युद्धकाण्ड, सर्ग 109
भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा शयानं निर्जितं रणे । शोकवेगपरीतात्मा विललाप विभीषणः ॥ १ ॥
भावार्थ
पराजित हुए भाईको मरकर रणभूमिमें पड़ा देख विभीषणका हृदय शोकके वेगसे व्याकुल हो गया और वे विलाप करने लगे—॥ १ ॥
वीरविक्रान्त विख्यात प्रवीण नयकोविद । महार्हशयनोपेत किं शेषे निहतो भुवि ॥ २ ॥
भावार्थ
‘हा विख्यात पराक्रमी वीर भाई दशानन! हा कार्यकुशल नीतिज्ञ ! तुम तो सदा बहुमूल्य बिछौनोंपर सोया करते थे, आज इस तरह मारे जाकर भूमिपर क्यों पड़े हो ? ॥ २ ॥
निक्षिप्य दीर्घौ निश्चेष्टौ भुजावङ्गदभूषितौ । मुकुटेनापवृत्तेन भास्कराकारवर्चसा ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘हे वीर ! तुम्हारी ये बाजूबंदसे विभूषित दोनों विशाल भुजाएँ निश्चेष्ट हो गयी हैं। तुम इन्हें फैलाकर क्यों पड़े हुए हो ? तुम्हारे माथेका मुकुट जो सूर्यके समान तेजस्वी है, यहाँ फेंका पड़ा है ॥ ३ ॥
तदिदं वीर सम्प्राप्तं यन्मया पूर्वमीरितम् । काममोहपरीतस्य यत् तन्न रुचितं तव ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘वीरवर ! आज तुम्हारे ऊपर वही संकट आकर पड़ा है, जिसके लिये मैंने तुम्हें पहलेसे ही आगाह कर दिया था; किंतु उस समय काम और मोहके वशीभूत होनेके कारण तुम्हें मेरी बातें नहीं रुची थीं ॥ ४ ॥
यन्न दर्पात् प्रहस्तो वा नेन्द्रजिन्नापरे जनाः । न कुम्भकर्णोऽतिरथो नातिकायो नरान्तकः । न स्वयं बहु मन्येथास्तस्योदर्कोऽयमागतः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘अहङ्कारके कारण न तो प्रहस्तने, न इन्द्रजित्ने, न दूसरे लोगोंने, न अतिरथी कुम्भकर्णने, न अतिकायने, न नरान्तकने और न स्वयं तुमने ही मेरी बातोंको अधिक महत्त्व दिया था, उसीका फल यह सामने आया है ॥ ५ ॥
गतः सेतुः सुनीतानां गतो धर्मस्य विग्रहः । गतः सत्त्वस्य संक्षेपः सुहृस्तानां गतिर्गता ॥ ६ ॥ आदित्यः पतितो भूमौ मग्नस्तमसि चन्द्रमाः । चित्रभानुः प्रशान्तार्चिर्व्यवसायो निरुद्यमः । अस्मिन् निपतिते वीरे भूमौ शस्त्रभृतां वरे ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘आज शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ इस वीर रावणके धराशायी होनेसे सुन्दर नीतिपर चलनेवाले लोगोंकी मर्यादा टूट गयी, धर्मका मूर्तिमान् विग्रह चला गया, सत्त्व ( बल ) के संग्रहका स्थान नष्ट हो गया, सुन्दर हाथ चलानेवाले वीरोंका सहारा चला गया, सूर्य पृथ्वीपर गिर पड़ा, चन्द्रमा अँधेरेमें डूब गया, प्रज्वलित आग बुझ गयी और सारा उत्साह निरर्थक हो गया ॥ ६-७ ॥
किं शेषमिहलोकस्य गतसत्त्वस्य सम्प्रति । रणे राक्षसशार्दूले प्रसुप्त इव पांसुषु ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘रणभूमिकी धूलमें राक्षसशिरोमणि रावणके सो जानेसे इस लोकका आधार और बल समाप्त हो गया । अब यहाँ क्या शेष रह गया ? ॥ ८ ॥
धृतिप्रवालः प्रसभाग्र्यपुष्प- स्तपोबलः शौर्यनिबद्धमूलः । रणे महान् राक्षसराजवृक्षः सम्मर्दितो राघवमारुतेन ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘हाय ! धैर्य ही जिसके पत्ते थे, हठ ही सुन्दर फूल था, तपस्या ही बल और शौर्य ही मूल था, उस राक्षसराज रावणरूपी महान् वृक्षको आज रणभूमिमें श्रीराघवेन्द्ररूपी प्रचण्ड वायुने रौंद डाला ! ॥ ९ ॥
