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युद्धकाण्ड, सर्ग 127

श्रुत्वा तु परमानन्दं भरतः सत्यविक्रमः । हृष्टमाज्ञापयामास शत्रुघ्नं परवीरहा ॥ १ ॥ दैवतानि च सर्वाणि चैत्यानि नगरस्य च । सुगन्धमाल्यैर्वादित्रैरर्चन्तु शुचयो नराः ॥ २ ॥

भावार्थ

यह परमानन्दमय समाचार सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सत्यपराक्रमी भरतने शत्रुघ्नको हर्षपूर्वक आज्ञा दी—॥ ‘शुद्धाचारी पुरुष कुलदेवताओंका तथा नगरके सभी देवस्थानोंका गाजे-बाजेके साथ सुगन्धित पुष्पोंद्वारा पूजन करें ॥ २ ॥

सूताः स्तुतिपुराणज्ञाः सर्वे वैतालिकास्तथा । सर्वे वादित्रकुशला गणिकाश्चैव सर्वशः ॥ ३ ॥ राजदारास्तथामात्याः सैन्याः सेनाङ्गनागणाः । ब्राह्मणाश्च सराजन्याः श्रेणीमुख्यास्तथा गणाः ॥ ४ ॥ अभिनिर्यान्तु रामस्य द्रष्टुं शशिनिभं मुखम् ।

भावार्थ

‘स्तुति और पुराणोंके जानकार सूत, समस्त वैतालिक ( भाँट ), बाजे बजानेमें कुशल सब लोग, सभी गणिकाएँ, राजरानियाँ, मन्त्रीगण, सेनाएँ, सैनिकोंकी स्त्रियाँ, ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा व्यवसायी संघके मुखिया लोग श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रका दर्शन करनेके लिये नगरसे बाहर चलें’ ॥३-४½॥

भरतस्य वचः श्रुत्वा शत्रुघ्नः परवीरहा ॥ ५ ॥ विष्टीरनेकसाहस्रीश्चोदयामास भागशः । समीकुरुत निम्नानि विषमाणि समानि च ॥ ६ ॥

भावार्थ

भरतजीकी यह बात सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले शत्रुघ्नने कई हजार मजदूरोंकी अलग-अलग टोलियाँ बनाकर उन्हें आज्ञा दी—‘तुमलोग ऊँची-नीची भूमियोंको समतल बना दो ॥ ५-६ ॥

स्थानानि च निरस्यन्तां नन्दिग्रामादितः परम् । सिञ्चन्तु पृथिवीं कृत्स्नां हिमशीतेन वारिणा ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘अयोध्यासे नन्दिग्रामतकका मार्ग साफ कर दो, आसपासकी सारी भूमिपर बर्फकी तरह ठंडे जलका छिड़काव कर दो ॥ ७ ॥

ततोऽभ्यवकिरन्त्वन्ये लाजैः पुष्पैश्च सर्वतः । समुच्छ्रितपताकास्तु रथ्याः पुरवरोत्तमे ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘तत्पश्चात् दूसरे लोग रास्तेमें सब ओर लावा और फूल बिखेर दें । इस श्रेष्ठ नगरकी सड़कोंके अगल-बगलमें ऊँची पताकाएँ फहरा दी जायँ ॥ ८ ॥

शोभयन्तु च वेश्मानि सूर्यस्योदयनं प्रति । स्रग्दाममुक्तपुष्पैश्च सुवर्णैः पञ्चवर्णकैः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘कल सूर्योदयतक लोग नगरके सब मकानोंको सुनहरी पुष्पमालाओं, घनीभूत फूलोंके मोटे गजरों, सूतके बन्धनसे रहित कमल आदिके पुष्पों तथा पंचरंगे अलङ्कारोंसे सजा दें ॥ ९ ॥

राजमार्गमसम्बाधं किरन्तु शतशो नराः । ततस्तच्छासनं श्रुत्वा शत्रुघ्नस्य मुदान्विताः ॥ १० ॥

