युद्धकाण्ड, सर्ग 124
पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां लक्ष्मणाग्रजः । भरद्वाजाश्रमं प्राप्य ववन्दे नियतो मुनिम् ॥ १ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीने चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर पञ्चमी तिथिको भरद्वाज आश्रममें पहुँचकर मनको वशमें रखते हुए मुनिको प्रणाम किया ॥ १ ॥
सोऽपृच्छदभिवाद्यैनं भरद्वाजं तपोधनम् । शृणोषि कच्चिद् भगवन् सुभिक्षानामयं पुरे । कच्चित् स युक्तो भरतो जीवन्त्यपि च मातरः ॥ २ ॥
भावार्थ
तपस्याके धनी भरद्वाज मुनिको प्रणाम करके श्रीरामने उनसे पूछा—‘भगवन् ! आपने अयोध्यापुरीके विषयमें भी कुछ सुना है ? वहाँ सुकाल और कुशल-मङ्गल तो है न ? भरत प्रजापालनमें तत्पर रहते हैं न ? मेरी माताएँ जीवित हैं न ?’ ॥ २ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण भरद्वाजो महामुनिः । प्रत्युवाच रघुश्रेष्ठं स्मितपूर्वं प्रहृष्टवत् ॥ ३ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार पूछनेपर महामुनि भरद्वाजने मुस्कराकर उन रघुश्रेष्ठ श्रीरामसे प्रसन्नतापूर्वक कहा—॥ ३ ॥
आज्ञावशत्वे भरतो जटिलस्त्वां प्रतीक्षते । पादुके ते पुरस्कृत्य सर्वं च कुशलं गृहे ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! भरत आपकी आज्ञाके अधीन हैं । वे बटा बढ़ाये आपके आगमनकी प्रतीक्षा करते हैं । आपकी चरणपादुकाओंको सामने रखकर सारा कार्य करते हैं । आपके घरपर और नगरमें भी सब कुशल है ॥ ४ ॥
त्वां पुरा चीरवसनं प्रविशन्तं महावनम् । स्त्रीतृतीयं च्युतं राज्याद् धर्मकामं च केवलम् ॥ ५ ॥ पदातिं त्यक्तसर्वस्वं पितृनिर्देशकारिणम् । सर्वभोगैः परित्यक्तं स्वर्गच्युतमिवामरम् ॥ ६ ॥ दृष्ट्वा तु करुणापूर्वं ममासीत् समितिंजय । कैकेयीवचने युक्तं वन्यमूलफलाशिनम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘पहले जब आप महान् वनकी यात्रा कर रहे थे, उस समय आपने चीरवस्त्र धारण कर रक्खा था और आप दोनों भाइयोंके साथ तीसरी केवल आपकी स्त्री थी । आप राज्यसे वञ्चित किये गये थे और केवल धर्मपालनकी इच्छा मनमें ले सर्वस्व त्यागकर पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये पैदल ही जा रहे थे । सारे भोगोंसे दूर हो स्वर्गसे भूतलपर गिरे हुए देवताके समान जान पड़ते थे । शत्रुविजयी वीर ! आप कैकेयीके आदेशके पालनमें तत्पर हो जंगली फल-मूलका आहार करते थे, उस समय आपको देखकर मेरे मनमें बड़ी करुणा हुई थी ॥ ५—७ ॥
साम्प्रतं तु समृद्धार्थं समित्रगणबान्धवम् । समीक्ष्य विजितारिं च ममाभूत् प्रीतिरुत्तमा ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘परंतु इस समय तो सारी स्थिति ही बदल गयी है । आप शत्रुपर विजय पाकर सफलमनोरथ हो मित्रों तथा बान्धवोंके साथ लौट रहे हैं । इस रूपमें आपको देखकर मुझे बड़ा सुख मिला—मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ८ ॥
सर्वं च सुखदुःखं ते विदितं मम राघव । यत् त्वया विपुलं प्राप्तं जनस्थाननिवासिना ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘रघुवीर ! आपने जनस्थानमें रहकर जो विपुल सुख-दुःख उठाये हैं, वे सब मुझे मालूम हैं ॥ ९ ॥
ब्राह्मणार्थे नियुक्तस्य रक्षतः सर्वतापसान् । रावणेन हृता भार्या बभूवेयमनिन्दिता ॥ १० ॥
भावार्थ
‘वहाँ रहकर आप ब्राह्मणोंके कार्यमें संलग्न हो समस्त तपस्वी मुनियोंकी रक्षा करते थे । उस समय रावण आपकी इस सती-साध्वी भार्याको हर ले गया ॥ १० ॥
