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युद्धकाण्ड, सर्ग 125

अयोध्यां तु समालोक्य चिन्तयामास राघवः । प्रियकामः प्रियं रामस्ततस्त्वरितविक्रमः ॥ १ ॥

भावार्थ

( भरद्वाज-आश्रमपर उतरनेसे पहले ) विमानसे ही अयोध्यापुरीका दर्शन करके अयोध्यावासियों तथा सुग्रीव आदिका प्रिय करनेकी इच्छावाले शीघ्रपराक्रमी रघुकुलनन्दन श्रीरामने यह विचार किया कि कैसे इन सबका प्रिय हो ? ॥१॥

चिन्तयित्वा ततो दृष्टिं वानरेषु न्यपातयत् । उवाच धीमांस्तेजस्वी हनूमन्तं प्लवंगमम् ॥ २ ॥

भावार्थ

विचार करके तेजस्वी एवं बुद्धिमान् श्रीरामने वानरोंपर दृष्टि डाली और वानर-वीर हनुमान्जीसे कहा-- ॥ २ ॥

अयोध्यां त्वरितो गत्वा शीघ्रं प्लवगसत्तम । जानीहि कच्चित् कुशली जनो नृपतिमन्दिरे ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘कपिश्रेष्ठ ! तुम शीघ्र ही अयोध्यामें जाकर पता लो कि राजभवनमें सब लोग सकुशल तो हैं न ?॥ ३ ॥

शृङ्गवेरपुरं प्राप्य गुहं गहनगोचरम् । निषादाधिपतिं ब्रूहि कुशलं वचनान्मम ॥ ४ ॥ श्रुत्वा तु मां कुशलिनमरोगं विगतज्वरम् । भविष्यति गुहः प्रीतः स ममात्मसमः सखा ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘शृङ्गवेरपुरमें पहुँचकर वनवासी निषादराज गुहसे भी मिलना और मेरी ओरसे कुशल कहना ॥ ४ !! ‘मुझे सकुशल, नीरोग और चिन्तारहित सुनकर निषादराज गुहको बड़ी प्रसन्नता होगी; क्योंकि वह मेरा मित्र है । मेरे लिये आत्माके समान है ॥ ५ ॥

अयोध्यायाश्च ते मार्गं प्रवृत्तिं भरतस्य च । निवेदयिष्यति प्रीतो निषादाधिपतिर्गुहः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘निषादराज गुह प्रसन्न होकर तुम्हें अयोध्याका मार्ग और भरतका समाचार बतायेगा ॥ ६ ॥

भरतस्तु त्वया वाच्यः कुशलं वचनान्मम । सिद्धार्थं शंस मां तस्मै सभार्यं सहलक्ष्मणम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘भरतके पास जाकर तुम मेरी ओरसे उनका कुशल पूछना और उन्हें सीता एवं लक्ष्मणसहित मेरे सफलमनोरथ होकर लौटनेका समाचार बताना ॥ ७ ॥

हरणं चापि वैदेह्या रावणेन बलीयसा । सुग्रीवेण च संवादं वालिनश्च वधं रणे ॥ ८ ॥ मैथिल्यन्वेषणं चैव यथा चाधिगता त्वया । लङ्घयित्वा महातोयमापगापतिमव्ययम् ॥ ९ ॥ उपयानं समुद्रस्य सागरस्य च दर्शनम् । यथा च कारितः सेतू रावणश्च यथा हतः ॥ १० ॥ वरदानं महेन्द्रेण ब्रह्मणा वरुणेन च । महादेवप्रसादाच्च पित्रा मम समागमम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘बलवान् रावणके द्वारा सीताजीके हरे जानेका, सुग्रीवसे बातचीत होनेका, रणभूमिमें वालीके वधका, सीताजीके खोजका, तुमने जो महान् जलराशिसे भरे हुए अपार महासागरको लाँघकर जिस तरह सीताका पता लगाया था उसका, फिर समुद्रतटपर मेरे जानेका, सागरके दर्शन देनेका, उसपर पुल बनानेका, रावणके वधका, इन्द्र, ब्रह्मा और वरुणसे मिलने एवं वरदान पानेका और महादेवजीके प्रसादसे पिताजीके दर्शन होनेका वृत्तान्त उन्हें सुनाना ॥ ८–११ ॥