भावार्थ

‘राजमार्गपर अधिक भीड़ न हो, इसकी व्यवस्थाके लिये सैकड़ों मनुष्य सब ओर लग जायँ ।’ शत्रुघ्नका वह आदेश सुनकर सब लोग बड़ी प्रसन्नताके साथ उसके पालनमें लग गये ॥ १० ॥

धृष्टिर्जयन्तो विजयः सिद्धार्थश्चार्थसाधकः । अशोको मन्त्रपालश्च सुमन्त्रश्चापि निर्ययुः ॥ ११ ॥ मत्तैर्नागसहस्रैश्च सध्वजैः सुविभूषितैः ।

भावार्थ

धृष्टि, जयन्त, विजय, सिद्धार्थ, अर्थसाधक, अशोक, मन्त्रपाल और सुमन्त्र—ये आठों मन्त्री ध्वजा और आभूषणोंसे विभूषित मतवाले हाथियोंपर चढ़कर चले ॥ ११½ ॥

अपरे हेमकक्षाभिः सगजाभिः करेणुभिः ॥ १२ ॥ निर्ययुस्तुरगाक्रान्ता रथैश्च सुमहारथाः ।

भावार्थ

दूसरे बहुतसे महारथी वीर सुनहरे रस्सोंसे कसी हुई हथिनियों, हाथियों, घोड़ों और रथोंपर सवार होकर निकले १२½

शक्त्यृष्टिपाशहस्तानां सध्वजानां पताकिनाम् ॥ १३ ॥ तुरगाणां सहस्रैश्च मुख्यैर्मुख्यतरान्वितैः । पदातीनां सहस्रैश्च वीराः परिवृता ययुः ॥ १४ ॥

भावार्थ

ध्वजा-पताकाओंसे विभूषित हजारों अच्छे-अच्छे घोड़ों और घुड़सवारों तथा हाथोंमें शक्ति, ऋष्टि और पाश धारण करनेवाले सहस्रों पैदल योद्धाओंसे घिरे हुए वीर पुरुष श्रीरामकी अगवानीके लिये गये ॥ १३-१४ ॥

ततो यानान्युपारूढाः सर्वा दशरथस्त्रियः । कौसल्यां प्रमुखे कृत्वा सुमित्रां चापि निर्ययुः ॥ १५ ॥ कैकेय्या सहिताः सर्वा नन्दिग्राममुपागमन् ॥ १६ ॥

भावार्थ

तदनन्तर राजा दशरथकी सभी रानियाँ सवारियोंपर चढ़कर कौसल्या और सुमित्राको आगे करके निकलीं तथा कैकेयी-सहित सब-की-सब नन्दिग्राममें आ पहुँचीं ॥ १५-१६ ॥

द्विजातिमुख्यैर्धर्मात्मा श्रेणीमुख्यैः सनैगमैः । माल्यमोदकहस्तैश्च मन्त्रिभिर्भरतो वृतः ॥ १७ ॥ शङ्खभेरीनिनादैश्च बन्दिभिश्चाभिनन्दितः । आर्यपादौ गृहीत्वा तु शिरसा धर्मकोविदः ॥ १८ ॥

भावार्थ

धर्मात्मा एवं धर्मज्ञ भरत मुख्य-मुख्य ब्राह्मणों, व्यवसायी वर्गके प्रधानों, वैश्यों तथा हाथोंमें माला और मिठाई लिये मन्त्रियोंसे घिरकर अपने बड़े भाईकी चरणपादुकाओंको सिरपर धारण किये शङ्खों और भेरियोंकी गम्भीर ध्वनिके साथ चले । उस समय बन्दीजन उनका अभिनन्दन कर रहे थे ॥ १७–१८ ॥

पाण्डुरं छत्रमादाय शुक्लमाल्योपशोभितम् । शुक्ले च वालव्यजने राजार्हे हेमभूषिते ॥ १९ ॥

भावार्थ

श्वेत मालाओंसे सुशोभित सफेद रंगका छत्र तथा राजाओंके योग्य सोनेसे मढ़े हुए दो श्वेत चँवर भी उन्होंने अपने साथ ले रक्खे थे ॥ १९ ॥

उपवासकृशो दीनश्चीरकृष्णाजिनाम्बरः । भ्रातुरागमनं श्रुत्वा तत्पूर्वं हर्षमागतः ॥ २० ॥

