निर्यात्यतां सीता रामायेति पुनः पुनः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘मैंने भाँति-भाँतिके युक्तिसंगत वचनोंद्वारा उसे बारंबार समझाया कि तुम श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें सीताको सादर लौटा दो—इसीमें भलाई है ॥ १४ ॥

स च न प्रतिजग्राह रावणः कालचोदितः । उच्यमानं हितं वाक्यं विपरीत इवौषधम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘यद्यपि मैंने यह बात उसके हितके लिये ही कही थी, तथापि कालसे प्रेरित होनेके कारण रावणने मेरी बात नहीं मानी । ठीक उसी प्रकार, जैसे मरणासन्न पुरुष औषध नहीं लेता ॥ १५ ॥

सोऽहं परुषितस्तेन दासवच्चावमानितः । त्यक्त्वा पुत्रांश्च दारांश्च राघवं शरणं गतः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘यही नहीं, उसने मुझे बहुत-सी कठोर बातें सुनायीं और दासकी भाँति मेरा अपमान किया । इसलिये मैं अपने स्त्री-पुत्रोंको वहीं छोड़कर श्रीरघुनाथजीकी शरणमें आया हूँ ॥१६॥

निवेदयत मां क्षिप्रं राघवाय महात्मने । सर्वलोकशरण्याय विभीषणमुपस्थितम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘वानरो ! जो समस्त लोकोंको शरण देनेवाले हैं, उन महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर शीघ्र मेरे आगमनकी सूचना दो और उनसे कहो—‘शरणार्थी विभीषण सेवामें उपस्थित हुआ है’ ॥ १७ ॥

एतत्तु वचनं श्रुत्वा सुग्रीवो लघुविक्रमः । लक्ष्मणस्याग्रतो रामं संरब्धमिदमब्रवीत् ॥ १८ ॥

भावार्थ

विभीषणकी यह बात सुनकर शीघ्रगामी सुग्रीवने तुरंत ही भगवान् श्रीरामके पास जाकर लक्ष्मणके सामने ही कुछ आवेशके साथ इस प्रकार कहा—॥ १८ ॥

प्रविष्टः शत्रुसैन्यं हि प्राप्तः शत्रुरतर्कितः । निहन्यादन्तरं लब्ध्वा उलूको वायसानिव ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘प्रभो ! आज कोई वैरी, जो राक्षस होनेके कारण पहले हमारे शत्रु रावणकी सेनामें सम्मिलित हुआ था, अब अकस्मात् हमारी सेनामें प्रवेश पानेके लिये आ गया है । वह मौका पाकर हमें उसी तरह मार डालेगा, जैसे उल्लू कौओंका काम तमाम कर देता है ॥ १९ ॥

मन्त्रे व्यूहे नये चारे युक्तो भवितुमर्हसि । वानराणां च भद्रं ते परेषां च परंतप ॥ २० ॥

भावार्थ

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुनन्दन ! अतः आपको अपने वानरसैनिकोंपर अनुग्रह और शत्रुओंका निग्रह करनेके लिये कार्याकार्यके विचार, सेनाकी मोर्चेबंदी, नीतियुक्त उपायोंके प्रयोग तथा गुप्तचरोंकी नियुक्ति आदिके विषयमें सतत सावधान रहना चाहिये । ऐसा करनेसे ही आपका भला होगा ॥ २० ॥

अन्तर्धानगता ह्येते राक्षसाः कामरूपिणः । शूराश्च निकृतिज्ञाश्च तेषां जातु न विश्वसेत् ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘ये राक्षसलोग मनमाना रूप धारण कर सकते हैं । इनमें अन्तर्धान होनेकी भी शक्ति होती है। शूरवीर और मायावी तो ये होते ही हैं । इसलिये इनका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ २१ ॥

