युद्धकाण्ड, सर्ग 126
बहूनि नाम वर्षाणि गतस्य सुमहद्वनम् । शृणोम्यहं प्रीतिकरं मम नाथस्य कीर्तनम् ॥ १ ॥
भावार्थ
‘मेरे स्वामी श्रीरामको विशाल वनमें गये बहुत वर्ष बीत गये । इतने वर्षोंके बाद आज मुझे उनकी आनन्ददायिनी चर्चा सुननेको मिली है ॥ १ ॥
कल्याणी बत गाथेयं लौकिकी प्रतिभाति माम् । एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि ॥ २ ॥
भावार्थ
‘आज यह कल्याणमयी लौकिक गाथा मुझे यथार्थ जान पड़ती है—मनुष्य यदि जीता रहे तो उसे कभी-न-कभी हर्ष और आनन्दकी प्राप्ति होती ही है, भले ही वह सौ वर्षों बाद हो ॥ २ ॥
राघवस्य हरीणां च कथमासीत् समागमः । कस्मिन् देशे किमाश्रित्य तत्त्वमाख्याहि पृच्छतः ॥ ३ ॥ स पृष्टो राजपुत्रेण बृस्यां समुपवेशितः । आचचक्षे ततः सर्वं रामस्य चरितं वने ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! श्रीरघुनाथजीका और वानरोंका यह मेल-जोल कैसे हुआ ? किस देशमें और किस कारणको लेकर हुआ ? यह मैं जानना चाहता हूँ । तुम मुझे ठीक-ठीक बताओ’ ॥ राजकुमार भरतके इस प्रकार पूछनेपर कुशासनपर बैठाये हुए हनुमान्जीने श्रीरामका वनवासविषयक सारा चरित्र उनसे कह सुनाया—॥ ४ ॥
यथा प्रव्राजितो रामो मातुर्दत्तौ वरौ तव । यथा च पुत्रशोकेन राजा दशरथो मृतः ॥ ५ ॥ यथा दूतैस्त्वमानीतस्तूर्णं राजगृहात् प्रभो । त्वयायोध्यां प्रविष्टेन यथा राज्यं न चेप्सितम् ॥ ६ ॥ चित्रकूटगिरिं गत्वा राज्येनामित्रकर्शनः । निमन्त्रितस्त्वया भ्राता धर्ममाचरता सताम् ॥ ७ ॥ स्थितेन राज्ञो वचने यथा राज्यं विसर्जितम् । आर्यस्य पादुके गृह्य यथासि पुनरागतः ॥ ८ ॥ सर्वमेतन्महाबाहो यथावद् विदितं तव । त्वयि प्रतिप्रयाते तु यद् वृत्तं तन्निबोध मे ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! महाबाहो ! जिस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीको वनवास दिया गया, जिस तरह आपकी माताको दो वर प्रदान किये गये, जैसे पुत्रशोकसे राजा दशरथकी मृत्यु हुई, जिस प्रकार आप राजगृहसे दूतोंद्वारा शीघ्र ही बुलाये गये, जिस तरह अयोध्यामें प्रवेश करके आपने राज्य लेनेकी इच्छा नहीं की और सत्पुरुषोंके धर्मका आचरण करते हुए चित्रकूट-पर्वतपर जाकर अपने शत्रुसूदन भाईको आपने राज्य लेनेके लिये निमन्त्रित किया, फिर उन्होंने जिस प्रकार राजा दशरथके वचनका पालन करनेमें दृढ़तापूर्वक स्थित होकर राज्यको त्याग दिया तथा जिस प्रकार अपने बड़े भाईकी चरण-पादुकाएँ लेकर आप फिर लौट आये—ये सब बातें तो आपको यथावत् रूपसे विदित ही हैं । आपके लौट आनेके बाद जो वृत्तान्त घटित हुआ, वह बता रहा हूँ, मुझसे सुनिये––॥ ५–९ ॥
