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उत्तरकाण्ड, सर्ग 99

वाल्मीकिनैवमुक्तस्तु राघवः प्रत्यभाषत । प्राञ्जलिर्जगतो मध्ये दृष्ट्वा तां वरवर्णिनीम् ॥ १ ॥

भावार्थ

महर्षि वाल्मीकिके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजी सुन्दरी सीतादेवीकी ओर एक बार दृष्टि डालकर उस जनसमुदायके बीच हाथ जोड़कर बोले--॥ १ ॥

एवमेतन्महाभाग यथा वदसि धर्मवित् । प्रत्ययस्तु मम ब्रह्मंस्तव वाक्यैरकल्मषैः ॥ २ ॥

भावार्थ

‘महाभाग ! आप धर्मके ज्ञाता हैं । सीताके सम्बन्धमें आप जैसा कह रहे हैं, वह सब ठीक है । ब्रह्मन् ! आपके इन निर्दोष वचनोंसे मुझे जनकनन्दिनीकी शुद्धतापर पूरा विश्वास हो गया है ॥ २ ॥

प्रत्ययश्च पुरा वृत्तो वैदेह्याः सुरसंनिधौ । शपथश्च कृतस्तत्र तेन वेश्म प्रवेशिता ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘एक बार पहले भी देवताओंके समीप विदेहकुमारीकी शुद्धताका विश्वास मुझे प्राप्त हो चुका है । उस समय सीताने अपनी शुद्धिके लिये शपथ की थी, जिसके कारण मैंने इन्हें अपने भवनमें स्थान दिया ॥ ३ ॥

लोकापवादो बलवान् येन त्यक्ता हि मैथिली । सेयं लोकभयाद् ब्रह्मन्नपापेत्यभिजानता । परित्यक्ता मया सीता तद् भवान् क्षन्तुमर्हति ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘किंतु आगे चलकर फिर बड़े जोरका लोकापवाद उठा, जिससे विवश होकर मुझे मिथिलेशकुमारीका त्याग करना पड़ा । ब्रह्मन् ! यह जानते हुए भी कि सीता सर्वथा निष्पाप हैं, मैंने केवल समाजके भयसे इन्हें छोड़ दिया था; अतः आप मेरे इस अपराधको क्षमा करें ॥ ४ ॥

जानामि चेमौ पुत्रौ मे यमजातौ कुशीलवौ । शुद्धायां जगतो मध्ये मैथिल्यां प्रीतिरस्तु मे ॥ ५ ॥ अभिप्रायं तु विज्ञाय रामस्य सुरसत्तमाः । सीतायाः शपथे तस्मिन् महेन्द्राद्या महौजसः ॥ ६ ॥ पितामहं पुरस्कृत्य सर्व एव समागताः ।

भावार्थ

‘मैं यह भी जानता हूँ कि ये जुड़वे उत्पन्न हुए कुमार कुश और लव मेरे ही पुत्र हैं, तथापि जनसमुदायमें शुद्ध प्रमाणित होनेपर ही मिथिलेशकुमारीमें मेरा प्रेम हो सकता है’॥ श्रीरामचन्द्रजीके अभिप्रायको जानकर सीताके शपथके समय महेन्द्र आदि सभी मुख्य-मुख्य महातेजस्वी देवता पितामह ब्रह्माजीको आगे करके वहाँ आ गये ॥ ६½ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः ॥ ७ ॥ साध्याश्च देवाः सर्वे ते सर्वे च परमर्षयः । नागाः सुपर्णाः सिद्धाश्च ते सर्वे हृष्टमानसाः ॥ ८ ॥ सीताशपथसम्भ्रान्ताः सर्व एव समागताः ।

भावार्थ

आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, समस्त साध्य-देव, सभी महर्षि, नाग, गरुड़ और सम्पूर्ण सिद्धगण प्रसन्नचित्त हो सीताजीके शपथ-ग्रहणको देखनेके लिये घबराये हुए-से वहाँ आ पहुँचे ॥ ७-८½ ॥

