युद्धकाण्ड, सर्ग 128
शिरस्यञ्जलिमाधाय कैकेयीनन्दिवर्धनः । बभाषे भरतो ज्येष्ठं रामं सत्यपराक्रमम् ॥ १ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् कैकेयीनन्दन भरतने मस्तकपर अञ्जलि बाँधकर अपने बड़े भाई सत्यपराक्रमी श्रीरामसे कहा—॥ १ ॥
पूजिता मामिका माता दत्तं राज्यमिदं मम । तद् ददामि पुनस्तुभ्यं यथा त्वमददा मम ॥ २ ॥
भावार्थ
‘आपने मेरी माताका सम्मान किया और यह राज्य मुझे दे दिया । जैसे आपने मुझे दिया, उसी तरह मैं अब फिर आपको वापस दे रहा हूँ ॥ २ ॥
धुरमेकाकिना न्यस्तां वृषभेण बलीयसा । किशोरवद् गुरुं भारं न वोढुमहमुत्सहे ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘अत्यन्त बलवान् बैल जिस बोझेको अकेला उठाता है, उसे बछड़ा नहीं उठा सकता; उसी तरह मैं भी इस भारी भारको उठानेमें असमर्थ हूँ ॥ ३ ॥
वारिवेगेन महता भिन्नः सेतुरिव क्षरन् । दुर्बन्धनमिदं मन्ये राज्यच्छिद्रमसंवृतम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘जैसे जलके महान् वेगसे टूटे या फटे हुए बाँधको, जब कि उससे जलका प्रखर प्रवाह बह रहा हो, बाँधना अत्यन्त कठिन होता है, उसी प्रकार राज्यके खुले हुए छिद्रको ढक पाना मैं अपने लिये असम्भव मानता हूँ ॥ ४ ॥
गतिं खर इवाश्वस्य हंसस्येव च वायसः । नान्वेतुमुत्सहे वीर तव मार्गमरिंदम ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘शत्रुदमन वीर ! जैसे गदहा घोड़ेकी और कौवा हंसकी गतिका अनुसरण नहीं कर सकता, उसी तरह मैं आपके मार्गका—रक्षणीय-रक्षणरूपी कौशलका अनुकरण नहीं कर सकता ॥ ५ ॥
यथा चारोपितो वृक्षो जातश्चान्तर्निवेशने । महानपि दुरारोहो महास्कन्धः प्रशाखवान् ॥ ६ ॥ शीर्येत पुष्पितो भूत्वा न फलानि प्रदर्शयन् । तस्य नानुभवेदर्थं यस्य हेतोः स रोपितः ॥ ७ ॥ एषोपमा महाबाहो त्वमर्थं वेत्तुमर्हसि । यद्यस्मान् मनुजेन्द्र त्वं भर्ता भृत्यान् न शाधि हि ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘महाबाहो ! नरेन्द्र ! जैसे घरके भीतरके बगीचेमें एक वृक्ष लगाया गया । वह जमा और जमकर बहुत बड़ा हो गया । इतना बड़ा कि उसपर चढ़ना कठिन हो रहा था । उसका तना बहुत बड़ा और मोटा था तथा उसमें बहुत-सी शाखाएँ थीं । उस वृक्षमें फूल लगे; किंतु वह अपने फल नहीं दिखा सका था । इसी दशामें टूटकर धराशायी हो गया । लगानेवालोंने जिन फलोंके उद्देश्यसे उस वृक्षको लगाया था, उनका अनुभव वे नहीं कर सके । यही उपमा उस राजाके लिये भी हो सकती है, जिसे प्रजाने अपनी रक्षाके लिये पाल-पोसकर बड़ा किया और बड़े होनेपर वह उनकी रक्षासे मुँह मोड़ने लगे । इस कथनके तात्पर्यको आप समझें । यदि भर्त्ता होकर भी आप हम भृत्योंका भरण-पोषण नहीं करेंगे तो आप भी उस निष्फल वृक्षके समान ही समझे जायँगे ॥ ६–८ ॥
जगदद्याभिषिक्तं त्वामनुपश्यतु राघव । प्रतपन्तमिवादित्यं मध्याह्ने दीप्ततेजसम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! अब तो हमारी यही इच्छा है कि जगत्के सब लोग आपका राज्याभिषेक देखें । मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति आपका तेज और प्रताप बढ़ता रहे ॥ ९ ॥
तूर्यसंघातनिर्घोषैः काञ्चीनूपुरनिःस्वनैः । मधुरैर्गीतशब्दैश्च प्रतिबुध्यस्व शोष्व च ॥ १० ॥ यावदावर्तते चक्रं यावती च वसुंधरा । तावत् त्वमिह लोकस्य स्वामित्वमनुवर्तय ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘आप विविध वाद्योंकी मधुर ध्वनि, काञ्ची तथा नूपुरोंकी झनकार और गीतके मनोहर शब्द सुनकर सोयें और जागें ॥ ‘जबतक नक्षत्रमण्डल घूमता है और जबतक यह पृथ्वी स्थित है तबतक आप इस संसारके स्वामी बने रहें’ ॥ ११ ॥
भरतस्य वचः श्रुत्वा रामः परपुरंजयः । तथेति प्रतिजग्राह निषसादासने शुभे ॥ १२ ॥
भावार्थ
भरतकी यह बात सुनकर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भगवान् श्रीरामने ‘तथास्तु’ कहकर उसे मान लिया और वे एक सुन्दर आसनपर विराजमान हुए ॥ १२ ॥
ततः शत्रुघ्नवचनान्निपुणाः श्मश्रुवर्धनाः । सुखहस्ताः सुशीघ्राश्च राघवं पर्यवारयन् ॥ १३ ॥
भावार्थ
फिर शत्रुघ्नजीकी आज्ञासे निपुण नाई बुलाये गये, जिनके हाथ हल्के और तेज चलनेवाले थे । उन सबने श्रीरघुनाथजीको घेर लिया ॥ १३ ॥
पूर्वं तु भरते स्नाते लक्ष्मणे च महाबले । सुग्रीवे वानरेन्द्रे च राक्षसेन्द्रे विभीषणे ॥ १४ ॥ विशोधितजटः स्नातश्चित्रमाल्यानुलेपनः । महार्हवसनोपेतस्तस्थौ तत्र श्रिया ज्वलन् ॥ १५ ॥
भावार्थ
पहले भरतने स्नान किया फिर महाबली लक्ष्मणने । तत्पश्चात् वानरराज सुग्रीव और राक्षसराज विभीषणने भी स्नान किया । तदनन्तर जटाका शोधन करके श्रीरामने स्नान किया, फिर विचित्र पुष्पमाला, सुन्दर अनुलेपन और बहुमूल्य पीताम्बर धारण करके आभूषणोंकी शोभासे प्रकाशित होते हुए वे सिंहासनपर विराजमान हुए ॥ १४-१५ ॥