अपयाते त्वयि तदा समुद्भ्रान्तमृगद्विजम् । परिद्यूनमिवात्यर्थं तद् वनं समपद्यत ॥ १० ॥ तद्धस्तिमृदितं घोरं सिंहव्याघ्रमृगाकुलम् । प्रविवेशाथ विजनं स महद् दण्डकावनम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘आपके लौट आनेपर वह वन सब ओरसे अत्यन्त क्षीण-सा हो चला । वहाँके पशु-पक्षी भयसे घबरा उठे थे, तब उस वनको छोड़कर श्रीरामने विशाल दण्डकारण्यमें प्रवेश किया, जो निर्जन था । उस घोर वनको हाथियोंने रौंद डाला था । उसमें सिंह, व्याघ्र और मृग भरे हुए थे ॥ १०-११ ॥
तेषां पुरस्ताद् बलवान् गच्छतां गहने वने । विनदन् सुमहानादं विराधः प्रत्यदृश्यत ॥ १२ ॥ तमुत्क्षिप्य महानादमूर्ध्वबाहुमधोमुखम् । निखाते प्रक्षिपन्ति स्म नदन्तमिव कुञ्जरम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘उस गहन वनमें जाते हुए इन तीनोंके आगे महान् गर्जना करता हुआ बलवान् राक्षस विराध दिखायी दिया ॥ ‘ऊपर बाँह और नीचे मुँह किये चिग्घाड़ते हुए हाथीके समान जोर-जोरसे गर्जना करनेवाले उस राक्षसको उन तीनोंने मारकर गड्ढेमें फेंक दिया ॥ १३ ॥
तत् कृत्वा दुष्करं कर्म भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । सायाह्ने शरभङ्गस्य रम्यमाश्रममीयतुः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘वह दुष्कर कर्म करके दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण सायंकालमें शरभङ्ग मुनिके रमणीय आश्रमपर जा पहुँचे ॥ १४ ॥
शरभङ्गे दिवं प्राप्ते रामः सत्यपराक्रमः । अभिवाद्य मुनीन् सर्वाञ्जनस्थानमुपागमत् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘शरभंग मुनि श्रीरामके समक्ष स्वर्गलोकको चले गये । तब सत्यपराक्रमी श्रीराम सब मुनियोंको प्रणाम करके जनस्थानमें आये ॥ १५ ॥
पश्चाच्छूर्पणखा नाम रामपार्श्वमुपागता । ततो रामेण संदिष्टो लक्ष्मणः सहसोत्थितः ॥ १६ ॥ प्रगृह्य खड्गं चिच्छेद कर्णनासं महाबलः ।
भावार्थ
‘जनस्थानमें आनेके बाद शूर्पणखा नामवाली एक राक्षसी ( मनमें कामभाव लेकर ) श्रीरामचन्द्रजीके पास आयी । तब श्रीरामने लक्ष्मणको उसे दण्ड देनेका आदेश दिया । महाबली लक्ष्मणने सहसा उठकर तलवार उठायी और उस राक्षसीके नाक-कान काट लिये ॥ १६½ ॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम् ॥ १७ ॥ हतानि वसता तत्र राघवेण महात्मना ।
भावार्थ
‘वहाँ रहते हुए महात्मा श्रीरघुनाथजीने अकेले ही शूर्पणखाकी प्रेरणासे आये हुए भयानक कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसोंका वध किया ॥ १७½ ॥
एकेन सह संगम्य रामेण रणमूर्धनि ॥ १८ ॥ अर्धाश्चतुर्थभागेन निःशेषा राक्षसाः कृताः ।
भावार्थ
‘युद्धके मुहानेपर एकमात्र श्रीरामके साथ भिड़कर वे समस्त राक्षस पहरभरमें ही समाप्त हो गये ॥ १८½ ॥
महाबला महावीर्यास्तपसो विघ्नकारिणः ॥ १९ ॥ निहता राघवेणाजौ दण्डकारण्यवासिनः ।
भावार्थ