भावार्थ

भरतजी उपवासके कारण दीन और दुर्बल हो रहे थे । वे चीर-वस्त्र और कृष्णमृगचर्म धारण किये थे । भाईका आगमन सुनकर पहले-पहल उन्हें महान् हर्ष हुआ था ॥ २० ॥

प्रत्युद्ययौ यदा रामं महात्मा सचिवैः सह । अश्वानां खुरशब्दैश्च रथनेमिस्वनेन च ॥ २१ ॥ शङ्खदुन्दुभिनादेन संचचालेव मेदिनी । गजानां बृंहितैश्चापि शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः ॥ २२ ॥

भावार्थ

महात्मा भरत उस समय श्रीरामकी अगवानीके लिये आगे बढ़े । घोड़ोंकी टापों, रथके पहियोंकी नेमियों और शङ्खों एवं दुन्दुभियोंके गम्भीर नादोंसे सारी पृथ्वी हिलती-सी जान पड़ती थी । शङ्खों और दुन्दुभियोंकी ध्वनियोंसे मिले हुए हाथियोंके गर्जन-शब्द भी भूतलको कम्पित-सा किये देते थे ॥ २१-२२ ॥

कृत्स्नं तु नगरं तत् तु नन्दिग्राममुपागमत् । समीक्ष्य भरतो वाक्यमुवाच पवनात्मजम् ॥ २३ ॥

भावार्थ

भरतजीने जब देखा कि अयोध्यापुरीके सभी नागरिक नन्दिग्राममें आ गये हैं, तब उन्होंने पवनपुत्र हनुमान्जीसे कहा—॥ २३ ॥

कच्चिन्न खलु कापेयी सेव्यते चलचित्तता । नहि पश्यामि काकुत्स्थं राममार्यं परंतपम् ॥ २४ ॥ कच्चिन्न चानुदृश्यन्ते कपयः कामरूपिणः ।

भावार्थ

‘वानर-वीर ! वानरोंका चित्त स्वभावतः चञ्चल होता है । कहीं आपने भी उसी गुणका सेवन तो नहीं किया है—श्रीरामके आनेकी झूठी ही खबर तो नहीं उड़ा दी है; क्योंकि मुझे अभीतक शत्रुओंको संताप देनेवाले ककुत्स्थकुलभूषण आर्य श्रीरामके दर्शन नहीं हो रहे हैं तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर भी कहीं दृष्टिगोचर नहीं हो रहे हैं ?’ ॥ २४½ ॥

अथैवमुक्ते वचने हनूमानिदमब्रवीत् ॥ २५ ॥ अर्थ्यं विज्ञापयन्नेव भरतं सत्यविक्रमम् ।

भावार्थ

भरतजीके ऐसा कहनेपर हनुमान्जीने सार्थक एवं सत्य बात बतानेके लिये उन सत्यपराक्रमी भरतजीसे कहा—॥२५½॥

सदाफलान् कुसुमितान् वृक्षान् प्राप्य मधुस्रवान् ॥२६॥ भरद्वाजप्रसादेन मत्तभ्रमरनादितान् । तस्य चैव वरो दत्तो वासवेन परंतप ॥ २७ ॥ ससैन्यस्य तदातिथ्यं कृतं सर्वगुणान्वितम् ।

भावार्थ

‘मुनिवर भरद्वाजजीकी कृपासे रास्तेके सभी वृक्ष सदा फूलने-फलनेवाले हो गये हैं और उनसे मधुकी धाराएँ गिरती हैं । उन वृक्षोंपर मतवाले भ्रमर निरन्तर गूँजते रहते हैं । उन्हें पाकर वानरलोग अपनी भूख-प्यास मिटाने लगे हैं ॥ ‘परंतप ! देवराज इन्द्रने भी श्रीरामचन्द्रजीको ऐसा ही वरदान दिया था । अतएव भरद्वाजजीने सेनासहित श्रीरामचन्द्रजीका सर्वगुणसम्पन्न--साङ्गोपाङ्ग आतिथ्य-सत्कार किया है ॥ २७½ ॥