दृष्ट्वा देवानृषींश्चैव राघवः पुनरब्रवीत् ॥ ९ ॥ प्रत्ययो मे सुरश्रेष्ठ ऋषिवाक्यैरकल्मषैः । शुद्धायां जगतो मध्ये वैदेह्यां प्रीतिरस्तु मे ॥ १० ॥

भावार्थ

देवताओं तथा ऋषियोंको उपस्थित देख श्रीरघुनाथजी फिर बोले—‘सुरश्रेष्ठगण ! यद्यपि मुझे महर्षि वाल्मीकिके निर्दोष वचनोंसे ही पूरा विश्वास हो गया है, तथापि जन-समाजके बीच विदेहकुमारीकी विशुद्धता प्रमाणित हो जानेपर मुझे अधिक प्रसन्नता होगी’ ॥ ९-१० ॥

ततो वायुः शुभः पुण्यो दिव्यगन्धो मनोरमः । तं जनौघं सुरश्रेष्ठो ह्लादयामास सर्वतः ॥ ११ ॥

भावार्थ

तदनन्तर दिव्य सुगन्धसे परिपूर्ण, मनको आनन्द देनेवाले परम पवित्र एवं शुभकारक सुरश्रेष्ठ वायुदेव मन्दगतिसे प्रवाहित हो सब ओरसे वहाँके जनसमुदायको आह्लाद प्रदान करने लगे ॥ ११ ॥

तदद्भुतमिवाचिन्त्यं निरैक्षन्त समाहिताः । मानवाः सर्वराष्ट्रेभ्यः पूर्वं कृतयुगे यथा ॥ १२ ॥

भावार्थ

समस्त राष्ट्रोंसे आये हुए मनुष्योंने एकाग्रचित्त हो प्राचीन कालके सत्ययुगकी भाँति यह अद्भुत और अचिन्त्य-सी घटना अपनी आँखों देखी ॥ १२ ॥

सर्वान् समागतान् दृष्ट्वा सीता काषायवासिनी । अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यमधोदृष्टिरवाङ्मुखी ॥ १३ ॥

भावार्थ

उस समय सीताजी तपस्विनियोंके अनुरूप गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए थीं । सबको उपस्थित जानकर वे हाथ जोड़े, दृष्टि और मुखको नीचे किये बोलीं—॥ १३ ॥

यथाहं राघवादन्यं मनसापि न चिन्तये । तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘मैं श्रीरघुनाथजीके सिवा दूसरे किसी पुरुषका ( स्पर्श तो दूर रहा ) मनसे चिन्तन भी नहीं करती; यदि यह सत्य है तो भगवती पृथ्वीदेवी मुझे अपनी गोदमें स्थान दें ॥ १४ ॥

मनसा कर्मणा वाचा यथा रामं समर्चये । तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘यदि मैं मन, वाणी और क्रियाके द्वारा केवल श्रीरामकी ही आराधना करती हूँ तो भगवती पृथ्वीदेवी मुझे अपनी गोदमें स्थान दें ॥ १५ ॥

यथैतत् सत्यमुक्तं मे वेद्मि रामात् परं न च । तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘भगवान् श्रीरामको छोड़कर मैं दूसरे किसी पुरुषको नहीं जानती, मेरी कही हुई यह बात यदि सत्य हो तो भगवती पृथ्वीदेवी मुझे अपनी गोदमें स्थान दें’ ॥ १६ ॥

तथा शपन्त्यां वैदेह्यां प्रादुरासीत् तदद्भुतम् । भूतलादुत्थितं दिव्यं सिंहासनमनुत्तमम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

विदेहकुमारी सीताके इस प्रकार शपथ करते ही भूतलसे एक अद्भुत सिंहासन प्रकट हुआ, जो बड़ा ही सुन्दर और दिव्य था ॥ १७ ॥

ध्रियमाणं शिरोभिस्तु नागैरमितविक्रमैः । दिव्यं दिव्येन वपुषा दिव्यरत्नविभूषितैः ॥ १८ ॥