उपयातं च मां सौम्य भरताय निवेद्य । सह राक्षसराजेन हरीणामीश्वरेण च ॥ १२ ॥ जित्वा शत्रुगणान् रामः प्राप्य चानुत्तमं यशः । उपायाति समृद्धार्थः सह मित्रैर्महाबलैः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! फिर भरतसे यह भी निवेदन करना कि श्रीराम शत्रुओंको जीतकर परम उत्तम यश पाकर, सफलमनोरथ हो राक्षसराज विभीषण, वानरराज सुग्रीव तथा अपने अन्य महाबली मित्रोंके साथ आ रहे हैं और प्रयागतक आ पहुँचे हैं १२-१३

एतच्छ्रुत्वा यमाकारं भजते भरतस्ततः । स च ते वेदितव्यः स्यात् सर्वं यच्चापि मां प्रति ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘यह बात सुनकर भरतकी जैसी मुख-मुद्रा हो, उसपर ध्यान रखना और समझना तथा भरतका मेरे प्रति जो कर्तव्य या बर्ताव हो, उसको भी जाननेका प्रयत्न करना ॥ १४ ॥

ज्ञेयाः सर्वे च वृत्तान्ता भरतस्येङ्गितानि च । तत्त्वेन मुखवर्णेन दृष्ट्या व्याभाषितेन च ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘वहाँके सारे वृत्तान्त तथा भरतकी चेष्टाएँ तुम्हें यथार्थरूपसे जाननी चाहिये । मुखकी कान्ति, दृष्टि और बातचीतसे उनके मनोभावको समझनेकी चेष्टा करनी चाहिये ॥ १५ ॥

सर्वकामसमृद्धं हि हस्त्यश्वरथसंकुलम् । पितृपैतामहं राज्यं कस्य नावर्तयेन्मनः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘समस्त मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न तथा हाथी, घोड़े और रथोंसे भरपूर बाप-दादोंका राज्य सुलभ हो तो वह किसके मनको नहीं पलट देता ? ॥ १६ ॥

संगत्या भरतः श्रीमान् राज्येनार्थी स्वयं भवेत् । प्रशास्तु वसुधां सर्वामखिलां रघुनन्दनः ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘यदि कैकेयीकी संगति अथवा चिरकालतक राज्यवैभवका संसर्ग होनेसे श्रीमान् भरत स्वयं ही राज्य पानेकी इच्छा रखते हों तो वे रघुकुलनन्दन भरत बेखटके समस्त भूमण्डलका राज्य करें (मुझे उस राज्यको नहीं लेना है । उस दशामें हम कहीं अन्यत्र रहकर तपस्वी जीवन व्यतीत करेंगे ) ॥ १७ ॥

तस्य बुद्धिं च विज्ञाय व्यवसायं च वानर । यावन्न दूरं याताः स्मः क्षिप्रमागन्तुमर्हसि ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘वानरवीर ! तुम भरतके विचार और निश्चयको जानकर जबतक हमलोग इस आश्रमसे दूर न चले जायँ तभीतक शीघ्र लौट आओ’ ॥ १८ ॥

इति प्रतिसमादिष्टो हनूमान् मारुतात्मजः । मानुषं धारयन् रूपमयोध्यां त्वरितो ययौ ॥ १९ ॥

भावार्थ

श्रीरघुनाथजीके इस प्रकार आदेश देनेपर पवनपुत्र हनुमान्जी मनुष्यका रूप धारण करके तीव्रगतिसे अयोध्याकी ओर चल दिये ॥ १९ ॥

अथोत्पपात वेगेन हनूमान् मारुतात्मजः । गरुत्मानिव वेगेन जिघृक्षन्नुरगोत्तमम् ॥ २० ॥

भावार्थ

जैसे गरुड़ किसी श्रेष्ठ सर्पको पकड़नेके लिये बड़े वेगसे झपट्टा मारते हैं, उसी तरह पवनपुत्र हनुमान् तीव्र वेगसे उड़ चले ॥ २० ॥