तेजोविषाणः कुलवंशवंशः कोपप्रसादापरगात्रहस्तः । इक्ष्वाकुसिंहावगृहीतदेहः सुप्तः क्षितौ रावणगन्धहस्ती ॥ १० ॥
भावार्थ
‘तेज ही जिसके दाँत थे, वंशपरम्परा ही पृष्ठभाग थी, क्रोध ही नीचेके ( पैर आदि ) अङ्ग थे और प्रसाद ही शुण्डदण्ड था, वह रावणरूपी गन्धहस्ती आज इक्ष्वाकुवंशी श्रीरामरूपी सिंहके द्वारा शरीरके विदीर्ण कर दिये जानेसे सदाके लिये पृथ्वीपर सो गया है ! ॥ १० ॥
पराक्रमोत्साहविजृम्भितार्चि- र्निःश्वासधूमः स्वबलप्रतापः । प्रतापवान् संयति राक्षसाग्नि- र्निर्वापितो रामपयोधरेण ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘पराक्रम और उत्साह जिसकी बढ़ती हुई ज्वालाओंके समान थे, निःश्वास ही धूम था और अपना बल ही प्रताप था, उस राक्षस रावणरूपी प्रतापी अग्निको इस समय युद्धस्थलमें श्रीरामरूपी मेघने बुझा दिया ! ॥ ११ ॥
सिंहर्क्षलाङ्गूलककुद्विषाणः पराभिजिद्गन्धनगन्धवाहः । रक्षोवृषश्चापलकर्णचक्षुः क्षितीश्वरव्याघ्रहतोऽवसन्नः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘राक्षस सैनिक जिसकी पूँछ, ककुद् और सींग थे, जो शत्रुओंपर विजय पानेवाला था तथा पराक्रम और उत्साह आदि प्रकट करनेमें जो वायुके समान था, चपलतारूपी आँख तथा कानसे युक्त वह राक्षसराज रावणरूपी साँड़ महाराज श्रीरामरूपी व्याघ्रद्वारा मारा जाकर नष्ट हो गया !’ ॥ १२ ॥
वदन्तं हेतुमद्वाक्यं परिदृष्टार्थनिश्चयम् । रामः शोकसमाविष्टमित्युवाच विभीषणम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
जिससे अर्थनिश्चय प्रकट हो रहा था, ऐसी युक्तिसंगत बात कहते हुए शोकमग्न विभीषणसे उस समय भगवान् श्रीरामने कहा—॥ १३ ॥
नायं विनष्टो निश्चेष्टः समरे चण्डविक्रमः । अत्युन्नतमहोत्साहः पतितोऽयमशङ्कितः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘विभीषण ! यह रावण समराङ्गणमें असमर्थ होकर नहीं मारा गया है । इसने प्रचण्ड पराक्रम प्रकट किया है, इसका उत्साह बहुत बढ़ा हुआ था । इसे मृत्युसे कोई भय नहीं था । यह दैवात् रणभूमिमें धराशायी हुआ है ॥ १४ ॥
नैवं विनष्टाः शोचन्ते क्षत्रधर्मव्यवस्थिताः । वृद्धिमाशंसमाना ये निपतन्ति रणाजिरे ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘जो लोग अपने अभ्युदयकी इच्छासे क्षत्रियधर्ममें स्थित हो समराङ्गणमें मारे जाते हैं, इस तरह नष्ट होनेवाले लोगोंके विषयमें शोक नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥
येन सेन्द्रास्त्रयो लोकास्त्रासिता युधि धीमता । तस्मिन् कालसमायुक्ते न कालः परिशोचितुम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘जिस बुद्धिमान् वीरने इन्द्रसहित तीनों लोकोंको युद्धमें भयभीत कर रक्खा था, वही यदि इस समय कालके अधीन हो गया तो उसके लिये शोक करनेका अवसर नहीं है ॥१६॥
