उत्तरकाण्ड, सर्ग 98
तस्यां रजन्यां व्युष्टायां यज्ञवाटं गतो नृपः । ऋषीन् सर्वान् महातेजाः शब्दापयति राघवः ॥ १ ॥
भावार्थ
रात बीती, सवेरा हुआ और महातेजस्वी राजा श्रीरामचन्द्रजी यज्ञशालामें पधारे । उस समय उन्होंने समस्त ऋषियोंको बुलवाया ॥ १ ॥
वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिरथ काश्यपः । विश्वामित्रो दीर्घतमा दुर्वासाश्च महातपाः ॥ २ ॥ पुलस्त्योऽपि तथा शक्तिर्भार्गवश्चैव वामनः । मार्कण्डेयश्च दीर्घायुर्मौद्गल्यश्च महायशाः ॥ ३ ॥ गर्गश्च च्यवनश्चैव शतानन्दश्च धर्मवित् । भरद्वाजश्च तेजस्वी अग्निपुत्रश्च सुप्रभः ॥ ४ ॥ नारदः पर्वतश्चैव गौतमश्च महायशाः । कात्यायनः सुयज्ञश्च ह्यगस्त्यस्तपसां निधिः ॥ ५ ॥ एते चान्ये च बहवो मुनयः संशितव्रताः । कौतूहलसमाविष्टाः सर्वे एव समागताः ॥ ६ ॥
भावार्थ
वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, विश्वामित्र, दीर्घतमा, महातपस्वी दुर्वासा, पुलस्त्य, शक्ति, भार्गव, वामन, दीर्घजीवी मार्कण्डेय, महायशस्वी मौद्गल्य, गर्ग, च्यवन, धर्मज्ञ शतानन्द, तेजस्वी भरद्वाज, अग्निपुत्र सुप्रभ, नारद, पर्वत, महायशस्वी गौतम, कात्यायन, सुयज्ञ और तपोनिधि अगस्त्य—ये तथा दूसरे कठोर व्रतका पालन करनेवाले सभी बहुसंख्यक महर्षि कौतूहलवश वहाँ एकत्र हुए ॥ २—६ ॥
राक्षसाश्च महावीर्या वानराश्च महाबलाः । सर्वे एव समाजग्मुर्महात्मानः कुतूहलात् ॥ ७ ॥
भावार्थ
महापराक्रमी राक्षस और महाबली वानर—ये सभी महामना कौतूहलवश वहाँ आये ॥ ७ ॥
क्षत्रिया ये च शूद्राश्च वैश्याश्चैव सहस्रशः । नानादेशगताश्चैव ब्राह्मणाः संशितव्रताः ॥ ८ ॥
भावार्थ
नाना देशोंसे पधारे हुए तीक्ष्ण व्रतधारी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सहस्रोंकी संख्यामें वहाँ उपस्थित हुए ॥ ८ ॥
ज्ञाननिष्ठाः कर्मनिष्ठा योगनिष्ठास्तथापरे । सीताशपथवीक्षार्थं सर्वे एव समागताः ॥ ९ ॥
भावार्थ
सीताजीका शपथ-ग्रहण देखनेके लिये ज्ञाननिष्ठ, कर्मनिष्ठ और योगनिष्ठ सभी तरहके लोग पधारे थे ॥ ९ ॥
तदा समागतं सर्वमश्मभूतमिवाचलम् । श्रुत्वा मुनिवरस्तूर्णं ससीतः समुपागमत् ॥ १० ॥
भावार्थ
राजसभामें एकत्र हुए सब लोग पत्थरकी भाँति निश्चल होकर बैठे हैं—यह सुनकर मुनिवर वाल्मीकि सीताजीको साथ लेकर तुरंत वहाँ आये ॥ १० ॥
तमृर्षि पृष्ठतः सीता अन्वगच्छद्वाङ्मुखी। कृताञ्जलिर्बाष्पकला कृत्वा रामं मनोगतम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
महर्षिके पीछे सीता सिर झुकाये चली आ रही थीं । उनके दोनों हाथ जुड़े थे और नेत्रोंसे आँसू झर रहे थे । वे अपने हृदयमन्दिरमें बैठे हुए श्रीरामका चिन्तन कर रही थीं ॥११॥
तां दृष्ट्वा श्रुतिमायान्तीं ब्रह्माणमनुगामिनीम् । वाल्मीकेः पृष्ठतः सीतां साधुवादो महानभूत् ॥ १२ ॥
भावार्थ
वाल्मीकिके पीछे-पीछे आती हुई सीता ब्रह्माजीका अनुसरण करनेवाली श्रुतिके समान जान पड़ती थीं । उन्हें देखकर वहाँ धन्य-धन्यकी भारी आवाज गूँज उठी ॥ १२ ॥
ततो हलहलाशब्दः सर्वेषामेवमाबभौ । दुःखजन्मविशालेन शोकेनाकुलितात्मनाम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
उस समय समस्त दर्शकोंका हृदय दुःख देनेवाले महान् शोकसे व्याकुल था । उन सबका कोलाहल सब ओर व्याप्त हो गया ॥ १३ ॥
साधु रामेति केचित् तु साधु सीतेति चापरे । उभावेव च तत्रान्ये प्रेक्षकाः सम्प्रचुक्रुशुः ॥ १४ ॥
भावार्थ