भावार्थ

दिव्य रत्नोंसे विभूषित महापराक्रमी नागोंने दिव्य रूप धारण करके उस दिव्य सिंहासनको अपने सिरपर धारण कर रक्खा था ॥ १८ ॥

तस्मिंस्तु धरणी देवी बाहुभ्यां गृह्य मैथिलीम् । स्वागतेनाभिनन्द्यैनामासने चोपवेशयत् ॥ १९ ॥

भावार्थ

सिंहासनके साथ ही पृथ्वीकी अधिष्ठात्री देवी भी दिव्य रूपसे प्रकट हुईं । उन्होंने मिथिलेशकुमारी सीताको अपनी दोनों भुजाओंसे गोदमें उठा लिया और स्वागतपूर्वक उनका अभिनन्दन करके उन्हें उस सिंहासनपर बिठा दिया ॥ १९ ॥

तामासनगतां दृष्ट्वा प्रविशन्तीं रसातलम् । पुष्पवृष्टिरविच्छिन्ना दिव्या सीतामवाकिरत् ॥ २० ॥ साधुकारश्च सुमहान् देवानां सहसोत्थितः । साधुसाध्विति वै सीते यस्यास्ते शीलमीदृशम्॥२१॥ एवं बहुविधा वाचो ह्यन्तरिक्षगताः सुराः । व्याजह्रुर्हृष्टमनसो दृष्ट्वा सीताप्रवेशनम् ॥ २२ ॥ यज्ञवाटगताश्चापि मुनयः सर्व एव ते । राजानश्च नरव्याघ्रा विस्मयान्नोपरेमिरे ॥ २३ ॥

भावार्थ

सिंहासनपर बैठकर जब सीतादेवी रसातलमें प्रवेश करने लगीं, उस समय देवताओंने उनकी ओर देखा । फिर तो आकाशसे उनके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी लगातार वर्षा होने लगी॥ देवताओंके मुँहसे सहसा ‘धन्य-धन्य’ का महान् शब्द प्रकट हुआ । वे कहने लगे—‘सीते ! तुम धन्य हो, धन्य हो । तुम्हारा शील-स्वभाव इतना सुन्दर और ऐसा पवित्र है’ ॥ सीताका रसातलमें प्रवेश देखकर आकाशमें खड़े हुए देवता प्रसन्नचित्त हो इस तरहकी बहुत-सी बातें कहने लगे ॥ यज्ञमण्डपमें पधारे हुए सभी मुनि और नरश्रेष्ठ नरेश भी आश्चर्यसे भर गये ॥ २३ ॥

अन्तरिक्षे च भूमौ च सर्वे स्थावरजङ्गमाः । दानवाश्च महाकायाः पाताले पन्नगाधिपाः ॥ २४ ॥

भावार्थ

अन्तरिक्षमें और भूतलपर सभी चराचर प्राणी तथा पातालमें विशालकाय दानव और नागराज भी आश्चर्यचकित हो उठे ॥ २४ ॥

केचिद् विनेदुः संहृष्टाः केचिद् ध्यानपरायणाः । केचिद् रामं निरीक्षन्ते केचित् सीतामचेतसः ॥ २५ ॥

भावार्थ

कोई हर्षनाद करने लगे, कोई ध्यानमग्न हो गये, कोई श्रीरामकी ओर देखने लगे और कोई हक्के-बक्के-से होकर सीताजीकी ओर निहारने लगे ॥ २५ ॥

सीताप्रवेशनं दृष्ट्वा तेषामासीत् समागमः । तन्मुहूर्तमिवात्यर्थं समं सम्मोहितं जगत् ॥ २६ ॥

भावार्थ

सीताका भूतलमें प्रवेश देखकर वहाँ आये हुए सब लोग हर्ष, शोक आदिमें डूब गये । दो घड़ी तक वहाँका सारा जनसमुदाय अत्यन्त मोहाच्छन्न-सा हो गया ॥ २६ ॥

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