प्रणिधी राक्षसेन्द्रस्य रावणस्य भवेदयम् । अनुप्रविश्य सोऽस्मासु भेदं कुर्यान्न संशयः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘सम्भव है यह राक्षसराज रावणका कोई गुप्तचर हो । यदि ऐसा हुआ तो हमलोगोंमें घुसकर यह फूट पैदा कर देगा, इसमें संदेह नहीं ॥ २२ ॥

अथ वा स्वयमेवैष छिद्रमासाद्य बुद्धिमान् । अनुप्रविश्य विश्वस्ते कदाचित् प्रहरेदपि ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘अथवा यह बुद्धिमान् राक्षस छिद्र पाकर हमारी विश्वस्त सेनाके भीतर घुसकर कभी स्वयं ही हमलोगोंपर प्रहार कर बैठेगा, इस बातकी भी सम्भावना है ॥ २३ ॥

मित्राटविबलं चैव मौलभृत्यबलं तथा । सर्वमेतद् बलं ग्राह्यं वर्जयित्वा द्विषद्बलम् ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘मित्रोंकी, जंगली जातियोंकी तथा परम्परागत भृत्योंकी जो सेनाएँ हैं, इन सबका संग्रह तो किया जा सकता है; किंतु जो शत्रुपक्षसे मिले हुए हों, ऐसे सैनिकोंका संग्रह कदापि नहीं करना चाहिये ॥ २४ ॥

प्रकृत्या राक्षसो ह्येष भ्रातामित्रस्य वै प्रभो । आगतश्च रिपुः साक्षात् कथमस्मिंश्च विश्वसेत्॥ २५ ॥

भावार्थ

‘प्रभो ! यह स्वभावसे तो राक्षस है ही, अपनेको शत्रुका भाई भी बता रहा है । इस दृष्टिसे यह साक्षात् हमारा शत्रु ही यहाँ आ पहुँचा है; फिर इसपर कैसे विश्वास किया जा सकता है ॥ २५ ॥

रावणस्यानुजो भ्राता विभीषण इति श्रुतः । चतुर्भिः सह रक्षोभिर्भवन्तं शरणं गतः ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘रावणका छोटा भाई, जो विभीषणके नामसे प्रसिद्ध है, चार राक्षसोंके साथ आपकी शरणमें आया है ॥ २६ ॥

रावणेन प्रणीतं हि तमवेहि विभीषणम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये क्षमं क्षमवतां वर ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘आप उस विभीषणको रावणका भेजा हुआ ही समझें । उचित व्यापार करनेवालोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! मैं तो उसको कैद कर लेना ही उचित समझता हूँ ॥ २७ ॥

राक्षसो जिह्मया बुद्ध्या संदिष्टोऽयमिहागतः । प्रहर्तुं मायया छन्नो विश्वस्ते त्वयि चानघ ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘निष्पाप श्रीराम ! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि यह राक्षस रावणके कहनेसे ही यहाँ आया है । इसकी बुद्धिमें कुटिलता भरी है । यह मायासे छिपा रहेगा तथा जब आप इसपर पूरा विश्वास करके इसकी ओरसे निश्चिन्त हो जायँगे, तब यह आपहीपर चोट कर बैठेगा । इसी उद्देश्यसे इसका यहाँ आना हुआ है ॥ २८ ॥

वध्यतामेष तीव्रेण दण्डेन सचिवैः सह । रावणस्य नृशंसस्य भ्राता ह्येष विभीषणः ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘यह महाक्रूर रावणका भाई है, इसलिये इसे कठोर दण्ड देकर इसके मन्त्रियोंसहित मार डालना चाहिये’ ॥ २९ ॥

एवमुक्त्वा तु तं रामं संरब्धो वाहिनीपतिः । वाक्यज्ञो वाक्यकुशलं ततो मौनमुपागमत् ॥ ३० ॥

भावार्थ

बातचीतकी कला जाननेवाले एवं रोषमें भरे हुए सेनापति सुग्रीव प्रवचनकुशल श्रीरामसे ऐसी बातें कहकर चुप हो गये ॥ ३० ॥

