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युद्धकाण्ड, सर्ग 15

बृहस्पतेस्तुल्यमतेर्वचस्त- न्निशम्य यत्नेन विभीषणस्य । ततो महात्मा वचनं बभाषे तत्रेन्द्रजिन्नैर्ऋतयूथमुख्यः ॥ १ ॥

भावार्थ

विभीषण बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् थे । उनके वचनोंको जैसे-तैसे बड़े कष्टसे सुनकर राक्षसयूथपतियोंमें प्रधान महाकाय इन्द्रजित्ने वहाँ यह बात कही—॥ १ ॥

किं नाम ते तात कनिष्ठ वाक्य- मनर्थकं वै बहुभीतवच्च । अस्मिन् कुले योऽपि भवेन्न जातः सोऽपीदृशं नैव वदेन्न कुर्यात् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘मेरे छोटे चाचा ! आप बहुत डरे हुएकी भाँति यह कसी निरर्थक बात कह रहे हैं ? जिसने इस कुलमें जन्म न लिया होगा, वह पुरुष भी न तो ऐसी बात कहेगा और न ऐसा काम ही करेगा ॥ २ ॥

सत्त्वेन वीर्येण पराक्रमेण धैर्येण शौर्येण च तेजसा च । एकः कुलेऽस्मिन् पुरुषो विमुक्तो विभीषणस्तात कनिष्ठ एषः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘पिताजी ! हमारे इस राक्षसकुलमें एकमात्र ये छोटे चाचा विभीषण ही बल, वीर्य, पराक्रम, धैर्य, शौर्य और तेजसे रहित हैं ॥ ३ ॥

किं नाम तौ मानुषराजपुत्रा- वस्माकमेकेन हि राक्षसेन । सुप्राकृतेनापि निहन्तुमेतौ शक्यौ कुतो भीषयसे स्म भीरो ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘वे दोनों मानव राजकुमार क्या हैं ? उन्हें तो हमारा एक साधारण-सा राक्षस भी मार सकता है; फिर मेरे डरपोक चाचा ! आप हमें क्यों डरा रहे हैं ? ॥ ४ ॥

त्रिलोकनाथो ननु देवराजः शक्रो मया भूमितले निविष्टः। भयार्पिताश्चापि दिशः प्रपन्नाः सर्वे तदा देवगणाः समग्राः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘मैंने तीनों लोकोंके स्वामी देवराज इन्द्रको भी स्वर्गसे हटाकर इस भूतलपर ला बिठाया था । उस समय सारे देवताओंने भयभीत हो भागकर सम्पूर्ण दिशाओंकी शरण ली थी ॥ ५ ॥

ऐरावतो निःस्वनमुञ्चदन् स निपातितो भूमितले मया तु।‘ विकृष्य दन्तौ तु मया प्रसह्य वित्रासिता देवगणाः समग्राः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘मैंने हठपूर्वक ऐरावत हाथीके दोनों दाँत उखाड़कर उसे स्वर्गसे पृथ्वीपर गिरा दिया था । उस समय वह जोर-जोरसे चिग्घाड़ रहा था । अपने इस पराक्रमद्वारा मैंने सम्पूर्ण देवताओंको आतङ्कमें डाल दिया था ॥ ६ ॥

सोऽहं सुराणामपि दर्पहन्ता दैत्योत्तमानामपि शोककर्ता । कथं नरेन्द्रात्मजयोर्न शक्तो मनुष्ययोः प्राकृतयोः सुवीर्यः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘जो देवताओंके भी दर्पका दलन कर सकता है, बड़े-बड़े दैत्योंको भी शोकमग्न कर देनेवाला है तथा जो उत्तम बल-पराक्रमसे सम्पन्न है, वही मुझ-जैसा वीर मनुष्य-जातिके दो साधारण राजकुमारोंका सामना कैसे नहीं कर सकता है ?‘॥७॥

अथेन्द्रकल्पस्य दुरासदस्य महौजसस्तद् वचनं निशम्य । ततो महार्थं वचनं बभाषे विभीषणः शस्त्रभृतां वरिष्ठः ॥ ८ ॥