प्रतिकर्म च रामस्य कारयामास वीर्यवान् । लक्ष्मणस्य च लक्ष्मीवानिक्ष्वाकुकुलवर्धनः ॥ १६ ॥ प्रतिकर्म च सीतायाः सर्वा दशरथस्त्रियः । आत्मनैव तदा चक्रुर्मनस्विन्यो मनोहरम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
इक्ष्वाकुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले शोभाशाली, पराक्रमी वीर शत्रुघ्नने श्रीराम और लक्ष्मणको शृङ्गार धारण कराया ॥ उस समय राजा दशरथकी सभी मनस्विनी रानियोंने स्वयं अपने हाथोंसे सीताजीका मनोहर शृङ्गार किया ॥ १७ ॥
ततो वानरपत्नीनां सर्वासामेव शोभनम् । चकार यत्नात् कौसल्या प्रहृष्टा पुत्रवत्सला ॥ १८ ॥
भावार्थ
पुत्रवत्सला कौसल्याने अत्यन्त हर्ष और उत्साहके साथ बड़े यत्नसे समस्त वानरपत्नियोंका सुन्दर शृङ्गार किया ॥१८॥
ततः शत्रुघ्नवचनात् सुमन्त्रो नाम सारथिः । योजयित्वाभिचक्राम रथं सर्वाङ्गशोभनम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् शत्रुघ्नजीकी आज्ञासे सारथि सुमन्त्रजी एक सर्वाङ्गसुन्दर रथ जोतकर ले आये ॥ १९ ॥
अम्यर्कामलसंकाशं दिव्यं दृष्ट्वा रथं स्थितम् । आरुरोह महाबाहू रामः परपुरंजयः ॥ २० ॥
भावार्थ
अग्नि और सूर्यके समान देदीप्यमान उस दिव्य रथको खड़ा देख शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले महाबाहु श्रीराम उसपर आरूढ़ हुए ॥ २० ॥
सुग्रीवो हनुमांश्चैव महेन्द्रसदृशद्युती । स्नातौ दिव्यनिभैर्वस्त्रैर्जग्मतुः शुभकुण्डलौ ॥ २१ ॥
भावार्थ
सुग्रीव और हनुमान्जी दोनों देवराज इन्द्रके समान कान्तिमान् थे । दोनोंके कानोंमें सुन्दर कुण्डल शोभा पा रहे थे । वे दोनों ही स्नान करके दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित हो नगरकी ओर चले ॥ २१ ॥
सर्वाभरणजुष्टाश्च ययुस्ताः शुभकुण्डलाः । सुग्रीवपत्न्यः सीता च द्रष्टुं नगरमुत्सुकाः ॥ २२ ॥
भावार्थ
सुग्रीवकी पत्नियाँ और सीताजी समस्त आभूषणोंसे विभूषित और सुन्दर कुण्डलोंसे अलंकृत हो नगर देखनेकी उत्सुकता मनमें लिये सवारियोंपर चलीं ॥ २२ ॥
अयोध्यायां च सचिवा राज्ञो दशरथस्य च । पुरोहितं पुरस्कृत्य मन्त्रयामासुरर्थवत् ॥ २३ ॥
भावार्थ
अयोध्यामें राजा दशरथके मन्त्री पुरोहित वसिष्ठजीको आगे करके श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकके विषयमें आवश्यक विचार करने लगे ॥ २३ ॥
अशोको विजयश्चैव सिद्धार्थश्च समाहिताः । मन्त्रयन् रामवृद्ध्यर्थमृद्ध्यर्थं नगरस्य च ॥ २४ ॥
भावार्थ
अशोक, विजय और सिद्धार्थ—ये तीनों मन्त्री एकाग्रचित्त हो श्रीरामचन्द्रजीके अभ्युदय तथा नगरकी समृद्धिके लिये परस्पर मन्त्रणा करने लगे ॥ २४ ॥
सर्वमेवाभिषेकार्थं जयार्हस्य महात्मनः । कर्तुमर्हथ रामस्य यद् यन्मङ्गलपूर्वकम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
उन्होंने सेवकोंसे कहा—‘विजयके योग्य जो महात्मा श्रीरामचन्द्रजी हैं, उनके अभिषेकके लिये जो-जो आवश्यक कार्य करना है, वह सब मङ्गलपूर्वक तुम सब लोग करो’ ॥२५॥
इति ते मन्त्रिणः सर्वे संदिश्य च पुरोहितः । नगरान्निर्ययुस्तूर्णं रामदर्शनबुद्धयः ॥ २६ ॥
भावार्थ
इस प्रकार आदेश देकर वे मन्त्री और पुरोहितजी श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके लिये तत्काल नगरसे बाहर निकले ॥ २६ ॥
हरियुक्तं सहस्राक्षो रथमिन्द्र इवानघः । प्रययौ रथमास्थाय रामो नगरमुत्तमम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
जैसे सहस्र नेत्रधारी इन्द्र हरे रंगके घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर यात्रा करते हैं, उसी प्रकार निष्पाप श्रीराम एक श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो अपने उत्तम नगरकी ओर चले॥२७॥
जग्राह भरतो रश्मीञ्शत्रुघ्नश्छत्रमाददे । लक्ष्मणो व्यजनं तस्य मूर्ध्नि संवीजयंस्तदा ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘उस समय भरतने सारथि बनकर घोड़ोंकी बागडोर अपने हाथमें ले रक्खी थी । शत्रुघ्नने छत्र लगा रक्खा था और लक्ष्मण उस समय श्रीरामचन्द्रजीके मस्तकपर चँवर डुला रहे थे ॥ २८ ॥
श्वेतं च वालव्यजनं जगृहे परितः स्थितः। अपरं चन्द्रसंकाशं राक्षसेन्द्रो विभीषणः ॥ २९ ॥
भावार्थ
एक ओर लक्ष्मण थे और दूसरी ओर राक्षसराज विभीषण खड़े थे । उन्होंने चन्द्रमाके समान कान्तिमान् दूसरा श्वेत चँवर हाथमें ले रक्खा था ॥ २९ ॥
ऋषिसङ्घैस्तदाऽऽकाशे देवैश्च समरुद्गणैः। स्तूयमानस्य रामस्य शुश्रुवे मधुरध्वनिः ॥ ३० ॥
भावार्थ
उस समय आकाशमें खड़े हुए ऋषियों तथा मरुद्गणोंसहित देवताओंके समुदाय श्रीरामचन्द्रजीके स्तवनकी मधुर ध्वनि सुन रहे थे ॥ ३० ॥
ततः शत्रुंजयं नाम कुञ्जरं पर्वतोपमम् । आरुरोह महातेजाः सुग्रीवः प्लवगर्षभः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
तदनन्तर महातेजस्वी वानरराज सुग्रीव शत्रुञ्जयनामक पर्वताकार गजराजपर आरूढ़ हुए ॥ ३१ ॥