सुग्रीवस्य तु तद् वाक्यं श्रुत्वा रामो महाबलः । समीपस्थानुवाचेदं हनुमत्प्रमुखान् कपीन् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

सुग्रीवका वह वचन सुनकर महाबली श्रीराम अपने निकट बैठे हुए हनुमान् आदि वानरोंसे इस प्रकार बोले—॥३१॥

यदुक्तं कपिराजेन रावणावरजं प्रति । वाक्यं हेतुमदत्यर्थं भवद्भिरपि च श्रुतम् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘वानरो ! वानरराज सुग्रीवने रावणके छोटे भाई विभीषणके विषयमें जो अत्यन्त युक्तियुक्त बातें कही हैं, वे तुम लोगोंने भी सुनी हैं ॥ ३२ ॥

सुहृदामर्थकृच्छ्रेषु युक्तं बुद्धिमता सदा । समर्थेनोपसंदेष्टुं शाश्वतीं भूतिमिच्छता ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘मित्रोंकी स्थायी उन्नति चाहनेवाले बुद्धिमान् एवं समर्थ पुरुषको कर्तव्याकर्तव्यके विषयमें संशय उपस्थित होनेपर सदा ही अपनी सम्मति देनी चाहिये’ ॥ ३३ ॥

इत्येवं परिपृष्टास्ते स्वं स्वं मतमतन्द्रिताः । सोपचारं तदा राममूचुः प्रियचिकीर्षवः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

इस प्रकार सलाह पूछी जानेपर श्रीरामका प्रिय करनेकी इच्छा रखनेवाले वे सब वानर आलस्य छोड़ उत्साहित हो सादर अपना-अपना मत प्रकट करने लगे—॥ ३४ ॥

अज्ञातं नास्ति ते किंचित् त्रिषु लोकेषु राघव । आत्मानं पूजयन् राम पृच्छस्यस्मान् सुहृत्तया ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! तीनों लोकोंमें कोई ऐसी बात नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो, तथापि हम आपके अपने ही अङ्ग हैं, अतः आप मित्रभावसे हमारा सम्मान बढ़ाते हुए हमसे सलाह पूछते हैं ॥ ३५ ॥

त्वं हि सत्यव्रतः शूरो धार्मिको दृढविक्रमः । परीक्ष्यकारी स्मृतिमान् निस्सृष्टात्मा सुहृत्सु च ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘आप सत्यव्रती, शूरवीर, धर्मात्मा, सुदृढ़ पराक्रमी, जाँच-बूझकर काम करनेवाले, स्मरणशक्तिसे सम्पन्न और मित्रोंपर विश्वास करके उन्हींके हाथोंमें अपने-आपको सौंप देनेवाले हैं ॥ ३६ ॥

तस्मादेकैकशस्तावद् ब्रुवन्तु सचिवास्तव । हेतुतो मतिसम्पन्नाः समर्थाश्च पुनः पुनः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘इसलिये आपके सभी बुद्धिमान् एवं सामर्थ्यशाली सचिव एक-एक करके बारी-बारीसे अपने युक्तियुक्त विचार प्रकट करें’ ॥ ३७ ॥

इत्युक्ते राघवायाथ मतिमानङ्गदोऽग्रतः । विभीषणपरीक्षार्थमुवाच वचनं हरिः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

वानरोंके ऐसा कहनेपर सबसे पहले बुद्धिमान् वानर अङ्गद विभीषणकी परीक्षाके लिये सुझाव देते हुए श्रीरघुनाथजीसे बोले—॥ ३८ ॥

शत्रोः सकाशात् सम्प्राप्तः सर्वथा तर्क्य एव हि । विश्वासनीयः सहसा न कर्तव्यो विभीषणः ॥ ३९ ॥

