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युद्धकाण्ड, सर्ग 110

रावणं निहतं श्रुत्वा राघवेण महात्मना । अन्तःपुराद् विनिष्पेतू राक्षस्यः शोककर्शिताः ॥ १ ॥

भावार्थ

महात्मा श्रीरघुनाथजीके द्वारा रावणके मारे जानेका समाचार सुनकर शोकसे व्याकुल हुई राक्षसियाँ अन्तःपुरसे निकल पड़ीं ॥ १ ॥

वार्यमाणाः सुबहुशो वेष्टन्त्यः क्षितिपांसुषु । विमुक्तकेश्यः शोकार्ता गावो वत्सहता इव ॥ २ ॥

भावार्थ

लोगोंके बारंबार मना करनेपर भी वे धरतीकी धूलमें लोटने लगती थीं । उनके केश खुले हुए थे और जिनके बछड़े मर गये हों, उन गौओंके समान वे शोकसे आतुर हो रही थीं ॥ २ ॥

उत्तरेण विनिष्क्रम्य द्वारेण सह राक्षसैः । प्रविश्यायोधनं घोरं विचिन्वन्त्यो हतं पतिम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

राक्षसोंके साथ लङ्काके उत्तर दरवाजेसे निकलकर भयंकर युद्धभूमिमें प्रवेश करके वे अपने मरे हुए पतिको खोजने लगीं ॥ ३ ॥

आर्यपुत्रेति वादिन्यो हा नाथेति च सर्वशः । परिपेतुः कबन्धाङ्कां महीं शोणितकर्दमाम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘हा आर्यपुत्र ! हा नाथ !’ की पुकार मचाती हुई वे सब-की-सब उस रणभूमिमें जहाँ बिना मस्तकके लाशें बिछी हुई थीं तथा रक्तकी कीच जम गयी थी, सब ओर गिरती-पड़ती भटकने लगीं ॥ ४ ॥

ता बाष्पपरिपूर्णाक्ष्यो भर्तृशोकपराजिताः । करिण्य इव नर्दन्त्यः करेण्वो हतयूथपाः ॥ ५ ॥

भावार्थ

उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी । वे पतिके शोकसे बेसुध हो यूथपतिके मारे जानेपर हथिनियोंकी तरह करुण-क्रन्दन कर रही थीं ॥ ५ ॥

दद्दशुस्ता महाकायं महावीर्यं महाद्युतिम् । रावणं निहतं भूमौ नीलाञ्जनचयोपमम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

उन्होंने महाकाय, महापराक्रमी और महातेजस्वी रावणको देखा, जो काले कोयलेके ढेर-सा पृथ्वीपर मरा पड़ा था ॥ ६ ॥

ताः पतिं सहसा दृष्ट्वा शयानं रणपांसुषु । निपेतुस्तस्य गात्रेषु च्छिन्ना वनलता इव ॥ ७ ॥

भावार्थ

रणभूमिकी धूलिमें पड़े हुए अपने मृतक पतिपर सहसा दृष्टि पड़ते ही वे कटी हुई वनकी लताओंके समान उसके अङ्गोंपर गिर पड़ीं ॥ ७ ॥

बहुमानात् परिष्वज्य काचिदेनं रुरोद ह। चरणौ काचिदालम्ब्य काचित् कण्ठेऽवलम्ब्य च॥ ८ ॥ उत्क्षिप्य च भुजौ काचिद् भूमौ सुपरिवर्तते। हतस्य वदनं दृष्ट्वा काचिन्मोहमुपागमत् ॥ ९ ॥

भावार्थ

उनमेंसे कोई तो बड़े आदरके साथ उसका आलिंगन करके, कोई पैर पकड़कर और कोई गलेसे लगकर रोने लगीं॥ कोई स्त्री अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठा पछाड़ खाकर गिरी और धरतीपर लोटने लगी तथा कोई मरे हुए स्वामीका मुख देखकर मूर्छित हो गयी ॥ ९ ॥