नव नागसहस्राणि ययुरास्थाय वानराः। मानुषं विग्रहं कृत्वा सर्वाभरणभूषिताः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
वानरलोग नौ हजार हाथियोंपर चढ़कर यात्रा कर रहे थे। वे उस समय मानवरूप धारण किये हुए थे और सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थे ॥ ३२ ॥
शङ्खशब्दप्रणादैश्च दुन्दुभीनां च निःस्वनैः। प्रययौ पुरुषव्याघ्रस्तां पुरीं हर्म्यमालिनीम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
पुरुषसिंह श्रीराम शङ्खध्वनि तथा दुन्दुभियोंके गम्भीर नादके साथ प्रासादमालाओंसे अलंकृत अयोध्यापुरीकी ओर प्रस्थित हुए ॥ ३३ ॥
ददृशुस्ते समायान्तं राघवं सपुरःसरम् । विराजमानं वपुषा रथेनातिरथं तदा ॥ ३४ ॥
भावार्थ
अयोध्यावासियोंने अतिरथी श्रीरघुनाथजीको रथपर बैठकर आते देखा । उनका श्रीविग्रह दिव्यकान्तिसे प्रकाशित हो रहा था और उनके आगे-आगे अग्रगामी सैनिकोंका जत्था चल रहा था ॥ ३४ ॥
ते वर्धयित्वा काकुत्स्थं रामेण प्रतिनन्दिताः। अनुजग्मुर्महात्मानं भ्रातृभिः परिवारितम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
उन सबने आगे बढ़कर श्रीरघुनाथजीको बधाई दी और श्रीरामने भी बदलेमें उनका अभिनन्दन किया । फिर वे सब पुरवासी भाइयोंसे घिरे हुए महात्मा श्रीरामके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ ३५ ॥
अमात्यैर्ब्राह्मणैश्चैव तथा प्रकृतिभिर्वृतः। श्रिया विरुरुचे रामो नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
जैसे नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमा सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार मन्त्रियों, ब्राह्मणों तथा प्रजाजनोंसे घिरे हुए श्रीरामचन्द्रजी अपनी दिव्यकान्तिसे उद्भासित हो रहे थे ॥ ३६ ॥
स पुरोगामिभिस्तूर्यैस्तालस्वस्तिकपाणिभिः। प्रव्याहरद्भिर्मुदितैर्मङ्गलानि वृतो ययौ ॥ ३७ ॥
भावार्थ
सबसे आगे बाजेवाले थे । वे आनन्दमग्न हो तुरही, करताल और स्वस्तिक बजाते तथा माङ्गलिक गीत गाते थे । उन सबके साथ श्रीरामचन्द्रजी नगरकी ओर बढ़ने लगे ॥३७॥
अक्षतं जातरूपं च गावः कन्याः सहद्विजाः। नरा मोदकहस्ताश्च रामस्य पुरतो ययुः ॥ ३८ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीके आगे अक्षत और सुवर्णसे युक्त पात्र, गौ, ब्राह्मण, कन्याएँ तथा हाथमें मिठाई लिये अनेकानेक मनुष्य चल रहे थे ॥ ३८ ॥
सख्यं च रामः सुग्रीवे प्रभावं चानिलात्मजे। वानराणां च तत् कर्म ह्याचचक्षेऽथ मन्त्रिणाम् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजी अपने मन्त्रियोंसे सुग्रीवकी मित्रता, हनुमान्जीके प्रभाव तथा अन्य वानरोंके अद्भुत पराक्रमकी चर्चा करते जा रहे थे ॥ ३९ ॥
श्रुत्वा च विस्मयं जग्मुरयोध्यापुरवासिनः। वानराणां च तत् कर्म राक्षसानां च तद् बलम् । विभीषणस्य संयोगमाचचक्षेऽथ मन्त्रिणाम् ॥ ४० ॥
भावार्थ
वानरोंके पुरुषार्थ और राक्षसोंके बलकी बातें सुनकर अयोध्यावासियोंको बड़ा विस्मय हुआ । श्रीरामने विभीषणसे मिलनका प्रसंग भी अपने मन्त्रियोंको बताया ॥ ४० ॥
द्युतिमानेतदाख्याय रामो वानरसंयुतः। हृष्टपुष्टजनाकीर्णामयोध्यां प्रविवेश सः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
यह सब बताकर वानरोंसहित तेजस्वी श्रीरामने हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया ॥ ४१ ॥
ततो ह्यभ्युच्छ्रयन् पौराः पताकाश्च गृहे गृहे । ऐक्ष्वाकाध्युषितं रम्यमाससाद पितुर्गृहम् ॥ ४२ ॥
भावार्थ
उस समय पुरवासियोंने अपने-अपने घरपर लगी हुई पताकाएँ ऊँची कर दीं । फिर श्रीरामचन्द्रजी इक्ष्वाकुवंशी राजाओंके उपयोगमें आये हुए पिताके रमणीय भवनमें गये ॥ ४२ ॥
अथाब्रवीद् राजपुत्रो भरतं धर्मिणां वरम् । अर्थोपहितया वाचा मधुरं रघुनन्दनः ॥ ४३ ॥ पितुर्भवनमासाद्य प्रविश्य च महात्मनः । कौसल्यां च सुमित्रां च कैकेयीमभिवाद्य च ॥ ४४ ॥
भावार्थ
उस समय रघुकुलनन्दन राजकुमार श्रीरामने महात्मा पिताजीके भवनमें प्रवेश करके माता कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयीके चरणोंमें मस्तक झुकाकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भरतसे अर्थयुक्त मधुर वाणीमें कहा—॥ ४३-४४ ॥
तत्र मद्भवनं श्रेष्ठं साशोकवनिकं महत् । मुक्तावैदूर्यसंकीर्णं सुग्रीवाय निवेदय ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘भरत ! मेरा जो अशोकवाटिकासे घिरा हुआ मुक्ता एवं वैदूर्य मणियोंसे जटित विशाल भवन है, वह सुग्रीवको दे दो’ ॥ ४५ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भरतः सत्यविक्रमः । हस्ते गृहीत्वा सुग्रीवं प्रविवेश तमालयम् ॥ ४६ ॥
भावार्थ
उनकी आज्ञा सुनकर सत्यपराक्रमी भरतने सुग्रीवका हाथ पकड़कर उस भवनमें प्रवेश किया ॥ ४६ ॥