भावार्थ

‘भगवन् ! विभीषण शत्रुके पाससे आया है, इसलिये उसपर अभी शङ्का ही करनी चाहिये । उसे सहसा विश्वासपात्र नहीं बना लेना चाहिये ॥ ३९ ॥

छादयित्वाऽऽत्मभावं हि चरन्ति शठबुद्धयः । प्रहरन्ति च रन्ध्रेषु सोऽनर्थः सुमहान् भवेत् ॥ ४० ॥

भावार्थ

‘बहुत-से शठतापूर्ण विचार रखनेवाले लोग अपने मनोभावको छिपाकर विचरते रहते हैं और मौका पाते ही प्रहार कर बैठते हैं । इससे बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता है ॥ ४० ॥

अर्थानर्थौ विनिश्चित्य व्यवसायं भजेत ह । गुणतः संग्रहं कुर्याद् दोषतस्तु विसर्जयेत् ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘अतः गुण-दोषका विचार करके पहले यह निश्चय कर लेना चाहिये कि इस व्यक्तिसे अर्थकी प्राप्ति होगी या अनर्थकी ( यह हितका साधन करेगा या अहितका ) । यदि उसमें गुण हों तो उसे स्वीकार करे और यदि दोष दिखायी दें तो त्याग दे ॥ ४१ ॥

यदि दोषो महांस्तस्मिंस्त्यज्यतामविशङ्कितम् । गुणान् वापि बहून् ज्ञात्वा संग्रहः क्रियतां नृप ॥ ४२ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! यदि उसमें महान् दोष हो तो निःसंदेह उसका त्याग कर देना ही उचित है । गुणोंकी दृष्टिसे यदि उसमें बहुत-से सद्गुणोंके होनेका पता लगे, तभी उस व्यक्तिको अपनाना चाहिये’ ॥ ४२ ॥

शारभस्त्वथ निश्चित्य सार्थं वचनमब्रवीत् । क्षिप्रमस्मिन् नरव्याघ्र चारः प्रतिविधीयताम् ॥ ४३ ॥

भावार्थ

तदनन्तर शरभने सोच-विचारकर यह सार्थक बात कही— ‘पुरुषसिंह ! इस विभीषणके ऊपर शीघ्र ही कोई गुप्तचर नियुक्त कर दिया जाय ॥ ४३ ॥

प्रणिधाय हि चारेण यथावत् सूक्ष्मबुद्धिना । परीक्ष्य च ततः कार्यो यथान्यायं परिग्रहः ॥ ४४ ॥

भावार्थ

‘सूक्ष्म बुद्धिवाले गुप्तचरको भेजकर उसके द्वारा यथावत्रूपसे उसकी परीक्षा कर ली जाय । इसके बाद यथोचित रीतिसे उसका संग्रह करना चाहिये’ ॥ ४४ ॥

जाम्बवांस्त्वथ सम्प्रेक्ष्य शास्त्रबुद्ध्या विचक्षणः । वाक्यं विज्ञापयामास गुणवद् दोषवर्जितम् ॥ ४५ ॥

भावार्थ

इसके बाद परम चतुर जाम्बवान्ने शास्त्रीय बुद्धिसे विचार करके ये गुणयुक्त दोषरहित वचन कहे—॥ ४५ ॥

बद्धवैराच्च पापाच्च राक्षसेन्द्राद् विभीषणः । अदेशकाले सम्प्राप्तः सर्वथा शङ्क्यतामयम् ॥ ४६ ॥ ततो मैन्दस्तु सम्प्रेक्ष्य नयापनयकोविदः । वाक्यं वचनसम्पन्नो बभाषे हेतुमत्तरम् ॥ ४७ ॥

भावार्थ

‘राक्षसराज रावण बड़ा पापी है । उसने हमारे साथ वैर बाँध रक्खा है और यह विभीषण उसीके पाससे आ रहा है । वास्तवमें न तो इसके आनेका यह समय है और न स्थान ही । इसलिये इसके विषयमें सब प्रकारसे सशङ्क ही रहना चाहिये’ ॥ तदनन्तर नीति और अनीतिके ज्ञाता तथा वाग्वैभवसे सम्पन्न मैन्दने सोच-विचारकर यह युक्तियुक्त उत्तम बात कही—॥ ४७ ॥

