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युद्धकाण्ड, सर्ग 108

अथ संस्मारयामास मातली राघवं तदा । अजानन्निव किं वीर त्वमेनमनुवर्तसे ॥ १ ॥

भावार्थ

मातलिने श्रीरघुनाथजीको कुछ याद दिलाते हुए कहा— ‘वीरवर ! आप अनजानकी तरह क्यों इस राक्षसका अनुसरण कर रहे हैं ? ( यह जो अस्त्र चलाता है, उसके निवारण करनेवाले अस्त्रका प्रयोगमात्र करके रह जाते हैं ) ॥ १ ॥

विसृजास्मै वधाय त्वमस्त्रं पैतामहं प्रभो । विनाशकालः कथितो यः सुरैः सोऽद्य वर्तते ॥ २ ॥

भावार्थ

‘प्रभो ! आप इसके वधके लिये ब्रह्माजीके अस्त्रका प्रयोग कीजिये । देवताओंने इसके विनाशका जो समय बताया है, वह अब आ पहुँचा है’ ॥ २ ॥

ततः संस्मारितो रामस्तेन वाक्येन मातलेः । जग्राह स शरं दीप्तं निःश्वसन्तमिवोरगम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

मातलिके इस वाक्यसे श्रीरामचन्द्रजीको उस अस्त्रका स्मरण हो आया । फिर तो उन्होंने फुफकारते हुए सर्पके समान एक तेजस्वी बाण हाथमें लिया ॥ ३ ॥

यं तस्मै प्रथमं प्रादादगस्त्यो भगवानृषिः । ब्रह्मदत्तं महद् बाणममोघं युधि वीर्यवान् ॥ ४ ॥

भावार्थ

यह वही बाण था, जिसे पहले शक्तिशाली भगवान् अगस्त्य ऋषिने रघुनाथजीको दिया था । वह विशाल बाण ब्रह्माजीका दिया हुआ था और युद्धमें अमोघ था ॥ ४ ॥

ब्रह्मणा निर्मितं पूर्वमिन्द्रार्थममितौजसा । दत्तं सुरपतेः पूर्वं त्रिलोकजयकाङ्क्षिणः ॥ ५ ॥ यस्य वाजेषु पवनः फले पावकभास्करौ । शरीरमाकाशमयं गौरवे मेरुमन्दरौ ॥ ६ ॥

भावार्थ

अमित तेजस्वी ब्रह्माजीने पहले इन्द्रके लिये उस बाणका निर्माण किया था और तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छा रखनेवाले देवेन्द्रको ही पूर्वकालमें अर्पित किया था ॥ उस बाणके वेगमें वायुकी, धारमें अग्नि और सूर्यकी, शरीरमें आकाशकी तथा भारीपनमें मेरु और मन्दराचलकी प्रतिष्ठा की गयी थी ॥ ६ ॥

जाज्वल्यमानं वपुषा सुपुङ्खं हेमभूषितम् । तेजसा सर्वभूतानां कृतं भास्करवर्चसम् ॥ ७ ॥ सधूममिव कालाग्निं दीप्तमाशीविषोपमम् । नरनागाश्ववृन्दानां भेदनं क्षिप्रकारिणम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

वह सम्पूर्ण भूतोंके तेजसे बनाया गया था । उससे सूर्यके समान ज्योति निकलती रहती थी । वह सुवर्णसे भूषित, सुन्दर पंखसे युक्त, स्वरूपसे जाज्वल्यमान, प्रलयकालकी धूमयुक्त अग्निके समान भयंकर, दीप्तिमान्, विषधर सर्पके समान विषैला, मनुष्य, हाथी और घोड़ोंको विदीर्ण कर डालनेवाला तथा शीघ्रतापूर्वक लक्ष्यका भेदन करनेवाला था ॥ ७-८ ॥

द्वाराणां परिघाणां च गिरीणां चापि भेदनम् । नानारुधिरदिग्धाङ्गं मेदोदिग्धं सुदारुणम् ॥ ९ ॥ वज्रसारं महानादं नानासमितिदारुणम् । सर्ववित्रासनं भीमं श्वसन्तमिव पन्नगम् ॥ १० ॥ कङ्कगृध्रबकानां च गोमायुगणरक्षसाम् । नित्यभक्षप्रदं युद्धे यमरूपं भयावहम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

बड़े-बड़े दरवाजों, परिघों तथा पर्वतोंको भी तोड़-फोड़ देनेकी उसमें शक्ति थी । उसका सारा शरीर नाना प्रकारके रक्तमें नहाया और चर्बीसे परिपुष्ट हुआ था । देखनेमें भी वह बड़ा भयंकर था । वज्रके समान कठोर, महान् शब्दसे युक्त; अनेकानेक युद्धोंमें शत्रुसेनाको विदीर्ण करनेवाला, सबको त्रास देनेवाला तथा फुफकारते हुए सर्पके समान भयंकर था । युद्धमें वह यमराजका भयावह रूप धारण कर लेता था । समरभूमिमें कौए, गीध, बगले, गीदड़ तथा पिशाचोंको वह सदा भक्ष्य प्रदान करता था ॥ ९–११ ॥