ततस्तैलप्रदीपांश्च पर्यङ्कास्तरणानि च । गृहीत्वा विविशुः क्षिप्रं शत्रुघ्नेन प्रचोदिताः ॥ ४७ ॥
भावार्थ
फिर शत्रुघ्नजीकी आज्ञासे अनेकानेक सेवक उसमें तिलके तेलसे जलनेवाले बहुत-से दीपक, पलंग और बिछौने लेकर शीघ्र ही गये ॥ ४७ ॥
उवाच च महातेजाः सुग्रीवं राघवानुजः । अभिषेकाय रामस्य दूतानाज्ञापय प्रभो ॥ ४८ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् महातेजस्वी भरतने सुग्रीवसे कहा—‘प्रभो ! भगवान् श्रीरामके अभिषेकके निमित्त जल लानेके लिये आप अपने दूतोंको आज्ञा दीजिये’ ॥ ४८ ॥
सौवर्णान् वानरेन्द्राणां चतुर्णां चतुरो घटान् । ददौ क्षिप्रं स सुग्रीवः सर्वरत्नविभूषितान् ॥ ४९ ॥
भावार्थ
तब सुग्रीवने उसी समय चार श्रेष्ठ वानरोंको सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित चार सोनेके घड़े देकर कहा—॥ ४९ ॥
तथा प्रत्यूषसमये चतुर्णां सागराम्भसाम् । पूर्णैर्घटैः प्रतीक्षध्वं तथा कुरुत वानराः ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘वानरो ! तुमलोग कल प्रातःकाल ही चारों समुद्रोंके जलसे भरे हुए घड़ोंके साथ उपस्थित रहकर आवश्यक आदेशकी प्रतीक्षा करो’ ॥ ५० ॥
एवमुक्ता महात्मानो वानरा वारणोपमाः । उत्पेतुर्गगनं शीघ्रं गरुडा इव शीघ्रगाः ॥ ५१ ॥
भावार्थ
सुग्रीवके इस प्रकार आदेश देनेपर हाथीके समान विशालकाय महामनस्वी वानर, जो गरुड़के समान शीघ्रगामी थे, तत्काल आकाशमें उड़ चले ॥ ५१ ॥
जाम्बवांश्च हनूमांश्च वेगदर्शी च वानरः । ऋषभश्चैव कलशाञ्जलपूर्णानथानयन् ॥ ५२ ॥ नदीशतानां पञ्चानां जलं कुम्भैरुपाहरन् ।
भावार्थ
जाम्बवान्, हनुमान्, वेगदर्शी (गवय) और ऋषभ—ये सभी वानर चारों समुद्रोंसे और पाँच सौ नदियोंसे भी सोनेके बहुत-से कलश भर लाये ॥ ५२½ ॥
पूर्वात् समुद्रात् कलशं जलपूर्णमथानयत् ॥ ५३ ॥ सुषेणः सत्त्वसम्पन्नः सर्वरत्नविभूषितम् ।
भावार्थ
जिनके पास रीछोंकी बहुत-सी सुन्दर सेना है वे शक्तिशाली जाम्बवान् सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित सुवर्णमय कलश लेकर गये और उसमें पूर्वसमुद्रका जल भरकर ले आये ५३½
ऋषभो दक्षिणात्तूर्णं समुद्राज्जलमानयत् ॥ ५४ ॥ रक्तचन्दनकर्पूरैः संवृतं काञ्चनं घटम् ।
भावार्थ
ऋषभ दक्षिण समुद्रसे शीघ्र ही एक सोनेका घड़ा भर लाये। वह लाल चन्दन और कपूरसे ढका हुआ था ॥५४½॥
गवयः पश्चिमात् तोयमाजहार महार्णवात् ॥ ५५ ॥ रत्नकुम्भेन महता शीतं मारुतविक्रमः ।
भावार्थ
वायुके समान वेगशाली गवय एक रत्ननिर्मित विशाल कलशके द्वारा पश्चिम दिशाके महासागरसे शीतल जल भर लाये ॥ ५५½ ॥
उत्तराच्च जलं शीघ्रं गरुडानिलविक्रमः ॥ ५६ ॥ आजहार स धर्मात्मानिलः सर्वगुणान्वितः ।
भावार्थ
गरुड़ तथा वायुके समान तीव्र गतिसे चलनेवाले, धर्मात्मा सर्वगुणसम्पन्न पवनपुत्र हनुमान्जी भी उत्तरवर्ती महासागरसे शीघ्र जल ले आये ॥ ५६½ ॥
ततस्तैर्वानरश्रेष्ठैरानीतं प्रेक्ष्य तज्जलम् ॥ ५७ ॥ अभिषेकाय रामस्य शत्रुघ्नः सचिवैः सह ॥ । पुरोहिताय श्रेष्ठाय सुहृद्भ्यश्च न्यवेदयत् ॥ ५८ ॥
भावार्थ
उन श्रेष्ठ वानरोंके द्वारा लाये हुए उस जलको देखकर मन्त्रियोंसहित शत्रुघ्नने वह सारा जल श्रीरामजीके अभिषेकके लिये पुरोहित वसिष्ठजी तथा अन्य सुहृदोंको समर्पित कर दिया ॥ ५७-५८ ॥
ततः स प्रयतो वृद्धो वसिष्ठो ब्राह्मणैः सह । रामं रत्नमये पीठे ससीतं संन्यवेशयत् ॥ ५९ ॥
भावार्थ
तदनन्तर ब्राह्मणोंसहित शुद्धचेता वृद्ध वसिष्ठजीने सीतासहित श्रीरामचन्द्रजीको रत्नमयी चौकीपर बैठाया ॥ ५९ ॥
वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिरथ काश्यपः । कात्यायनः सुयज्ञश्च गौतमो विजयस्तथा ॥ ६० ॥ अभ्यषिञ्चन्नरव्याघ्रं प्रसन्नेन सुगन्धिना । सलिलेन सहस्राक्षं वसवो वासवं यथा ॥ ६१ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् जैसे आठ वसुओंने देवराज इन्द्रका अभिषेक कराया था, उसी प्रकार वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, कात्यायन, सुयज्ञ, गौतम और विजय—इन आठ मन्त्रियोंने स्वच्छ एवं सुगन्धित जलके द्वारा सीतासहित पुरुषप्रवर श्रीरामचन्द्रजीका अभिषेक कराया ॥ ६०-६१ ॥
ऋत्विग्भिर्ब्राह्मणैः पूर्वं कन्याभिर्मन्त्रिभिस्तथा । योधैश्चैवाभ्यषिञ्चंस्ते सम्प्रहृष्टैः सनैगमैः ॥ ६२ ॥ सर्वौषधिरसैश्चापि दैवतैर्नभसि स्थितैः । चतुर्भिर्लोकपालैश्च सर्वैर्देवैश्च संगतैः ॥ ६३ ॥
भावार्थ
( किनके द्वारा कराया ? यह बताते हैं—) सबसे पहले उन्होंने सम्पूर्ण ओषधियोंके रसों तथा पूर्वोक्त जलसे ऋत्विग् ब्राह्मणोंद्वारा, फिर सोलह कन्याओंद्वारा तत्पश्चात् मन्त्रियोंद्वारा अभिषेक करवाया । इसके बाद अन्यान्य योद्धाओं और हर्षसे भरे हुए श्रेष्ठ व्यवसायियोंको भी अभिषेकका अवसर दिया । उस समय आकाशमें खड़े हुए समस्त देवताओं और एकत्र हुए चारों लोकपालोंने भी भगवान् श्रीरामका अभिषेक किया ॥ ६२-६३ ॥