‘तपस्यामें विघ्न डालनेवाले उन दण्डकारण्यनिवासी महाबली और महापराक्रमी राक्षसोंको श्रीरघुनाथजीने युद्धमें मार डाला ॥ १९½ ॥
राक्षसाश्च विनिष्पिष्टाः खरश्च निहतो रणे ॥ २० ॥ दूषणं चाग्रतो हत्वा त्रिशिरास्तदनन्तरम् ।
भावार्थ
‘उस रणभूमिमें वे चौदह हजार राक्षस पीस डाले गये, खर मारा गया, फिर दूषणका काम तमाम हुआ । तदनन्तर त्रिशिराको भी मौतके घाट उतार दिया गया ॥ २०½ ॥
ततस्तेनार्दिता बाला रावणं समुपागता ॥ २१ ॥ रावणानुचरो घोरो मारीचो नाम राक्षसः । लोभयामास वैदेहीं भूत्वा रत्नमयो मृगः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘इस घटनासे पीड़ित होकर वह मूर्ख राक्षसी लङ्कामें रावणके पास गयी । रावणके कहनेसे उसके अनुचर मारीच नामक भयंकर राक्षसने रत्नमय मृगका रूप धारण करके विदेहराजकुमारी सीताको लुभाया ॥ २१-२२ ॥
सा राममब्रवीद् दृष्ट्वा वैदेही गृह्यतामिति । अयं मनोहरः कान्त आश्रमो नो भविष्यति ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘उस मृगको देखकर सीताने श्रीरामसे कहा––‘आर्यपुत्र ! इस मृगको पकड़ लीजिये । इसके रहनेसे मेरा यह आश्रम कान्तिमान् एवं मनोहर हो जायगा’ ॥ २३ ॥
ततो रामो धनुष्पाणिर्मृगं तमनुधावति । स तं जघान धावन्तं शरेणानतपर्वणा ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘तब श्रीरामने हाथमें धनुष लेकर उस मृगका पीछा किया और झुकी हुई गाँठवाले एक बाणसे उस भागते हुए मृगको मार डाला ॥ २४ ॥
अथ सौम्य दशग्रीवो मृगं याति तु राघवे । लक्ष्मणे चापि निष्क्रान्ते प्रविवेशाश्रमं तदा ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! जब श्रीरघुनाथजी मृगके पीछे जा रहे थे और लक्ष्मण भी उन्हींका समाचार लेनेके लिये पर्णशालासे बाहर निकल गये, तब रावणने उस आश्रममें प्रवेश किया ॥ २५ ॥
जग्राह तरसा सीतां ग्रहः खे रोहिणीमिव । त्रातुकामं ततो युद्धे हत्वा गृध्रं जटायुषम् ॥ २६ ॥ प्रगृह्य सहसा सीतां जगामाशु स राक्षसः । ततस्त्वद्भुतसंकाशाः स्थिताः पर्वतमूर्धनि ॥ २७ ॥ सीतां गृहीत्वा गच्छन्तं वानराः पर्वतोपमाः । दद्दशुर्विस्मिताकारा रावणं राक्षसाधिपम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘उसने बलपूर्वक सीताको पकड़ लिया, मानो आकाशमें मंगलने रोहिणीपर आक्रमण किया हो । उस समय उनकी रक्षाके लिये आये हुए गृध्रराज जटायुको युद्धमें मारकर वह राक्षस सहसा सीताको साथ ले वहाँसे जल्दी ही चम्पत हो गया॥ ‘तदनन्तर एक पर्वत-शिखरपर रहनेवाले पर्वतोंके समान ही अद्भुत एवं विशाल शरीरवाले वानरोंने आश्चर्यचकित हो सीताको लेकर जाते हुए राक्षसराज रावणको देखा ॥२७-२८॥