लङ्घयित्वा पितृपथं विहगेन्द्रालयं शुभम् । गङ्गायमुनयोर्भीमं समतीत्य समागमम् ॥ २१ ॥ शृङ्गवेरपुरं प्राप्य गुहमासाद्य वीर्यवान् । स वाचा शुभया हृष्टो हनूमानिदमब्रवीत् ॥ २२ ॥

भावार्थ

अपने पिता वायुके मार्ग—अन्तरिक्षको, जो पक्षिराज गरुड़का सुन्दर गृह है, लाँघकर गङ्गा और यमुनाके वेगशाली संगमको पार करके शृङ्गवेरपुरमें पहुँचकर पराक्रमी हनुमान्जी निषादराज गुहसे मिले और बड़े हर्षके साथ सुन्दर वाणीमें बोले—॥ २१-२२ ॥

सखा तु तव काकुत्स्थो रामः सत्यपराक्रमः । ससीतः सह सौमित्रिः स त्वां कुशलमब्रवीत् ॥ २३ ॥ पञ्चमीमद्य रजनीमुषित्वा वचनान्मुनेः । भरद्वाजाभ्यनुज्ञातं द्रक्ष्यस्यत्रैव राघवम् ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘तुम्हारे मित्र ककुत्स्थकुलभूषण सत्यपराक्रमी श्रीराम सीता और लक्ष्मणके साथ आ रहे हैं और उन्होंने तुम्हें अपना कुशल-समाचार कहलाया है । वे प्रयागमें हैं और भरद्वाजमुनिके कहनेसे उन्हींके आश्रममें आज पञ्चमीकी रात बिताकर कल उनकी आज्ञा ले वहाँसे चलेंगे । तुम्हें यहीं श्रीरघुनाथजीका दर्शन होगा’ ॥ २३-२४ ॥

एवमुक्त्वा महातेजाः सम्प्रहृष्टतनूरुहः । उत्पपात महावेगाद् वेगवानविचारयन् ॥ २५ ॥

भावार्थ

गुहसे यों कहकर महातेजस्वी और वेगशाली हनुमान्जी बिना कोई सोच-विचार किये बड़े वेगसे आगेको उड़ चले । उस समय उनके सारे अङ्गोंमें हर्षजनित रोमाञ्च हो आया था ॥ २५ ॥

सोऽपश्यद् रामतीर्थं च नदीं वालुकिनीं तथा । वरूथीं गोमतीं चैव भीमं शालवनं तथा ॥ २६ ॥

भावार्थ

मार्गमें उन्हें परशुराम-तीर्थ, बालुकिनी नदी, वरूथी, गोमती और भयानक सालवनके दर्शन हुए ॥ २६ ॥

प्रजाश्च बहुसाहस्रीः स्फीताञ्जनपदानपि । स गत्वा दूरमध्वानं त्वरितः कपिकुञ्जरः ॥ २७ ॥ आससाद द्रुमान् फुल्लान् नन्दिग्रामसमीपगान् । सुराधिपस्योपवने यथा चैत्ररथे द्रुमान् ॥ २८ ॥

भावार्थ

कई सहस्र प्रजाओं तथा समृद्धिशाली जनपदोंको देखते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी तीव्रगतिसे दूरतकका रास्ता लाँघ गये और नन्दिग्रामके समीपवर्ती खिले हुए वृक्षोंके पास जा पहुँचे । वे वृक्ष देवराज इन्द्रके नन्दनवन और कुबेरके चैत्ररथ वनके वृक्षोंके समान सुशोभित होते थे ॥ २७-२८ ॥

स्त्रीभिः सपुत्रैः पौत्रैश्च रममाणैः स्वलंकृतैः । क्रोशमात्रे त्वयोध्यायाश्चीरकृष्णाजिनाम्बरम् ॥ २९ ॥ ददर्श भरतं दीनं कृशमाश्रमवासिनम् । जटिलं मलदिग्धाङ्गं भ्रातृव्यसनकर्शितम् ॥ ३० ॥ फलमूलाशिनं दान्तं तापसं धर्मचारिणम् । समुन्नतजटाभारं वल्कलाजिनवाससम् ॥ ३१ ॥ नियतं भावितात्मानं ब्रह्मर्षिसमतेजसम् । पादुके ते पुरस्कृत्य प्रशासन्तं वसुंधराम् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