ब्रह्मणा निर्मितं पूर्वं किरीटं रत्नशोभितम् । अभिषिक्तः पुरा येन मनुस्तं दीप्ततेजसम् ॥ ६४ ॥ तस्यान्ववाये राजानः क्रमाद् येनाभिषेचिताः । सभायां हेमकल्पायां शोभितायां महाधनैः ॥ ६५ ॥ रत्नैर्नानाविधैश्चैव चित्रितायां सुशोभनैः । नानारत्नमये पीठे कल्पयित्वा यथाविधि ॥ ६६ ॥ किरीटेन ततः पश्चाद् वसिष्ठेन महात्मना । ऋत्विग्भिर्भूषणैश्चैव समयोक्ष्यत राघवः ॥ ६७ ॥
भावार्थ
तदनन्तर ब्रह्माजीका बनाया हुआ रत्नशोभित एवं दिव्य तेजसे देदीप्यमान किरीट, जिसके द्वारा पहले-पहल मनुजीका और फिर क्रमशः उनके सभी वंशधर राजाओंका अभिषेक हुआ था, भाँति-भाँतिके रत्नोंसे चित्रित, सुवर्णनिर्मित एवं महान् वैभवसे शोभायमान सभाभवनमें अनेक रत्नोंसे बनी हुई चौकीपर विधिपूर्वक रक्खा गया । फिर महात्मा वसिष्ठजीने अन्य ऋत्विज ब्राह्मणोंके साथ उस किरीटसे और अन्यान्य आभूषणोंसे भी श्रीरघुनाथजीको विभूषित किया ॥ ६४–६७ ॥
छत्रं तस्य च जग्राह शत्रुघ्नः पाण्डुरं शुभम् । श्वेतं च वालव्यजनं सुग्रीवो वानरेश्वरः ॥ ६८ ॥ अपरं चन्द्रसंकाशं राक्षसेन्द्रो विभीषणः ।
भावार्थ
उस समय शत्रुघ्नजीने उनपर सुन्दर श्वेत रंगका छत्र लगाया । एक ओर वानरराज सुग्रीवने श्वेत चँवर हाथमें लिया तो दूसरी ओर राक्षसराज विभीषणने चन्द्रमाके समान चमकीला चँवर लेकर डुलाना आरम्भ किया ॥ ६८½ ॥
मालां ज्वलन्तीं वपुषा काञ्चनीं शतपुष्कराम् ॥ ६९ ॥ राघवाय ददौ वायुर्वासवेन प्रचोदितः । सर्वरत्नसमायुक्तं मणिभिश्च विभूषितम् ॥ ७० ॥ मुक्ताहारं नरेन्द्राय ददौ शक्रप्रचोदितः ।
भावार्थ
उस अवसरपर देवराज इन्द्रकी प्रेरणासे वायुदेवने सौ सुवर्णमय कमलोंसे बनी हुई एक दीप्तिमती माला और सब प्रकारके रत्नोंसे युक्त मणियोंसे विभूषित मुक्ताहार राजा रामचन्द्रजीको भेंट किया ॥ ६९-७०½ ॥
प्रजगुर्देवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ७१ ॥ अभिषेके तदर्हस्य तदा रामस्य धीमतः ।
भावार्थ
बुद्धिमान् श्रीरामके अभिषेककालमें देवगन्धर्व गाने लगे और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं । भगवान् श्रीराम इस सम्मानके सर्वथा योग्य थे ॥ ७१½ ॥
भूमिः सस्यवती चैव फलवन्तश्च पादपाः ॥ ७२ ॥ गन्धवन्ति च पुष्पाणि बभूवू राघवोत्सवे ।
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीके राज्याभिषेकोत्सवके समय पृथ्वी खेतीसे हरी-भरी हो गयी, वृक्षोंमें फल आ गये और फूलोंमें सुगन्ध छा गयी ॥ ७२½ ॥
सहस्रशतमश्वानां धेनूनां च गवां तथा ॥ ७३ ॥ ददौ शतवृषान् पूर्वं द्विजेभ्यो मनुजर्षभः । त्रिंशत्कोटीर्हिरण्यस्य ब्राह्मणेभ्यो ददौ पुनः ॥ ७४ ॥ नानाभरणवस्त्राणि महार्हाणि च राघवः ।
भावार्थ
महाराज श्रीरामने उस समय पहले ब्राह्मणोंको एक लाख घोड़े उतनी ही दूध देनेवाली गौएँ तथा सौ साँड़ दान किये । यही नहीं, श्रीरघुनाथजीने तीस करोड़ अशर्फियाँ तथा नाना प्रकारके बहुमूल्य आभूषण और वस्त्र भी ब्राह्मणोंको बाँटे ॥ ७३-७४½ ॥
अर्करश्मिप्रतीकाशां काञ्चनीं मणिविग्रहाम् ॥ ७५ ॥ सुग्रीवाय स्रजं दिव्यां प्रायच्छन्मनुजाधिपः ।
भावार्थ
तत्पश्चात् राजा श्रीरामने अपने मित्र सुग्रीवको सोनेकी एक दिव्य माला भेंट की, जो सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशित हो रही थी । उसमें बहुत-सी मणियोंका संयोग था ॥ ७५½ ॥
वैदूर्यमयचित्रे च चन्द्ररश्मिविभूषिते ॥ ७६ ॥ वालिपुत्राय धृतिमानङ्गदायाङ्गदे ददौ ।
भावार्थ
इसके बाद धैर्यशाली श्रीरघुवीरने प्रसन्न हो वालिपुत्र अङ्गदको दो अङ्गद ( बाजूबन्द ) भेंट किये, जो नीलमसे जटित होनेके कारण विचित्र दिखायी देते थे । वे चन्द्रमाकी किरणोंसे विभूषित-से जान पड़ते थे ॥ ७६½ ॥
मणिप्रवरजुष्टं तं मुक्ताहारमनुत्तमम् ॥ ७७ ॥ सीतायै प्रददौ रामश्चन्द्ररश्मिसमप्रभम् । अरजे वाससी दिव्ये शुभान्याभरणानि च ॥ ७८ ॥
भावार्थ
उत्तम मणियोंसे युक्त उस परम उत्तम मुक्ताहारको ( जिसे वायुदेवताने भेंट किया था तथा ) जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान प्रकाशित होता था श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीके गलेमें डाल दिया । साथ ही उन्हें कभी मैले न होनेवाले दो दिव्य वस्त्र तथा और भी बहुत-से सुन्दर आभूषण अर्पित किये ॥ ७७-७८ ॥
अवेक्षमाणा वैदेही प्रददौ वायुसूनवे । अवमुच्यात्मनः कण्ठाद्धारं जनकनन्दिनी ॥ ७९ ॥ अवैक्षत हरीन् सर्वान् भर्तारं च मुहुर्मुहुः ।
भावार्थ
विदेहनन्दिनी सीताने पतिकी ओर देखकर वायुपुत्र हनुमान्को कुछ भेंट देनेका विचार किया । वे जनकनन्दिनी अपने गलेसे उस मुक्ताहारको निकालकर बारंबार समस्त वानरों तथा पतिकी ओर देखने लगीं ॥ ७९½ ॥
तामिङ्गितज्ञः सम्प्रेक्ष्य बभाषे जनकात्मजाम् ॥ ८० ॥ प्रदेहि सुभगे हारं यस्य तुष्यासि भामिनि ।
भावार्थ