अनुजो नाम तस्यैष रावणस्य विभीषणः । पृच्छ्यतां मधुरेणायं शनैर्नरपतीश्वर ॥ ४८ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! यह विभीषण रावणका छोटा भाई ही तो है, इसलिये इससे मधुर व्यवहारके साथ धीरे-धीरे सब बातें पूछनी चाहिये ॥ ४८ ॥

भावमस्य तु विज्ञाय तत्त्वतस्तं करिष्यसि । यदि दुष्टो न दुष्टो वा बुद्धिपूर्वं नरर्षभ ॥ ४९ ॥

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ ! फिर इसके भावको समझकर आप बुद्धिपूर्वक यह ठीक-ठीक निश्चय करें कि यह दुष्ट है या नहीं । उसके बाद जैसा उचित हो, वैसा करना चाहिये’ ॥ ४९ ॥

अथ संस्कारसम्पन्नो हनूमान् सचिवोत्तमः । उवाच वचनं श्लक्ष्णमर्थवन्मधुरं लघु ॥ ५० ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् सचिवोंमें श्रेष्ठ और सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानजनित संस्कारसे युक्त हनुमान्जीने ये श्रवणमधुर, सार्थक, सुन्दर और संक्षिप्त वचन कहे—॥ ५० ॥

न भवन्तं मतिश्रेष्ठं समर्थं वदतां वरम् । अतिशाययितुं शक्तो बृहस्पतिरपि ब्रुवन् ॥ ५१ ॥

भावार्थ

‘प्रभो ! आप बुद्धिमानोंमें उत्तम, सामर्थ्यशाली और वक्ताओंमें श्रेष्ठ हैं । यदि बृहस्पति भी भाषण दें तो वे अपनेको आपसे बढ़कर वक्ता नहीं सिद्ध कर सकते ॥ ५१ ॥

न वादान्नापि संघर्षान्नाधिक्यान्न च कामतः । वक्ष्यामि वचनं राजन् यथार्थं राम गौरवात् ॥ ५२ ॥

भावार्थ

‘महाराज श्रीराम ! मैं जो कुछ निवेदन करूँगा, वह वाद-विवाद या तर्क, स्पर्धा, अधिक बुद्धिमत्ताके अभिमान अथवा किसी प्रकारकी कामनासे नहीं करूँगा । मैं तो कार्यकी गुरुतापर दृष्टि रखकर जो यथार्थ समझूँगा, वही बात कहूँगा ॥ ५२ ॥

अर्थानर्थनिमित्तं हि यदुक्तं सचिवैस्तव । तत्र दोषं प्रपश्यामि क्रिया नह्युपपद्यते ॥ ५३ ॥

भावार्थ

‘आपके मन्त्रियोंने जो अर्थ और अनर्थके निर्णयके लिये गुण-दोषकी परीक्षा करनेका सुझाव दिया है, उसमें मुझे दोष दिखायी देता है; क्योंकि इस समय परीक्षा लेना कदापि सम्भव नहीं है ॥ ५३ ॥

ऋते नियोगात् सामर्थ्यमवबोद्धुं न शक्यते । सहसा विनियोगोऽपि दोषवान् प्रतिभाति मे ॥ ५४ ॥

भावार्थ

‘विभीषण आश्रय देनेके योग्य हैं या नहीं—इसका निर्णय उसे किसी कामें नियुक्त किये बिना नहीं हो सकता और सहसा उसे किसी कामें लगा देना भी मुझे सदोष ही प्रतीत होता है ॥ ५४ ॥

चारप्रणिहितं युक्तं यदुक्तं सचिवैस्तव । अर्थस्यासम्भवात् तत्र कारणं नोपपद्यते ॥ ५५ ॥