कोई कहते थे——‘श्रीराम ! तुम धन्य हो।’ दूसरे कहते थे–‘देवि सीते ! तुम धन्य हो’ तथा वहाँ कुछ अन्य दर्शक भी ऐसे थे, जो सीता और राम दोनोंको उच्चस्वरसे साधुवाद दे रहे थे ॥ १४ ॥
ततो मध्ये जनौघस्य प्रविश्य मुनिपुङ्गवः । सीतासहायो वाल्मीकिरिति होवाच राघवम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
तब उस जनसमुदायके बीचमें सीतासहित प्रवेश करके मुनिवर वाल्मीकि श्रीरघुनाथजीसे इस प्रकार बोले—॥१५॥
इयं दाशरथे सीता सुव्रता धर्मचारिणी । अपवादात् परित्यक्ता ममाश्रमसमीपतः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘दशरथनन्दन ! यह सीता उत्तम व्रतका पालन करनेवाली और धर्मपरायणा है । आपने लोकापवादसे डरकर इसे मेरे आश्रमके समीप त्याग दिया था ॥ १६ ॥
लोकापवादभीतस्य तव राम महाव्रत । प्रत्ययं दास्यते सीता तामनुज्ञातुमर्हसि ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘महान् व्रतधारी श्रीराम ! लोकापवादसे डरे हुए आपको सीता अपनी शुद्धताका विश्वास दिलायेगी । इसके लिये आप इसे आज्ञा दें ॥ १७ ॥
इमौ तु जानकीपुत्रावुभौ च यमजातकौ । सुतौ तवैव दुर्धर्षौ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘ये दोनों कुमार कुश और लव जानकीके गर्भसे जुड़वे पैदा हुए हैं । ये आपके ही पुत्र हैं और आपके ही समान दुर्धर्ष वीर हैं, यह मैं आपको सच्ची बात बता रहा हूँ ॥१८॥
प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन । न स्मराम्यनृतं वाक्यमिमौ तु तव पुत्रकौ ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘रघुकुलनन्दन ! मैं प्रचेता ( वरुण ) का दसवाँ पुत्र हूँ । मेरे मुँहसे कभी झूठ बात निकली हो, इसकी याद मुझे नहीं है । मैं सत्य कहता हूँ ये दोनों आपके ही पुत्र हैं ॥१९॥
बहुवर्षसहस्राणि तपश्चर्या मया कृता । नोपाश्नीयां फलं तस्या दुष्टेयं यदि मैथिली ॥ २० ॥
भावार्थ
‘मैंने कई हजार वर्षोंतक भारी तपस्या की है । यदि मिथिलेशकुमारी सीतामें कोई दोष हो तो मुझे उस तपस्याका फल न मिले ॥ २० ॥
मनसा कर्मणा वाचा भूतपूर्वं न किल्बिषम् । तस्याहं फलमश्नामि अपापा मैथिली यदि ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा भी पहले कभी कोई पाप नहीं किया है । यदि मिथिलेशकुमारी सीता निष्पाप हों, तभी मुझे अपने उस पापशून्य पुण्यकर्मका फल प्राप्त हो ॥२१॥
अहं पञ्चसु भूतेषु मनःषष्ठेषु राघव । विचिन्त्य सीता शुद्धेति जग्राह वननिर्झरे ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! मैंने अपनी पाँचों इन्द्रियों और मन-बुद्धिके द्वारा सीताकी शुद्धताका भलीभाँति निश्चय करके ही इसे अपने संरक्षणमें लिया था । यह मुझे जंगलमें एक झरनेके पास मिली थी ॥ २२ ॥
इयं शुद्धसमाचारा अपापा पतिदेवता । लोकापवादभीतस्य प्रत्ययं तव दास्यति ॥ २३ ॥ तस्मादियं नरवरात्मज शुद्धभावा दिव्येन दृष्टिविषयेण मया प्रविष्टा । लोकापवादकलुषीकृतचेतसा या त्यक्ता त्वया प्रियतमा विदितापि शुद्धा॥ २४ ॥
भावार्थ
‘इसका आचरण सर्वथा शुद्ध है । पाप इसे छू भी नहीं सका है तथा यह पतिको ही देवता मानती है । अतः लोकापवादसे डरे हुए आपको अपनी शुद्धताका विश्वास दिलायेगी॥ ‘राजकुमार ! मैंने दिव्य दृष्टिसे यह जान लिया था कि सीताका भाव और विचार परम पवित्र है; इसलिये यह मेरे आश्रममें प्रवेश पा सकी है । आपको भी यह प्राणोंसे अधिक प्यारी है और आप यह भी जानते हैं कि सीता सर्वथा शुद्ध है तथापि लोकापवादसे कलुषितचित्त होकर आपने इसका त्याग किया है’ ॥ २४ ॥
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