नैकान्तविजयो युद्धे भूतपूर्वः कदाचन । परैर्वा हन्यते वीरः परान् वा हन्ति संयुगे ॥ १७ ॥ इयं हि पूर्वैः संदिष्टा गतिः क्षत्रियसम्मता । क्षत्रियो निहतः संख्ये न शोच्य इति निश्चयः ॥ १८ ॥ तदेवं निश्चयं दृष्ट्वा तत्त्वमास्थाय विज्वरः । यदिहानन्तरं कार्यं कल्प्यं तदनुचिन्तय ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘युद्धमें किसीको सदा विजय-ही-विजय मिले, ऐसा पहले भी कभी नहीं हुआ है । वीर पुरुष संग्राममें या तो शत्रुओंद्वारा मारा जाता है या स्वयं ही शत्रुओंको मार गिराता है ॥ ‘आज रावणको जो गति प्राप्त हुई है, यह पूर्वकालके महापुरुषोंद्वारा बतायी गयी उत्तम गति है । क्षात्र-वृत्तिका आश्रय लेनेवाले वीरोंके लिये तो यह बड़े आदरकी वस्तु है । क्षत्रिय-वृत्तिसे रहनेवाला वीर पुरुष यदि युद्धमें मारा गया हो तो वह शोकके योग्य नहीं है; यही शास्त्रका सिद्धान्त है ॥ ‘शास्त्रके इस निश्चयपर विचार करके सात्त्विक बुद्धिका आश्रय ले तुम निश्चिन्त हो जाओ और अब आगे जो कुछ ( प्रेत-संस्कार आदि ) कार्य करना हो, उसके सम्बन्धमें विचार करो’ ॥ १९ ॥
तमुक्तवाक्यं विक्रान्तं राजपुत्रं विभीषणः । उवाच शोकसंतप्तो भ्रातुर्हितमनन्तरम् ॥ २० ॥
भावार्थ
परम पराक्रमी राजकुमार श्रीरामके ऐसा कहनेपर शोकसंतप्त हुए विभीषणने उनसे अपने भाईके लिये हितकर बात कही—॥ २० ॥
योऽयं विमर्देष्वविभिन्नपूर्वः सुरैः समस्तैरपि वासवेन । भवन्तमासाद्य रणे विभग्नो वेलामिवासाद्य यथा समुद्रः ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! पूर्वकालमें युद्धके अवसरोंपर समस्त देवताओं तथा इन्द्रने भी जिसे कभी पीछे नहीं हटाया था, वही रावण आज रणभूमिमें आपसे टक्कर लेकर उसी तरह शान्त हो गया, जैसे समुद्र अपनी तट-भूमितक जाकर शान्त हो जाता है ॥ २१ ॥
अनेन दत्तानि वनीपकेषु भुक्ताश्च भोगा निभृताश्च भृत्याः । धनानि मित्रेषु समर्पितानि वैराण्यमित्रेषु च यापितानि ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘इसने याचकोंको दान दिये, भोग भोगे और भृत्योंका भरण-पोषण किया है । मित्रोंको धन अर्पित किये और शत्रुओंसे वैरका बदला लिया ॥ २२ ॥
एषोऽहिताग्निश्च महातपाश्च वेदान्तगः कर्मसु चाग्र्यशूरः । एतस्य यत् प्रेतगतस्य कृत्यं तत् कर्तुमिच्छामि तव प्रसादात् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘यह रावण अग्निहोत्री, महातपस्वी, वेदान्तवेत्ता तथा यज्ञ-यागादि कर्मोंमें श्रेष्ठ शूर—परम कर्मठ रहा है । अब यह प्रेतभावको प्राप्त हुआ है, अतः अब मैं ही आपकी कृपासे इसका प्रेत-कृत्य करना चाहता हूँ’ ॥ २३ ॥
स तस्य वाक्यैः करुणैर्महात्मा सम्बोधितः साधु विभीषणेन । आज्ञापयामास नरेन्द्रसूनुः स्वर्गीयमाधानमदीनसत्त्वः ॥ २४ ॥
भावार्थ
विभीषणके करुणाजनक वचनोंद्वारा अच्छी तरह समझाये जानेपर उदारचेता राजकुमार महात्मा श्रीरामने उन्हें रावणके लिये स्वर्गादि उत्तम लोकोंकी प्राप्ति करानेवाला अन्त्येष्टि-कर्म करनेकी आज्ञा दी ॥ २४ ॥
मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम् । क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ॥ २५ ॥
भावार्थ
वे बोले—‘विभीषण ! वैर जीवन कालतक ही रहता है । मरनेके बाद उस वैरका अन्त हो जाता है । अब हमारा प्रयोजन सिद्ध हो चुका है, अतः अब तुम इसका संस्कार करो । इस समय यह जैसे तुम्हारे स्नेहका पात्र है, उसी तरह मेरा भी स्नेहभाजन है’ ॥ २५ ॥
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