नन्दनं वानरेन्द्राणां रक्षसामवसादनम् । वाजितं विविधैर्वाजैश्चारुचित्रैर्गरुत्मतः ॥ १२ ॥ तमुत्तमेषुं लोकानामिक्ष्वाकुभयनाशनम् । द्विषतां कीर्तिहरणं प्रहर्षकरमात्मनः ॥ १३ ॥ अभिमन्त्र्य ततो रामस्तं महेषुं महाबलः । वेदप्रोक्तेन विधिना संदधे कार्मुके बली ॥ १४ ॥

भावार्थ

वह सायक वानर-यूथपतियोंको आनन्द देनेवाला तथा राक्षसोंको दुःखमें डालनेवाला था । गरुड़के सुन्दर विचित्र और नाना प्रकारके पंख लगाकर वह पंखयुक्त बना हुआ था। वह उत्तम बाण समस्त लोकों तथा इक्ष्वाकुवंशियोंके भयका नाशक था, शत्रुओंकी कीर्तिका अपहरण तथा अपने हर्षकी वृद्धि करनेवाला था । उस महान् सायकको वेदोक्त विधिसे अभिमन्त्रित करके महाबली श्रीरामने अपने धनुषपर रक्खा ॥ १३-१४ ॥

तस्मिन् संधीयमाने तु राघवेण शरोत्तमे । सर्वभूतानि संत्रेसुश्चचाल च वसुंधरा ॥ १५ ॥

भावार्थ

श्रीरघुनाथजी जब उस उत्तम बाणका संधान करने लगे, तब सम्पूर्ण प्राणी थर्रा उठे और धरती डोलने लगी ॥ १५ ॥

स रावणाय संक्रुद्धो भृशमायम्य कार्मुकम् । चिक्षेप परमायत्तः शरं मर्मविदारणम् ॥ १६ ॥

भावार्थ

श्रीरामने अत्यन्त कुपित हो बड़े यत्नके साथ धनुषको पूर्णरूपसे खींचकर उस मर्मभेदी बाणको रावणपर चला दिया ॥ १६ ॥

स वज्र इव दुर्धर्षो वज्रिबाहुविसर्जितः । कृतान्त इव चावार्यो न्यपतद् रावणोरसि ॥ १७ ॥

भावार्थ

वज्रधारी इन्द्रके हाथोंसे छूटे हुए वज्रके समान दुर्धर्ष और कालके समान अनिवार्य वह बाण रावणकी छातीपर जा लगा ॥ १७ ॥

स विसृष्टो महावेगः शरीरान्तकरः परः । बिभेद हृदयं तस्य रावणस्य दुरात्मनः ॥ १८ ॥

भावार्थ

शरीरका अन्त कर देनेवाले उस महान् वेगशाली श्रेष्ठ बाणने छूटते ही दुरात्मा रावणके हृदयको विदीर्ण कर डाला ॥ १८ ॥

रुधिराक्तः स वेगेन शरीरान्तकरः शरः । रावणस्य हरन् प्राणान् विवेश धरणीतलम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

शरीरका अन्त करके रावणके प्राण हर लेनेवाला वह बाण उसके खूनसे रँगकर वेगपूर्वक धरतीमें समा गया ॥१९॥

स शरो रावणं हत्वा रुधिरार्द्रकृतच्छविः । कृतकर्मा निभृतवत् स तूर्णीं पुनराविशत् ॥ २० ॥

भावार्थ

इस प्रकार रावणका वध करके खूनसे रँगा हुआ वह शोभाशाली बाण अपना काम पूरा करनेके पश्चात् पुनः विनीत सेवककी भाँति श्रीरामचन्द्रजीके तरकसमें लौट आया ॥ २० ॥

तस्य हस्ताद्धतस्याशु कार्मुकं तत् ससायकम् । निपपात सह प्राणैर्भ्रश्यमानस्य जीवितात् ॥ २१ ॥

भावार्थ

श्रीरामके बाणोंकी चोट खाकर रावण जीवनसे हाथ धो बैठा। उसके प्राण निकलनेके साथ ही हाथसे सायकसहित धनुष भी छूटकर गिर पड़ा ॥ २१ ॥

गतासुर्भीमवेगस्तु नैर्ऋतेन्द्रो महाद्युतिः । पपात स्यन्दनाद् भूमौ वृत्रो वज्रहतो यथा ॥ २२ ॥ तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ हतशेषा निशाचराः । हतनाथा भयत्रस्ताः सर्वतः सम्प्रदुद्रुवुः ॥ २३ ॥

भावार्थ

वह भयानक वेगशाली महातेजस्वी राक्षसराज प्राणहीन हो वज्रके मारे हुए वृत्रासुरकी भाँति रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ रावणको पृथ्वीपर पड़ा देख मरनेसे बचे हुए सम्पूर्ण निशाचर स्वामीके मारे जानेसे भयभीत हो सब ओर भाग गये ॥ २३ ॥

नर्दन्तश्चाभिपेतुस्तान् वानरा द्रुमयोधिनः । दशग्रीववधं दृष्ट्वा वानरा जितकाशिनः ॥ २४ ॥