उनकी उस चेष्टाको समझकर श्रीरामचन्द्रजीने जानकीजीकी ओर देखकर कहा—‘सौभाग्यशालिनि ! भामिनि ! तुम जिसपर संतुष्ट हो, उसे यह हार दे दो’ ॥ ८०½ ॥
अथ सा वायुपुत्राय तं हारमसितेक्षणा ॥ ८१ ॥ तेजो धृतिर्यशो दाक्ष्यं सामर्थ्यं विनयो नयः । पौरुषं विक्रमो बुद्धिर्यस्मिन्नेतानि नित्यदा ॥ ८२ ॥
भावार्थ
तब कजरारे नेत्रोंवाली माता सीताने वायुपुत्र हनुमान्को, जिनमें तेज, धृति, यश, चतुरता, शक्ति, विनय, नीति, पुरुषार्थ, पराक्रम और उत्तम बुद्धि—ये सद्गुण सदा विद्यमान रहते हैं, वह हार दे दिया ॥ ८१-८२ ॥
हनूमांस्तेन हारेण शुशुभे वानरर्षभः । चन्द्रांशुचयगौरेण श्वेताभ्रेण यथाचलः ॥ ८३ ॥
भावार्थ
उस हारसे कपिश्रेष्ठ हनुमान् उसी तरह शोभा पाने लगे, जैसे चन्द्रमाकी किरणोंके समूह-सदृश श्वेत बादलोंकी मालासे कोई पर्वत सुशोभित हो रहा हो ॥ ८३ ॥
सर्वे वानरवृद्धाश्च ये चान्ये वानरोत्तमाः । वासोभिर्भूषणैश्चैव यथार्हं प्रतिपूजिताः ॥ ८४ ॥
भावार्थ
इसी प्रकार जो प्रधान-प्रधान एवं श्रेष्ठ वानर थे, उन सबका वस्त्रों और आभूषणोंद्वारा यथायोग्य सत्कार किया गया ॥ ८४ ॥
विभीषणोऽथ सुग्रीवो हनूमाञ्जाम्बवांस्तथा । सर्वे वानरमुख्याश्च रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ ८५ ॥ यथार्हं पूजिताः सर्वे कामैः रत्नैश्च पुष्कलैः । प्रहृष्टमनसः सर्वे जग्मुरेव यथागतम् ॥ ८६ ॥
भावार्थ
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामने विभीषण, सुग्रीव, हनुमान् तथा जाम्बवान् आदि सभी श्रेष्ठ वानरवीरोंका मनोवाञ्छित वस्तुओं एवं प्रचुर रत्नोंद्वारा यथायोग्य सत्कार किया । वे सब-के-सब प्रसन्नचित्त होकर जैसे आये थे, उसी तरह अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ८५-८६ ॥
ततो द्विविदमैन्दाभ्यां नीलाय च परंतपः । सर्वान् कामगुणान् वीक्ष्य प्रददौ वसुधाधिपः ॥ ८७ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा श्रीरघुनाथजीने द्विविद, मैन्द और नीलकी ओर देखकर उन सबको मनोवाञ्छापूरक गुणोंसे युक्त सब प्रकारके उत्तम रत्न आदि भेंट किये ॥ ८७ ॥
दृष्ट्वा सर्वे महात्मानस्ततस्ते वानरर्षभाः । विसृष्टाः पार्थिवेन्द्रेण किष्किन्धां समुपागमन् ॥ ८८ ॥
भावार्थ
इस प्रकार भगवान् श्रीरामका राज्याभिषेक देखकर सभी महामनस्वी श्रेष्ठ वानर महाराज श्रीरामसे बिदा ले किष्किन्धाको चले गये ॥ ८८ ॥
सुग्रीवो वानरश्रेष्ठो दृष्ट्वा रामाभिषेचनम् । पूजितश्चैव रामेण किष्किन्धां प्राविशत् पुरीम् ॥ ८९ ॥
भावार्थ
वानरश्रेष्ठ सुग्रीवने भी श्रीरामके राज्याभिषेकका उत्सव देखकर उनसे पूजित हो किष्किन्धापुरीमें प्रवेश किया ॥८९॥
विभीषणोऽपि धर्मात्मा सह तैर्नैर्ऋतर्षभैः । लब्ध्वा कुलधनं राजा लङ्कां प्रायान्महायशाः ॥ ९० ॥
भावार्थ
महायशस्वी धर्मात्मा विभीषण भी अपने कुलका वैभव– अपना राज्य पाकर अपने साथी श्रेष्ठ निशाचरोंके साथ लङ्कापुरीको चले गये ॥ ९० ॥
स राज्यमखिलं शासन्निहतारिर्महायशाः । राघवः परमोदारः शशास परया मुदा । उवाच लक्ष्मणं रामो धर्मज्ञं धर्मवत्सलः ॥ ९१ ॥
भावार्थ
अपने शत्रुओंका वध करके परम उदार महायशस्वी श्रीरघुनाथजी बड़े आनन्दसे समस्त राज्यका शासन करने लगे । उन धर्मवत्सल श्रीरामने धर्मज्ञ लक्ष्मणसे कहा—— ॥ ९१ ॥
आतिष्ठ धर्मज्ञ मया सहेमां गां पूर्वराजाध्युषितां बलेन । तुल्यं मया त्वं पितृभिर्धृता वा तां यौवराज्ये धुरमुद्वहस्व ॥ ९२ ॥
भावार्थ
‘धर्मज्ञ लक्ष्मण ! पूर्ववर्ती राजाओंने चतुरङ्गिणी सेनाके साथ जिसका पालन किया था, उसी इस भूमण्डलके राज्यपर तुम मेरे साथ प्रतिष्ठित होओ । अपने पिता, पितामह और प्रपितामहोंने जिस राज्यभारको पहले धारण किया था, उसीको मेरे ही समान तुम भी युवराज-पदपर स्थित होकर धारण करो’ ॥ ९२ ॥
सर्वात्मना पर्यनुनीयमानो यदा न सौमित्रिरुपैति योगम् । नियुज्यमानो भुवि यौवराज्ये ततोऽभ्यषिञ्चद् भरतं महात्मा ॥९३॥
भावार्थ
परंतु श्रीरामचन्द्रजीके सब तरहसे समझाने और नियुक्त किये जानेपर भी जब सुमित्राकुमार लक्ष्मणने उस पदको नहीं स्वीकार किया, तब महात्मा श्रीरामने भरतको युवराज-पदपर अभिषिक्त किया ॥ ९३ ॥
पौण्डरीकाश्वमेधाभ्यां वाजपेयेन चासकृत् । अन्यैश्च विविधैर्यज्ञैरयजत् पार्थिवात्मजः ॥ ९४ ॥
भावार्थ
राजकुमार महाराज श्रीरामने अनेक बार पौण्डरीक, अश्वमेध, वाजपेय तथा अन्य नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान किया ॥ ९४ ॥
राज्यं दशसहस्राणि प्राप्य वर्षाणि राघवः । शताश्वमेधानाजह्रे सदश्वान् भूरिदक्षिणान् ॥ ९५ ॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीने राज्य पाकर ग्यारह सहस्र वर्षोंतक उसका पालन और सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया । उन यज्ञोंमें उत्तम अश्व छोड़े गये थे तथा ऋत्विजोंको बहुत अधिक दक्षिणाएँ बाँटी गयी थीं ॥ ९५ ॥
आजानुलम्बिबाहुः स महावक्षाः प्रतापवान् । लक्ष्मणानुचरो रामः शशास पृथिवीमिमाम् ॥ ९६ ॥