मारीचदर्शनं चैव सीतोन्मथनमेव च । कबन्धदर्शनं चैव पम्पाभिगमनं तथा ॥ ११ ॥ सुग्रीवेण च ते सख्यं यत्र वाली हतस्त्वया । मार्गणं चैव वैदेह्याः कर्म वातात्मजस्य च ॥ १२ ॥ विदितायां च वैदेह्यां नलसेतुर्यथा कृतः । यथा चादीपिता लङ्का प्रहृष्टैर्हरियूथपैः ॥ १३ ॥ सपुत्रबान्धवामात्यः सबलः सहवाहनः । यथा च निहतः संख्ये रावणो बलदर्पितः ॥ १४ ॥ यथा च निहते तस्मिन् रावणे देवकण्टके । समागमश्च त्रिदशैर्यथा दत्तश्च ते वरः ॥ १५ ॥ सर्वं ममैतद् विदितं तपसा धर्मवत्सल ।
भावार्थ
‘धर्मवत्सल ! मारीचका कपटमृगके रूपमें दिखायी देना, सीताका बलपूर्वक अपहरण होना, इनकी खोज करते समय आपके मार्गमें कबन्धका मिलना, आपका पम्पासरोवरके तटपर जाना, सुग्रीवके साथ आपकी मैत्रीका होना, आपके हाथसे वालीका मारा जाना, सीताकी खोज, पवनपुत्र हनुमान्का अद्भुत कर्म, सीताका पता लग जानेपर नलके द्वारा समुद्रपर सेतुका निर्माण, हर्ष और उत्साहसे भरे हुए वानर-यूथपतियों-द्वारा लङ्कापुरीका दहन, पुत्र, बन्धु, मन्त्री, सेना और सवारियोंसहित बलाभिमानी रावणका आपके द्वारा युद्धमें वध होना, उस देवकण्टक रावणके मारे जानेपर देवताओंके साथ आपका समागम होना तथा उनका आपको वर देना—ये सारी बातें मुझे तपके प्रभावसे ज्ञात हैं ॥ ११—१५½ ॥
सम्पतन्ति च मे शिष्याः प्रवृत्त्याख्याः पुरीमितः ॥ १६ ॥ अहमप्यत्र ते दद्मि वरं शस्त्रभृतां वर । अर्घ्यं प्रतिगृहाणेदमयोध्यां श्वो गमिष्यसि ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘मेरे प्रवृत्ति नामक शिष्य यहाँसे अयोध्यापुरीको जाते रहते हैं ( अतः मुझे वहाँका वृत्तान्त मालूम होता रहता है ), शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीराम ! यहाँ मैं भी आपको एक वर देता हूँ ( आपकी जो इच्छा हो, उसे माँग ले ) । आज मेरा अर्घ्य और आतिथ्य-सत्कार ग्रहण करें । कल सवेरे अयोध्याको जाइयेगा’ ॥ १६-१७ ॥
तस्य तच्छिरसा वाक्यं प्रतिगृह्य नृपात्मजः । बाढमित्येव संहृष्टः श्रीमान् वरमयाचत ॥ १८ ॥
भावार्थ
मुनिके उस वचनको शिरोधार्य करके हर्षसे भरे हुए श्रीमान् राजकुमार श्रीरामने कहा—‘बहुत अच्छा’ । फिर उन्होंने उनसे यह वर माँगा—॥ १८ ॥
अकालफलिनो वृक्षाः सर्वे चापि मधुस्रवाः । फलान्यमृतगन्धीनि बहूनि विविधानि च ॥ १९ ॥ भवन्तु मार्गे भगवन्नयोध्यां प्रति गच्छतः ।
भावार्थ
‘भगवन् ! यहाँसे अयोध्या जाते समय मार्गके सब वृक्षोंमें समय न होनेपर भी फल उत्पन्न हो जायँ और वे सब-के-सब मधुकी धारा टपकानेवाले हों । उनमें नाना प्रकारके बहुत-से अमृतोपम सुगन्धित फल लग जायँ’ ॥ १९½ ॥
तथेति च प्रतिज्ञाते वचनात् समनन्तरम् ॥ २० ॥ अभवन् पादपास्तत्र स्वर्गपादपसंनिभाः ।
भावार्थ
भरद्वाजजीने कहा--‘ऐसा ही होगा’ । उनके इस प्रकार प्रतिज्ञा करते ही--उनकी उस वाणीके निकलते ही तत्काल वहाँके सारे वृक्ष स्वर्गीय वृक्षोंके समान हो गये ॥ २०½ ॥
निष्फलाः फलिनश्चासन् विपुष्पाः पुष्पशालिनः ॥२१॥ शुष्काः समग्रपत्रास्ते नगाश्चैव मधुस्रवाः । सर्वतो योजनास्तिस्रो गच्छतामभवंस्तदा ॥ २२ ॥
भावार्थ
जिनमें फल नहीं थे, उनमें फल आ गये । जिनमें फूल नहीं थे, वे फूलोंसे सुशोभित होने लगे । सूखे हुए वृक्षोंमें भी हरे-हरे पत्ते निकल आये और सभी वृक्ष मधुकी धारा बहाने लगे । अयोध्या जानेका जो मार्ग था, उसके आस-पास तीन योजनतकके वृक्ष ऐसे ही हो गये ॥ २१-२२ ॥
ततः प्रहृष्टाः प्लवगर्षभास्ते बहूनि दिव्यानि फलानि चैव । कामादुपाश्नन्ति सहस्रशस्ते मुदान्विताः स्वर्गजितो यथैव ॥ २३ ॥
भावार्थ
फिर तो वे सहस्रों श्रेष्ठ वानर हर्षसे भरकर स्वर्गवासी देवताओंके समान अपनी रुचिके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक उन बहुसंख्यक दिव्य फलोंका आस्वादन करने लगे ॥ २३ ॥
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