काचिदङ्के शिरः कृत्वा रुरोद मुखमीक्षती। स्नापयन्ती मुखं बाष्पैस्तुषारैरिव पङ्कजम् ॥ १० ॥

भावार्थ

कोई पतिका मस्तक गोदमें लेकर उसका मुँह निहारती और ओसकणोंसे कमलकी भाँति अश्रु-बिन्दुओंसे पतिके मुखारविन्दको नहलाती हुई रोदन करने लगी ॥ १० ॥

एवमार्ताः पतिं दृष्ट्वा रावणं निहतं भुवि। चुक्रुशुर्बहुधा शोकाद् भूयस्ताः पर्यदेवयन् ॥ ११ ॥

भावार्थ

इस प्रकार अपने पतिदेवता रावणको धरतीपर मरकर गिरा देख वे सब-की-सब आर्तभावसे उसे पुकारने लगीं और शोकके कारण नाना प्रकारसे विलाप करने लगीं ॥ ११ ॥

येन वित्रासितः शक्रो येन वित्रासितो यमः। येन वैश्रवणो राजा पुष्पकेण वियोजितः ॥ १२ ॥ गन्धर्वाणामृषीणां च सुराणां च महात्मनाम्। भयं येन रणे दत्तं सोऽयं शेते रणे हतः ॥ १३ ॥

भावार्थ

वे बोलीं—‘हाय ! जिन्होंने यमराज और इन्द्रको भी भयभीत कर रक्खा था, राजाधिराज कुवेरका पुष्पक विमान छीन लिया था तथा गन्धर्वों, ऋषियों और महामनखी देवताओंको भी रणभूमिमें भय प्रदान किया था, वे ही हमारे प्राणनाथ आज इस समराङ्गणमें मारे जाकर सदाके लिये सो गये हैं ॥ १२-१३ ॥

असुरेभ्यः सुरेभ्यो वा पन्नगेभ्योऽपि वा तथा। भयं यो न विजानाति तस्येदं मानुषाद् भयम् ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘हाय ! जो असुरों, देवताओं तथा नागोंसे भी भयभीत होना नहीं जानते थे, उन्हींको आज मनुष्यसे यह भय प्राप्त हो गया ॥ १४ ॥

अवध्यो देवतानां यस्तथा दानवरक्षसाम्। हतः सोऽयं रणे शेते मानुषेण पदातिना ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘जिन्हें देवता, दानव और राक्षस भी नहीं मार सकते थे, वे ही आज एक पैदल मनुष्यके हाथसे मारे जाकर रणभूमिमें सो रहे हैं ॥ १५ ॥

यो न शक्यः सुरैर्हन्तुं न यक्षैर्नासुरैस्तथा। सोऽयं कश्चिदिवासत्त्वो मृत्युं मर्त्येन लम्भितः॥ १६ ॥

भावार्थ

‘जो देवताओं, असुरों तथा यक्षोंके लिये भी अवध्य थे, वे ही किसी निर्बल प्राणीके समान एक मनुष्यके हाथसे मृत्युको प्राप्त हुए’ ॥ १६ ॥

एवं वदन्त्यो रुरुदुस्तस्य ता दुःखिताः स्त्रियः। भूय एव च दुःखार्ता विलेपुश्च पुनः पुनः ॥ १७ ॥

भावार्थ

इस तरहकी बातें कहती हुई रावणकी वे दुःखिनी स्त्रियाँ वहाँ फूट-फूटकर रोने लगीं तथा दुःखसे आतुर होकर पुनः बारंबार विलाप करने लगीं ॥ १७ ॥