निःस्वनः श्रूयते भीमः प्रहृष्टानां वनौकसाम् ॥ २८ ॥ मन्ये वानरसेना सा नदीं तरति गोमतीम् ।

भावार्थ

‘किंतु देखिये, अब हर्षसे भरे हुए वानरोंका भयंकर कोलाहल सुनायी देता है । मालूम होता है इस समय वानर-सेना गोमतीको पार कर रही है ॥ २८½ ॥

रजोवर्षं समुद्भूतं पश्य सालवनं प्रति ॥ २९ ॥ मन्ये सालवनं रम्यं लोलयन्ति प्लवंगमाः ।

भावार्थ

‘उधर सालवनकी ओर देखिये, कैसी धूलकी वर्षा हो रही है ! मैं समझता हूँ वानरलोग रमणीय सालवनको आन्दोलित कर रहे हैं ॥ २९½ ॥

तदेतद् दृश्यते दूराद् विमानं चन्द्रसंनिभम् ॥ ३० ॥ विमानं पुष्पकं दिव्यं मनसा ब्रह्मनिर्मितम् । रावणं बान्धवैः सार्धं हत्वा लब्धं महात्मना ॥ ३१ ॥ तरुणादित्यसंकाशं विमानं रामवाहनम् । धनदस्य प्रसादेन दिव्यमेतन्मनोजवम् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘लीजिये, यह रहा पुष्पक विमान, जो दूरसे चन्द्रमाके समान दिखायी देता है । इस दिव्य पुष्पक-विमानको विश्वकर्माने अपने मनके संकल्पसे ही रचा था । महात्मा श्रीरामने रावणको बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर इसे प्राप्त किया है ॥ ‘श्रीरामका वाहन बना हुआ यह विमान प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा है । इसका वेग मनके समान है । यह दिव्य विमान ब्रह्माजीकी कृपासे कुबेरको प्राप्त हुआ था ॥ ३२ ॥

एतस्मिन् भ्रातरौ वीरौ वैदेह्या सह राघवौ । सुग्रीवश्च महातेजा राक्षसश्च विभीषणः ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘इसीमें विदेहराजकुमारी सीताके साथ वे दोनों रघुवंशी वीर बन्धु बैठे हैं और इसीमें महातेजस्वी सुग्रीव तथा राक्षस विभीषण भी विराजमान हैं’ ॥ ३३ ॥

ततो हर्षसमुद्भूतो निःस्वनो दिवमस्पृशत् । स्त्रीबालयुवबृद्धानां रामोऽयमिति कीर्तिते ॥ ३४ ॥

भावार्थ

हनुमान्जीके इतना कहते ही स्त्रियों, बालकों, नौजवानों और बूढ़ों—सभी पुरवासियोंके मुखसे यह वाणी फूट पड़ी—-‘अहो ! ये श्रीरामचन्द्रजी आ रहे हैं ।’ उन नागरिकोंका वह हर्षनाद स्वर्गलोकतक गूँज उठा ॥ ३४ ॥

रथकुञ्जरवाजिभ्यस्तेऽवतीर्य महीं गताः । ददृशुस्तं विमानस्थं नराः सोममिवाम्बरे ॥ ३५ ॥

भावार्थ

सब लोग हाथी, घोड़ों और रथोंसे उतर पड़े तथा पृथ्वीपर खड़े हो विमानपर विराजमान श्रीरामचन्द्रजीका उसी तरह दर्शन करने लगे, जैसे लोग आकाशमें प्रकाशित होनेवाले चन्द्रदेवका दर्शन करते हैं ॥ ३५ ॥

प्राञ्जलिर्भरतो भूत्वा प्रहृष्टो राघवोन्मुखः । यथार्थेनार्घ्यपाद्याद्यैस्ततो राममपूजयत् ॥ ३६ ॥

भावार्थ

भरतजी श्रीरामचन्द्रजीकी ओर दृष्टि लगाये हाथ जोड़कर खड़े हो गये । उनका शरीर हर्षसे पुलकित था । उन्होंने दूरसे ही अर्घ्य-पाद्य आदिके द्वारा श्रीरामका विधिवत् पूजन किया ॥ ३६ ॥