उनके आस-पास बहुत-सी स्त्रियाँ अपने उन पुत्रों और पौत्रोंके साथ, जो वस्त्राभूषणोंसे भलीभाँति अलंकृत थे, विचरती और उनके पुष्पोंका चयन करती थीं । अयोध्यासे एक कोसकी दूरीपर उन्होंने आश्रमवासी भरतको देखा, जो चीर-वस्त्र और काला मृगचर्म धारण किये दुखी एवं दुर्बल दिखायी देते थे । उनके सिरपर जटा बढ़ी हुई थी, शरीरपर मैल जम गयी थी, भाईके वनवासके दुःखने उन्हें बहुत ही कृश कर दिया था, फल-मूल ही उनका भोजन था, वे इन्द्रियोंका दमन करके तपस्यामें लगे हुए थे और धर्मका आचरण करते थे । सिरपर जटाका भार बहुत ही ऊँचा दिखायी देता था, वल्कल और मृगचर्मसे उनका शरीर ढका था । वे बड़े नियमसे रहते थे । उनका अन्तःकरण शुद्ध था और वे ब्रह्मर्षिके समान तेजस्वी जान पड़ते थे । रघुनाथजीकी दोनों चरणपादुकाओंको आगे रखकर वे पृथ्वीका शासन करते थे ॥ २९–३२ ॥

चातुर्वर्ण्यस्य लोकस्य त्रातारं सर्वतो भयात् । उपस्थितममात्यैश्च शुचिभिश्च पुरोहितैः ॥ ३३ ॥ बलमुख्यैश्च युक्तैश्च काषायाम्बरधारिभिः ।

भावार्थ

भरतजी चारों वर्णोंकी प्रजाओंको सब प्रकारके भयसे सुरक्षित रखते थे । उनके पास मन्त्री, पुरोहित और सेनापति भी योगयुक्त होकर रहते और गेरुए वस्त्र पहनते थे ॥ ३३½ ॥

नहि ते राजपुत्रं तं चीरकृष्णाजिनाम्बरम् ॥ ३४ ॥ परिभोक्तुं व्यवस्यन्ति पौरा वै धर्मवत्सलाः ।

भावार्थ

अयोध्याके वे धर्मानुरागी पुरवासी भी उन चीर और काला मृगचर्म धारण करनेवाले राजकुमार भरतको उस दशामें छोड़कर स्वयं भोग भोगनेकी इच्छा नहीं करते थे ॥ ३४½ ॥

तं धर्ममिव धर्मज्ञं देहबन्धमिवापरम् ॥ ३५ ॥ उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं हनूमान् मारुतात्मजः ।

भावार्थ

मनुष्य देह धारण करके आये हुए दूसरे धर्मकी भाँति उन धर्मज्ञ भरतके पास पहुँचकर पवनकुमार हनुमान्जी हाथ जोड़कर बोले—॥ ३५½ ॥

वसन्तं दण्डकारण्ये यं त्वं चीरजटाधरम् ॥ ३६ ॥ अनुशोचसि काकुत्स्थं स त्वां कौशलमब्रवीत् । प्रियमाख्यामि ते देव शोकं त्यज सुदारुणम् ॥ ३७ ॥ अस्मिन् मुहूर्ते भ्रात्रा त्वं रामेण सह संगतः । निहत्य रावणं रामः प्रतिलभ्य च मैथिलीम् ॥ ३८ ॥ उपयाति समृद्धार्थः सह मित्रैर्महाबलैः । लक्ष्मणश्च महातेजा वैदेही च यशस्विनी । सीता समग्रा रामेण महेन्द्रेण शची यथा ॥ ३९ ॥

भावार्थ

‘देव ! आप दण्डकारण्यमें चीर-वस्त्र और जटा धारण करके रहनेवाले जिन श्रीरघुनाथजीके लिये निरन्तर चिन्तित रहते हैं, उन्होंने आपको अपना कुशल-समाचार कहलाया है और आपका भी पूछा है । अब आप इस अत्यन्त दारुण शोकको त्याग दीजिये । मैं आपको बड़ा प्रिय समाचार सुना रहा हूँ । आप शीघ्र ही अपने भाई श्रीरामसे मिलेंगे ॥ ‘भगवान् श्रीराम रावणको मारकर मिथिलेशकुमारीको वापस ले सफलमनोरथ हो अपने महाबली मित्रोंके साथ आ रहे हैं । उनके साथ महातेजस्वी लक्ष्मण और यशस्विनी विदेहराजकुमारी सीता भी हैं । जैसे देवराज इन्द्रके साथ शची शोभा पाती हैं, उसी प्रकार श्रीरामके साथ पूर्णकामा सीताजी सुशोभित हो रही हैं’ ॥ ३८-३९ ॥