अशृण्वता तु सुहृदां सततं हितवादिनाम्। मरणायाहृता सीता राक्षसाश्च निपातिताः। एताः सममिदानीं ते वयमात्मा च पातितः ॥ १८ ॥ ब्रुवाणोऽपि हितं वाक्यमिष्टो भ्राता विभीषणः। दृष्टं परुषितो मोहात् त्वयाऽऽत्मवधकाङ्क्षिणा ॥ १९ ॥ यदि निर्यातिता ते स्यात् सीता रामाय मैथिली। न नः स्याद् व्यसनं घोरमिदं मूलहरं महत् ॥ २० ॥

भावार्थ

वे बोलीं—‘प्राणनाथ ! आपने सदा हितकी बात बतानेवाले सुहृदोंकी बातें अनसुनी कर दीं और अपनी मृत्युके लिये सीताका अपहरण किया । इसका फल यह हुआ कि ये राक्षस मार गिराये गये तथा आपने इस समय अपनेको रणभूमिमें और हमलोगोंको महान् दुःखके समुद्रमें गिरा दिया॥ ‘आपके प्रिय भाई विभीषण आपको हितकी बात बता रहे थे तो भी आपने अपने वधके लिये उन्हें मोहवश कटु वचन सुनाये । उसीका यह फल प्रत्यक्ष दिखायी दिया है ॥ ‘यदि आपने मिथिलेशकुमारी सीताको श्रीरामके पास लौटा दिया होता तो जड़-मूलसहित हमारा विनाश करनेवाला यह महाघोर संकट हमपर न आता ॥ २० ॥

वृत्तकामो भवेद् भ्राता रामो मित्रकुलं भवेत्। वयं चाविधवाः सर्वाः सकामा न च शत्रवः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘सीताको लौटा देनेपर आपके भाई विभीषणका भी मनोरथ सफल हो जाता, श्रीराम हमारे मित्र-पक्षमें आ जाते, हम सबको विधवा नहीं होना पड़ता और हमारे शत्रुओंकी कामनाएँ पूरी नहीं होतीं ॥ २१ ॥

त्वया पुनर्नृशंसेन सीतां संरुन्धता बलात्। राक्षसा वयमात्मा च त्रयं तुल्यं निपातितम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘परंतु आप ऐसे निष्ठुर निकले कि सीताको बलपूर्वक कैद कर लिया तथा राक्षसोंको, हम स्त्रियोंको और अपने-आपको—तीनोंको भी एक साथ नीचे गिरा दिया—विपत्तिमें डाल दिया ॥ २२ ॥

न कामकारः कामं वा तव राक्षसपुंगव। दैवं चेष्टयते सर्वं हतं दैवेन हन्यते ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘राक्षसशिरोमणे ! आपका स्वेच्छाचार ही हमारे विनाशमें कारण हुआ हो, ऐसी बात नहीं है । दैव ही सब कुछ कराता है । दैवका मारा हुआ ही मारा जाता या मरता है ॥ २३॥

वानराणां विनाशोऽयं राक्षसानां च ते रणे । तव चैव महाबाहो दैवयोगादुपागतः ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘महाबाहो ! इस युद्धमें वानरोंका, राक्षसोंका और आपका भी विनाश दैवयोगसे ही हुआ है ॥ २४ ॥

नैवार्थेन च कामेन विक्रमेण न चाज्ञया । शक्या दैवगतिर्लोके निवर्तयितुमुद्यता ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘संसारमें फल देनेके लिये उन्मुख हुए दैवके विधानको कोई धनसे, कामनासे, पराक्रमसे, आज्ञासे अथवा शक्तिसे भी नहीं पलट सकता’ ॥ २५ ॥

विलिपुरेवं दीनास्ता राक्षसाधिपयोषितः । कुरर्य इव दुःखार्ता बाष्पपर्याकुलेक्षणाः ॥ २६ ॥

भावार्थ

इस प्रकार राक्षसराजकी सभी स्त्रियाँ दुःखसे पीड़ित हो आँखोंमें आँसू भरकर दीनभावसे कुररीकी भाँति विलाप करने लगीं ॥ २६ ॥

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