भावार्थ

‘आपके मन्त्रियोंने जो गुप्तचर नियुक्त करनेकी बात कही है, उसका कोई प्रयोजन न होनेसे वैसा करनेका कोई युक्तियुक्त कारण नहीं दिखायी देता । ( जो दूर रहता हो और जिसका वृत्तान्त ज्ञात न हो, उसीके लिये गुप्तचरकी नियुक्ति की जाती है । जो सामने खड़ा है और स्पष्टरूपसे अपना वृत्तान्त बता रहा है, उसके लिये गुप्तचर भेजनेकी क्या आवश्यकता है ) ॥ ५५ ॥

अदेशकाले सम्प्राप्त इत्ययं यद् विभीषणः । विवक्षा तत्र मेऽस्तीयं तां निबोध यथामति ॥ ५६ ॥

भावार्थ

‘इसके सिवा जो यह कहा गया है कि विभीषणका इस समय यहाँ आना देश-कालके अनुरूप नहीं है । उसके विषयमें भी मैं अपनी बुद्धिके अनुसार कुछ कहना चाहता हूँ । आप सुनें ॥ ५६ ॥

एष देशश्च कालश्च भवतीह यथा तथा । पुरुषात् पुरुषं प्राप्य तथा दोषगुणावपि ॥ ५७ ॥ दौरात्म्यं रावणे दृष्ट्वा विक्रमं च तथा त्वयि । युक्तमागमनं ह्यत्र सदृशं तस्य बुद्धितः ॥ ५८॥

भावार्थ

‘उसके यहाँ आनेका यही उत्तम देश और काल है, यह बात जिस तरह सिद्ध होती है, वैसा बता रहा हूँ । विभीषण एक नीच पुरुषके पाससे चलकर एक श्रेष्ठ पुरुषके पास आया है । उसने दोनोंके दोषों और गुणोंका भी विवेचन किया है । तत्पश्चात् रावणमें दुष्टता और आपमें पराक्रम देख वह रावणको छोड़कर आपके पास आ गया है । इसलिये उसका यहाँ आगमन सर्वथा उचित और उसकी उत्तम बुद्धिके अनुरूप है ॥ ५७-५८॥

अज्ञातरूपैः पुरुषैः स राजन् पृच्छ्यतामिति । यदुक्तमत्र मे प्रेक्षा काचिदस्ति समीक्षिता ॥ ५९॥

भावार्थ

‘राजन् ! किसी मन्त्रीके द्वारा जो यह कहा गया है कि अपरिचित पुरुषोंद्वारा इससे सारी बातें पूछी जायँ । उसके विषयमें मेरा जाँच-बूझकर निश्चित किया हुआ विचार है, जिसे आपके सामने रखता हूँ ॥ ५९ ॥

पृच्छ्यमानो विशङ्केत सहसा बुद्धिमान् वचः । तत्र मित्रं प्रदुष्येत मिथ्या पृष्टं सुखागतम् ॥ ६० ॥

भावार्थ

‘यदि कोई अपरिचित व्यक्ति यह पूछेगा कि तुम कौन हो, कहाँसे आये हो ? किसलिये आये हो ? इत्यादि, तब कोई बुद्धिमान् पुरुष सहसा उस पूछनेवालेपर संदेह करने लगेगा और यदि उसे यह मालूम हो जायगा कि सब कुछ जानते हुए भी मुझसे झूठे ही पूछा जा रहा है, तब सुखके लिये आये हुए उस नवागत मित्रका हृदय कलुषित हो जायगा (इस प्रकार हमें एक मित्रके लाभसे वञ्चित होना पड़ेगा ) ॥ ६० ॥

अशक्यं सहसा राजन् भावो बोद्धुं परस्य वै । अन्तरेण स्वरैर्भिन्नैर्नैपुण्यं पश्यतां भृशम् ॥ ६१ ॥