एवमुक्तो हनुमता भरतः कैकयीसुतः । पपात सहसा हृष्टो हर्षान्मोहमुपागमत् ॥ ४० ॥

भावार्थ

हनुमान्जीके ऐसा कहते ही कैकेयी-कुमार भरत सहसा आनन्दविभोर हो पृथ्वीपर गिर पड़े और हर्षसे मूर्च्छित हो गये ॥ ४० ॥

ततो मुहूर्तादुत्थाय प्रत्याश्वस्य च राघवः । हनूमन्तमुवाचेदं भरतः प्रियवादिनम् ॥ ४१ ॥ अशोकजैः प्रीतिमयैः कपिमालिङ्गय सम्भ्रमात् । सिषेच भरतः श्रीमान् विपुलैरश्रुबिन्दुभिः ॥ ४२ ॥ देवो वा मानुषो वा त्वमनुक्रोशादिहागतः । प्रियाख्यानस्य ते सौम्य ददामि ब्रुवतः प्रियम् ॥ ४३ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् दो घड़ीके बाद उन्हें होश हुआ और वे उठकर खड़े हो गये । उस समय रघुकुलभूषण श्रीमान् भरतने प्रियवादी हनुमान्जीको बड़े वेगसे पकड़कर दोनों भुजाओंमें भर लिया और शोक संसर्गसे शून्य परमानन्दजनित विपुल अश्रु-बिन्दुओंसे वे उन्हें नहलाने लगे । फिर इस प्रकार बोले—॥ ‘भैया ! तुम कोई देवता हो या मनुष्य, जो मुझपर कृपा करके यहाँ पधारे हो ? सौम्य ! तुमने जो यह प्रिय संवाद सुनाया है, इसके बदले मैं तुम्हें कौन-सी प्रिय वस्तु प्रदान करूँ ? ( मुझे तो कोई ऐसा बहुमूल्य उपहार नहीं दिखायी देता, जो इस प्रिय संवादके तुल्य हो ) ॥ ४३ ॥

गवां शतसहस्रं च ग्रामाणां च शतं परम् । सकुण्डलाः शुभाचारा भार्याः कन्यास्तु षोडश ॥ ४४ ॥ हेमवर्णाः सुनासोरूः शशिसौम्याननाः स्त्रियः । सर्वाभरणसम्पन्नाः सम्पन्नाः कुलजातिभिः ॥ ४५ ॥

भावार्थ

‘( तथापि ) मैं तुम्हें इसके लिये एक लाख गौएँ, सौ उत्तम गाँव तथा उत्तम आचार-विचारवाली सोलह कुमारी कन्याएँ पत्नीरूपमें समर्पित करता हूँ । उन कन्याओंके कानोंमें सुन्दर कुण्डल जगमगाते होंगे । उनकी अङ्ग-कान्ति सुवर्णके समान होगी । उनकी नासिका सुघड़, ऊरु मनोहर और मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर होंगे । वे कुलीन होनेके साथ ही सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित होंगी’ ॥ ४४-४५ ॥

निशम्य रामागमनं नृपात्मजः कपिप्रवीरस्य तदाद्भुतोपमम् । प्रहर्षितो रामदिदृक्षयाभवत् पुनश्च हर्षादिदमब्रवीद् वचः ॥ ४६ ॥

भावार्थ

उन प्रमुख वानर-वीर हनुमान्जीके मुखसे श्रीरामचन्द्रजीके आगमनका अद्भुत समाचार सुनकर राजकुमार भरतको श्रीरामके दर्शनकी इच्छासे अत्यन्त हर्ष हुआ और उस हर्षातिरेकसे ही वे फिर इस प्रकार बोले—॥ ४६ ॥

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