मनसा ब्रह्मणा सृष्टे विमाने भरताग्रजः । रराज पृथुदीर्घाक्षो वज्रपाणिरिवामरः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

विश्वकर्माद्वारा मनसे रचे गये उस विमानपर बैठे हुए विशाल नेत्रोंवाले भगवान् श्रीराम वज्रधारी देवराज इन्द्रके समान शोभा पा रहे थे ॥ ३७ ॥

ततो विमानाग्रगतं भरतो भ्रातरं तदा । ववन्दे प्रणतो रामं मेरुस्थमिव भास्करम् ॥ ३८ ॥

भावार्थ

विमानके ऊपरी भागमें बैठे हुए भाई श्रीरामपर दृष्टि पड़ते ही भरतने विनीतभावसे उन्हें उसी तरह प्रणाम किया, जैसे मेरुके शिखरपर उदित सूर्यदेवको द्विजलोग नमस्कार करते हैं ॥ ३८ ॥

ततो रामाभ्यनुज्ञातं तद् विमानमनुत्तमम् । हंसयुक्तं महावेगं निपपात महीतलम् ॥ ३९ ॥

भावार्थ

इतनेहीमें श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर वह महान् वेगशाली हंसयुक्त उत्तम विमान पृथ्वीपर उतर आया ॥३९॥

आरोपितो विमानं तद् भरतः सत्यविक्रमः । राममासाद्य मुदितः पुनरेवाभ्यवादयत् ॥ ४० ॥ तं समुत्थाय काकुत्स्थश्चिरस्याक्षिपथं गतम् । अङ्के भरतमारोप्य मुदितः परिषस्वजे ॥ ४१ ॥

भावार्थ

भगवान् श्रीरामने सत्यपराक्रमी भरतजीको विमानपर चढ़ा लिया और उन्होंने श्रीरघुनाथजीके पास पहुँचकर आनन्दविभोर हो पुनः उनके श्रीचरणोंमें साष्टाङ्ग प्रणाम किया॥ दीर्घकालके पश्चात् दृष्टिपथमें आये हुए भरतको उठाकर श्रीरघुनाथजीने अपनी गोदमें बिठा लिया और बड़े हर्षके साथ उन्हें हृदयसे लगाया ॥ ४१ ॥

ततो लक्ष्मणमासाद्य वैदेहीं च परंतपः । अथाभ्यवादयत् प्रीतो भरतो नाम चाब्रवीत् ॥ ४२ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाले भरतने लक्ष्मणसे मिलकर—उनका प्रणाम ग्रहण करके विदेह-राजकुमारी सीताको बड़ी प्रसन्नताके साथ प्रणाम किया और अपना नाम भी बताया ॥ ४२ ॥

सुग्रीवं कैकयीपुत्रो जाम्बवन्तमथाङ्गदम् । मैन्दं च द्विविदं नीलमृषभं चैव सस्वजे ॥ ४३ ॥ सुषेणं च नलं चैव गवाक्षं गन्धमादनम् । शरभं पनसं चैव परितः परिषस्वजे ॥ ४४ ॥ ते कृत्वा मानुषं रूपं वानराः कामरूपिणः । कुशलं पर्यपृच्छंस्ते प्रहृष्टा भरतं तदा ॥ ४५ ॥

भावार्थ

इसके बाद कैकेयीकुमार भरतने सुग्रीव, जाम्बवान्, अङ्गद, मैन्द, द्विविद, नील, ऋषभ, सुषेण, नल, गवाक्ष, गन्धमादन, शरभ और पनसका पूर्णरूपसे आलिङ्गन किया ॥ वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर मानवरूप धारण करके भरतजीसे मिले और उन सबने महान् हर्षसे उल्लसित होकर उस समय भरतजीका कुशल-समाचार पूछा ॥ ४५ ॥

अथाब्रवीद् राजपुत्रः सुग्रीवं वानरर्षभम् । परिष्वज्य महातेजा भरतो धर्मिणां वरः ॥ ४६ ॥

भावार्थ

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी राजकुमार भरतने वानरराज सुग्रीवको हृदयसे लगाकर उनसे कहा—॥ ४६ ॥