ततः शीघ्रतरं गत्वा तद् विमानं मनोजवम् । आरुह्य सह वैदेह्या पुष्पकं स महाबलः ॥ २९ ॥ प्रविवेश तदा लङ्कां रावणो राक्षसेश्वरः । तां सुवर्णपरिष्कारे शुभे महति वेश्मनि ॥ ३० ॥ प्रवेश्य मैथिलीं वाक्यैः सान्त्वयामास रावणः । तृणवद् भाषितं तस्य तं च नैर्ऋतपुङ्गवम् ॥ ३१ ॥ अचिन्तयन्ती वैदेही ह्यशोकवनिकां गता । न्यवर्तत तदा रामो मृगं हत्वा तदा वने ॥ ३२ ॥ निवर्तमानः काकुत्स्थो दृष्ट्वा गृध्रं स विव्यथे । गृध्रं हतं तदा दृष्ट्वा रामः प्रियतरं पितुः ॥ ३३ ॥ मार्गमाणस्तु वैदेहीं राघवः सहलक्ष्मणः । गोदावरीमनुचरन् वनोद्देशांश्च पुष्पितान् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘वह महाबली राक्षसराज रावण बड़ी शीघ्रताके साथ मनके समान वेगशाली पुष्पक विमानके पास जा पहुँचा और सीताके साथ उसपर आरूढ़ हो उसने लङ्कामें प्रवेश किया ॥ ‘वहाँ सुवर्णभूषित विशाल भवनमें मिथिलेशकुमारीको ठहराकर रावण चिकनी-चुपड़ी बातोंसे उन्हें सान्त्वना देने लगा॥ ‘अशोकवाटिकामें रहती हुई विदेहनन्दिनीने रावणकी बातोंको तथा स्वयं उस राक्षसराजको भी तिनकेके समान मानकर ठुकरा दिया और कभी उसका चिन्तन नहीं किया ॥ ‘उधर वनमें श्रीरामचन्द्रजी मृगको मारकर लौटे । लौटते समय जब उन्होंने पितासे भी अधिक प्रिय गृध्रराजको मारा गया देखा, तब उनके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ ‘लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजी विदेहराजकुमारी सीताकी खोज करते हुए गोदावरीतटके पुष्पित वनप्रान्तमें विचरने लगे ॥ ३४ ॥
आसेदतुर्महारण्ये कबन्धं नाम राक्षसम् । ततः कबन्धवचनाद् रामः सत्यपराक्रमः ॥ ३५ ॥ ऋष्यमूकगिरिं गत्वा सुग्रीवेण समागतः ।
भावार्थ
‘खोजते-खोजते वे दोनों भाई उस विशाल वनमें कबन्ध नामक राक्षसके पास जा पहुँचे । तदनन्तर सत्यपराक्रमी रामने कबन्धका उद्धार किया और उसीके कहनेसे वे ऋष्यमूक पर्वतपर जाकर सुग्रीवसे मिले ॥ ३५३ ॥
तयोः समागमः पूर्वं प्रीत्या हार्दो व्यजायत ॥ ३६ ॥ भ्रात्रा निरस्तः क्रुद्धेन सुग्रीवो वालिना पुरा । इतरेतरसंवादात् प्रगाढः प्रणयस्तयोः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘उन दोनोंमें एक दूसरेके साक्षात्कारसे पहले ही हार्दिक मित्रता हो गयी थी । पूर्वकालमें क्रुद्ध हुए बड़े भाई वालीने सुग्रीवको घरसे निकाल दिया था । श्रीराम और सुग्रीवमें जब परस्पर बातें हुईं, तब उनमें और भी प्रगाढ़ प्रेम हो गया ॥ ३६-३७ ॥
रामः स्वबाहुवीर्येण स्वराज्यं प्रत्यपादयत् । वालिनं समरे हत्वा महाकायं महाबलम् ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामने अपने बाहुबलसे समराङ्गणमें महाकाय, महाबली वालीका वध करके सुग्रीवको उनका राज्य दिला दिया ॥३८॥