भावार्थ

दशमुख रावणका वध हुआ देख विजयसे सुशोभित होनेवाले वानर, जो वृक्षोंद्वारा युद्ध करनेवाले थे, गर्जना करते हुए उन राक्षसोंपर टूट पड़े ॥ २४ ॥

अर्दिता वानरैर्हृष्टैर्लङ्कामभ्यपतन् भयात् । हताश्रयत्वात् करुणैर्बाष्पप्रस्रवणैर्मुखैः ॥ २५ ॥

भावार्थ

उन हर्षोल्लासित वानरोंद्वारा पीड़ित किये जानेपर वे राक्षस भयके मारे लङ्कापुरीकी ओर भाग गये; क्योंकि उनका आश्रय नष्ट हो गया था । उनके मुखपर करुणायुक्त आँसुओंकी धारा बह रही थी ॥ २५ ॥

ततो विनेदुः संहृष्टा वानरा जितकाशिनः । वदन्तो राघवजयं रावणस्य च तद्वधम् ॥ २६ ॥

भावार्थ

उस समय वानर विजय-लक्ष्मीसे सुशोभित हो अत्यन्त हर्ष और उत्साहसे भर गये तथा श्रीरघुनाथजीकी विजय और रावणके वधकी घोषणा करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ २६ ॥

अथान्तरिक्षे व्यनदत् सौम्यश्चिदशदुन्दुभिः । दिव्यगन्धवहस्तत्र मारुतः सुसुखो ववौ ॥ २७ ॥

भावार्थ

इसी समय आकाशमें मधुर स्वरसे देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं । वायु दिव्य सुगन्ध बिखेरती हुई मन्द-मन्द गतिसे प्रवाहित होने लगी ॥ २७ ॥

निपपातान्तरिक्षाच्च पुष्पवृष्टिस्तदा भुवि । किरन्ती राघवरथं दुरावापा मनोहरा ॥ २८ ॥

भावार्थ

अन्तरिक्षसे भूतलपर श्रीरघुनाथजीके रथके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी, जो दुर्लभ तथा मनोहर थी ॥ २८ ॥

राघवस्तवसंयुक्ता गगने च विश्रुश्रुवे । साधुसाध्विति वागग्र्या देवतानां महात्मनाम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

आकाशमें महामना देवताओंके मुखसे निकली हुई श्रीरामचन्द्रजीकी स्तुतिसे युक्त साधुवादकी श्रेष्ठ वाणी सुनायी देने लगी ॥ २९ ॥

आविवेश महान् हर्षो देवानां चारणैः सह । रावणे निहते रौद्रे सर्वलोकभयंकरे ॥ ३० ॥

भावार्थ

सम्पूर्ण लोकोंको भय देनेवाले रौद्र राक्षस रावणके मारे जानेपर देवताओं और चारणोंको महान् हर्ष हुआ ॥ ३० ॥

ततः सकामं सुग्रीवमङ्गदं च विभीषणम् । चकार राघवः प्रीतो हत्वा राक्षसपुंगवम् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

श्रीरघुनाथजीने राक्षसराजको मारकर सुग्रीव, अङ्गद तथा विभीषणको सफलमनोरथ किया और स्वयं भी उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३१ ॥

ततः प्रजग्मुः प्रशमं मरुद्गणा दिशः प्रसेदुर्विमलं नभोऽभवत् । मही चकम्पे न च मारुतो ववौ स्थिरप्रभश्चाप्यभवद् दिवाकरः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् देवताओंको बड़ी शान्ति मिली, सम्पूर्ण दिशाएँ प्रसन्न हो गयीं—उनमें प्रकाश छा गया, आकाश निर्मल हो गया, पृथ्वीका काँपना बंद हुआ, हवा स्वाभाविक गतिसे चलने लगी तथा सूर्यकी प्रभा भी स्थिर हो गयी ॥ ३२ ॥

ततस्तु सुग्रीवविभीषणाङ्गदाः सुहृद्विशिष्टाः सहलक्ष्मणस्तदा । समेत्य हृष्टा विजयेन राघवं रणेऽभिरामं विधिनाभ्यपूजयन् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

सुग्रीव, विभीषण, अङ्गद तथा लक्ष्मण अपने सुहृदोंके साथ युद्धमें श्रीरामचन्द्रजीकी विजयसे बहुत प्रसन्न हुए । इसके बाद उन सबने मिलकर नयनाभिराम श्रीरामकी विधिवत् पूजा की ॥ ३३ ॥

स तु निहतरिपुः स्थिरप्रतिज्ञः स्वजनबलाभिवृतो रणे बभूव । रघुकुलनृपनन्दनो महौजा- स्त्रिदशगणैरभिसंवृतो महेन्द्रः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

शत्रुको मारकर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करनेके पश्चात् स्वजनों-सहित सेनासे घिरे हुए महातेजस्वी रघुकुलराजकुमार श्रीराम रणभूमिमें देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति शोभा पाने लगे ॥ ३४ ॥

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