भावार्थ
उनकी भुजाएँ घुटनों तक लंबी थीं । उनका वक्षःस्थल विशाल एवं विस्तृत था । वे बड़े प्रतापी नरेश थे । लक्ष्मणको साथ लेकर श्रीरामने इस पृथ्वीका शासन किया ॥ ९६ ॥
राघवश्चापि धर्मात्मा प्राप्य राज्यमनुत्तमम् । ईजे बहुविधैर्यज्ञैः ससुहृज्ज्ञातिबान्धवः ॥ ९७ ॥
भावार्थ
अयोध्याके परम उत्तम राज्यको पाकर धर्मात्मा श्रीरामने सुहृदों, कुटुम्बीजनों तथा भाई-बन्धुओंके साथ अनेक प्रकारके यज्ञ किये ॥ ९७ ॥
न पर्यदेवन् विधवा न च व्यालकृतं भयम् । न व्याधिजं भयं चासीद् रामे राज्यं प्रशासति ॥ ९८ ॥
भावार्थ
श्रीरामके राज्य-शासनकालमें कभी विधवाओंका विलाप नहीं सुनायी पड़ता था । सर्प आदि दुष्ट जन्तुओंका भय नहीं था और रोगोंकी भी आशङ्का नहीं थी ॥ ९८ ॥
निर्दस्युरभवल्लोको नानर्थः कश्चिदस्पृशत् । न च स्म वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते ॥ ९९ ॥
भावार्थ
सम्पूर्ण जगत्में कहीं चोरों या लुटेरोंका नाम भी नहीं सुना जाता था। कोई भी मनुष्य अनर्थकारी कार्योंमें हाथ नहीं डालता था और बूढ़ोंको बालकोंके अन्त्येष्टि-संस्कार नहीं करने पड़ते थे ॥ ९९ ॥
सर्वं मुदितमेवासीत् सर्वो धर्मपरोऽभवत् । राममेवानुपश्यन्तो नाभ्यहिंसन् परस्परम् ॥ १०० ॥
भावार्थ
सब लोग सदा प्रसन्न ही रहते थे । सभी धर्मपरायण थे और श्रीरामपर ही बारंबार दृष्टि रखते हुए वे कभी एक दूसरेको कष्ट नहीं पहुँचाते थे ॥ १०० ॥
आसन् वर्षसहस्राणि तथा पुत्रसहस्रिणः । निरामया विशोकाश्च रामे राज्यं प्रशासति ॥ १०१ ॥
भावार्थ
श्रीरामके राज्य-शासन करते समय लोग सहस्रों वर्षोंतक जीवित रहते थे, सहस्रों पुत्रोंके जनक होते थे और उन्हें किसी प्रकारका रोग या शोक नहीं होता था ॥ १०१ ॥
रामो रामो राम इति प्रजानामभवन् कथाः । रामभूतं जगदभूद् रामे राज्यं प्रशासति ॥ १०२ ॥
भावार्थ
श्रीरामके राज्यशासनकालमें प्रजावर्गके भीतर केवल राम, राम, रामकी ही चर्चा होती थी । सारा जगत् श्रीराममय हो रहा था ॥ १०२ ॥
नित्यमूला नित्यफलास्तरवस्तत्र पुष्पिताः । कामवर्षी च पर्जन्यः सुखस्पर्शश्च मारुतः ॥ १०३ ॥
भावार्थ
श्रीरामके राज्यमें वृक्षोंकी जड़ें सदा मजबूत रहती थीं । वे वृक्ष सदा फूलों और फलोंसे लदे रहते थे । मेघ प्रजाकी इच्छा और आवश्यकताके अनुसार ही वर्षा करते थे । वायु मन्द गतिसे चलती थी, जिससे उसका स्पर्श सुखद जान पड़ता था ॥ १०३ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा लोभविवर्जिताः । स्वकर्मसु प्रवर्तन्ते तुष्टाः स्वैरेव कर्मभिः ॥ १०४ ॥
भावार्थ
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्णोंके लोग लोभरहित होते थे । सबको अपने ही वर्णाश्रमोचित कर्मोंसे संतोष था और सभी उन्हींके पालनमें लगे रहते थे ॥ १०४ ॥
आसन् प्रजा धर्मपरा रामे शासति नानृताः । सर्वे लक्षणसम्पन्नाः सर्वे धर्मपरायणाः ॥ १०५ ॥
भावार्थ
श्रीरामके शासनकालमें सारी प्रजा धर्ममें तत्पर रहती थी । झूठ नहीं बोलती थी । सब लोग उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे और सबने धर्मका आश्रय ले रक्खा था ॥ १०५ ॥
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । भ्रातृभिः सहितः श्रीमान् रामो राज्यमकारयत् ॥ १०६ ॥
भावार्थ
भाइयोंसहित श्रीमान् रामने ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य किया था ॥ १०६ ॥
धर्म्यं यशस्यमायुष्यं राज्ञां च विजयावहम् । आदिकाव्यमिदं चार्षं पुरा वाल्मीकिना कृतम् ॥ १०७ ॥
भावार्थ
यह ऋषिप्रोक्त आदिकाव्य रामायण है, जिसे पूर्वकालमें महर्षि वाल्मीकिने बनाया था । यह धर्म, यश तथा आयुकी वृद्धि करनेवाला एवं राजाओंको विजय देनेवाला है ॥ १०७ ॥
यः शृणोति सदा लोके नरः पापात् प्रमुच्यते । पुत्रकामश्च पुत्रान् वै धनकामो धनानि च ॥ १०८ ॥ लभते मनुजो लोके श्रुत्वा रामाभिषेचनम् । महीं विजयते राजा रिपूंश्चाप्यधितिष्ठति ॥ १०९ ॥
भावार्थ
संसारमें जो मानव सदा इसका श्रवण करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है । श्रीरामके राज्याभिषेकके प्रसंगको सुनकर मनुष्य इस जगत्में यदि पुत्रका इच्छुक हो तो पुत्र और धनका अभिलाषी हो तो धन पाता है । राजा इस काव्यका श्रवण करनेसे पृथ्वीपर विजय पाता और शत्रुओंको अपने अधीन कर लेता है ॥ १०८-१०९ ॥
राघवेण यथा माता सुमित्रा लक्ष्मणेन च । भरतेन च कैकेयी जीवपुत्रास्तथा स्त्रियः ॥ ११० ॥ भविष्यन्ति सदानन्दाः पुत्रपौत्रसमन्विताः ।
भावार्थ
जैसे माता कौसल्या श्रीरामको, सुमित्रा लक्ष्मणको और कैकेयी भरतको पाकर जीवित पुत्रोंकी माता कहलायीं, उसी प्रकार संसारकी दूसरी स्त्रियाँ भी इस आदिकाव्यके पाठ और श्रवणसे जीवित पुत्रोंकी जननी, सदा आनन्दमग्न तथा पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न होंगी ॥ ११०½ ॥