सुग्रीवः स्थापितो राज्ये सहितः सर्ववानरैः । रामाय प्रतिजानीते राजपुत्र्यास्तु मार्गणम् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामने समस्त वानरोंसहित सुग्रीवको अपने राज्यपर स्थापित कर दिया और सुग्रीवने श्रीरामके समक्ष यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं राजकुमारी सीताकी खोज करूँगा ॥ ३९ ॥
आदिष्टा वानरेन्द्रेण सुग्रीवेण महात्मना । दश कोट्यः प्लवङ्गानां सर्वाः प्रस्थापिता दिशः ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘तदनुसार महात्मा वानरराज सुग्रीवने दस करोड़ वानरोंको सीताका पता लगानेकी आज्ञा देकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भेजा ॥ ४० ॥
तेषां नो विप्रकृष्टानां विन्ध्ये पर्वतसत्तमे । भृशं शोकाभितप्तानां महान् कालोऽत्यवर्तत ॥ ४१ ॥
भावार्थ
‘उन्हीं वानरोंमें हमलोग भी थे । गिरिराज विन्ध्यकी गुफामें प्रवेश कर जानेके कारण हमारे लौटनेका नियत समय बीत गया । हमने बहुत विलम्ब कर दिया । हमारे अत्यन्त शोकमें पड़े-पड़े दीर्घकाल व्यतीत हो गया ॥ ४१ ॥
भ्राता तु गृध्रराजस्य सम्पातिर्नाम वीर्यवान् । समाख्याति स वसतीं सीतां रावणमन्दिरे ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘तदनन्तर गृध्रराज जटायुके एक पराक्रमी भाई मिल गये, जिनका नाम था सम्पाति । उन्होंने हमें बताया कि सीता लङ्कामें रावणके भवनमें निवास करती हैं ॥ ४२ ॥
सोऽहं दुःखपरीतानां दुःखं तज्ज्ञातिनां नुदन् । आत्मवीर्यं समास्थाय योजनानां शतं प्लुतः । तत्राहमेकामद्राक्षमशोकवनिकां गताम् ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘तब दुःखमें डूबे हुए अपने भाई-बन्धुओंके कष्टका निवारण करनेके लिये मैं अपने बल-पराक्रमका सहारा ले सौ योजन समुद्रको लाँघ गया और लङ्कामें अशोकवाटिकाके भीतर अकेली बैठी हुई सीतासे मिला ॥ ४३ ॥
कौशेयवस्त्रां मलिनां निरानन्दां दृढव्रताम् । तया समेत्य विधिवत् पृष्ट्वा सर्वमनिन्दिताम् ॥ ४४ ॥ अभिज्ञानं मया दत्तं रामनामाङ्गुलीयकम् । अभिज्ञानं मणिं लब्ध्वा चरितार्थोऽहमागतः ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘वे एक रेशमी साड़ी पहने हुए थीं। शरीरसे मलिन और आनन्दशून्य जान पड़ती थीं तथा पातिव्रत्यके पालनमें दृढ़तापूर्वक लगी थीं । उनसे मिलकर मैंने उन सती-साध्वी देवीसे विधिपूर्वक सारा समाचार पूछा और पहचानके लिये श्रीरामनामसे अङ्कित अँगूठी उन्हें दे दी । साथ ही उनकी ओरसे पहचानके तौरपर चूड़ामणि लेकर मैं कृतकृत्य होकर लौट आया ॥ ४४-४५ ॥
मया च पुनरागम्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः । अभिज्ञानं मया दत्तमर्चिष्मान् स महामणिः ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामके पास पुनः लौटकर मैंने वह तेजस्वी महामणि पहचानके रूपमें उन्हें दे दी ॥ ४६ ॥
श्रुत्वा तां मैथिलीं रामस्त्वाशशंसे च जीवितम् । जीवितान्तमनुप्राप्तः पीत्वामृतमिवातुरः ॥ ४७ ॥