भावार्थ

इन्द्रतुल्य तेजस्वी महापराक्रमी दुर्जय वीर इन्द्रजित्की यह बात सुनकर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ विभीषणने ये महान् अर्थसे युक्त वचन कहे—॥ ८ ॥

न तात मन्त्रे तव निश्चयोऽस्ति बालस्त्वमद्याप्यविपक्वबुद्धिः । तस्मात् त्वयाप्यात्मविनाशनाय वचोऽर्थहीनं बहु विप्रलप्तम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘तात ! अभी तुम बालक हो । तुम्हारी बुद्धि कच्ची है । तुम्हारे मनमें कर्तव्य और अकर्तव्यका यथार्थ निश्चय नहीं हुआ है । इसीलिये तुम भी अपने ही विनाशके लिये बहुत-सी निरर्थक बातें बक गये हो ॥ ९ ॥

पुत्रप्रवादेन तु रावणस्य त्वमिन्द्रजिन्मित्रमुखोऽसि शत्रुः। यस्येदृशं राघवतो विनाशं निशम्य मोहादनुमन्यसे त्वम् ॥ १० ॥

भावार्थ

‘इन्द्रजित् ! तुम रावणके पुत्र कहलाकर भी ऊपरसे ही उसके मित्र हो । भीतरसे तो तुम पिताके शत्रु ही जान पड़ते हो । यही कारण है कि तुम श्रीरघुनाथजीके द्वारा राक्षसराजके विनाशकी बातें सुनकर भी मोहवश उन्हींकी हाँ-में-हाँ मिला रहे हो ॥ १० ॥

त्वमेव वध्यश्च सुदुर्मतिश्च स चापि वध्योय इहानयत् त्वाम् । बालं दृढं साहसिकं च योऽद्य प्रावेशयन्मन्त्रकृतां समीपम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘तुम्हारी बुद्धि बहुत ही खोटी है । तुम स्वयं तो मार डालनेके योग्य हो ही, जो तुम्हें यहाँ बुला लाया है, वह भी वधके ही योग्य है । जिसने आज तुम-जैसे अत्यन्त दुःसाहसी बालकको इन सलाहकारोंके समीप आने दिया है, वह प्राणदण्ड-का ही अपराधी है ॥ ११ ॥

मूढोऽप्रगल्भोऽविनयोपपन्न- स्तीक्ष्णस्वभावोऽल्पमतिर्दुरात्मा । मूर्खस्त्वमत्यन्तसुदुर्मतिश्च त्वमिन्द्रजिद् बालतया ब्रवीषि ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘इन्द्रजित् ! तुम अविवेकी हो । तुम्हारी बुद्धि परिपक्व नहीं है । विनय तो तुम्हें छूतक नहीं गयी है । तुम्हारा स्वभाव बड़ा तीखा और बुद्धि बहुत थोड़ी है । तुम अत्यन्त दुर्बुद्धि, दुरात्मा और मूर्ख हो । इसीलिये बालकोंकी-सी वे सिर-पैरकी बातें करते हो ॥ १२ ॥

को ब्रह्मदण्डप्रतिमप्रकाशा- नर्चिष्मतः कालनिकाशरूपान् । सहेत बाणान् यमदण्डकल्पान् समक्षमुक्तान् युधि राघवेण ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘भगवान् श्रीरामके द्वारा युद्धके मुहानेपर शत्रुओंके समक्ष छोड़े गये तेजस्वी बाण साक्षात् ब्रह्मदण्डके समान प्रकाशित होते हैं, कालके समान जान पड़ते हैं और यमदण्डके समान भयंकर होते हैं । भला, उन्हें कौन सह सकता है ? ॥ १३ ॥

धनानि रत्नानि सुभूषणानि वासांसि दिव्यानि मणींश्च चित्रान्। सीतां च रामाय निवेद्य देवीं वसेम राजन्निह वीतशोकाः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘अतः राजन् ! हमलोग धन, रत्न, सुन्दर आभूषण, दिव्य वस्त्र, विचित्र मणि और देवी सीताको श्रीरामकी सेवामें समर्पित करके ही शोकरहित होकर इस नगरमें निवास कर सकते हैं’ ॥ १४ ॥

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