त्वमस्माकं चतुर्णां वै भ्राता सुग्रीव पञ्चमः । सौहृदाज्जायते मित्रमपकारोऽरिलक्षणम् ॥ ४७ ॥

भावार्थ

‘सुग्रीव ! तुम हम चारोंके पाँचवें भाई हो; क्योंकि स्नेहपूर्वक उपकार करनेसे ही कोई भी मित्र होता है ( और मित्र अपना भाई ही होता है ) । अपकार करना ही शत्रुका लक्षण है’ ॥ ४७ ॥

विभीषणं च भरतः सान्त्ववाक्यमथाब्रवीत् । दिष्ट्या त्वया सहायेन कृतं कर्म सुदुष्करम् ॥ ४८ ॥

भावार्थ

इसके बाद भरतने विभीषणको सान्त्वना देते हुए उनसे कहा—‘राक्षसराज ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आपकी सहायता पाकर श्रीरघुनाथजीने अत्यन्त दुष्कर कार्य पूरा किया है’ ॥ ४८ ॥

शत्रुघ्नश्च तदा राममभिवाद्य सलक्ष्मणम् । सीतायाश्चरणौ वीरो विनयादभ्यवादयत् ॥ ४९ ॥ रामो मातरमासाद्य विवर्णां शोककर्शिताम् । जग्राह प्रणतः पादौ मनो मातुः प्रहर्षयन् ॥ ५० ॥

भावार्थ

इसी समय वीर शत्रुघ्नने भी श्रीराम और लक्ष्मणको प्रणाम करके सीताजीके चरणोंमें विनयपूर्वक मस्तक झुकाया ॥ माता कौसल्या शोकके कारण अत्यन्त दुर्बल और कान्तिहीन हो गयी थीं । उनके पास पहुँचकर श्रीरामने प्रणत हो उनके दोनों पैर पकड़ लिये और माताके मनको अत्यन्त हर्ष प्रदान किया ॥ ५० ॥

अभिवाद्य सुमित्रां च कैकेयीं च यशस्विनीम् । स मातृश्च ततः सर्वाः पुरोहितमुपागमत् ॥ ५१ ॥

भावार्थ

फिर सुमित्रा और यशस्विनी कैकेयीको प्रणाम करके उन्होंने सम्पूर्ण माताओंका अभिवादन किया, इसके बाद वे राजपुरोहित वसिष्ठजीके पास आये ॥ ५१ ॥

स्वागतं ते महाबाहो कौसल्यानन्दवर्धन । इति प्राञ्जलयः सर्वे नागरा राममब्रुवन् ॥ ५२ ॥

भावार्थ

उस समय अयोध्याके समस्त नागरिक हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे एक साथ बोल उठे—‘माता कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीराम ! आपका स्वागत है, स्वागत है’ ॥ ५२ ॥

तान्यञ्जलिसहस्राणि प्रगृहीतानि नागरैः । व्याकोशानीव पद्मानि ददर्श भरताग्रजः ॥ ५३ ॥

भावार्थ

भरतके बड़े भाई श्रीरामने देखा, खिले हुए कमलोंके समान नागरिकोंकी सहस्रों अञ्जलियाँ उनकी ओर उठी हुई हैं ॥ ५३ ॥

पादुके ते तु रामस्य गृहीत्वा भरतः स्वयम् । चरणाभ्यां नरेन्द्रस्य योजयामास धर्मवित् ॥ ५४ ॥ अब्रवीच्च तदा रामं भरतः स कृताञ्जलिः ।

भावार्थ

तदनन्तर धर्मज्ञ भरतने स्वयं ही श्रीरामकी वे चरण-पादुकाएँ लेकर उन महाराजके चरणोंमें पहना दीं और हाथ जोड़कर उस समय उनसे कहा—॥ ५४½ ॥

पतत् ते सकलं राज्यं न्यासं निर्यातितं मया ॥ ५५ ॥ अद्य जन्म कृतार्थं मे संवृत्तश्च मनोरथः । यत् त्वां पश्यामि राजानमयोध्यां पुनरागतम् ॥ ५६ ॥