श्रुत्वा रामायणमिदं दीर्घमायुश्च विन्दति ॥ १११ ॥ रामस्य विजयं चेमं सर्वमक्लिष्टकर्मणः ।
भावार्थ
क्लेशरहित कर्म करनेवाले श्रीरामकी विजय-कथारूप इस सम्पूर्ण रामायण-काव्यको सुनकर मनुष्य दीर्घकालतक स्थिर रहनेवाली आयु पाता है ॥ १११½ ॥
शृणोति य इदं काव्यं पुरा वाल्मीकिना कृतम् ॥ ११२ ॥ श्रद्धानो जितक्रोधो दुर्गाण्यतितरत्यसौ ।
भावार्थ
पूर्वकालमें महर्षि वाल्मीकिने जिसकी रचना की थी, वही यह आदिकाव्य है। जो क्रोधको जीतकर श्रद्धापूर्वक इसे सुनता है, वह बड़े-बड़े संकटोंसे पार हो जाता है ॥ ११२½॥
समागम्य प्रवासान्ते रमन्ते सह बान्धवैः ॥११३॥ शृण्वन्ति य इदं काव्यं पुरा वाल्मीकिना कृतम् । ते प्रार्थितान् वरान् सर्वान् प्राप्नुवन्तीह राघवात्॥११४॥
भावार्थ
जो लोग पूर्वकालमें महर्षि वाल्मीकिद्वारा निर्मित इस काव्यको सुनते हैं, वे परदेशसे लौटकर अपने भाई-बन्धुओंके साथ मिलते और आनन्दका अनुभव करते हैं। वे इस जगत्में श्रीरघुनाथजीसे समस्त मनोवाञ्छित फलोंको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ११३-११४ ॥
श्रवणेन सुराः सर्वे प्रीयन्ते सम्प्रशृण्वताम् । विनायकाश्च शाम्यन्ति गृहे तिष्ठन्ति यस्य वै ॥११५॥
भावार्थ
इसके श्रवणसे समस्त देवता श्रोताओंपर प्रसन्न होते हैं तथा जिसके घरमें विघ्नकारी ग्रह होते हैं, उसके वे सारे ग्रह शान्त हो जाते हैं ॥ ११५ ॥
विजयेत महीं राजा प्रवासी स्वस्तिमान् भवेत् । स्त्रियो रजस्वलाः श्रुत्वा पुत्रान् सूयुरनुत्तमान् ॥११६॥
भावार्थ
राजा इसके श्रवणसे भूमण्डलपर विजय पाता है। परदेशमें निवास करनेवाला पुरुष सकुशल रहता और रजस्वला स्त्रियाँ ( स्नानके अनन्तर सोलह दिनोंके भीतर ) इसे सुनकर श्रेष्ठ पुत्रोंको जन्म देती हैं ॥ ११६ ॥
पूजयंश्चैनमितिहासं पुरातनम् । सर्वपापैः प्रमुच्येत दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥११७॥
भावार्थ
जो इस प्राचीन इतिहासका पूजन और पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और बड़ी आयु पाता है ॥११७॥
प्रणम्य शिरसा नित्यं श्रोतव्यं क्षत्रियैर्द्विजात् । ऐश्वर्यं पुत्रलाभश्च भविष्यति न संशयः ॥११८॥
भावार्थ
क्षत्रियोंको चाहिये कि वे प्रतिदिन मस्तक झुकाकर प्रणाम करके ब्राह्मणके मुखसे इस ग्रन्थका श्रवण करें । इससे उन्हें ऐश्वर्य और पुत्रकी प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं है ॥११८॥
रामायणमिदं कृत्स्नं शृण्वतः पठतः सदा । प्रीयते सततं रामः स हि विष्णुः सनातनः ॥११९॥
भावार्थ
जो नित्य इस सम्पूर्ण रामायणका श्रवण एवं पाठ करता है, उसपर सनातन विष्णुस्वरूप भगवान् श्रीराम सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ ११९ ॥
आदिदेवो महाबाहुर्हरिर्नारायणः प्रभुः । साक्षाद् रामो रघुश्रेष्ठः शेषो लक्ष्मण उच्यते ॥१२०॥
भावार्थ
साक्षात् आदिदेव महाबाहु पापहारी प्रभु नारायण ही रघुकुलतिलक श्रीराम हैं तथा भगवान् शेष ही लक्ष्मण कहलाते हैं ॥ १२० ॥
एवमेतत् पुरावृत्तमाख्यानं भद्रमस्तु वः । प्रव्याहरत विस्रब्धं बलं विष्णोः प्रवर्धताम् ॥१२१॥
भावार्थ
( लवकुश कहते हैं– ) श्रोताओ ! आपलोगोंका कल्याण हो। यह पूर्वघटित आख्यान ही इस प्रकार रामायण-काव्यके रूपमें वर्णित हुआ है। आपलोग पूर्ण विश्वासके साथ इसका पाठ करें । इससे आपके वैष्णव बलकी वृद्धि होगी ॥१२१॥
देवाश्च सर्वे तुष्यन्ति ग्रहणाच्छ्रवणात् तथा । रामायणस्य श्रवणे तृप्यन्ति पितरः सदा ॥१२२॥
भावार्थ
रामायणको हृदयमें धारण करने और सुननेसे सब देवता संतुष्ट होते हैं। इसके श्रवणसे पितरोंको भी सदा तृप्ति मिलती है ॥ १२२ ॥
भक्त्या रामस्य ये चेमां संहितामृषिणा कृताम् । ये लिखन्तीह च नरास्तेषां वासस्त्रिविष्टपे ॥१२३॥
भावार्थ
जो लोग श्रीरामचन्द्रजीमें भक्तिभाव रखकर महर्षि वाल्मीकिनिर्मित इस रामायण-संहिताको लिखते हैं, उनका स्वर्गमें निवास होता है ॥ १२३ ॥
कुटुम्बवृद्धिं धनधान्यवृद्धिं स्त्रियश्च मुख्याः सुखमुत्तमं च । श्रुत्वा शुभं काव्यमिदं महार्थं प्राप्नोति सर्वां भुवि चार्थसिद्धिम् ॥१२४॥
भावार्थ
इस शुभ और गम्भीर अर्थसे युक्त काव्यको सुनकर मनुष्यके कुटुम्ब और धन-धान्यकी वृद्धि होती है। उसे श्रेष्ठ गुणवाली सुन्दरी स्त्रियाँ सुलभ होती हैं तथा इस भूतलपर वह अपने सारे मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है ॥ १२४ ॥
आयुष्यमारोग्यकरं यशस्यं सौभ्रातृकं बुद्धिकरं शुभं च । श्रोतव्यमेतन्नियमेन सद्भि- राख्यानमोजस्करमृद्धिकामैः ॥१२५॥
भावार्थ
यह काव्य आयु, आरोग्य, यश तथा भ्रातृप्रेमको बढ़ानेवाला है। यह उत्तम बुद्धि प्रदान करनेवाला और मङ्गलकारी है; अतः समृद्धिकी इच्छा रखनेवाले सत्पुरुषोंको इस उत्साह-वर्द्धक इतिहासका नियमपूर्वक श्रवण करना चाहिये ॥ १२५॥
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