भावार्थ

‘इसके सिवा महाराज ! किसी दूसरेके मनकी बातको सहसा समझ लेना असम्भव है । बीच-बीचमें स्वरभेदसे आप अच्छी तरह यह निश्चय कर लें कि यह साधुभावसे आया है या असाधुभावसे ॥ ६१ ॥

न त्वस्य ब्रुवतो जातु लक्ष्यते दुष्टभावता । प्रसन्नं वदनं चापि तस्मान्मे नास्ति संशयः ॥ ६२ ॥

भावार्थ

‘इसकी बातचीतसे भी कभी इसका दुर्भाव नहीं लक्षित होता । इसका मुख भी प्रसन्न है । इसलिये मेरे मनमें इसके प्रति कोई संदेह नहीं है ॥ ६२ ॥

अशङ्कितमतिः स्वस्थो न शठः परिसर्पति । न चास्य दुष्टवागस्ति तस्मान्मे नास्ति संशयः ॥ ६३ ॥

भावार्थ

‘दुष्ट पुरुष कभी निःशङ्क एवं स्वस्थचित्त होकर सामने नहीं आ सकता । इसके सिवा इसकी वाणी भी दोषयुक्त नहीं है । अतः मुझे इसके विषयमें कोई संदेह नहीं है ॥ ६३ ॥

आकारश्छाद्यमानोऽपि न शक्यो विनिगूहितुम् । बलाद्धि विवृणोत्येव भावमन्तर्गतं नृणाम् ॥ ६४ ॥

भावार्थ

‘कोई अपने आकारको कितना ही क्यों न छिपाये, उसके भीतरका भाव कभी छिप नहीं सकता । बाहरका आकार पुरुषोंके आन्तरिक भावको बलात् प्रकट कर देता है ॥ ६४ ॥

देशकालोपपन्नं च कार्यं कार्यविदां वर । सफलं कुरुते क्षिप्रं प्रयोगेणाभिसंहितम् ॥ ६५ ॥

भावार्थ

‘कार्यवेत्ताओंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! विभीषणका यहाँ आग-मनरूप जो कार्य है, वह देश-कालके अनुरूप ही है । ऐसा कार्य यदि योग्य पुरुषके द्वारा सम्पादित हो तो अपने-आपको शीघ्र सफल बनाता है ॥ ६५ ॥

उद्योगं तव सम्प्रेक्ष्य मिथ्यावृत्तं च रावणम् । वालिनं च हतं श्रुत्वा सुग्रीवं चाभिषेचितम् ॥ ६६ ॥ राज्यं प्रार्थयमानस्तु बुद्धिपूर्वमिहागतः । एतावत् तु पुरस्कृत्य युज्यते तस्य संग्रहः ॥ ६७ ॥

भावार्थ

‘आपके उद्योग, रावणके मिथ्याचार, वालीके वध और सुग्रीवके राज्याभिषेकका समाचार जान-सुनकर राज्य पानेकी इच्छासे यह समझ-बूझकर ही यहाँ आपके पास आया है ( इसके मनमें यह विश्वास है कि शरणागतवत्सल दयालु श्रीराम अवश्य ही मेरी रक्षा करेंगे और राज्य भी दे देंगे )। इन्हीं सब बातोंको दृष्टिमें रखकर विभीषणका संग्रह करना—उसे अपना लेना मुझे उचित जान पड़ता है ॥ ६६-६७ ॥

यथाशक्ति मयोक्तं तु राक्षसस्यार्जवं प्रति । प्रमाणं त्वं हि शेषस्य श्रुत्वा बुद्धिमतां वर ॥ ६८ ॥

भावार्थ

‘बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ रघुनाथ ! इस प्रकार इस राक्षसकी सरलता और निर्दोषताके विषयमें मैंने यथाशक्ति निवेदन किया। इसे सुनकर आगे आप जैसा उचित समझें, वैसा करें’ ॥ ६८॥

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