भावार्थ

‘प्रभो ! मेरे पास धरोहरके रूपमें रक्खा हुआ आपका यह सारा राज्य आज मैंने आपके श्रीचरणोंमें लौटा दिया । आज मेरा जन्म सफल हो गया । मेरा मनोरथ पूरा हुआ, जो अयोध्यानरेश आप श्रीरामको पुनः अयोध्यामें लौटा हुआ देख रहा हूँ ॥ ५५-५६ ॥

अवेक्षतां भवान् कोशं कोष्ठागारं गृहं बलम् । भवतस्तेजसा सर्वं कृतं दशगुणं मया ॥ ५७ ॥

भावार्थ

‘आप राज्यका खजाना, कोठार, घर और सेना सब देख लें । आपके प्रतापसे ये सारी वस्तुएँ पहलेसे दसगुनी हो गयी हैं’ ॥ ५७ ॥

तथा ब्रुवाणं भरतं दृष्ट्वा तं भ्रातृवत्सलम् । मुमुचुर्वानरा बाष्पं राक्षसश्च विभीषणः ॥ ५८ ॥

भावार्थ

भ्रातृवत्सल भरतको इस प्रकार कहते देख समस्त वानर तथा राक्षसराज विभीषण नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ ५८ ॥

ततः प्रहर्षाद् भरतमङ्कमारोप्य राघवः । ययौ तेन विमानेन ससैन्यो भरताश्रमम् ॥ ५९ ॥

भावार्थ

इसके पश्चात् श्रीरघुनाथजी भरतको बड़े हर्ष और स्नेहके साथ गोदमें बैठाकर विमानके द्वारा ही सेनासहित उनके आश्रमपर गये ॥ ५९ ॥

भरताश्रममासाद्य ससैन्यो राघवस्तदा । अवतीर्य विमानाग्रादवतस्थे महीतले ॥ ६० ॥

भावार्थ

भरतके आश्रममें पहुँचकर सेनासहित श्रीरघुनाथजी विमानसे उतरकर भूतलपर खड़े हो गये ॥ ६० ॥

अब्रवीत् तु तदा रामस्तद् विमानमनुत्तमम् । वह वैश्रवणं देवमनुजानामि गम्यताम् ॥ ६१ ॥

भावार्थ

उस समय श्रीरामने उस उत्तम विमानसे कहा— ‘विमानराज ! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, अब तुम यहाँसे देवप्रवर कुबेरके ही पास चले जाओ और उन्हींकी सवारीमें रहो’ ॥ ६१ ॥

ततो रामाभ्यनुज्ञातं तद् विमानमनुत्तमम् । उत्तरां दिशमुद्दिश्य जगाम धनदालयम् ॥ ६२ ॥

भावार्थ

श्रीरामकी आज्ञा पाकर वह परम उत्तम विमान उत्तर दिशाको लक्ष्य करके कुबेरके स्थानपर चला गया ॥ ६२ ॥

विमानं पुष्पकं दिव्यं संगृहीतं तु रक्षसा । अगमद् धनदं वेगाद् रामवाक्यप्रचोदितम् ॥ ६३ ॥

भावार्थ

राक्षस रावणने जिस दिव्य पुष्पक विमानपर बलपूर्वक अधिकार कर लिया था, वही अब श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे प्रेरित हो वेगपूर्वक कुबेरकी सेवामें चला गया ॥ ६३ ॥

पुरोहितस्यात्मसखस्य राघवो बृहस्पतेः शक्र इवामराधिपः । निपीड्य पादौ पृथगासने शुभे सहैव तेनोपविवेश वीर्यवान् ॥ ६४ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् पराक्रमी श्रीरघुनाथजीने अपने सखा पुरोहित वसिष्ठपुत्र सुयज्ञके ( अथवा अपने परम सहायक पुरोहित वसिष्ठजीके ) उसी प्रकार चरण छुए, जैसे देवराज इन्द्र बृहस्पतिजीके चरणोंका स्पर्श करते हैं । फिर उन्हें एक सुन्दर पृथक् आसनपर विराजमान करके उनके साथ ही दूसरे आसनपर वे स्वयं भी बैठे ॥ ६४ ॥

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