भावार्थ
‘जैसे मृत्युके निकट पहुँचा हुआ रोगी अमृत पीकर पुनः जी उठता है, उसी प्रकार सीताके वियोगमें मरणासन्न हुए श्रीरामने उनका शुभ समाचार पाकर जीवित रहनेकी आशा की ॥ ४७ ॥
उद्योजयिष्यन्नुद्योगं दध्रे लङ्कावधे मनः । जिघांसुरिव लोकान्ते सर्वाँल्लोकान् विभावसुः ॥ ४८ ॥
भावार्थ
‘फिर जैसे प्रलयकालमें संवर्तकनामक अग्निदेव सम्पूर्ण लोकोंको भस्म कर डालनेके लिये उद्यत हो जाते हैं, उसी प्रकार सेनाको प्रोत्साहन देते हुए श्रीरामने लङ्कापुरीको नष्ट कर डालनेका विचार किया ॥ ४८ ॥
ततः समुद्रमासाद्य नलं सेतुमकारयत् । अतरत् कपिवीराणां वाहिनी तेन सेतुना ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘इसके बाद समुद्रतटपर आकर श्रीरामने नल नामक वानरसे समुद्रपर पुल बँधवाया और उस पुलसे वानरवीरोंकी सारी सेना सागरके पार जा पहुँची ॥ ४९ ॥
प्रहस्तमवधीन्नीलः कुम्भकर्णं तु राघवः । लक्ष्मणो रावणसुतं स्वयं रामस्तु रावणम् ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘वहाँ युद्धमें नीलने प्रहस्तको, लक्ष्मणने रावणपुत्र इन्द्रजित्को तथा साक्षात् रघुकुलनन्दन श्रीरामने कुम्भकर्ण एवं रावणको मार डाला ॥ ५० ॥
स शक्रेण समागम्य यमेन वरुणेन च । महेश्वरस्वयंभूभ्यां तथा दशरथेन च ॥ ५१ ॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् श्रीरघुनाथजी क्रमशः इन्द्र, यम, वरुण, महादेवजी, ब्रह्माजी तथा महाराज दशरथसे मिले ॥ ५१ ॥
तैश्च दत्तवरः श्रीमान्नृषिभिश्च समागतैः । सुरर्षिभिश्च काकुत्स्थो वराँल्लेभे परंतपः ॥ ५२ ॥
भावार्थ
‘वहाँ पधारे हुए ऋषियों तथा देवर्षियोंने शत्रुसंतापी श्रीमान् रघुवीरको वरदान दिया । उनसे श्रीरामने वर प्राप्त किया ॥ ५२ ॥
स तु दत्तवरः प्रीत्या वानरैश्च समागतैः । पुष्पकेण विमानेन किष्किन्धामभ्युपागमत् ॥ ५३ ॥
भावार्थ
‘वर पाकर प्रसन्नतासे भरे हुए श्रीरामचन्द्रजी वानरोंके साथ पुष्पकविमानद्वारा किष्किन्धा आये ॥ ५३ ॥
तां गङ्गां पुनरासाद्य वसन्तं मुनिसंनिधौ । अविघ्नं पुष्ययोगेन श्वो रामं द्रष्टुमर्हसि ॥ ५४ ॥
भावार्थ
‘वहाँसे फिर गङ्गातटपर आकर प्रयागमें भरद्वाजमुनिके समीप वे ठहरे हुए हैं । कल पुष्य नक्षत्रके योगमें आप बिना किसी विघ्न-बाधाके श्रीरामका दर्शन करेंगे’ ॥ ५४ ॥
ततः स वाक्यैर्मधुरैर्हनूमतो निशम्य हृष्टो भरतः कृताञ्जलिः । उवाच वाणीं मनसः प्रहर्षिणीं चिरस्य पूर्णः खलु मे मनोरथः ॥ ५५ ॥
भावार्थ
इस प्रकार हनुमान्जीके मधुर वाक्योंद्वारा सारी बातें सुनकर भरतजी बड़े प्रसन्न हुए और हाथ जोड़कर मनको हर्ष प्रदान करनेवाली वाणीमें बोले—‘आज चिरकालके बाद मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ’ ॥ ५५ ॥
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